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काव्य- दर्द जो कुंआरा है… (Kavya- Dard Jo Kunwara Hai…)

तुम्हारे सिवा भी

दर्द बहुत थे

कुछ मिट गए

कुछ बीत गए

कुछ भूल गए

कुछ रीत गए

बाकी सब,

रह-रह चुभते हैं

पर एक वह

जो मिटा न बीता

भूला न रीता

और चुभना तो दूर

जिस कम्बख़्त ने

मुझे छुआ तक नहीं,

बस एक आदत-सा

जो साथ-साथ रहता है

रग-रग में बहता है,

पर आज भी कुंआरा है

वह दर्द तुम्हारा है...

- शशांक शेखर सिंह

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