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सभी पिताओं को समर्पित दोहे… (Dohe Dedicated To All Fathers…)

देवतुल्य है हर पिता, वह जीवन का मूल।

वह पराग के तुल्य है, जिससे खिलते फूल।।

संतति को देता सदा, गहन वृक्ष सम छाँव।

कष्ट न हो संतान को, ख़ुद लग जाता दाँव।।

पर्दे के पीछे करें, संतति के सब काम।

देकर उनको हर ख़ुशी, वह करता विश्राम।।

जीवन की हर जटिलता, करता रहता दूर।

बिन पाले वह लालसा, दे ख़ुशियाँ भरपूर।।

संकट यदि हो सामने, बन जाता दीवार।

दृढ़ता से वह हो खड़ा, सह लेता हर वार।।

सही ग़लत में फ़र्क कर, दिखलाता वह राह।

बच्चे ग़लती ना करें, इतनी रखता चाह।

ऊपर से वह शुष्क अरु, दिखता बहुत कठोर।अंदर सागर नेह का, लेता सदा हिलोर।।

प्रेम प्रदर्शन कर सके, पितु का नहीं स्वभाव।आवश्यकता पूरी करे, ख़ुद सह सर्व अभाव।।

अनुशासन की नींव को, पिता करे मज़बूत।

संयम से कैसे जिएं, दे ख़ुद नित्य सुबूत।।

शुद्ध विचारों से सदा, जीवन बने पवित्र।

देकर दंड उलाहना, संयत करें चरित्र।।

मातु पिता समतुल्य हैं, सच्ची है यह बात।

दोनों परम अमूल्य हैं, माता हो या तात।।

जीवन के संग्राम में, पिता सदा है साथ।

हिम्मत देता है हमें, और पकड़ता हाथ।।

माता संस्कारित करें, समझे अपना अंग।

रह अदृश्य हरदम पिता, सदा जिताता जंग।।

बच्चों को शिक्षा दिला, दिखलाता वह राह।

बच्चे बस उन्नति करें, मन में रखता चाह।।

ऋण न चुका पाएं कभी, हो कोई संतान।वृद्धावस्था में मिले, बस थोड़ा सा मान।।

- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

Fathers Day

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Photo Courtesy: Freepik

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