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पंजाबी कहानी- भाभी मैना (Short Story- Bhabhi Maina)

काका अपनी खिड़की में आकर बैठ गया और उसने बुलाया, "भाभी मैना!.. भाभी मैना!" मैना को बहुत शर्म आई. उसे अब पता लगा कि वह अपने मन में नहीं, बल्कि मुंह से बोल रही‌ थी. "हां, काका! मेरे अच्छे काका... पर ज़रा धीमे बोलो."‌ "तुम इतने दिन कहां चली गई थी." "मेरा कमरा क़ैदखाना बना दिया गया है. इस खिड़की को ताला लग गया है."

शहर की एक गली में दो आमने-सामने के घरों के बीच में मुश्किल से तीन-साढ़े तीन गज़ का फ़ासला होगा. पहली छत पर उन घरों की दो खिड़कियां भी आमने-सामने खुलती थी. एक में से सामने दीवार पर टंगा हुआ काफ़ी बड़ा आईना दिखाई देता था.

वह एक छोटा सा कमरा था और उसमें सिवाय एक स्त्री के और कोई सूरत शायद ही कभी नज़र आती थी. वह स्त्री कभी कसीदा काढ़ती, कभी पुस्तक पढ़ती, कभी ऊंघती हुई बैठी होती और कभी वह आईने के सामने खड़ी होकर बालों में देर तक कंघी करती रहती. वह दिन में कई-कई बार कंघी करती. घरवालों का ख़्याल था कि उसे बाल संवारने का शौक पागलपन की हद तक है..

उसके बाल लंबे भी बहुत थे. जब वह मुड़कर उनकी लंबाई देखती, तो वे उसके टखनों को छू रहे होते. प्रकाश में वे बाल चमकते हुए दिखाई देते.

वह जवान थी और सुंदर नाक-नक्शों वाली. उसके चेहरे पर एक मिठास और उदासी झलकती थी.

वह खिड़की में बैठी देर तक आंसू बहाती रहती. कभी किसी ने उसे खिड़की में से सिर निकाल कर बाहर झांकते हुए नहीं देखा था. पर गलीवालों को उसके वहां बैठने का आभास ज़रूर होता था. कभी कोई स्त्री वहां से गुज़रते हुए उसे आवाज़ भी दे लेती और वह बड़े मीठे लहज़े में उसका जवाब देती.

जब वह कमरे में न होती, तो खिड़की बंद हो जाती.

रोज़ एक छोटा सा लडका बस्ता लिए गली का मोड़ मुड़ता उसे दिखाई देता. वह लड़का भी ऊपर देखता और फिर अपने घर में चला जाता. उसके सीढ़ियां चढ़ने की दुप-दुप की आवाज़ स्त्री के कानों में पड़ती. वह स्त्री कभी उस घर में नहीं गई थी, पर उसे उन सीढ़ियों की गिनती याद थी.

वह लड़का बस्ता एक तरफ़ रखकर अपनी खिड़की खोलकर सामने की खिड़की की ओर देखता. स्त्री उस तरफ़ न देखती, पर उसे पता होता कि किसी की दो आंखें उसे देख रही हैं. अगर किसी दिन लड़के को स्कूल से आने में देर हो जाती तो वह दूसरे लड़कों से पूछना चाहती कि 'काका' (छोटा बच्चा) क्यों नहीं आया, पर उसने कभी पूछा नहीं था.

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इस प्रकार काफ़ी अर्सा बीत गया. काका 13 वर्ष का होने लगा था. उसकी दिलचस्पी सामने की खिड़की में अब कुछ ज़्यादा बढ़ गई थी. एक दिन उसने अपनी मां से पूछा, "हमारे घर सभी आते हैं, पर सामने के घर से कभी कोई नहीं आया."

मां ने कहा, "वह उस घर की बहू है, वह भी विधवा. वे लोग बहुत पर्दा करने वाले हैं. इसलिए किसी के यहां नहीं आते-जाते."

"और क्या ये लोग घर से बाहर भी नहीं निकलते?"

"निकलते हैं, पर यह एक दुखी परिवार है. मौत ने इस घर को तबाह कर डाला है. एक ही बेटा रह गया था. उसकी शादी हुई, पर दो ही साल में वह मर गया. उसकी मौत के बाद उसकी पत्नी को एक बच्चा हुआ. वह भी सालभर बाद मर गया. अब दोनों विधवाएं रोने-धोने को रह गई हैं.

"वह किसका बच्चा था?"

"मैना का, जिसे तुमने कई बार खिड़की में बैठे हुए देखा होगा."

"वह हर समय खिड़की में क्यों बैठी रहती हैं?"

"ये लोग जवान विधवाओं की बहुत रखवाली रखते हैं और फिर, घर में काम-काज भी ज्यादा नहीं है."

