"अब मुझे कुछ नहीं सुनना है. यदि मेरे ही कारण मेवाड़ पर संकट आया है तो मेरा कर्तव्य है कि मैं मेवाड़ को इस संकट से उबारू. आप बिना किसी संकोच के मुझे ज़हर का प्याला दे दें. मैं नहीं चाहती कि मेरे शरीर के बदले मेवाड़ के हज़ारों शरीर रक्त से सन जाए..."
राणा भीमसिंह की आंखों में बेचैनी और चिंता की गहरी लकीरे खिंची हुई थीं. पिछले कुछ समय से उनके राज्य मेवाड़ पर कई दूसरे नरेशों की कुदृष्टि थी. हर पल एक अनजाने भय से वे आशंकित से रहते थे. न जाने कब कौन मेवाड़ पर आक्रमण कर दे. राजपूतों की आपसी वैमनस्यता ने वैसे भी राजपूतों को कमज़ोर कर दिया था. उस पर मुगलों की आंधी कभी भी किसी भी रियासत को लील लेती थी. वे गहरे सोच में डूबे हुए थे कि तभी उनकी पत्नी ललिता देवी ने कक्ष में प्रवेश किया.
"क्या बात है महाराज, आपकी आंखों में बेचैनी स्पष्ट दिखाई दे रही है, आख़िर आप चिन्तित क्यों है?" ललिता देवी ने पूछा.
"कुछ नहीं महारानी, मेवाड़ की रक्षा की चिंता तो मुझे हर पल रहती है-इसके साथ ही अपनी एकमात्र बेटी कृष्णा के विवाह की चिंता भी मुझे चैन नहीं लेने देती. यद्यपि अनेक नरेशों ने कृष्णा का हाथ मांगा है पर मेरा हृदय नहीं कहता कि मैं इन धन लौल्प नरेशों के हाथों अपनी फूल सी बेटी सौंप दूं." राणा भीमसिंह ने कहा.
"पर अभी इस बात की चिंता करने की भला क्या ज़रूरत है. कृष्णा की उम्र ही अभी कितनी है और फिर उसके लिए वरों की भला क्या कमी हो सकती है." ललिता देवी बोलीं.
"नहीं, मैं चाहता हूं कि अपने जीते जी कृष्णा के हाथ पीले कर दूं. पता नहीं कब क्या हो जाए." राणा भीम सिंह आगे कुछ कहते, इसके पहले एक सेवक ने आकर कहा, "महाराज की जय हो, जयपुर नरेश मानसिंह का एक दूत आपसे मिलना चाहता है."
"उसे सम्मान सहित महल में ठहराओ. हम कुछ देर बाद उससे भेंट करेंगे."
मेवाड़ राज्य की राजधानी उदयपुर को राणा उदयसिंह ने अपने नाम पर बसाया था. राणा भीमसिंह इस राज्य के शासक थे. कृष्णकुमारी उनकी एकमात्र संतान थी. सुख विलास और राजसी वैभव में पली कृष्णकुमारी जितनी नाज़ुक और कमसिन थी, उतनी ही वीर, साहसी और बुद्धिमान भी. उन दिनों राजपूतों की आपसी वैमनस्यता ने हर राज्य को सीमित और कमज़ोर बना दिया था. किसी भी राज्य में आक्रमण कर वहां की युवतियों का अपहरण कर लेना साधारण-सी बात थी. और यही कारण था कि राणा भीमसिंह अपनी बेटी का विवाह जल्द और योग्य वर के साथ कर देना चाहते थे. इसके लिए कई राज्यों के नरेशों को ख़बर भी भेजी थी और वे इसी प्रतीक्षा में थे कि कहीं से इस रिश्ते के लिए स्वीकृति आ जाए. चूंकि कृष्णकुमारी की ख़ूबसूरती की चर्चा चारों ओर थी, इसलिए कई राज्यों के राजदूत उनसे भेट करने आ चुके थे, पर उन्हें अभी तक कोई उपयुक्त वर नहीं मिला था.
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कुछ देर बाद राणा भीमसिंह दरबार में आए. जयपुर नरेश मानसिंह के दूत ने उनका अभिवादन किया और कहा, "जयपुर नरेश मानसिंह ने आपकी कन्या कृष्णकुमारी से विवाह के लिए प्रस्ताव भेजा है. हमारे राजा सुंदर, कला प्रेमी और साहित्य के ज्ञाता हैं. निसंदेह आपकी कन्या के लिए वे श्रेष्ठ वर साबित होंगे. उनका एक चित्र भी मैं साथ लाया हूं." कहते हुए दूत ने एक चित्र उनके सामने रख दिया.
