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कहानी- तुम्हारे साथ (Short Story- Tumhare Sath)

तुम कहां हो सौरभ? आज तुम्हारी हथेलियों पर अपने आंसुओं से मेहंदी रचाने को जी चाहता है. कैसी विचित्र पीड़ा है! क्या है यह? प्रारब्ध का अभिशाप? क्यों भीतर से रिश्ता इतना पुख्ता हुआ जाता है. जबकि तुम कहां हो, कैसे हो, क्या करते हो? मुझे कुछ भी नहीं मालूम. तुम्हीं बताओ कैसे जीऊं तुम्हारे बिना, तुम्हारे साथ!..

एक लंबाऽऽऽ अंतराल... तुम्हारे बिना मैं जी कैसे गई? जाने कैसे यह प्रश्न मेरे भीतर गूंजा... मैं सन्न, घर से बाहर... तुम्हारी यादों के साथ... प्रश्न था कि पीछा नहीं छोड़ता था. फिर तुम्हारा नाम... तुम्हारी स्मृति... भीतर-भीतर तेज़ी से उभरते फैलते तुम्हारे चित्र...

सब जैसे इस दिल्लगी में शामिल हो गए... मेरे रुआंसे हो जाने के बाद भी... यादों के काफ़िले को न रुकना था, न रुका. उदासी की बाढ़ में डूबने लगी हूं.

कभी-कभी मन करता है, कहीं बहुत दूर चली जाऊं, जहां कोई एक पक्षी- एक पत्ता तक मुझे जानता न हो, जहां बस तुम्हारी यादों से भीगी हवाएं हों, पैरों के नीचे तुम्हारी यादों का नर्म हरियाला गलीचा हो और सिर पर आकाश के लाखों सितारों की आंखों से तुम मुझे देखते रहो... तुम, बस तुम...

तुम मेरी सबसे बड़ी शक्ति भी हो और कमज़ोरी भी. अकेलेपन में तुम्हारी यादों की टीस मथती है तो अपना जीवन कितना कष्टप्रद लगने लगता है. सच कहूं तो आदत-सी पड़ गई है- रोज़ आंखें धोकर सुलाती है तुम्हारी स्मृति...

घड़ी की सुइयों और कैलेण्डर के पन्नों की गति तुम्हारी छवि को ज़रा भी नहीं धुंधला पाए. घर में होती हूं तो तुम हर सांस में होते हो, हर धड़कन में होते हो. लेकिन जब बाहर निकलना होता है तो तुम्हारी स्मृतियों को घर में दुधमुहे बच्चे की तरह बहला-फुसला कर जाना होता है, लेकिन आज...

"जाओ सौरभ, क्यों याद आए तुम? क्यों मेरी हिदायतों के बावजूद.. क्यों नियम तोड़ा?"

एक झटके से बस रुकती है. सामने की सीट पर बैठा यात्री अपना ब्रीफकेस थामे नीचे उतरता है. बस का दरवाज़ा झटके से बंद होता है और शीशे के पार उतरे हुए व्यक्ति के सिर के बाएं भाग पर बालों के बीच मांग पर दृष्टि थम जाती है... ऊंचे मस्तक के ऊपर काले रेशमी बालों के बीच बाईं कनपटी पर ठीक उसी तरह मांग निकली थी. एक-एक बाल व्यवस्थित, अनुशासित बिल्कुल तुम्हारी तरह.

उस व्यक्ति का चेहरा मैंने नहीं देखा. उसके नाक-नक़्श मैं नहीं पहचानती. उसका नाम पता मुझे नहीं मालूम. बस एक मांग काढ़ने की शैली. इत्ती-सी बात... पता नहीं कब दृष्टि उसकी मांग पर पड़ी और बस तुम्हारी यादों ने टीसना-मथना शुरू कर दिया मुझे. दिल बहुत-बहुत उदास हो चला है. सुबह घर से सोचकर चली थी कि लौटते हुए खूब शॉपिंग करनी है पर अब कुछ नहीं हो पाएगा.

