
विनीता राहुरीकर
“क्या बात है, तुम्हें कोई और पसंद है, तो बात यहीं ख़त्म करते हैं. पर तुम इतनी हताश और घबराई हुई क्यों लग रही हो?” अक्षय को उसे इस तरह परेशान देख कर ठीक नहीं लगा.
“नहीं ऐसा कुछ नहीं. बस मैं विवाह नहीं कर सकती. किसी से भी नहीं. बात मैं छुपा नहीं सकती और सच कोई सुन नहीं सकता.” नीला का गला भर आया.
“मां एक अच्छी सी साड़ी दो न मुझे.” नीला ने मीनाक्षी से कमरे में आते हुए कहा.
“साड़ी? साड़ी से क्या काम पड़ गया तुझे.” मीनाक्षी ने हंसते हुए पूछा.
“इस बार जो नाटक हम करने जा रहे हैं, उसमें मैं एक विवाहित स्त्री बनी हूं. इसीलिए मुझे साड़ी पहननी है. आज रिहर्सल है, तो मैंने सोचा कि साड़ी पहन कर ही की जाए, तो विवाहिता की फील आएगी एक्टिंग में.” नीला ने बताया.
“नाटक की तरह अब जल्दी से असल ज़िंदगी में भी विवाहित स्त्री बनने के बारे में सोच नीला.” मीनाक्षी ने अपनी चिर परिचित बात आज फिर कह दी.
“ओह मां! कर लूंगी शादी भी. ऐसी भी क्या जल्दी है. इतने साल पढ़ाई में लगी रही. अब तो समय मिला है अपनी रुचि का काम करने का. कुछ समय तो निश्चिंत होकर मुझे रंगमंच के जीवन को एंजॉय करने दो.” नीला ने मीनाक्षी के गले में बांहें डालते हुए लाड़ से कहा.
“चल अच्छा, ज़्यादा लाड़ मत दिखा. देख ले कौन सी साड़ी चाहिए तुझे.” मीनाक्षी ने प्यार से उसके गाल पर चपत लगाते हुए वॉर्डरोब खोल दिया.
“30-32 की स्त्री है कस्बे की मध्यमवर्गीय. तुम्हीं बताओ न कौन सी साड़ी ठीक रहेगी.” नीला ने साड़ियों पर नज़र डालते हुए कहा.
“मेरे हिसाब से यह ठीक रहेगी, ये भी अच्छी है. एक काम कर तू ये दोनों साड़ियां ले जा, जो ठीक लगे सेट पर वो पहन लेना. पहननी आएगी या नहीं?” मीनाक्षी बोली.
“मुझे तो नहीं आएगी, लेकिन मीरा दीदी हैं न वो पहना देंगी.” नीला ने बताया.
“ठीक है तू तैयार हो जा. मैं इसके साथ के ब्लाउज़ वगैरह निकाल कर रखती हूं.” मीनाक्षी ने कहा.
“थैंक यू मां, लव यू.” नीला ने मां का गाल चूम लिया.
नीला तैयार होने अपने कमरे में चली गई, तो मीनाक्षी ने साड़ियों के साथ मैचिंग चूड़ियां, बिंदी का पत्ता, सेफ्टी पिन आदि सब एक बैग में ठीक से रख दिया. जाने क्यों उसकी आंखें भर आईं. बेटियां कितनी जल्दी बड़ी हो जाती हैं. 23 साल की पूरी हो गई नीला. बस अब जल्दी ही शादी कर उसकी बैग भर कर मीनाक्षी को उसे विदा कर देना पड़ेगा. बेटी का ब्याह मां के लिए पीड़ा और सुख दोनों ही भावनाओं का अजीब संगम होता है.
नाश्ता करके अपना लंच और मां की साड़ियां लेकर नीला नाटक की रिहर्सल के लिए चली गई. पिता आलोक ने ऑफिस जाते हुए उसे हिंदी भवन छोड़ दिया, जहां उस दिन वे लोग रिहर्सल के लिए इकट्ठा होने वाले थे. आलोक उसे ड्रॉप करके ऑफिस चले गए और नीला भवन के पिछली तरफ़ वाले छोटे हॉल में आ गई. अक्षय और मीरा दीदी आ चुकी थीं और दोनों डायलॉग याद कर रहे थे.
