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कहानी- पराया (Short Story- Paraya)

संजय की मानसिकता के कारण कभी-कभी मुझे एहसास होने लगता कि सुमेश मेरे लिए भी पराया है. लेकिन आज का दिन मेरे जीवन का सबसे सुखद दिन था. संजय के मुंह से आज मेरा नाम रंजना सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि इन ४० सालों में मैं अपनी पहचान के साथ-साथ अपना नाम भी भूल गई थी.

सुमेश की शादी की वीडियो फिल्म चल रही थी. मैं बड़ी तन्मयता से उसे देख रही थी. मेरे पति संजय, बहुत ख़ुश नज़र आ रहे थे. दोस्तों का हाथ पकड़-पकड़ कर संजय उन्हें खींच लाते और कभी भांगड़ा करते तो कभी बैंड वाले से 'ले जायेंगे... ले जायेंगे, दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे...' गाना बजवाते. संजय को इस तरह ख़ुश देख कर मुझे आत्मीय सुख मिल रहा था. और मिलता भी क्यों न? सुमेश मेरे पहले पति प्रदीप का लड़का था, जिसे स्वीकारने में संजय को बरसों लग गए थे.

कैसेट देखते-देखते मैं यादों को कुरेदने की कोशिश करने लगी और अतीत के समन्दर में खो गई. मैं सुंदर और होशियार लड़की थी और स्कूल-कॉलेज में हमेशा प्रथम ही आती थी. मैं बहुत चंचल स्वभाव की थी. अपनी सहेलियों द्वारा की जाने वाली शैतानियों में मैं ही लीडर रहती थी. इसी तरह मौज-मस्ती में दिन गुज़र रहे थे. लेकिन एक दिन पिताजी को दिल का दौरा पड़ गया और वह इस दुनिया से चल बसे. नियति का मेरे साथ यह पहला खिलवाड़ था. पिताजी के देहांत के बाद मैं और मम्मी अकेले रह गए. पिताजी एक प्राइवेट कम्पनी में काम करते थे, इसलिए उनके जाने के बाद हमारे सामने दो वक़्त की रोटी का प्रश्न खड़ा हो गया. सो बी.ए. करने के बाद मैंने एक कम्पनी में सेक्रेटरी की नौकरी कर ली.

हमारी कम्पनी में ही प्रदीप एक्जीक्यूटिव ऑफिसर थे. हम दोनों ने साथ-साथ काम करते हुए एक-दूसरे को देखा, परखा और समझा था. इधर मम्मी मेरी शादी के लिए चिंतित थीं. प्रदीप उन्हें भी अच्छा लगा और हम दोनों की शादी एक सादे समारोह में हो गई. प्रदीप शालीन और बहुत ही सभ्य पुरुष थे. मम्मी की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने उठा ली थी. ज़िंदगी के कुछ दिन तो ऐसे बीते कि लगा मानो समय को पंख लग गए हों और हम उड़े जा रहे हों.

इसी बीच मैं गर्भवती हो गई. प्रदीप कम्पनी के काम से अक्सर दौरे पर जाया करते थे. एक बार जब वह दिल्ली से मद्रास जा रहे थे, तब उनका प्लेन क्रैश हो गया और नियति ने मुझसे मेरे प्रदीप को छीन लिया. मेरा सब कुछ लुट चुका था. तक़दीर ने मेरे साथ यह दूसरी बार खिलवाड़ किया था. मम्मी और मैं फिर अकेले रह गए.

हां, इस बार प्रदीप की याद ज़रूर मेरी कोख में थी. सच में बड़ा कष्टप्रद होता है, ऐसी याद को अपनी कोख में रखने, पालने और जन्म देने में, लेकिन मैंने इन परिस्थितियों से भी समझौता कर लिया था.