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सीधी घर जाती हूं, ताला खोलकर भीतर चटखनी चढ़ा देती हूं. कपड़े बदलने, हाथ-मुंह धो लेने तक की सामर्थ्य नहीं है. हुक उमड़ने लगी... 'आओ सौरभ, कहीं से भी आ जाओ... सच, मैं खुद नहीं समझ पाती कि मैं ज़िंदा कैसे हूं. लाख समझाऊं ख़ुद को, आंसू हैं कि रुकने का नाम नहीं लेते.

मेरे तमाम हुड़दंगिए दोस्तों से तुम कुछ अलग थे, परंतु ऐसा कुछ तब तो नहीं लगा था कि मैं हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारा साथ चाहूं. न कभी तुम्हारी तरफ़ से ऐसा संकेत मिला था, फिर तुम्हारे चले जाने के बाद दुनिया में तुम्हीं तुम क्यों रह गए? क्यों हो गए दिन कंटीले और रातें दुखदाई.

तुम! सबसे अलग से तो बचपन से ही थे और तुम मानो न मानो, इस बात का थोड़ा सा अहंकार भी था तुम्हें. सुपीरियेरिटी कॉम्प्लेक्स. लेकिन आमतौर पर तुम उस अहंकार को ढांपे रखते थे. 'बुर्क वर्म' नाम दिया गया था तुम्हें और तुम इस नाम से कभी चिढ़े भी नहीं.

जहां एक ओर होतीं हम सब की सरल तरल हास्य लहरें, वहीं तुम्हारी जटिल उलटबासियां... कैसे सोचा जा सकता था तब कि इतने वरिष्ठ और गरिष्ठ बोल बोलने वाले के लिए भी अपनी अबोध भोली भावनाएं यूं बावली हो जाएंगी.

आज सूचना केन्द्र जाना है. सारे अख़बार देखने हैं. लाइब्रेरी के गेट पर बैग जमा करने के लिए हाथ आगे बढ़ाया था कि ठिठक गई मैं. गेटकीपर ने टोकन मेरी ओर बढ़ाया, लेकिन मैं तो तब तक दूसरी ही दुनिया में जा चुकी थी.

"टोकन लीजिए न मैडम." उसने कहा तो मुझे होश आया. वैसी ही बादामी आंखें... बिल्कुल तुम्हारे जैसी. शायद मेरा ध्यान न भी जाता, अगर उसका चश्मा भी बिल्कुल तुम्हारी तरह न होता. जब तुम्हें पहली बार चश्मा पहने देखा था, तुम अच्छे लगे थे. टोकन लेकर लाइब्रेरी में आकर बैठ गई हूं. सामने अख़बारों का अम्बार रखा है. परंतु मन है कि उस सुनहरे फ्रेम और उन बादामी आंखों में उलझ कर रह गया है. तुम्हारी आंखें पूरा का पूरा मन घेरे बैठी हैं. कैसे अख़बार देखूं?

अख़बारों का ढेर बिना देखे ही एक ओर ठेल दिया है. गेट पर आंख भर कर गेटकीपर का चश्मा देखती हूं. टोकन देने और अपना बैग वापस लेते वक़्त कुछ समय मैं पलक नहीं झपकाती. सुनहरी कमानी की उस काली धारी को देखती रहती हूं... वो जो बिल्कुल तुम्हारे चश्मे जैसी है, गेटकीपर बेचारा! उसे क्या पता कि आज उसकी आंखें कितनी क्रीमती हो गई हैं.

अब इस लाइब्रेरी में आना-जाना बढ़ाऊंगी. जब यह गेटकीपर होगा तो इससे यूं ही बेमतलब बातें करूंगी और इस बहाने से इसका चश्मा देखती रहूंगी. बातों का क्या, कुछ भी कर लो. अच्छा अगर मैं इससे इसका चश्मा मांग लूं तो क्या यह दे देगा? किसी भी क़ीमत पर?