“लो आ गई तुम्हारी अजी सुनती हो...” जैसे ही नीला ने हॉल में पैर रखा, उसे देखते ही मीरा दीदी हंसते हुए बोलीं.
अक्षय और नीला दोनों झेंप कर हंस दिए. नीला ने मीरा से कहा कि उसे साड़ी पहना दे झटपट अर्णव दा के आने के पहले. दूसरे कमरे में जाकर मीरा ने नीला को साड़ी पहना दी और बालों की चोटी बना दी. 80-90 के दशक की कहानी पर आधारित नाटक था, तो परिवेश और रहन-सहन भी वैसा ही रखा गया था.
अर्णव दा के आते ही रिहर्सल शुरू हो गई. अक्षय तो बचपन से ही थिएटर से जुड़ा हुआ था, तो उसे एक्टिंग में कोई द़िक्क़त नहीं होती थी. नीला को थोड़ी मेहनत करनी पड़ती थी. फिर भी वह बहुत जल्दी अर्णव दा के निर्देशानुसार सीख लेती. नाटक में अक्षय और नीला पति-पत्नी बने थे और बार-बार अक्षय नीला को, अजी सुनती हो... करके पुकारता. हल्का-फुल्का हास्य प्रधान नाटक था.
नीला ने बहुत मेहनत की थी रिहर्सल्स में. डेढ़ साल से वह अर्णव दा के ’स्वप्नांकुर’ ग्रुप से जुड़ी थी. अभी तक वह छोटी-छोटी भूमिकाएं करती थी. पहली बार वह मुख्य भूमिका में थी. इसलिए वह अपनी भूमिका में स्वाभाविकता लाने के लिए बहुत काम कर रही थी.
महीने भर बाद ही शहर में उनके नाटक का मंचन हुआ, जो दर्शकों द्वारा बहुत सराहा गया. मीनाक्षी और आलोक भी आए थे. अक्षय को देखकर मीनाक्षी बहुत प्रभावित हुई. दिखने में कितना सुदर्शन लड़का था और उतनी ही स्वाभाविक एक्टिंग कर रहा था जैसे सच में ही नीला का पति हो.
“कितना सुंदर लड़का है ये. अपनी नीला के साथ जोड़ी कितनी अच्छी लग रही है इसकी.” मीनाक्षी ने आलोक से कहा.
“तुम्हें तो बस एक ही बात सूझती है. अरे पता नहीं कौन है, किस परिवार से है. कुंवारा भी है या शादीशुदा है.” आलोक हंस पड़े.
“आप तो बस मेरी बात को हवा में ही उड़ा दिया करो. मीनाक्षी बनावटी ग़ुस्से से बोली. मगर अक्षय उसके मन में बस चुका था नीला के लिए. नाटक ख़त्म होने के बाद नीला ने मीनाक्षी और आलोक का परिचय अपने ग्रुप में सभी से करवाया. अक्षय के शांत, सभ्य आचरण से मीनाक्षी बहुत प्रभावित हुई.
नाटक को दर्शकों की इतनी प्रशंसा और प्रोत्साहन मिला कि लगातार इसके चार रविवार शहर में शो हुए और फिर आसपास के शहरों से भी इसकी मांग आने लगी. जल्दी ही यह बहुत लोकप्रिय हो गया.
मीनाक्षी को नीला को दूसरे शहर भेजने में थोड़ा संकोच हो रहा था, लेकिन मीरा और तीन अन्य लड़कियां भी ग्रुप में जा रही थीं, उस पर अब अर्णव और अक्षय आदि से भी आलोक और मीनाक्षी की अच्छी पहचान हो गई थी, तो भरे मन से मीनाक्षी ने उसे जाने की आज्ञा दे दी.
“थैंक यू मां, लव यू...” अपने चिर परिचित अंदाज़ में नीला ने मीनाक्षी के गाल पर चूम कर उसे गले लगा लिया.