कम्पनी ने प्रदीप की कार्य-कुशलता को देखते हुए काफ़ी पैसे दिए थे. अब मैं और मम्मी अपने फ्लैट में आ गए. कुछ ही दिनों बाद बेटे (सुमेश) का जन्म हुआ. बिल्कुल प्रदीप पर गया था. मैं उसे पाकर अपना पुराना दुख-दर्द भूल गयी. मेरी उम्र को देखते हुए मम्मी फिर चिंतित रहने लगी थीं कि इतनी बड़ी ज़िंदगी मैं अकेले कैसे गुज़ारूंगी. मम्मी अक्सर मेरे मन को टटोलने की कोशिश करतीं कि मैं दूसरी बार शादी करूंगी या नहीं. अब सवाल यह था कि भले ही मैं सुंदर थी, अच्छी नौकरी करती थी, लेकिन थी तो विधवा ही ना, और एक बच्चे की मां भी. तब मम्मी का तर्क होता कि कोई ज़रूरतमंद ही मिल जाए, तो बेटी मेरी चिंता दूर हो जाए.

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मेरे बारे में सब कुछ जानकर उसके मन में मेरे प्रति सहानुभूति हो गई और उसकी सहानुभूति पाकर मैं उसके क़रीब होती चली गई. उसका समीप्य पाने के लिए मैं हमेशा उतावली रहती. परन्तु मैं उसे अपनी मजबूरी बनाना नहीं चाहती थी.

मम्मी अपनी इस चिंता को लिए हुए ही इस दुनिया से चली गईं और अब मैं और सुमेश अकेले रह गए. धीरे-धीरे सुमेश बड़ा होने लगा और उसके प्रति मेरी ज़िम्मेदारियां बढ़ने लगीं. मेरा पूरा दिन तो भागदौड़ में गुज़र जाता, लेकिन रातें तन्हाई में इसी बीच संजय ने हमारी कंपनी ज्वाइन कर ली. वह ग़रीब ज़रूर था, लेकिन था शालीन. मेरे बारे में सब कुछ जानकर उसके मन में मेरे प्रति सहानुभूति हो गई और उसकी सहानुभूति पाकर मैं उसके क़रीब होती चली गई. उसका समीप्य पाने के लिए मैं हमेशा उतावली रहती, परन्तु मैं उसे अपनी मजबूरी बनाना नहीं चाहती थी.

संजय मेरी सुन्दरता पर मुग्ध था. मैंने उसके सामने अपनी ज़िन्दगी को खुली किताब बनाकर पेश कर दिया था. कोई बात नहीं छुपाई थी मैंने उससे. यह भी बता दिया कि सुमेश मेरे पति के प्यार की निशानी है और मेरे जीने का सहारा भी. मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग है वह, उसे मैं अपने जीवन से अलग नहीं कर सकती. पर संजय मुझे पाने के लिए मेरी हर शर्त मानने को तैयार हो गया. सुमेश को अपनाना भी उसने मंज़ूर कर लिया और फिर हमने कोर्ट में शादी कर ली.

शादी तो हो गई. पर मुझे महसूस होने लगा कि संजय मन से सुमेश को स्वीकार नहीं कर पा रहा था. उसे मुझसे प्यार था, मैरी तकलीफ़ को वह सुनता था और उसका समाधान भी निकालता था, लेकिन सुमेश के लिए वह प्रतिक्रियाहीन था. मुझे आज भी वो दिन याद है, जब सुमेश को तेज बुखार था. मैं रात भर ठंडे पानी की पट्टियां उसके माथे पर रखती रही, लेकिन संजय को जैसे सुमेश से कोई मतलब ही नहीं था. कभी-कभार औपचारिकता के नाते उसने सुमेश की तबियत के बारे में पूछ ज़रूर लिया. फिर अगले दो-तीन दिन तक मैंने ही कम्पनी से सुमेश की देखभाल के लिए छुट्टी ले ली थी.

एक तरह से संजय की निगाह में सुमेश पराया होता जा रहा था. इसी धारणा के चलते संजय और मेरी तक़रार भी होने लगी. मैं सोचती, नारी की भावनाएं वट वृक्ष के समान विशाल होती हैं, वह अपने आंचल में सभी को समा लेती है, लेकिन पुरुष अपनी संकुचित और ईर्ष्यालु भावना के कारण ऐसा नहीं कर पाता. शायद इसी का परिणाम था कि सुमेश संजय की निगाह में उपेक्षित था.