राणा भीमसिंह ने एक नज़र चित्र पर डाली. जयपुर नरेश का काफ़ी नाम था. वे एक वींर, साहसी और बलशाली राज्य के शासक थे. भीमसिंह ने दूत को विश्राम की सलाह दी और महल में जाकर वह चित्र अपनी बेटी कृष्णकुमारी को दिखाया और कहा, "बेटी कृष्णा, जयपुर नरेश ने यह चित्र भेजा है, तुमसे विवाह करना चाहते हैं. तुम चित्र देख कर अपनी पसंदगी या नापसंदगी का विचार बतला दो."
कृष्णा ने चित्र हाथ में लिया और उस पर नज़र पड़ते ही उसका अंग-अंग खिल उठा. राजा मानसिंह के चेहरे से वीरता, सौम्यता और स्वाभिमान टपक रहा था. कृष्णा राजपूतों की बेटी थी और अपने पति की जो कल्पना उसके ज़ेहन में थी, मानसिंह का चित्र उस पर पूरी तरह खरा उतर रहा था.
अपनी पुत्री की भावभंगिमा देखकर राणा भीमसिंह समझ गए कि कृष्णा को मानसिंह पसंद आ गए हैं. जयपुर एक समृद्धशाली पड़ोसी राज्य था और उससे संबंध बनाने में मेवाड़ की शक्ति बढ़ने की भी आशा थी. राणा भीमसिंह ने यह रिश्ता मंज़ूर कर लिया.
दूत जब प्रस्ताव की स्वीकृति लेकर जयपुर पहुंचा तब वहां के राज पुरोहित ने उदयपुर जाकर कृष्णा की गोदभराई की रस्म अदा की. उन्होंने उसकी गोद में क़ीमती वस्त्राभूषण, श्रीफल रखे और उसे जयपुर की महारानी का संबोधन दिया.
राजकुमारी कृष्णकुमारी के हृदय में फुलझड़ियो फटने लगीं. गोद भराई की रस्म के बाद उसे उसकी सहेलियों ने चिढ़ाना आरंभ कर दिया. वे उसे राजस्थान के रस्मों रिवाज़ के मुताबिक़ 'खम्मा' अन्न दाता कह कर पुकारने लगीं. कृष्णा ऊपरी मन से तो नाराज़ होती थी, पर हृदय के किसी कोने में उसे मीठी गुदगुदी भी होती थी. राणा भीमसिंह विवाह जल्द चाहते थे और उनकी प्रार्थना पर जयपुर नरेश ने विवाह की तिथि भेज दी. तिथि मिलते ही उदयपुर में बारात की तैयारियां शुरू हो गई. पूरे उदयपुर को बारात के स्वागत के लिए सजाया जाने लगा. राणा भीमसिंह ने ख़ज़ाने के द्वार खोल दिए. राजधानी में उत्सवों की बाढ़ सी आ गई. ऐसा लगने लगा मानो उदयपुर के हर घर में विवाह हो.
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इधर कृष्णा के विवाह की तैयारियां चल रही थीं, उधर राजा मानसिंह को एकाएक ज्वर ने आ घेरा. राजवैद्यों की चिकित्सा चल रही थी, पर ज्वर उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था. पूजा-पाठ और चिकित्सा के बाद भी जयपुर नरेश का स्वास्थ्य नहीं सुधरा और विवाह की नियत तिथि के चार दिन पहले वे काल के गाल में समा गए.
जयपुर नरेश की मौत का समाचार जैसे ही उदयपुर पहुंचा, सारा उदयपुर स्तब्ध रह गया. कृष्णा के सारे सपने क्षण भर में टूट कर बिखर गए. अपने प्रियतम से मिलन की शुभ घड़ी आई भी न थी कि वह अकेली रह गई.
