Close

कहानी- सोना (Short Story- Sona)

“मैं बहुत ग़ुस्से में चला गया था. ग़ुस्सा ख़ुद पर था, तुझ पर उतार दिया. मेरे भीतर जैसे लावा बह रहा था, लेकिन अब ग़ुस्सा करने की बारी तुम्हारी है. मैं क्या करूं? मैं तुम्हारे लायक नहीं रहा, मुझे किस जन्म का यह दंड मिला है?”

सुबह बहुत जल्दी ही आंख खुल गई थी. लाइट जला कर घड़ी देखी तो छह बज रहे थे. सुजाता ने रजाई सिर तक ओढ़ कर फिर से सोने की कोशिश की, दो-तीन बार करवट बदली, पर नींद नहीं आई. एसी का स्विच बंद कर दिया. दरवाज़ा खोल कर बाहर आ गई. गीली मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू उसके पूरे शरीर में समा गई. रात में बारिश हो गई थी और उसे पता ही नहीं चला था. मौसम की पहली बारिश, बाहर ही नहीं, सुजाता के भीतर भी कुछ गहरे तक भीग गया था.

उसने चारों ओर नज़र घुमाई. बगीचे की तो जैसे सूरत ही बदल गई थी. एक रात की बारिश में बगीचा नया-नया सा हो उठा था. नंगे पांव धीरे से उसने लॉन में कदम रखा. घास बहुत गीली थी, सुजाता को अच्छा लगा. गीली लॉन पर चलते हुए पैरों से लगी ठंडक पूरे शरीर में फैल गई. क्या फिर से बारिश होगी? उसने आसमान की ओर देखा, पर ऐसा लगा नहीं. बरसने के बाद आसमान जैसे हल्का हो गया था. उसकी आंखें भी इसी तरह बहुत बरसी थीं, लेकिन वह ख़ुद हल्की नहीं हुई थी, बल्कि और गंभीर हो गई थी.

मन के सबसे निचले तह में दबा दी गई सारी स्मृतियां इस ख़ुशबू और इस गीले स्पर्श से जैसे जाग उठी थीं. सुजाता ने सोचा कि इस बार जो-जो पल याद आएंगे, उन सबका वह स्वागत करेगी. सब को शांति से देखेगी, मिलेगी और स्वीकार करेगी. इस बारिश में वह ज़रूर हल्की हो जाएगी.

कुमार क्या कर रहा होगा? अगर कुमार यहां होता तो आज की बारिश में सुजाता उसके साथ जीती. एयरकंडीशन वाले बंद कमरे में पत्नी के साथ गहरी नींद में होने पर भी कुमार की आंख खुल जाती थी. न जाने कैसे उसे गीली मिट्टी की ख़ुशबू आ जाती थी. वह सुजाता को झकझोर देता. दोनों लॉन में दौड़ पड़ते और फिर पूरी तरह भीग जाते.

यह भी पढ़ें: रिश्तों में परफेक्शन नहीं, ढूंढ़ें कनेक्शन (Relationship Isn’t About Chasing Perfection, It’s About Finding Connetion)

राधा कॉफी की ट्रे लेकर आई. सुजाता के मन में सवाल उठा कि इस राधा को मेरे जागने की ख़बर कैसे मिल जाती है?

“दीदी, आज तो रविवार है, फिर भी इतनी जल्दी उठ गईं? नींद नहीं आई?”

सुजाता मुंह धो कर आई, नैपकिन से मुंह पोंछते हुए वहीं फर्श पर बैठ गई.

“रात को बहुत बारिश हुई थी?” सुजाता ने पलट कर पूछा.

“हां दीदी, मूसलाधार बारिश हुई थी, कॉफी यहीं ले आऊं?”