संजय ने एक-दो बार सुमेश को पढ़ाने के लिए देहरादून भेजने का प्रस्ताव रखा, जिसे मैंने ठुकरा दिया. मैंने तो यह निश्चय कर लिया था कि सुमेश के बाद, अब मैं किसी अन्य बच्चे की अपने जीवन में कल्पना ही नहीं करूंगी. लेकिन संजय के लिए शादी के बाद शायद यह ज़्यादा दिन तक संभव नहीं था. मैं पुनः गर्भवती हो गई. जब संजय को इस बात का पता चला तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. जिस तरह मैंने प्रदीप की अमानत को अपनी कोख में पाला था, उसी तरह अब संजय की अमानत मेरी कोख में पल रही थी. संजय को अपने ख़ुद के बच्चे के बाप बनने की ख़ुशी थी, लेकिन उसने मेरे दिल में झांकने की कोशिश नहीं की, मेरी मानसिकता समझने की कोशिश नहीं की. खैर, सुमेश तो मेरा अपना है ही और आने वाला बच्चा भी मेरा ही होगा, इसलिए मैं संजय की ख़ुशी को अपनी ख़ुशी समझकर उसका साथ देने लगी.

सुमेश अब स्कूल जाने लगा था और इधर घर में सुमेश का छोटा भाई रूमेश आ गया था. रूमेश के प्रति संजय अधिक संवेदनशील था, उसे छींक भी आती तो वह परेशान हो जाता. सुमेश की ओर यदि मैं थोड़ा भी ज़्यादा ध्यान देती तो संजय को बुरा लगता. वह चाहता था कि मैं पूरा समय रूमेश को ही दूं. भले ही संजय के लिए सुमेश और रूमेश अलग-अलग हों, लेकिन ये दोनों ही मेरी आंखों के तारे थे.

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रात दिन संजय 'रूमेश-रूमेश' की रट लगाए रखता. सुमेश, जो अब तक काफ़ी कुछ समझने लगा था, इस बात से दुखी रहता कि पापा उसे उपेक्षित क्यों करते हैं. तब मैं ही उसे समझाती, "बेटा तुम बड़े हो गए हो, जबकि तुम्हारा भाई रूमेश अभी छोटा है और छोटों पर ज़्यादा ध्यान देना पड़ता है, इसीलिए पापा रूमेश पर ज़्यादा ध्यान देते हैं. तुम परेशान मत रहा करो, मैं तो हूं ना तुम्हारा ध्यान रखने वाली..." और तब सुमेश का बाल सुलभ मन मेरी बात से ख़ुश हो जाता.

सुमेश पढ़ाई में बहुत तेज था. इसी के साथ-साथ वह खेल-कूद, पेंटिंग आदि क्रियाकलापों में भी आगे रहता. उसकी इन उपलब्धियों से मेरा मन प्रफुल्लित हो जाता, लेकिन जब मैं सुमेश की उपलब्धियों के बारे में संजय को बताती तो वह बिना कुछ कहे उठकर चला जाता. मैं सुमेश को और अधिक सफलताएं प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया करती. अब रूमेश भी बड़ा हो गया था और स्कूल जाने लगा था. उसे लेने के लिए ऑटो रिक्शा आता था. रूमेश पढ़ाई में कमज़ोर था. सो उसके भविष्य के लिए संजय बहुत चिंतित रहता था. उसकी पढ़ाई के लिए उसने दो-तीन ट्यूटर भी लगा दिए थे. अब एक बार फिर ऑफिस बच्चे और पति इसी के बीच ज़िंदगी गुज़रने लगी थी.

एक दिन ऑफिस में स्कूल से फोन आया कि रूमेश को लेकर जाने वाले ऑटो-रिक्शा का एक्सीडेंट हो गया है, और रूमेश इंडियन इंस्टीट्यूट में भर्ती है. मैं और संजय जब तक वहां पहुंचे, तब तक नियति मेरे साथ फिर एक क्रूर खिलवाड़ कर चुकी थी. हमारा अपना रूमेश अब इस दुनिया में नहीं था. संजय तो जैसे पागल ही हो गए थे. मैं तो समय के थपेड़े खाते-खाते कुछ कठोर हो गई थी. इसलिए सुमेश और संजय को संभाले हुए थी. मेरा दिल अंदर से रो रहा था, लेकिन इसे भी समय का क्रूर मज़ाक समझ कर मैं सब सहती गई.

