कुछ क्षण ठहरकर वह बोली, "जानती हो, जितना करती गई, लोगों की अपेक्षाएं उतनी ही बढ़ती गईं. किसी ने यह नहीं कहा कि आज तुम भी आराम कर लो."
बातों-बातों में रीटा बोली, "अब पचपन की हो गई हूं. सौ डिग्री बुखार भी हो जाए तो चादर लपेटकर पड़ जाती हूं."
"पहले… 102 डिग्री बुखार में भी रसोई चलती थी. बच्चों का टिफिन, पति का नाश्ता, सास-ससुर की दवा... सब समय पर. लगता था, मेरे बिना घर रुक जाएगा."
"फिर?"
रीटा ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, "एक दिन समझ आ गया कि मेरे बुखार से किसी की दिनचर्या नहीं रुकती, बस मुझे ही रुकना नहीं आता था."
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कुछ क्षण ठहरकर वह बोली, "जानती हो, जितना करती गई, लोगों की अपेक्षाएं उतनी ही बढ़ती गईं. किसी ने यह नहीं कहा कि आज तुम भी आराम कर लो."
उसने चाय का कप उठाया और बिल्कुल शांत स्वर में कहा, "अब शरीर को आराम देती हूं... क्योंकि वर्षों तक उसे तोड़ने का कोई पुरस्कार नहीं मिला, केवल अगली ज़िम्मेदारी मिलती रही."
अब पहली बार समझ आया, “त्याग की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह धीरे-धीरे कर्तव्य नहीं, दूसरों का अधिकार बन जाता है और जब तक हम स्वयं अपने शरीर का सम्मान नहीं करते, दुनिया भी नहीं करती."

नील मणि
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