चूंकि विवाह की पूरी तैयारियां हो चुकी थीं, अतः राणा भीमसिंह ने अपनी पत्नी ललिता देवी से विचार विमर्श के बाद जोधपुर नरेश राजा मकरन्दसिंह को सूचना भिजवा दी कि वे आकर कृष्णा के साथ विवाह कर लें. राजा मकरन्द सिंह पहले से ही कृष्णा के रूप के दीवाने थे, जब उन्हें यह समाचार मिला तो वे इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए और दूसरे ही दिन विवाह का मुहूर्त तय कर दिया गया. बारात के स्वागत के लिए राणा भीमसिंह ने अपने राज्य की सीमा पर पूरे लाव लश्कर केक्षसाथ पड़ाव डाल दिया. सीमा पर ही बारात की तैयारियां आरंभ हो गईं.
प्रातः होते ही राज्य की सीमा पर धूल के बवंडर दिखाई देने लगे. सजी हुई पालकियों, हाथी-घोड़ों के साथ राणा भीमसिंह बारात के स्वागत के लिए तैयार हो गए.
मेवाड़ के प्रतिष्ठित नागरिक, सामंत, दरबारी, जोधपुर नरेश का स्वागत करने के लिए वहां उपस्थित थे. दूर से धूल उड़ती देख भीमसिंह ने इशारा किया और महिलाओं ने मंगल गीत गाना शुरू कर दिया. धूल के बवंडर शनैः शनैः पास आते गए और जब आने वाले लोग वहां पहुंचे तो राणा भीमसिंह चौंक पड़े. यह मकरन्द सिंह की बारात नहीं, बल्कि जयपुर के कछवाहा राजपूतों की सेना थी, जिसके आगे-आगे जयपुर नरेश स्व. मानसिंह के छोटे भाई मुकुन्द सिंह थे.
राणा भीमसिंह घबरा गए. इस वक़्त सेना का क्या काम? स्त्रियों ने गंभीरता देख मंगल गान बंद कर दिया. नरेश मुकुन्द सिंह का एक दूत राणा भीमसिंह के पास आया और बोला, "जयपर नरेश वार्ता का उद्देश्य लेकर आए हैं, जब तक यह वार्ता नहीं हो जाती हमारी सेना यहां पड़ाव डाले रहेगी."
"हम इसी समय जयपुर नरेश से वार्ता करना चाहते हैं, क्योंकि कुछ ही देर में जोधपुर नरेश अपनी बारात लेकर आने वाले हैं. आप नरेश की ओर से किसी को वार्ता के लिए भेजें."
राणा भीमसिंह ने अपने कुछ सलाहकारों को साथ लिया और राजमहल वापस लौट आए. उनके साथ राजा मुकुन्द सिंह के दीवान वार्ता के लिए आए. इधर दोनों वार्ता के लिए राजमहल वापस लौटे, उधर जोधपुर नरेश मकरन्द सिंह अपनी बारात लेकर उदयपुर पहुंच गए. स्थिति की गंभीरता को देखकर उन्होंने उदयपुर की सीमा पर पड़ाव डाल दिया. अब उदयपर की सीमा पर दो सेनाएं पड़ाव डाले हुई थीं.
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उदयपुर के राजा राणा भीमसिंह से वार्ता आरंभ करते हुए जयपुर के दीवान ने कहा, "महाराजा साहब, आपकी पुत्री कृष्णकुमारी का विवाह महाराजा मानसिंह के साथ तय हो चुका था. दुर्भाग्य है कि वे अब हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु हमारे राज पुरोहित आपकी कन्या को जयपुर की महारानी का संबोधन दे चुके हैं. जिस दिन से हमारे राज पुरोहित ने आपकी कन्या को महारानी का संबोधन दिया है, हमने उन्हें जयपुर की महारानी मान लिया है. चूंकि राजा मानसिंह के बाद मुकुन्द सिंह हमारे शासक हैं अतः नियमानुसार आप अपनी कन्या का विवाह उनके साथ करें."
राणा भीमसिंह सोच में पड़ गए, वे कुछ बोलते उसके पूर्व ही दीवान ने कहा, "नरेश मुकुन्द सिंह ने कहा है कि यदि जयपुर की महारानी का विवाह दूसरी जगह करने की कोशिश की गई तो जयपुर के रणबांकुरों की तलवारें निकल आएंगी. हमें अपनी महारानी की मर्यादा के लिए चाहे जो भी करना होगा, हम पीछे नहीं हटेंगे."