मेरा विवेक मुझ पर हंस रहा है... चौकीदार का चश्मा! सौरभ की निशानी! हा-हा!

छीः भगवान ने मनुष्य को दिमाग़ क्यों दे दिया. बस दिल ही दिल होता तो दुनिया कितनी ख़ूबसूरत होती ना!

कितनी अजीब बात है, तब जिसे सिरफिरा, झक्की, खब्ती, बुक वर्म कहते और उस पर हंसा करते थे और जो सब कुछ सुनता हुआ भी स्थित प्रज्ञ मुद्रा में झीनी मुस्कान लिए बैठा रहता, आज उसी की याद में ज़िंदगी मुझे कोंच रही है.

अपनी ही धुन में लंबे डग भरती जा रही थी कि एक तमतमाए चेहरे वाले अभिभावक सामने पड़े.

"आप ही पुष्पलता मैडम हैं न?"

"जी हां. कहिए क्या काम है?" हालांकि उनका चेहरा देखकर तो मन में आया कि कहूं, कहिए क्या शिकायत है? पर मैं मन की बात करती, इससे पहले ही वे चिंघाड़ पड़े, 'मैथ आप ही पढ़ाती हैं न!

देखिए, ज़रा हमारे बेटे की कॉपी देखिए, पांच नंबर का सवाल है. उत्तर बिल्कुल सही दिए हैं. तब बताइए कि बाकी का ढाई नंबर कहां गया? आपने तो ढाई ही दिए हैं. आधे नम्बरों में नाश्ता पानी कीजिएगा क्या? या पूरे नम्बर देने के लिए घूस रिश्वत लीजिएगा."

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"ऐ मैडम जी! अभी हम शराफत से कह रहे हैं. सीधे से हमारे बिटवा को पांच में से पांच नंबर दीजिए, नहीं तो जाते हैं हम मैनेजर के पास."

"बेहतर होगा कि आप मैनेजर के पास ही चले जाएं." मैं पिण्ड छुड़ा कर बगल से निकली ही थी कि कुछ खटका, मुड़कर देखा. पलकें झपकीं. फिर-फिर देखा. अरे! वैसी ही उठंगी नाक, तुम्हारी जैसी.

चश्मा ख़रीदने का अब वैसा जोश नहीं रह गया था. सोचा चलकर कॉपी जांचने का काम ही पहले कर लेना चाहिए. चश्मा फिर कभी सही.

सिद्धांतों और अनुशासन के मामले में बहुत कड़ी हैं पुष्पलता मैडम, परंतु आज सोच रही हैं कि यह ढाई नम्बर का झगड़ा अगर लम्बा खिंचा तो ढाई नम्बर में उस नाक को दे दूंगी, जो मेरे सौरभ की नाक जैसी है.

पांचवीं मंज़िल का फ्लैट, आज लिफ्ट से बाहर निकलते ही कुछ नया दिखा. दरवाज़े के पास फ़र्श पर बैठी हुई एक लड़की, जिसका चेहरा उसके घुटनों के ऊपर बांहों के घेरे के बीच छिपा हुआ है.

"अरे नीरू! तुम कैसे आईं? न कोई चिट्ठी न फोन?" मेरी ख़ुशी आश्चर्य के बीच दब-ढंक गई है.

"बैंक का टेस्ट देना है कल. कॉल लेटर ही इतनी देर से मिला. मैं तो बहुत अपसेट हो गई दीदी और यहां तुम्हारा वॉचमैन! देखने में सींकिया पहलवान, पर ज़ुबान का उतना ही खुर्राट. एकदम मूड बिगड़ गया."