नीला पूरे दस दिनों के लिए जा रही थी. मीनाक्षी को अकेलापन बहुत अधिक खल रहा था. पहली बार नीला इतने दिनों के लिए उससे अलग हुई थी. उसे उदास देख कर आलोक ने हंसते हुए कहा, “दस दिनों के लिए तुमसे बेटी का बिछोह सहन नहीं हो रहा है, तो उसे ससुराल कैसे भेजोगी?”
“तब वह किसी ज़िम्मेदार परिवार में अपने जीवनसाथी के साथ सुरक्षित जाएगी. ब्याह की बात अलग होती है.” मीनाक्षी बोली.
“तुम चिंता मत करो. ये भी सब अच्छे लोग हैं. फिर मोबाइल है तो, जब चाहे उसे फोन कर लेना.” आलोक ने उसके कंधों पर हाथ रखते हुए कहा.
तभी नीला का वीडियो कॉल आ गया.
“मां देखो इस साड़ी में बिल्कुल तुम्हारी तरह लग रही हूं न?” नीला ख़ुश होकर पूछ रही थी.
“हां बेटा, एक काला टीका ज़रूर लगा लेना. बहुत सुंदर लग रही है आज.” मीनाक्षी ने कहा. तभी उसे पीछे अर्णव दा से बात करता अक्षय दिखाई दिया. आज उसने भी हल्के नीले रंग का शर्ट पहना था, नीला की साड़ी से मैच करता. तभी रिहर्सल का समय हो गया और नीला ने फोन रख दिया.
मीनाक्षी फिर से अक्षय के बारे में सोचने लगी. नीला से बातों ही बातों में उसने थोड़ी पूछताछ कर ली थी. शांत सा, काम में मगन रहने वाला लड़का है. कुंवारा ही है. अच्छे घर का है. घरेलू बिज़नेस है, जो पिता संभालते हैं. अक्षय भी मदद करता है उनकी. मगर चुप्पा है. सेट पर ज़्यादा बातें नहीं करता.
एक शहर से दूसरे शहर फिर तीसरे. नई-नई जगहें, थिएटर हॉल, दर्शक, रिहर्सल्स, साथ में लंच. कई बार रिहर्सल करते हुए हॉल में ही ज़मीन पर बैठ कर खाना खा लेना. फ्री टाइम में हंसी-मज़ाक, गप्पें, कई बार शो न होने पर अर्णव दा गिटार पर कोई रूमानी सी धुन छेड़ देते और मीरा दी गाना गाने लगतीं, तो सब मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहते देर रात तक. कभी आसपास घूमने या शॉपिंग करने चले जाते. दर्शकों का प्यार, नए-नए कलाकारों और रंगमंच से जुड़े लोगों से मुलाक़ात. नीला को सब सपने जैसा लगता. अपने सपनों को पूरा होते देख वह बहुत रोमांचित थी. जब नाटक में अक्षय अजी सुनती हो... कहकर पुकारता तो दर्शक सीटियां बजाने लगते. अक्षय का पुकारने का ढंग दर्शकों को बहुत पसंद आता और हॉल में फिर-फिर से या वन्स मोर... का शोर उठने लगता.
कम दिनों में ही नाटक के इतने शो और रिहर्सल्स हो गए थे कि कभी-कभी बिना नाटक के भी अक्षय नीला को, अजी सुनती हो... कहकर पुकार देता या नीला उसे, अजी सुनो जी... कह देती. ग्रुप के सभी लोग ज़ोर से हंसने लगते और अक्षय और नीला झेंप जाते.
एक रात शो के बाद अक्षय अपने पलंग पर लेटा था. बगल वाले पलंग पर अर्णव दा खर्राटे मार रहे थे, लेकिन अक्षय की आंखों में नींद नहीं थी. वह नीला के बारे में सोच रहा था. कभी उसका ध्यान किसी लड़की की ओर नहीं गया था, लेकिन जाने क्यों पिछले कुछ दिनों से नीला उसे अच्छी लगने लगी थी. उसकी नज़रें गुपचुप उसकी ओर उठ जाती थीं.