जीवन रूपी समन्दर में आया यह तूफ़ान भी शांत हो चला था. रूमेश की यादें ही अब हमारे साथ थीं. रूमेश के जाने के बाद संजय उदास रहने लगा. मैं इस डर से सुमेश को, संजय से दूर रखने की कोशिश करती कि सुमेश को सामने देखकर संजय के दिल में रूमेश की याद का दबा गुबार कहीं फिर न उठ जाए. सुमेश भी रूमेश के बिछड़ने के दुख को भुला नहीं पा रहा था.

सुमेश ने बी.ई. कर लिया था और एक कम्पनी में इंजीनियर हो गया था. बड़ा हैंडसम और आकर्षक व्यक्तित्व वाला था सुमेश. मैं भी चाहती थी कि कोई अच्छी सी लड़की देखकर सुमेश की शादी कर दी जाए. संजय को जब मैंने अपने इरादे के बारे में बताया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा. आज उसकी प्रतिक्रिया सकारात्मक थी. मैं सोच रही थी कि समय कितना बलवान होता है. समय गुज़रने के साथ-साथ व्यक्ति की विचारधारा और सोच में कितना परिवर्तन हो जाता है. संजय कह रहा था, "रंजना, मेरी संकुचित मानसिकता के कारण तुमने बहुत दर्द सहे और सबसे बड़ी बात, उस दर्द को तुमने अकेले ही पी लिया. वास्तव में अपना पराया कोई नहीं होता. अपने स्वभाव, व्यवहार से ही हम उसे अपना पराया बनाते हैं. सुमेश भी तो मेरा अपना है, लेकिन इस सच्चाई को समझने में मुझे बहुत वक़्त लगा."

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सुमेश पच्चीस साल का हो गया था और इतने सारे साल मैंने मानसिक अनिश्चितता की स्थिति में ही गुज़ारे थे. संजय की मानसिकता के कारण कभी-कभी मुझे एहसास होने लगता कि सुमेश मेरे लिए भी पराया है. लेकिन आज का दिन मेरे जीवन का सबसे सुखद दिन था. संजय के मुंह से आज मेरा नाम रंजना सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि इन ४० सालों में मैं अपनी पहचान के साथ-साथ अपना नाम भी भूल गई थी.

हमारी ही कम्पनी के मिस्टर खन्ना की लड़की सुरभि के साथ सुमेश की शादी तय हो गई. इस बार मैंने ही निश्चय किया था कि सुमेश की शादी बड़ी धूमधाम से करेंगे और जो अरमान मेरी शादी में अधूरे रह गए थे, उन्हें पूरा करेंगे.

"अरे रंजना तुम किन ख़्यालों में खो गई हो, वीडियो फिल्म तो ख़त्म हो गई..." तब मेरी तन्द्रा टूटी. मैंने अपनी आंखों के कोरों में आए ख़ुशी के आंसुओं को पोंछते हुए कहा, "कुछ नहीं संजय, यों ही ज़रा अतीत में खो गई थी." संजय ने परेशान होते हुए कहा, "देखो रंजना, अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता है, रात के दस बज रहे हैं और इन सुमेश महाशय का पता ही नहीं है. अरे अब तो घर में बहू भी आ गई है... उससे कह देना कि ज़्यादा से ज़्यादा आठ बजे तक घर पहुंच जाया करे..." तभी सुमेश ने कमरे में आते हुए कहा, "हां पापा, आज अचानक काम आने के कारण देर हो गई, कल से आपका सुमेश आठ बजे घर के अंदर होगा..." तब तक सुरभि भी आ गई थी, सभी को एक साथ हंसते देख मुझे हार्दिक ख़ुशी हो रही थी.

- संतोष श्रीवास्तव

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