“कामिनी, जब बच्चे लगातार मेहनत कर रहे हों, तब हमें उनका संबल बनना चाहिए. बच्चे असफलता से उतना नहीं डरते, जितना समाज से डरते हैं. और समाज कौन है? हम और आप ही तो.”
हर सुबह की तरह आज भी सुधा सोसाइटी के पार्क में वॉक कर रही थी. हल्की ठंडी हवा चल रही थी और पेड़ों पर बैठे पक्षियों की आवाज़ें वातावरण को मधुर बना रही थीं. तभी पीछे से एक तेज़ आवाज़ आई, “हेलो! सुधा जी! कैसी हैं आप?”
सुधा ने पलटकर देखा. सोसाइटी की कामिनी जी थीं. हमेशा की तरह उत्साह से भरी हुई और दूसरों की ज़िंदगी में ज़रूरत से ज़्यादा दिलचस्पी लेने वाली.
“नमस्ते.” कहती हुई सुधा मुस्कुराई.
कामिनी तुरंत उनके साथ कदम मिलाकर चलने लगीं.
“और सुनाइए, आपकी बेटी अन्या का मेडिकल का पेपर कैसा रहा?”
“ठीक रहा.” सुधा ने संक्षेप में कहा.
लेकिन कामिनी जी इतनी आसानी से कहां रुकने वाली थीं.
“वैसे क्या लगता है आपको? इस बार उसका सिलेक्शन हो जाएगा?”
सुधा हल्का सा मुस्कुराई.
“अब क्या कह सकते हैं. बच्चे अपना प्रयास करते हैं, हम केवल उनके प्रयास देख सकते हैं, परिणाम नहीं. इसलिए जो भी होगा, हमें सहज स्वीकार होगा.”
“सही बात है." कामिनी ने तुरंत कहा, “वैसे मेरे बड़े बेटे का तो पहली बार में ही सिलेक्शन हो गया था. छोटे बेटे ने भी इस बार अन्या के साथ पेपर दिया है. कह रहा था- ‘मॉम! बहुत बढ़िया एग्जाम गया है.’ उसका तो पक्का समझो."
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“अच्छी बात है." सुधा ने विनम्रता से कहा.
“बच्चों की मेहनत रंग लाए, यही ज़रूरी है. अच्छा, मैं चलती हूं.”
वह आगे बढ़ गई पर कामिनी का सवाल उसके मन में देर तक गूंजता रहा.
“घर पहुंचकर उसने देखा- अन्या फिर से किताबों में डूबी हुई थी. रिज़ल्ट आने में अभी पंद्रह दिन बाकी थे, लेकिन वह पढ़ाई से अपना ध्यान हटाना नहीं चाहती थी. शायद मेहनत अब उसकी आदत बन चुकी थी.
सुधा कुछ देर दरवाज़े पर खड़ी उसे देखती रही.
आजकल के बच्चे सचमुच कितनी मेहनत करते हैं, उसने सोचा.
हम केवल उनकी सफलता और असफलता देखते हैं, पर असली संघर्ष तो वे ही जीते हैं.
दिन बीतते गए. इन पंद्रह दिनों में कामिनी जी कई बार मिलीं और हर बार किसी न किसी तरह रिज़ल्ट की चर्चा छेड़ देतीं. कभी अपने बेटे का आत्मविश्वास बतातीं, कभी दूसरे बच्चों की तुलना करतीं.
सुधा हर बार मुस्कुराकर बात टाल देती. फिर रिज़ल्ट का दिन आ गया.
अन्या का मेडिकल कॉलेज में चयन हो गया. घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. अन्या खिल उठी. सुधा की आंखें भी नम हो गईं. लेकिन उसने इस ख़ुशी को शोर नहीं बनने दिया. उसने केवल अपने परिवार और कुछ शुभचिंतकों तक ही इसे सीमित रखा.