"मां, कभी यह महिला मुझे मिले, तो इसे क्या कहकर बुलाऊं?"

"कौन, मैना? वह तुम्हारी भाभी है. उसका पति गली के रिश्ते से तुम्हारा भाई था. बहुत अच्छा लड़का था."

"भला यह मैना कैसा नाम है?"

"तुम्हे अच्छा नहीं लगा?"

"नहीं, अच्छा तो लगा है, पर मैंने पहले कभी ऐसा नाम नहीं सुना. मैना वही होती है न, जो मामाजी के यहां पिंजरे में बंद है और बहुत मीठी बातें करती है?"

"हां, वही."

"मां, मुझे एक मैना ले दोगी?"

"अपने मामाजी से कहना."

कुछ दिनों के बाद उसकी बैठक में एक पिंजरा टंगा हुआ था. जब काका ऊपर जाता, तो पिंजरा साथ ही ले जाता.

अपनी मैना को उसने बोलना सिखाया, "भाभी मैना खिड़की में बैठी है." खिड़कीवाली मैना ने उससे कभी बात नहीं की थी, पर उसे बहुत अच्छा लगता, जब पिंजरे में की मैना कहती, "भाभी मैना खिड़की में बैठी है."

सर्दियों की रातों में भाभी मैना अपने कमरे में सोती थी. परीक्षा नज़दीक होने पर काका भी बैठक में ही सोने लग गया था.

उसकी उम्र अब पच्चीस वर्ष की हो गई थी. वह मन में कहा करती- काश, मुझे इस बच्चे से बोलने की आज़ादी मिल सके. कभी यह बीमार हो तो मैं इसके घर जाकर इसके पास बैठ सकूं. लेकिन मुझे कौन इतनी आज़ादी देगा? बस एक दिन मैं इसी कमरे में बूढ़ी हो जाऊंगी. मेरे बाल झड़ जाएंगे. काका शादी कर लेगा, तब मैं किस प्रकार अंधेरे जीवन के लंबे दिन और लंबी रातें काटूंगी?

एक दिन ऐसे ही सोचते हुए वह बिस्तर पर से उठकर खिड़की में आई. चांदनी रात थी. काका गहरी नींद में सोया हुआ था. मैना के मन में एक उबाल सा उठा, 'काश, मैं उसके पास पहुंच जाऊं!.. और उसका मुंह चूमकर वापस आ जाऊं.'

पर वह फ़ासला इतना छोटा नहीं था. वह फिर बिस्तर पर लेट गई. कुछ देर के बाद आवाज़ आई, "भाभी मैना..." वह चौंक कर उठी. पिंजरे में की मैना की आवाज़ थी वह. काका उसी प्रकार सोया हुआ था.

उसी समय मैना की सास किसी काम से उठी थी और उसके कानों में मैना का नाम पड़ा था. उसने मैना को आवाज़ दी तो वह झट बोल उठी. सास का शक पक्का हो गया.

"तुम सोई नहीं थी? रात आधी से ऊपर बीत गई है."

"यूं ही आंखें खुल गई थीं."

सास कमरे में आईं. सामने की खिड़की में उसे कोई सोया हुआ दिखाई दिया, मर्द का चेहरा. "किससे बातें कर रही थी?"

"किसी से भी तो नहीं."

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सास ने फिर सामने की खिड़की की ओर देखा और वह चली गई. काका यद्यपि बच्चा था और अपनी उम्र से छोटा लगता था, पर था तो वह मर्द. विधवाओं की क्या मजाल कि बच्चों को भी इस प्रकार देखें !

अगले दिन काका जब स्कूल से आया, तो मैना की खिड़की बंद थी. फिर रात के समय भी वह बंद थी.

रात अंधेरी थी. मैना की खिड़की के साथ घसर-मसर की आवाज़ आई, जैसे कोई अलग-अलग चाभियां लगाकर ताला खोल रहा हो.

फिर आहिस्ता से खिड़की खुली. मैना ने काका की सांसें सुनी. वह सोया हुआ था. उस अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था, पर मैना को जैसे सब कुछ साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा था.

दूसरे क्षण उसे लगा, जैसे वह उसके बिस्तर पर बैठी हुई थी और उसके बालों में उंगलियां फिरा रही थी, तभी उसके कानों में उसकी अपनी आवाज़ पड़ी, "काका!.. काका!"

काका हड़बड़ा कर उठ बैठा.

आवाज़ सुनकर काका जाग उठा था. अगर कोई और भी जाग पड़ा हो तो?

काका अपनी खिड़की में आकर बैठ गया और उसने बुलाया, "भाभी मैना!.. भाभी मैना!"

मैना को बहुत शर्म आई. उसे अब पता लगा कि वह अपने मन में नहीं, बल्कि मुंह से बोल रही‌ थी.