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अक्षय ने करवट बदली. उसके होंठों पर नीला के बारे में सोचते हुए मुस्कान आ गई थी. कितनी सरल सी है नीला, अभिनय में भी कितनी मेहनत करती है. इतनी सुंदर है, क्या पता उसका कोई बॉयफ्रेंड हो? इस ख़्याल से ही अक्षय का मन मायूस हो गया. लेकिन यदि नीला का कोई बॉयफ्रेंड होता, तो सेट पर या बाहर कभी तो उसके आसपास नज़र आता. नीला को तो हमेशा सेट पर आने की जल्दी होती है, लेकिन जाने की नहीं.
मगर मैं यह सब क्यों सोच रहा हूं? अक्षय ने सोचा, नीला का कोई बॉयफ्रेंड हो या न हो, उससे मुझे क्या? क्या मुझे वो अच्छी लगने लगी है. हां लगने तो लगी है आजकल. उसके साथ रहना, रिहर्सल करना, शो करना, यात्रा करते हुए उसके साथ बैठना मन को अच्छा तो लगने लगा है. शायद ये प्यार हो...
अक्षय सपनीली दृष्टि से नीला को देखता रहता. दिन बीतने के साथ ही उसके मन की भावनाएं नीला के लिए गहरी होती जा रही थीं. काश! नाटक उसके जीवन का सच बन पाता. हां प्यार ही तो हो गया था उसे नीला से. साड़ी पहनकर जब वह उसे अजी सुनो न... कहती, तो अक्षय का दिल धड़क जाता. जब वह लंच या डिनर करने के लिए ज़मीन या कुर्सी पर उसकी बगल में बैठ जाती, तो वह रोमांचित हो जाता. मीरा दी के रूमानी गानों को सुनते हुए उसका मन नीला के साथ अनगिनत सपने संजोने लगता.
मगर नीला इन सबसे बेख़बर बस अपने अभिनय में मगन रहती. मीनाक्षी जब तब उसे विवाह के लिए कहती.
“मां प्लीज़, अभी तो मैं 25 की भी नहीं हुई हूं. फिर शादी के बाद यदि लड़के या उसके घरवालों ने मुझे थिएटर नहीं करने दिया, बाहर ही नहीं जाने दिया तो... या मेरी शादी दूसरे शहर में हो गई, तो मेरा प्यारा ग्रुप छूट जाएगा.” नीला हर बार मीनाक्षी से आग्रह करती.
विवाह की बात उसके मन में एक अनजाने डर को जन्म दे देती. वह नहीं कर सकती है विवाह, इसीलिए स्टेज पर पत्नी का क़िरदार निभा कर ही ख़ुश हो लेती है. एक भ्रम को जीकर ही ख़ुद को बहला लेती है. कैसे बताए मां को भी जो एक गांठ उसके मन में बचपन से ही पड़ी हुई है. भूल गई थी वो. लेकिन जब समझने लायक उम्र हुई, तब वो फांस बुरी तरह दर्द देने लगी.
मीनाक्षी उसके शौक को पूरा होते भी देखना चाहती थी और समय से उसका विवाह भी करना चाहती थी. वह नहीं चाहती थी कि नीला के सपने टूट जाएं और यह भी चाहती थी कि उनकी इकलौती बेटी का घर भी बस जाए. दोनों ही बातें कैसे पूरी होंगी, मीनाक्षी यही सोचती रहती.
इसी तरह छह महीने और बीत गए. अब नीला अपने ग्रुप की मुख्य अभिनेत्री बन गई थी. उसका रंगमंच से जुड़ाव और गहरा हो गया था. एक दिन नीला की छुट्टी थी. मीनाक्षी ने उससे कहा कि शाम को उसे लड़के वाले देखने आ रहे हैं.
“मां लेकिन मेरा थिएटर?” नीला बोली.
“25 साल की हो गई हो नीला. हर बात का एक समय होता है. विवाह होने तक 26 की होने आ जाओगी. यही ठीक समय है शादी का. और लड़का इसी शहर का है. बाद में भी काम करती रह सकती हो. तुम्हें शौक था अभिनय का, तो हमने तुम्हें चार साल करने दिया काम. अब तुम भी हमारा कहना मान लो बेटा.” मीनाक्षी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, तो नीला कुछ न कह पाई.