यह एक विचित्र तर्क था. जिसके साथ कृष्णा का विवाह तय हुआ था वह अब जीवित नहीं था. राणा भीमसिंह ने दीवान के ठहरने की व्यवस्था की और स्वयं निवास में आए.
"बेटी कृष्णा आज मैं बड़ी ही विचित्र परिस्थिति में फंस गया हूं. एक ओर जोधपुर नरेश अपनी बारात लेकर सीमा पर पहुंच चुके हैं. वहीं दूसरी ओर जयपुर नरेश के नए शासक मुकुन्द सिंह तुमसे विवाह की बात कर रहे हैं. उन्होंने धमकी दी है कि यदि उनसे तुम्हारा विवाह नहीं हुआ तो वे मेवाड़ की ईंट से ईंट बजा देंगे."
"आप इतने चिन्तित क्यों हैं पिताजी, जिन्हें आपने प्रस्ताव भेजा था, मेरा विवाह उनसे ही करें. यदि मेरा विवाह जोधपुर नरेश के साथ नहीं हुआ तो उनका अपमान होगा." कृष्णकुमारी ने कहा.
"पर इसमें युद्ध का ख़तरा है." राणा भीमसिंह ने कहा.
"आप राजपूत होकर युद्ध से डरते हैं. अभी मेवाड़ के राजपूतों के खून में इतनी गर्मी है कि वे अपनी बहू-बेटियों की मर्यादा और लाज बचा सकें. और फिर जोधपुर की सेनाएं भी तो हमारा साथ देंगी. मेरा विवाह मानसिंह के साथ तय हुआ था, उनकी मृत्यु का मुझे बहुत आघात पहुंचा है. पर उनके अनुज के व्यवहार से जयपुर वालों के प्रति मेरे हृदय में जो सहानुभूति थी वह ख़त्म हो गई. उनके अनुज का मुझ पर कोई अधिकार नहीं है." कृष्ण कुमारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा.
"मैं अपने सलाहकारों से बात करूंगा अभी तुम राजकाज की परिस्थितियों से वाक़िफ नहीं हो. जैसा हमारे सलाहकार कहेंगे वैसा ही निर्णय हमें लेना होगा." कहकर राणां भीमसिंह अपने महल की ओर वापस लौट गए.
अजीत सिंह चूड़ावत राणा भीम सिंह का मुख्य सलाहकार था. हालांकि चूड़ावत सरदारों का अपना अलग इतिहास रहा है, परन्तु अजीत सिंह इसका अपवाद था. वह मेवाड़ की भलाई के बारे में कभी नहीं सोचता था और वैसे भी मुख्य सलाहकार का पद उसे उसकी वीरता पर नहीं, बल्कि उसके एक पूर्वज की वीरता के कारण मिला हुआ था. राणा भीम सिंह ने अजीत सिंह को मकरन्द सिंह और मुकुन्द सिंह से बातचीत के लिए भेजा था कि कोई बीच का रास्ता निकल आए, परन्तु दोनों ही अपनी ज़िद और स्वाभिमान की दुहाई देकर अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे. जोधपुर नरेश का कहना था कि उन्हें स्वयं विवाह का प्रस्ताव राणा भीम सिंह ने भेजा है. अतः वे कृष्णकुमारी को अपनी पत्नी बना कर ही छोड़ेंगे. दूसरी ओर जयपुर नरेश मुकुन्द सिंह कृष्णकुमारी से विवाह करना चाहते थे, क्योंकि उनका कहना था कि कृष्णा अब जयपुर की महारानी है.
अजीत सिंह ने दोनों राजाओं की राय राणा भीम सिंह के सामने रखी. राणा भीम सिंह सोच में पड़ गए. इस परेशानी से मुक्ति पाने का कोई भी उपाय उन्हें नहीं सूझ रहा था.
"यदि आप बुरा न मानें तो मैं एक बात कहूं." अजीत सिंह ने कहा.
"हां हां कहो. मेवाड़ को रक्तपात से बचाने का क्या उपाय हो सकता है?"
"महाराज, हमारे सामने एक ही रास्ता है और वह है कृष्णकुमारी की मौत. यदि मेवाड़ को युद्ध और अशांति से बचाना है तो आपको अपनी संतान का मोह त्यागना होगा. हमें कृष्णा को ज़हर देना होगा. उसकी मौत के बाद यह झगड़ा स्वयं ही ख़त्म हो जाएगा."