"हां, काका! मेरे अच्छे काका... पर ज़रा धीमे बोलो."

"तुम इतने दिन कहां चली गई थी."

"मेरा कमरा क़ैदखाना बना दिया गया है. इस खिड़की को ताला लग गया है."

"वह क्यों?"

"उस दिन तुम्हारी मैना ने मुझे बुलाया था तो मेरी सास उस समय उठ बैठी थीं. उसने सोचा था कि मैं तुमसे बातें कर रही हूं."

"तो क्या हो गया? मां ने कहा था कि तुम मेरी भाभी हो."

"बहुत कुछ हो गया काका! ताले लग गए; इसलिए अब मैं यहां से चली जाऊंगी. इस घर में यह मेरी आखिरी रात है. मैं तुमसे मिलकर जाना चाहती हूं. तुम किसी को बताओगे तो नहीं?"

"नहीं बताऊंगा, पर तुम क्यों जा रही हो? न जाओ. मैं बड़ा होऊंगा. मेरी शादी होगी. मैं अपनी पत्नी को तुम्हारे घर भेजूंगा. वह तुम्हें बुलाएगी. तुम उसे मिलने आना, फिर तो कोई कुछ नहीं कहेगा. तुम न जाओ."

"पर तुम अभी बहुत छोटे हो. तुम्हारी शादी को बहुत समय है. इतने साल मैं इस क़ैद में किस तरह बिताऊंगी? मेरा तो तुम्हारी ओर देखना भी बंद कर दिया गया है."

"तुम कहां जाओगी? मैं तुम्हें वहां मिलने आऊंगा."

"नहीं, काका, जहां मैं जा रही हूं, वहां कोई भी मर्द मेरे साथ बात तक नहीं कर सकेगा."

"तुम वहां न जाओ."

"मेरे लिए और कोई रास्ता बाकी नहीं रहा. मैंने पुजारिन बनने का फ़ैसला कर लिया है."

"हां, जो अपना सारा जीवन ईश्वर-भक्ति में बिताती है."

"न भाभी मैना, तुम कभी न बनना पुजारिन."

"काका, मेरे लिए और कोई रास्ता नहीं रहा." तभी उसने कोई चीज़ उसकी ओर फेंकी, "यह मेरी निशानी रख लेना."

मैना की खिड़की बंद हो गई.

दूसरे दिन जब काका स्कूल से आया तो उसकी मां ने बताया कि मैना बहुत दुखी थी. रोज़ सास लड़ती थी और तंग करती थी. वह घर से निकल गई है और लिखकर छोड़ गई है कि वह पुजारिन बनने जा रही है.

"पर मां, क्या वह यहां पुजारिन नहीं बन सकती?"

"नहीं. जिसे पुजारिन बनना हो, उसे अपना शहर छोड़कर किसी दूसरे शहर के मठ में जाना पड़ता है."

"भाभी मैना कहां गई होगी?"

"पता लग जाएगा. शायद रावलपिंडी गई हो, जहां इनका मठ है. वहां तुम्हारी मौसी रहती है. अगर वहां गई होगी तो जाकर देख आना."

सारी गली में मैना की बातें होती थीं.

बड़ी अच्छी स्त्री थी. उसके बाल कितने सुंदर थे. उसे जान से प्यारे थे, अब वे काट दिए जाएंगे...

मैना रावलपिंडी ही गई थी. काका अपनी मौसी के यहां चला गया.

काका अपनी भाभी को देखने के लिए बहुत बेचैन था. उसने उसे हंसते हुए कभी नहीं देखा था. मौसी बताती थी कि उसकी मुस्कुराहट लोगों का दिल मोह लेती है.

दूसरे दिन दोपहर के बाद मौसी ने बताया कि मैना की डोली निकलेगी. वह सभी बाज़ारों में घूमेगी. उसे हर कोई देख सकेगा.

बैंड बज रहा था. लोग डोली पर से रुपए-पैसे फेंक रहे थे. डोली में मैना गहनों से लदी बैठी थी.

एक मोड़ पर डोली अचानक काका के नज़दीक आ गई.!उस समय वह फूल फेंकने लगा, तो मैना ने उसे पहचान लिया. उसकी अधखुली आंखें पूरी तरह खुल गईं. उसने ध्यान से देखा. फिर हौसला करके डोली रोकने के लिए कहा, "वह हमारी गली का बच्चा है. मुझ पर फूल फेंकना चाहता है. उसे एक क्षण के लिए मेरे पास ले आओ."

यह रवैया अनोखा था, पर पुजारिन बननेवाली की हर बात मान ली जाती है.

"लाओ, तुम्हारे यह फूल मैं ले लूं. तुम बड़ी दूर से आए हो."