"अच्छा? कल ही नया वॉचमैन रखा गया है, शायद ड्यूटी आज से शुरू की है. ख़ैर में देखती हूं उसे. पहले तुम फ्रेश होकर कुछ खा-पी लो. वैसे बात क्या हुई थी?"

"गेट के अन्दर आने ही नहीं दे रहा था दीदी! बोलता है पुष्पलता मैडम अभी घर पर नहीं हैं. दूसरा किसको जानता है तुम इस बिल्डिंग में?"

"फिर? तुमने क्या कहा?"

"अरे मैंने दिया उसे धक्का और ज़बरदस्ती घुस आई."

चाय ख़त्म करके मैं सीधे वॉचमैन के सामने पहुंची. वह स्टूल पर बैठा सड़क के नज़ारे देखने में मग्न था. 'सींकिया पहलवान', नीरू ने ठीक ही कहा था, पर उस छरहरी काया में राजब की चुस्ती का आभास मिल रहा था.

"वॉचमैन..." मैंने यथासम्भव सख्ती बटोर कर कहा.

"यस मैडम," वह खड़ा हो गया.

"मैं पुष्पलता हूं. फैलट नं. २४."

उसने सैल्यूट मारा और मुस्कुराया, "हुक्म कीजिए मैडम!"

मैडम हुक्म क्या करें, दिल-दिमाग़ गड्डमड्ड हो रहे हैं. इसे पहले कहीं देखा है क्या? नहीं. उसकी मूछों पर दृष्टि अटक गई. वैसे ही बिल्कुल सौरभ की शैली में...

"वॉचमैन, मेरी छोटी बहन आई है, कुछ दिन यहीं रहेगी. मेरे पीछे भी उसे कोई परेशानी न होने पाए. ध्यान रखना."

पुष्पलता मैडम वॉचमैन को कड़ी डांट पिलाने आई थीं. परंतु यह तो कोई डांट नहीं हुई. दुलारने जैसी भाषा...

हा! हा!! हार गईं मैडम, एक और वॉचमैन से हार गईं. अपना ही मन हंसता है.

क्या करती उस उल्लू ने मूंछें ही ऐसी बनाई थीं...

इधर सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है.

प्रिंसिपल भी खुश रहती है. घर से भाई-बहनों और मम्मी-पापा की चिट्ठियां आती रहती हैं, कभी-कभी फोन भी.

घर से कुछ मांगा नहीं जाता, बस ख़ुशी मिलती है अपनों की खुशी में. शादी के लिए कितनी ही बार, कितने ही लड़कों की बात की मम्मी-पापा ने, मैंने ही मना कर दिया.

"कितनी प्यारी-सी ज़िंदगी जी रही हूं पापा. कौन जाने शादी करके मेरी सारी ख़ुशियां छिन जाएं, मेरे पास कहीं कुछ भी कमी तो नहीं. कभी ऐसा महसूस होगा तो साथी भी मिल जाएगा, बस मैं आप सबको ख़ुश देखना चाहती हूं, निश्चिंत देखना चाहती हूं. वैसे ही मस्त देखना चाहती हूं. जैसे कि मैं हूं,."

"तुम्हारे जैसी परफेक्ट पर्सनैलिटी तो कहीं ढूंढ़ कर भी नहीं मिल सकती." पापा गर्व से कहते हैं.

मम्मी की तकलीफ़ को भी धीरे-धीरे पोंछती रहती हूं. "शादी करके किसे सुखी देखा है मम्मी तुमने? आएगा, ऐसा वक़्त भी आएगा, जब शादी सचमुच शादी होगी. हम तुम भी वो वक़्त देखेंगे, तब मैं शादी कर सकूंगी, वरना यूं ही बेमौत मरने को मैं तैयार नहीं हूं." मम्मी भी इस मानसिकता में संतोष पाने लगी है. अब बाकी कोई चिंता नहीं.