"क्या कहा! कृष्णा को ज़हर?" राणा भीमसिंह चौंक पड़े. अपनी संतान को अपने ही हाथों से ज़हर देने की कल्पना मात्र से ही वे सिहर उठे. उनके हृदय में ज्वार भाटा उठने लगा. एक ओर मेवाड़ की रक्षा और दूसरी ओर संतान को ज़हर देकर मारना.
"अजीत सिंह, तुम जाओ. मुझे सोचने का मौक़ा दो." राणा भीम सिंह ने कहा इधर कृष्णकुमारी की एक ख़ास परिचारिका ने कृष्णकुमारी को ख़बर दी, "अन्नदाता, सरदार अजीत सिंह ने आपको ज़हर देकर मार डालने का परामर्श दिया है. मेवाड़ को युद्ध विभीषिका से बचाने का एकमात्र रास्ता यही है."
"जहर!" कृष्णकुमारी अंदर ही अंदर कांप गई. पर दूसरे ही क्षण उसका राजपुतानी रक्त खौल उठा. उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गईं. क्या उसका पिता इतना निष्ठुर हो सकता है, जो युद्ध से बचने के लिए अपनी ही संतान को अपने ही हाथों ज़हर पिला दे. कृष्णा राजपूत कन्या थी उसने एक क्षण विचार किया और तेज़ कदमों से अपने पिता के कक्ष की ओर चल दी.
राणा भीम सिंह अपने कक्ष में चिंतातुर टहल रहे थे. कृष्णा को आया देख उनका चेहरा खिल उठा, पर दूसरे ही क्षण आगत की कल्पना से उनके चेहरे की सारी ख़ुशी गायब हो गई.
"पिताजी, मैंने सुना है, सरदार अजीत सिंह ने आपको परामर्श दिया है कि मेवाड़ की रक्षा के लिए मुझे ज़हर दे दिया जाए."
"हां बेटी, मेवाड़ की रक्षा के लिए यह बहुत ज़रूरी है."
"तो क्या, राजपूतों का खून पानी हो गया है, जो अपनी बहू-बेटियों की रक्षा करने की बजाय उन्हें ज़हर देकर मार रहा है?"
"सुनो तो बेटी!" राणा भीम सिंह ने कहा.
"अब मुझे कुछ नहीं सुनना है. यदि मेरे ही कारण मेवाड़ पर संकट आया है तो मेरा कर्तव्य है कि मैं मेवाड़ को इस संकट से उबारू. आप बिना किसी संकोच के मुझे ज़हर का प्याला दे दें. मैं नहीं चाहती कि मेरे शरीर के बदले मेवाड़ के हज़ारों शरीर रक्त से सन जाए. आप राजवैद्य को बुलाएं. मैं कल प्रातः ज़हर का प्याला पीऊंगी." कहकर कृष्णकुमारी तेज़ क़दमों से अपने कक्ष की ओर चल दी.
दूसरे ही दिन प्रातः कृष्णा का उसकी सखियों ने भरपूर श्रृंगार किया. उसने भगवान कृष्ण के मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की. मंदिर के बाहर ही राजवैद्य ज़हर का प्याला लेकर खड़े थे. कृष्णा ने एक बार अपने पिता की ओर देखा और कहा, "पिताजी, मैं जा रही हूं, पर आप मेरी मौत पर शोक मत कीजिएगा. यह बलिदान मेवाड़ को रक्तपात और युद्ध से बचाने के लिए होगा. परन्तु एक बात का दुख मुझे है कि जो जाति अपनी बेटियों की रक्षा करने में असमर्थ है उसकी वीरता, उसके शौर्य और साहस को धिक्कार है." कहते-कहते कृष्णा ने प्याला लिया और एक ही सांस में उसे खाली कर दिया. तेज़ ज़हर का असर क्षण प्रतिक्षण बढ़ता गया. कुछ ही देर में उसकी आंखें मूंदने लगीं. पैर लड़खड़ाने लगे और देखते ही देखते वह निर्जीव होकर धरती पर गिर पड़ी.
राजवैद्य ने उसकी नाड़ी देखी और थके स्वर में कहा, "बेटी कृष्णा शहीद हो गईं."
कृष्णकुमारी की शहादत से मेवाड़ रक्तपात से बच गया, लेकिन क्या वह बलिदान एक तारीख़ बन सका?
- चैतन्य भट्ट
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