अगली सुबह वह फिर पार्क पहुंची. आज कामिनी जी दूर से ही कुछ बुझी बुझी सी लगीं. चेहरा उतरा हुआ था आंखों के नीचे गहरे काले घेरे. सुधा ने न तो उनके बेटे के रिज़ल्ट के बारे में पूछा और न ही अन्या के चयन की बात की.
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दोनों चुपचाप साथ चलती रहीं. तभी अचानक कामिनी लड़खड़ाईं और वहीं गिर पड़ीं.
“कामिनी जी!” सुधा घबरा गई.
उसने तुरंत पानी के छींटें मारे. थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया तो सुधा उन्हें अपने घर ले आई.
घर पहुंचते ही कामिनी फूट-फूटकर रोने लगीं.
“सुधा जी… मेरे बेटे का सिलेक्शन नहीं हो पाया…”
“अरे!” सुधा ने उनका हाथ पकड़ लिया, “इसमें इतना टूटने की क्या बात है? फिर से कोशिश करेगा. अन्या भी तो दूसरे प्रयास में सिलेक्ट हुई है.”
यह सुनते ही कामिनी जैसे बिजली का झटका खाकर उठ बैठीं.
“क्या कहा? अन्या सिलेक्ट हो गई?”
सुधा ने धीरे से सिर हिला दिया.
कामिनी का चेहरा और उतर गया.
“हाय… मेरा बच्चा क्यों नहीं हो पाया…”
तभी वहीं कमरे में बैठी अन्या बोली, “आंटी, ये कॉम्पिटिटिव एग्जाम हैं. इन्हें समझने में समय लगता है. आप परेशान मत होइए. अपने बेटे से कहिए कि कोशिश करता रहे. मेहनत कभी बेकार नहीं जाती. और अगर एक रास्ते पर सफलता न मिले तो आजकल विकल्पों की भी कमी नहीं है.”
कामिनी जी उसकी ओर देखने लगीं.
“सुधा जी… कितनी समझदार बेटी है आपकी.”
अन्या मुस्कुरा दी.
“मैं समझदार इसलिए हूं, क्योंकि मेरी मां समझदार हैं. मेरे असफल होने पर ये ऐसे टूटती नहीं हैं. ना ख़ुद उदास होती हैं, ना मुझे होने देती हैं.”
कामिनी की आंखें झुक गईं.
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सुधा ने धीरे से कहा, “कामिनी, जब बच्चे लगातार मेहनत कर रहे हों, तब हमें उनका संबल बनना चाहिए. बच्चे असफलता से उतना नहीं डरते, जितना समाज से डरते हैं. और समाज कौन है? हम और आप ही तो.”
कमरे में कुछ पल के लिए ख़ामोशी छा गई.
फिर सुधा ने मुस्कुराकर कहा, “जैसे पुरुषों से उनकी आमदनी और महिलाओं से उनकी उम्र नहीं पूछनी चाहिए… वैसे ही बच्चों और उनके माता-पिता से बार-बार उनका रिज़ल्ट भी नहीं पूछना चाहिए.”
कामिनी पहली बार हल्का सा हंसीं.
फिर बोलीं, “अन्या… मेरे घर चलोगी? ज़रा मेरे बेटे को भी समझा दो. कल से कमरे में बंद होकर रो रहा है."
अन्या जाने ही वाली थी कि सुधा ने उसका हाथ पकड़ लिया.
“नहीं,” उसने प्यार से कहा, “इस समय उसे किसी मोटिवेशनल स्पीच की नहीं, अपनी मां की ज़रूरत है. जाइए… उसे गले लगाइए. पहले अपनी उदासी छोड़िए, तभी उसकी उदासी कम कर पाएंगी, हमारे बच्चों का असली संबल हम ख़ुद हैं."
कामिनी कुछ क्षण उन्हें देखती रहीं. फिर उनकी आंखों में पहली बार एक सच्ची समझदारी उतरती दिखाई दी.
वे धीरे-धीरे उठीं और सकारात्मक ऊर्जा के साथ अपने घर की ओर चल दीं.

पूर्ति खरे
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