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तुम्हारी यादें हैं सौरभ! तुम्हारी छवियां हैं, तुम्हारी स्मृतियां, तुम्हारे सोच हैं मेरे इर्दगिर्द, एक रुपहला संसार रचा हुआ है, जिसे और कोई नहीं पहचानता. पर मैं इसमें भी ख़ुश रहती हूं. रहने लगी हूं. टीसों पर क़ाबू हो गया है या जाने मैं टीसों की इतनी अभ्यस्त हो गई हूं... एडिक्ट हो गई हूं... नशेड़ी, क्या पता!

फोन की घन्टी बजी, लेटे-लेटे ही रिसीवर उठा लिया मैंने. उधर से चहकती हुई आवाज़ आई, "मैं राधा. पहचाना पुष्पी ?"

"अरे राधा!" मैं उछल पड़ी.

"कैसी हो? कहां से बोल रही हो? अमित कैसा है? बेटे कैसे हैं..?" ढेरों प्रश्न और लम्बे-लम्बे उत्तर- तब भी जैसे बहुत-बहुत कुछ पूछना-जानना बाक़ी ही रह गया.

"तुम अकेली रहती हो?" राधा ने पूछा.

"सौरभ है न मेरे पास. मेरा चॉकलेट सोल्जर." मैं जैसे कोई राज़ बांटती हूं राधा से.

वह फिर किलकी, "तुमने शादी कर ली? मुझे ख़बर भी नहीं दी."

"हट! उसकी पत्नी से पिटवायेगी मुझे?"

"तो क्या बिना शादी के उसके साथ रह रही हो?"

थोड़ी देर मौन रहा... परंतु गेंद मेरे पाले में थी.

"क्या ज़रूरी है कि उसकी देह भी मैं अपने साथ रखूं?" मन उदास हो चला. आवाज़ संजीदा. "तो क्या प्राण निकाल कर रख लिए हैं अपने पास?" राधा हंसी और इधर पता नहीं पहले मैं चीखी या पहले मैंने फोन पटका. कनपटियां झनझना रही थीं और उसके अतिरिक्त मैं समूची चेतनाहीन हो गई थी. फोन की घण्टी फिर बजी तो चेतना लौटी.

"सॉरी यार!" राधा का स्वर शर्म से डूबा था, फिर करुण होकर बोली, "हम लोग इसी तरह तो बोला करते थे बेसिर-पैर की बातें. बस उसी शैली में मुंह से निकल गया... आई एम रियली सॉरी."

अब तक मैं संभल चुकी थी, व्यावहारिक बनकर कहा, "नहीं-नहीं, कोई बात नहीं. बस मैं ही कुछ ज़्यादा भावुक हो गई थी. वह जितना मेरे पास है, उसमें से कुछ घट नहीं सकता, लेकिन... लेकिन उसके एक रोएं का अनिष्ट भी मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती राधा."

"मेरी भी दुआएं ले ले यार."

"किसलिए?"

"उसके सारे रोएं सलामत रहें, इसके लिए."

हम दोनों बेलौस हंस पड़े. वही पुरानी वाली हंसी.

इतना हंसने के बाद उसके फोन रखते ही पता नहीं क्यों दिल रोना चाहता है. आज जी भर कर रोने का मन है. आज आंसुओं की बरसात होना चाहती है... आज मैं बहुत डरी और घबराई हुई हूं... आज मैं जीवन से त्रस्त हूं.

तुम कहां हो सौरभ? आज तुम्हारी हथेलियों पर अपने आंसुओं से मेहंदी रचाने को जी चाहता है. कैसी विचित्र पीड़ा है! क्या है यह? प्रारब्ध का अभिशाप? क्यों भीतर से रिश्ता इतना पुख्ता हुआ जाता है. जबकि तुम कहां हो, कैसे हो, क्या करते हो? मुझे कुछ भी नहीं मालूम. तुम्हीं बताओ कैसे जीऊं तुम्हारे बिना, तुम्हारे साथ!..

- रश्मि बड़थ्वाल

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