राधा ने ट्रे से कॉफी का मग उठा कर सुजाता को दे दिया. सुजाता जानती थी कि राधा सवाल सिर्फ़ पूछने के लिए पूछती थी. उसकी आंखों में कभी सवाल नहीं होते थे. बिल्कुल शांत आंखें. जैसे वह सुजाता को पूरी तरह जानती हो.

सुजाता ने मग हाथ में पकड़ा. मग की गर्माहट, ख़ुशबू भरी भाप, एक पल उस नशे को जीते हुए उसने राधा से पूछा, “तू बारिश में भीगी थी?”

“नहीं दीदी मन तो करता है, पर सर्दी लग जाए और बीमार पड़ जाऊं तो घर का काम रुक जाएगा न?"

घर का काम ही राधा का जीवन था. पूरे घर को उसने जैसे अपने कंधों पर उठा रखा था. सुजाता को कभी कुछ कहना न पड़े, ऐसा वह हर काम चुपचाप, सलीके से कर देती थी.

“और कॉफी दूं?”

“हूं? नहीं, नहा कर पीऊंगी.”

सुजाता कुछ सोच में डूबी थी. राधा मग ले कर टेबल की ओर चली गई. ट्रे उठा कर रसोई की तरफ़ जाने ही वाली थी कि सुजाता बोली, “आज खाना मैं बनाऊंगी। तुझे कहीं जाना हो तो चली जा."

“बाज़ार का तो कोई काम है नहीं, और इसके अलावा मैं कहां जाऊं? ऐसा करती हूं, आज लाइब्रेरी साफ़ कर लेती हूं.”

कुमार और सुजाता दोनों को पढ़ने का बहुत शौक था. इसी शौक के कारण उन्होंने छोटी सी निजी लाइब्रेरी बना ली थी. पढ़ने की इसी रुचि ने उन्हें एक-दूसरे के क़रीब लाया था. सुजाता मूलतः दिल्ली की रहने वाली थी, लेकिन पिता की अचानक मृत्यु के बाद वह बिल्कुल अकेली रह गई थी. मां तो बहुत पहले, जब वह बारह साल की थी, तभी एक बड़ी बीमारी के बाद चल बसी थीं. सुजाता इकलौती संतान थी. क़रीबी रिश्तेदार भी कोई ख़ास नहीं थे. रीता उसकी एकमात्र घनिष्ठ मित्र थी. दोनों ने साथ बचपन बिताया था. रीता के पिता का तबादला मुंबई हो गया था, पर उनकी दोस्ती में कोई दूरी नहीं आई. हर छुट्टी में रीता दिल्ली आती थी. पिता की मृत्यु के समय भी रीता और उसके पिता ने ही आ कर सब कुछ संभाला था.

यह भी पढ़ें: ग़ुस्सैल और चिड़चिड़े पार्टनर को कैसे करें डील? (How To Deal With An Angry And Irritable Partner?)

अंकल की मदद से सुजाता ने दिल्ली की स्मृतियों और पिता की संपत्ति समेटी और मुंबई आ कर बस गई थी. कुमार से उसकी मुलाक़ात कॉलेज में हुई थी. दोनों एक ही क्लास में थे. पढ़ने के शौक ने किताबों के आदान-प्रदान से शुरुआत करवाई. विचारों का आदान-प्रदान दोस्ती में बदला और उसी साल बरसात के साथ-साथ प्रेम भी पनप गया.

कुमार स्वभाव से गंभीर था. उसके पिता उसे बहुत सारा धन विरासत में दे गए थे. समझ आने के बाद से ही पैसा उसके आसपास रहा था. माता-पिता के झगड़े, मां का उसे पिता के पास छोड़ कर चले जाना, शायद इसी कारण उसके स्वभाव में गंभीरता आ गई थी. लेकिन बारिश आते ही कुछ समय के लिए कुमार भी बदल जाता. बारिश उसके स्वभाव को धो देती और उसके भीतर का आनंद बाहर छलक आता.