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काका बहुत खुश हुआ.

जुलूस डेरे पर पहुंच गया. लोग चले गए. ऊपर जाने पर मैना को बड़े पुजारी के सामने बैठा दिया गया.

"क्या तुमने अपना मन बना लिया है?" पुजारी ने पूछा.

"जी, महाराज."

"कपड़े-गहने तुम्हें सब उतारने पड़ेंगे और फिर, तुम इन्हें कभी भी अंगीकार नहीं कर सकोगी."

"जी महाराज, मुझे इनकी कोई चाह नहीं है."

"तुम वही कुछ खाओगी और पिओगी, जो हमारे नियमानुसार होगा."

"जी महाराज, मुझे अच्छे भोजन की कोई चाह नहीं है."

"मर्दों को छूना तो एक तरफ़, उनका ख़्याल भी इस धर्म में पाप है, जिसे तुम अपना रही हो."

मैना ने लंबी सांस ली. उसकी जेब में काका का रुमाल खुलता हुआ प्रतीत हुआ और रुमाल के सिरे जैसे छोटी-छोटी बांहें बनाकर उसके गिर्द लिपट गए. आख़िर उसने कुछ संभल कर उत्तर दिया, "जी, महाराज यह भी मुझे..."

"अब तुम उस कमरे में जाकर यह कपड़े उतार दो और जो कपड़े तुम्हे दिए जाएं, पहन लो. फिर तुम्हें अपने सिर के बाल काटने होंगे.

बालों को काटने की बात सुनकर वह अपनी आह न रोक सकी और बड़ा हौसला करके बोली, "पूज्य पिताजी, क्या मुझे बाल रखने की आज्ञा नहीं दे सकते?"

"यह किस प्रकार हो सकता है?" पुजारी ने हैरान होकर कहा.

"मैं जानती हूं कि यह मेरी अनोखी मांग है‌ पर अगर आप मान लें तो मैं आपको कभी किसी शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगी. मैं आपकी ऐसी सेविका बनूंगी कि सबको आश्चर्य होगा."

"पर यह नहीं हो सकेगा, क्या तुम्हे पहले नहीं पता था?"

"पता था, पर अब जब बाल कटाने का मौक़ा आया है तो लग रहा है, जैसे मेरे बाल जीवित हो. यह मेरे प्राणों में से उगे हुए हैं. जब मैं इनमें कंधी फिराती थी तो यह झटके से मेरी टांगों के गिर्द लिपट जाते थे. हे परम पूज्य, एक बार अनहोनी करके देखिए, आपको अपने फ़ैसले पर पछताना नहीं पड़ेगा."

"नहीं, तुम्हारी यह बात मानी नहीं जा सकेगी," पुजारी ने कहा.

"तो फिर पांच मिनट के लिए मुझे अकेले में अपने मन को समझा लेने दीजिए."

"हां, जाओ, सामने जाकर सोच लो."

मैना उठी और धीरे-धीरे पर दृढ़ता से सामने छत के सिरे पर जाकर बैठ गई. वहां से उसने नीचे बाज़ार की ओर देखा.

कुछ देर के बाद वह उठी.

"यह स्त्री बड़ी अनोखी है. इसकी हर बात हैरान करनेवाली है. अगर यह पुजारिन बन गई तो बहुत नाम कमाएगी." बड़े पुजारी ने कहा.

"पर वह वह खड़ी क्यों हो गई है?" दूसरे पुजारी ने घबरा कर कहा.

बड़े पुजारी ने देखा, मैना ने अपनी उंगली जूड़े में घुमाई. जूड़ा खुल गया. बाल पैरों को छूने लगे. मंद-मंद वायु में वे लहराने लगे.

"कितने लंबे..."

"ओह!" सभी उठकर सीढ़ियों की ओर भागे. उस समय मैना छत पर नहीं थी. सभी नीचे पहुंचे. बाज़ार में हाहाकार मचा हुआ था. काका मैना के सिरहाने बैठा था. उसने मैना के बिखरे हुए बाल माथे पर से एक तरफ़ हटाए. काले बालों में कहीं-कहीं खून सिंदूर की तरह चमक रहा था. काका की आंखों से आंसू बह रहे थे और वह मैना की आंखों में देख रहा था. वे आंखें खुली थीं. उनका रंग उसने पहले कभी नहीं देखा था. वे आंखें उस काली रात जैसी थीं, जिस रात मैना ने उसे जगाया था. पर उस रात की गहराई में कोई सूरज डूबा हुआ था, तब अंधेरे में भी वह उन्हें देख सकता था. वे आंखे अब भी उतनी ही काली और चमकदार थी. वे खुली हुई थीं, पर उस समय उनमें कोई सूरज नहीं था.

अनुवाद- सुखबीर

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