मेरे सामने ख़त के अक्षर धूमिल होने लगते है. जिन सच्चाइयों को मैं बीस वर्ष तक झुठलाती रही, वे ही मेरे सामने खड़ी हो जाती हैं. जिस मातृत्व की ख़ातिर मैंने अपना उदात्त प्रेम और वात्सल्य इन बच्चों दिया, वह ही आज मुझ पर हंसते प्रतीत होते हैं.
सामने दीवार पर लगे कैलेंडर पर मेरी दृष्टि बार बार अटक जाती. आज तो दस ही तारीख़ हुई है. विशाल को आने में अभी पूरे पांच दिन शेष हैं. उसने बड़े आग्रह से लिखा है, “मां! हम पंद्रहतारीख़ को सुबह की ट्रेन से आपके पास आ रहे हैं, जब से उसका ख़त मिला है, मुझ में नई स्फूर्ति आ गई. उसकी एक-एक चीज़ को करीने से लगा दिया. उसका कमरा, आलमारी, पलंग एवं मेज भी व्यवस्थित कर दी है.
विशाल और वैशाली, दोनों भाई बहन जब तक घर में रहते एक हंगामा सा मचा रहता था. आज दोनों के घर में न होने से एक वीरानगी सी छाई रहती है. वैशाली तो शादी होने के पश्चात पराई हो गई, पर विशाल तो मेरा होनहार लाड़ला बेटा है. सदा से शांत, प्रोफेसर साहब भी कभी-कभी धैर्य खोकर उलाहना दे देते हैं, “इन बच्चों को इतना प्यार-दुलार करती हो कि मेरा तुम्हें बिल्कुल ख़्याल ही नहीं रहता. मैं भी आखिर इंसान हूं, जिसे कभी-कभी तुम्हारी ज़रूरत रहती है.”
सच है, इन बच्चों के मोह एव ममता ने ही तो मुझेबांध रखा है. ममता का प्यासा मेरा अंतस संभवतः इन बच्चों को वात्सल्य एवं ममत्व देकर ही तृप्त हो रहा है.
एक हुक सी उठती है. जब मुझे अपने विगत दिनों की याद आती है. पिता की विशालकाय कोठी, उनका अतुलित प्यार, जिसने मुझे कभी मां की कमी महसूस न होने दी. बारह वर्ष की थी कि फिर वह हादसा हुआ जिसकी याद से आज भी सिहरन हो उठती है. उस दिन पिताजी को रात में दिल का दौरू पड़ा था. घर में शयनकक्ष में सोए थे, फिर कभी नहीं उठे. कुहराम मच गया. मैं तो विक्षिप्त जैसी ही हो गई थी. घर के अन्य सदस्यों के मध्य में भी ऐसा लग रहा था मानो मैं निपट अकेली हो गई हूं.
मैं किसी से बोलती नहीं थी. मुझे अपना ही घर भूतों का डेरा लगने लगा था. इस घुटन भरे माहौल में भी अध्ययन को लालयित मेरा मन आकाश की असीम ऊंचाइयों को छूने के लिए आतुर उड़ान भरने लगा था, पर वह एक पतंग की उड़ान मात्र थी, जिसकी डोर नीचे मेरे घरवालों के हाथ में थी. मैं कुछ नहीं थी, मेरी पसंद-नापसंद कुछ नहीं थी. पढूं तो उनकी मर्ज़ी से, न पढूं तो उनकी मर्ज़ी से. प्रतिदान की आशा से पढ़ाई का दान किया जा रहा था मुझ पर. मुझे पढ़ाना-लिखाना भी घरवालों की नज़रों में बोझ के सदृश था. धीरे-धीरे पढ़ने का उत्साह भी मेरा कम होता गया. हालांकि मुझे ऐसे कोई आभास नहीं था कि मेरा भविष्य मुझे कहां खींच ले जाएगा. जीवन का हर एहसास जिसे मैं छू कर जीना चाहत थी, वहीं मुझे घर की अगणित मर्यादाओं की ज़ंजीरों में जकड़ दिया गया था. मैं अपने आगे फैले सपाट एवं स्नेहहीन बोझिल जीवन को जैसे-तैसे जी रही थी. कभी-कभी में आधी-आधी रात तक जागती रहती थी और ऐसा लगता था कि चिरकाल से सोई मेरी मां मेरे पास आकर मुझे सांत्वना दे रही है. मेरा आस-पास रिश्तों का एहसास या वैभवपूर्ण इतिहास जैसा अब कुछ भी नहीं था, जिसके बहाने दूर तक फैली ज़िंदगी को रस लेकर गुज़ारती, दर्द का सैलाब सदा उठता-दबता रहता था.
मन में असुरक्षा का भय उठता, ‘काश! मेरे भी सिर पर ममता का हाथ होता. ऐसे समय में ज़िंदगी में ऐसा कोई नहीं था जिसको में अपना व्यक्तित्व समर्पित कर निर्भय हो जाती. उसे अपनी व्यथा का भागीदार बनाकर अपना बोझ हल्का कर पाती.
अतीत और भविष्य के भ्रम में अपने वर्तमान को मैं छलती रही. मेरे परिवारजनों को अपने वर्तमान के लिए मेरी चिंता नहीं थी. उनको चिंता थी तो अपनी मर्यादाओं एवं संपन्नता की. इसी कारण मेरी इच्छाओं को न समझते हुए मेरे समक्ष जब भी वे किसी संपन्न एवं प्रतिष्ठित युवक से शादी का प्रस्ताव रखते तो प्रतिशोध से परिपूर्ण मैं हर बार इंकार कर देती. आख़िर घरवाले मुझसे परेशान हो गए थे. मैंने मन ही मन प्रण कर लिया था कि मैं अपना संपूर्ण जीवन मातृहीनों को समर्पित कर दूंगी. मां का प्यार नहीं मिला तो क्या हुआ, मैं मातृहीनों को प्यार देकर अपने बचपन की प्यास बुझाऊंगी.