शाम को सुंदर सी साड़ी में मीनाक्षी ने नीला को सजाया. आलोक ने बाज़ार से कई तरह की मिठाइयां और नमकीन लाकर रखे. समय पर सारी तैयारियां हो गईर्ं. तभी बेल बजी. मीनाक्षी ने तत्परता से दरवाज़ा खोला. सामने अर्णव दा और मीरा दीदी को देख नीला आश्चर्यचकित रह गई.
“लड़के का परिवार इनका भलीभांति परिचित है. इन्होंने ही सुझाया था.” मीनाक्षी ने बताया.
कुछ ही देर में लड़का और उसका परिवार भी आ गया. नीला की बोलती ही बंद हो गई सामने अक्षय को देख कर.
“अब नहीं बोलोगी ’अजी सुनो न?’ बोलो न...” मीरा दी ने नीला के कान में धीरे से कहा, तो नीला ने घबरा कर नज़रें झुका लीं.
“यह सब क्या है मीरा दी, मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है.” नीला ने उनसे पूछा जब मीनाक्षी और आलोक अक्षय और उसके घरवालों का स्वागत कर रहे थे.
“मीनाक्षी जी एक दिन हमें रेस्टोरेंट में मिली थीं. तुम्हारी शादी को लेकर चिंतित थीं, लेकिन तुम्हारे शौक को भी मारना नहीं चाहती थीं. इधर बहुत दिनों से अक्षय के हावभाव देखकर हमें अंदाज़ा लग गया था कि वो तुम्हें पसंद करने लगा है. बस हम तीनों परिवारों ने आपस में मिलकर तय कर लिया कि नाटक को अब हक़ीक़त में बदल देने में सभी की समस्याओं का समाधान है. तुम्हारी शादी भी हो जाएगी और तुम्हें रंगमंच भी नहीं छोड़ना होगा. तुम इसी शहर में रहोगी, तो तुम्हारे माता-पिता को भी तसल्ली रहेगी.” मीरा ने संक्षेप में बताया.
“ओह तो यह सब आपकी साजिश है.” नीला बोली.
“हां, मगर प्यारी सी साजिश, जिसमें सभी के सपने पूरे हो सकें और हम सब हमेशा साथ रह सकें.” मीरा ने उसकी ठोड़ी छूकर स्नेह से कहा.
नीला अनमनी सी सिर झुकाकर बैठी रही, जिसे सबने उसकी स्वाभाविक स्त्री सुलभ लज्जा समझा.
“अरे जाओ अक्षय, तुम भी तो नीला से बात कर लो, उसे तुम पसंद भी हो या नहीं.” अक्षय के पिता ने हंसी में कहा.
“हां जाओ जी, तुम दोनों भी तो आपस में बात कर लो.” अर्णव दा ने कहा.
अक्षय और नीला को मीरा ने बालकनी में भेज दिया.
क्षण भर प्यार भरी नज़रों से नीला को देखने के बाद अक्षय ने पूछा, “क्या रिहर्सल और स्टेज के अलावा भी जीवनभर तुम्हें ’अजी सुनती हो...’ कहने का अधिकार दोगी मुझे नीला?”
नीला के सुंदर मुख पर स्याह बादल छा गए. माथे पर पसीना आ रहा था.
“क्या बात है, तुम्हें कोई और पसंद है, तो बात यहीं ख़त्म करते हैं. पर तुम इतनी हताश और घबराई हुई क्यों लग रही हो?” अक्षय को उसे इस तरह परेशान देख कर ठीक नहीं लगा.
“नहीं ऐसा कुछ नहीं. बस मैं विवाह नहीं कर सकती. किसी से भी नहीं. बात मैं छुपा नहीं सकती और सच कोई सुन नहीं सकता.” नीला का गला भर आया.
“आख़िर ऐसी भी क्या बात है नीला?” अक्षय ने स्नेह से पूछा.
