हम दूसरों का मूल्यांकन तो बड़ी आसानी से कर लेते हैं, लेकिन स्वयं जज होने के डर से हमेशा अपने ऊपर कठोर बने रहते हैं. इसलिए यदि किसी दिन रूटीन की कोई बात छूट जाए तो ख़ुद को दोष देने की बजाय इतना कहना काफी है, "इट्स ओके... ऐसा तो होता है कभी-कभी."
हर महिला की सोच, स्वभाव और जीवन को देखने का नज़रिया अलग होता है. एक ही घटना को चार महिलाएं देखें तो चारों उसे अलग-अलग तरीक़े से समझती और उसका अलग अर्थ निकालती हैं. हमारे भीतर का भावनात्मक संसार हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है और कई बार छोटी-छोटी बातों के लिए पछतावे से भी भर देता है. यह पछतावा किसी बड़े अपराध या भारी भूल का नहीं होता, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन की उन छोटी बातों का होता है, जिन्हें किसी दिन हम पूरा नहीं कर पातीं.
हम अपने रूटीन के इतनी आदी हो जाती हैं कि यदि किसी दिन उसमें थोड़ी सी भी कमी रह जाए तो अपराधबोध घेर लेता है. दूसरी ओर वही रूटीन कभी-कभी हमें थका भी देता है. लगातार एक जैसी ज़िम्मेदारियां निभाते-निभाते मन ऊब जाता है, लेकिन हम इस ऊब को स्वीकार नहीं करतीं. यही दबा हुआ तनाव कई बार रिश्तों में कड़वाहट और दूरी का कारण बन जाता है.
फिल्म 'पीकू' में एक बेटी अपने पिता की सेवा पूरी निष्ठा से करती है, लेकिन कई बार उनके व्यवहार से थक भी जाती है. यह थकान उसके प्रेम को कम नहीं करती, बल्कि यह केवल उसके इंसान होने का प्रमाण है. यदि यही स्थिति किसी बहू की होती तो समाज शायद उसे तुरंत कठघरे में खड़ा कर देता, जबकि सच यह है कि हर व्यक्ति की सहनशक्ति की एक सीमा होती है. कभी माता-पिता, कभी बच्चे, कभी जीवनसाथी और कभी सबसे प्रिय व्यक्ति से भी मन ऊब सकता है. इसमें कोई अपराध नहीं है.
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हर दिन एक जैसा नहीं होता. किसी सुबह जल्दी उठने का मन नहीं करता, कभी बच्चों को स्कूल भेजने की तैयारी बोझ लगती है, कभी घर के काम करने का उत्साह नहीं रहता. यह सब मानव स्वभाव का हिस्सा है.
पछतावे का बोझ क्यों उठाएं?
हम केवल अतीत का ही नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों का बोझ भी मन में ढोती रहती हैं. हमें लगता है कि हर काम हर दिन पूरी तरह होना ही चाहिए. यदि ऐसा न हो तो हम स्वयं को दोषी मान लेती हैं, जबकि यह पछतावा हमें केवल मानसिक पीड़ा देता है.
इतना ही नहीं, हम दूसरों के जीवन से अपनी तुलना भी करने लगती हैं. किसी को सफल देखकर सोचती हैं कि उसका जीवन कितना अच्छा है और हमारा कितना कठिन. लेकिन हम यह भूल जाती हैं कि हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं. जो उसके लिए उचित है, वह हमारे लिए ज़रूरी नहीं कि सही हो. इसलिए तुलना और पछतावे की बजाय अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करना अधिक बुद्धिमानी है.
जीवन को हल्का रखिए, रोबोट मत बनिए
जीवन में कब क्या होने वाला है, यह कोई नहीं जानता. इसलिए छोटी-छोटी बातों के बोझ तले दबकर जीने की बजाय स्वयं के प्रति थोड़ा उदार बनना चाहिए. यदि किसी दिन जल्दी उठने का मन न हो, रूटीन फॉलो करने की इच्छा न हो, मूड ठीक न हो या किसी काम से थोड़ी दूरी बनानी पड़े, तो स्वयं को माफ़ करना सीखिए. इससे न आपका प्रेम कम होगा और न आपकी ज़िम्मेदारियां.
जीवन रोबोट की तरह जीने के लिए नहीं मिला है. हमें अपनी सुविधा, शारीरिक क्षमता, मानसिक स्थिति और ख़ुशी को भी महत्व देना चाहिए. हर समय केवल दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीना अंततः मानसिक तनाव ही देता है. यदि जीवन को थोड़ा हल्का रखेंगी तो रिश्ते भी सहज रहेंगे और मन भी शांत रहेगा.
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यह बात केवल युवतियों के लिए नहीं, बल्कि हर उम्र की महिला के लिए उतनी ही आवश्यक है. परिवार में अनावश्यक तनाव और कलह से बचने का सबसे सरल उपाय यही है कि हम ख़ुद पर भी उतनी ही दया और प्रेम करें जितना दूसरों पर करती हैं. आख़िर जीवन काम के लिए नहीं, बल्कि काम जीवन के लिए है. इसलिए कभी-कभी अपने मन से भी कहिए, "इट्स ओके... ऐसा तो होता है कभी-कभी!.."
- स्नेहा सिंह

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