आज भी मुझे वह दिन अच्छी तरह याद है. मेरी सहेली नेहा के भाई की शादी थी, शादी में ही सौम्य, शालीन प्रोफेसर पांडेय से प्रथम भेंट हुई थी. नेहा ने ही मुझे बताया कि प्रो. पांडेय की पत्नी तीन माह पूर्व गुज़र गई हैं. उनसे प्रथम साक्षात्कार क्या हुआ, मुझे अपना लक्ष्य सामने नज़र आने लगा. मुझे ऐसा लगा जैसे जन्म-जन्म की मेरी प्यास को निर्मल जल मिल गया है. उनसे दो-तीन मुलाक़ातों के पश्चात ही मेरी कुठां एवं उदासी न जाने कहां गायब हो गई. पांचवी मुलाक़ात के पश्चात मैंने उनसे शादी करने का निर्णय कर लिया. घरवालों के विरोध के बावजूद आर्य समाज में ब्याह कर विधुर व दो बच्चों के पिता प्रो. पांडेय को मैंने अपना जीवनसाथी बना लिया.
जीवन की वह मधुर बेला जिसकी हर लड़की को प्रतीक्षा रहती है, मेरे जीवन में भी आई. नवविवाहिता जिस चिरआकांक्षित मिलन की मधुर बेला के लिए उत्कंठित रहती है मेरे अंदर उस समय ऐसी अनुराग तृष्णा नहीं थी.
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द्विपरिणीता शयन पत्नी का स्वागत करने को उत्कंठित पति से मेरा यही एक अनुरोध था, “मैं आपके दो बच्यों की मां हूं, तथाकथित सौतेली मां नहीं बनना चाहती. अतः मुझसे और बच्चों की आशा नहीं करना.”
शादी के पश्चात प्रोफेसर साहब ने मुझसे बच्चों के लिए मां के कर्तव्य एवं ममता के अतिरिक्त अपने लिए विशेष अपेक्षा नहीं की. तब से ही एक आदर्श एवं सहनशील मां की भूमिका को पूर्णता से निभाने का मेरा अथक प्रयास रहा है. मैं तो विशाल और वैशाली को पाकर धन्य हो गई हूं. अब तो मुझे मात्र बच्चों की ही फ़िक्र है, जिन्हें ममता की ज़रूरत है. इन बच्चों को पढ़ाने-लिखाने और परवरिश करने में कितनी मेहनत मुझे करनी पड़ी है, यह मेरा मन ही जानता है. इन बच्चों के कारण कई कई बार तो मैंने पति और समाज तक की अवहेलना की है. प्रोफेसर साहब जब कभी आसक्ति से मेरी ओर देखते हैं, तब स्वयं मैं भी विचलित हो जाती हूं. ऐसा लगता है जैसे वे अपने में घट रहे हैं एवं निपट अकेले हैं. पर इन बच्चों के प्रति मेरा कर्तव्य मुझे अपने पथ से च्यूत नहीं कर पाता है, तीन वर्ष पूर्व जब दोनों बच्चे ट्रिप में चले गए थे तब मुझे इसका सर्वप्रथम तीव्रता से एहसास हुआ था कि इन बच्चों के बिना मेरे जीवन का अब कोई मतलब ही नहीं है.
किसी भी मां के लिए वह क्षण बड़ा सुखद होता है, जब उसका बेटा शादी करता है. मेरा बेटा जब इस अवस्था में पहुंचा, मैं ख़ुशी से झूम उठी और गुड़िया सी सुंदर बहू पूनम का चयन कर उसकी शादी कर दी. आज मैं अपनी मेहनत का फल पा कर बहुत ख़ुश हूं. विशाल और पूनम की जोड़ी बहुत सुंदर है. कितना ख़्याल रखता है मेरा बेटा विशाल. उसका बचपना अभी तक नहीं गया है. जब भी कहीं से आता है ‘मां-मां’ कहकर लिपट जाता है.
समय कितनी जल्दी गुज़रता है, फिर भी सब कुछ पूर्ववत ही लगता है. मैं लेटे-लेटे सोचती हूं. सहसा डाकिए की आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग होती है. विशाल का ख़त आया है, लिखा है, “मां घर नहीं आ सकूंगा. पूनम घर नहीं आना चाहती, उसको न जाने क्यों आपसे भय लगता है, क्योंकि आप मेरी सौतेली…
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मेरे सामने ख़त के अक्षर धूमिल होने लगते है. जिन सच्चाइयों को मैं बीस वर्ष तक झुठलाती रही, वे ही मेरे सामने खड़ी हो जाती हैं. जिस मातृत्व की ख़ातिर मैंने अपना उदात्त प्रेम और वात्सल्य इन बच्चों दिया, वह ही आज मुझ पर हंसते प्रतीत होते हैं. मेरा हृदय चीत्कार कर उठता है. बीस वर्ष पूर्व के नन्हें विशाल का चित्र सामने उभर आता है. उस समय वह मातृहीन रो रहा था, जिसे मैंने हृदय से लगाया था, नियति की यह कैसी क्रूर पुनरावृत्ति है कि आज मैं स्वयं को संतानहीन समझकर रो रही हूं.
– डॉ. कृष्णा गुप्ता
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