कुमार कहता था, “बारिश होती है न, तो मैं भीतर से उमड़ने लगता हूं. तुझे देख कर भी मैं छलक जाता हूं. मैं अपने बच्चे को कभी यह दुख नहीं आने दूंगा.”

जब-जब कुमार उस दुख की छाया में डूब जाता, बिल्कुल चुप हो जाता. इतना चुप, जैसे वहां हो ही नहीं. उस समय वह अकेला जीता. किसी को अपने भीतर आने नहीं देता, सुजाता को भी नहीं. कभी-कभी वह पुणे में सुमित के घर चला जाता. सुमित और कुमार ने साथ मिल कर बिज़नेस शुरू किया था. कुमार मुंबई का दफ़्तर संभालता था और सुमित पुणे का.

कुछ समय पहले सुमित मुंबई आया था और तेज बुखार में अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था. कुमार ने जिस तरह उसकी देखभाल की थी, वह देखने लायक थी. ज़रूरत पड़ने पर उसने अपना ख़ून भी दे दिया था. सुमित को बचाते-बचाते कुमार ख़ुद कमजोर हो गया था. शायद उसी समय वह और ज़्यादा अकेला हो गया था. सुजाता से झगड़ा कर वह चला गया था।

कुमार अभी सुमित के घर ही होगा या यहां आने के लिए निकल पड़ा होगा? उसे पता चला होगा कि मुंबई में रात को बारिश हुई है, तो क्या वह आज आएगा? शायद आज आएगा ही, इसलिए ही उसने उसके पसंद का खाना बनाने का सोचा. एक साथ कितने ही विचार मन में उमड़ रहे थे.

नहा कर सुजाता रसोई में लग गई. आज सारी यादें एक साथ उमड़ आई थीं. बच्चे के होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे और कुमार भीतर ही भीतर कुंठित होता जा रहा था.

एक सुबह उसने कहा था, “रीता के साथ जाकर डॉक्टर को दिखा आओ.”

“मुझे इच्छा नहीं है.”

“किस बात की? बच्चे की?”

“मुझे डॉक्टर से कंसल्ट नहीं करना है.”

“पर क्यों?”

“डॉक्टर को दिखाने की ज़रूरत मुझे नहीं, तुम्हें है. देखो, कैसे हो गए हो तुम, बार-बार बुखार आता है, सिरदर्द करता है. चलो, किसी अच्छे डाक्टर को दिखाते हैं.”

इस जवाब पर कुमार ग़ुस्से में घर से निकल गया था. शायद उसे अपनी मां याद आ गई होगी, एक लापरवाह मां, जिसने झगड़ों में बेटे को होम दिया. उसे लगा होगा कि क्या सुजाता भी इतनी ही बेफ़िक्र है कि बच्चे को जन्म ही नहीं देना चाहती?

कुमार बिना बताए पुणे चला गया था. अब सुजाता उसे समझ पा रही थी. जिस पीड़ा में कुमार जीता रहा था, उसे अब उसकी अनुपस्थिति में समझ आया था.

सुमित का फोन आया था. उसने समझाया था और कहा था कि वह कुमार को अपने डॉक्टर के पास ले जाएगा. सुजाता भी रीता के साथ डॉक्टर के पास गई थी. टेस्ट कराए गए. रिपोर्ट्स नॉर्मल थीं. वह ख़ुश थी. उसने कुमार से बात करना चाहा, लेकिन कुमार फोन पर नहीं आया. सुमित से आग्रह किया कि वह कुमार को समझाए, पर सुमित ने बस 'हां-ना'' में जवाब दे कर फोन रख दिया था.

खाना बन चुका था. राधा ने सफ़ाई भी कर ली थी. सुजाता फिर फ़र्श पर बैठ गई.

'कुमार…' वह मन ही मन रो पड़ी , 'कुमार, आ जाओ न! देखो, यह बारिश भी आ गई और तुम अभी तक नहीं आए अब तो आ जाओ न!..'