“जब मैं सात-आठ साल की थी तब पड़ोस में अपनी सहेली के यहां अकसर खेलने जाती थी. एक बार उसके यहां उसके मामा आए हुए थे. उस दिन जब मैं उसके घर खेलने गई तो... घर पर और कोई नहीं था. बस उसके मामा ही थे. वो मुझे अंदर ले गए. मैं कुछ नहीं जानती थी, लेकिन बस इतना समझ पाई कि कुछ ग़लत हुआ है. मैं बहुत डर गई थी. घर आकर चुपचाप सो गई. शाम को मुझे बुखार आ गया. फिर पिताजी का ट्रांसफर हो गया और मैं इस घटना को भूल गई. पर जब समझदार हुई अक्षय, तब पता चला कि मेरे साथ क्या हुआ था. बस अब मैं कैसे किसी से विवाह करूं... एक बुरा सा एहसास अब भी तन मन पर हावी है.” नीला की आंखों में आंसू छलकने लगे.
“आधुनिक और पढ़ी-लिखी होकर भी तुम ये किस तरह की बातें कर रही हो नीला. वो बचपन का एक बुरा हादसा था, भूल जाओ उसे. फिर तुम तो तब छोटी सी अबोध बच्ची थी, जो कुछ समझती नहीं थी. उसमें तुम्हारी क्या ग़लती. इस घुटन से बाहर निकालो नीला.” अक्षय ने उसका हाथ थामकर सांत्वना भरे स्वर में कहा.
“तो क्या तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है?” नीला ने आश्चर्य से पूछा.
“मेरे लिए भावनाएं और प्रेम ही महत्वपूर्ण हैं. मैं अपने जीवनसाथी से सच्चा और निःस्वार्थ प्रेम और साथ चाहता हूं बस. जो जीवन के हर सुख-दुख में, अच्छी-बुरी परिस्थितियों में मुझे सहारा दे, साथ दे यही गुण चाहता हूं मैं अपनी पत्नी में. बाकी तुम्हारे अतीत से मुझे कोई वास्ता नहीं. मेरे लिए भविष्य में तुम्हारा प्यार और साथ ही महत्वपूर्ण है. अब तो मेरे सवाल का प्यारा सा जवाब दे दो जी.” अक्षय ने स्नेह और संजीदगी भरे स्वर में कहा.
स्याह बादल छंट चुके थे, व्यर्थ का अपराधबोध ख़त्म हो गया था. नीला अभिभूत थी ऐसी सुलझी हुई सोच वाला युवक जीवनसाथी के रूप में पाकर. उसने तो जीवन में कभी आशा ही नहीं की थी कि उसे इतना परिपक्व व समझदार लड़का मिल सकता है.
नीला ने शरमा कर नज़रें झुका लीं, फिर धीरे से कहा, “अजी सुनो न, क्या तुम मुझे जीवनभर रंगमंच से जुड़े रहने की इजाज़त दोगे?”
“मैं वादा करता हूं नीला की तुम्हें पंख फैलाकर उड़ने के लिए हमेशा खुला आसमान दूंगा. मैं ख़ुद चाहता था कि मुझे कोई ऐसी जीवन संगिनी मिले, जो मेरे शौक को समझ कर मेरा साथ दे सके. हम दोनों ही इस क्षेत्र में एक-दूसरे के पूरक हैं ऐसा मेरा विश्वास है.” अक्षय ने उसका हाथ थपथपाते हुए कहा.
“अजी सुनो न, फिर तुम मुझे जीवनभर अजी सुनती हो पुकार सकते हो...” नीला ने अक्षय को देखते हुए मुस्कुराकर हामी भरी.
“अजी सुनो न, तुम दोनों इसी बात पर मुंह मीठा करो अपना भी और हमारा भी.” मीरा दी अचानक से मिठाई का डिब्बा लिए बालकनी में आ धमकीं और दोनों के मुंह में मिठाई देते हुए बोलीं.
हॉल में सब एक-दूसरे को मिठाई खिलाते हुए आपस में बधाई दे रहे थे और सगाई की तारीख़ पर चर्चा कर रहे थे.
“अजी सुनती हो, रात में डिनर पर चलें कहीं अच्छे से होटल में?” अक्षय ने धीरे से नीला के कान में कहा.
“अजी सुनो न, अच्छा आइडिया है. चलो.” नीला ने हामी भरी.
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