“सुजाता,!” वह चौंकी. सामने कुमार खड़ा था. वह उठ भी नहीं सकी. कुमार उसके पैरों के पास बैठ गया. सुजाता देखती रही कि क्या कुमार रो रहा था? या उसकी अपनी भीगी आंखों का प्रतिबिंब कुमार की आंखों में उतर आया था?

कुमार बोलने लगा, “मैं बहुत ग़ुस्से में चला गया था. ग़ुस्सा ख़ुद पर था, तुझ पर उतार दिया. मेरे भीतर जैसे लावा बह रहा था, लेकिन अब ग़ुस्सा करने की बारी तुम्हारी है. मैं क्या करूं? मैं तुम्हारे लायक नहीं रहा, मुझे किस जन्म का यह दंड मिला है?”

यह भी पढ़ें: इन बेस्ट कॉम्प्लिमेंट्स से जीतें अपने पति का दिल! (6 Best Compliments Men Would Love To Hear)

वह बेसिर-पैर की बातें कर रहा था. सुजाता कुछ समझ नहीं पा रही थी.

कुमार रो पड़ा, “सुजाता, तुम मुझे अपने भीतर आने दोगी न?”

सुजाता स्तब्ध! तभी सुमित भी आ गया. उसकी आंखों में भी आंसू थे.

सुमित ने कहा, “मुझे बचाने में कुमार ख़ुद होम गया. उसने मुझे अपना शुद्ध ख़ून दिया, लेकिन अस्पताल की लापरवाही या हमारे बुरे नसीब से कुमार एचआईवी पॉजिटिव हो गया है.”

सुजाता के सिर पर जैसे आसमान टूट पड़ा. कौन किसे सहारा दे?

पता नहीं कितना समय बीत गया और दिन भी यूं ही गुज़रने लगे.

सुजाता और सुमित को लगा कि अब सिर्फ़ एक बच्चे की मौजूदगी ही कुमार को फिर से हंसा सकती है. उन्होंने आश्रम से एक बच्चा गोद लेने का निर्णय लिया. सारी ज़िम्मेदारी सुमित ने ली और वे एक प्यारी सी बच्ची सोना को घर ले आए.

कुमार लॉन में झूले पर शून्य मन बैठा था. सुजाता ने धीरे से सोना को उसकी गोद में बैठाया और उसके पास झूले पर बैठ गई. सुमित राधा को बच्ची के खाने और दवाइयों के निर्देश देने लगा.

कुमार की आंखों में चमक आ गई. होंठों पर मुस्कान. वह सोना के सिर पर हाथ फेरने लगा. उसे खिलाने लगा. सोना भी जैसे वर्षों की पहचान हो, खिलखिलाकर हंसने लगी.

अचानक कुमार बोला, “इसे तो बुखार जैसा लग रहा है.”

“हां, पर हम दवा करा देंगे.”

थोड़ी देर बाद सुजाता ने कहा, “कुमार, अगर अनजाने में हमारा अपना बच्चा होता तो वह भी हमारी वजह से एचआईवी होता न. इसलिए मैंने ख़ास सोना को चुना है.”

“तो क्या… सोना?”

“हां हम इसे संभालेंगे.”

कुमार ने उस एक शब्द को भीतर उतारते हुए सोना को और क़रीब कर लिया, जैसे उसका ही एक हिस्सा आज बाहर आ गया हो.

“मैं भी इसमें शामिल हूं.” सुमित ने पास आकर सोना को उठाते हुए कहा.

“और मैं भी, मेरी सोना को किसी की नज़र न लगे.” कह कर राधा ने उसकी नज़र उतारी.

और उसी पल, आसमान ने भी मन भर कर अमृत की बूंदें बरसा दीं...

- वीरेंद्र बहादुर सिंह 

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES

Photo Courtesy: Freepik

Share this article