कान्हदत्त की आंखें हैरानी से खुली रह गई. उसके चेहरे पर डर का भाव आ गया. उसने सोचा, ‘भला यह धागा इतने लोगों का बोझ कैसे संभाल सकेगा?” उसने सोचा, ‘अगर यह टूट गया तो मैं फिर से नरक में गिर पडूंगा.’
आख़िर उसने ऊंची आवाज़ में कहा, “हे पापियों, यह धागा मेरा है. तुम्हें ऊपर आने की इज़ाजत किसने दी है? उतरो नीचे, उतर जाओ, वरना…”
भगवान बुद्ध एक दिन स्वर्ग के कमल सरोवर के किनारे टहल रहे थे. पापियों की आत्माएं यातनाएं सह रही थीं.
भगवान बुद्ध अभी देख ही रहे थे कि उनकी नज़रकान्हदत्त नामक डाकू पर पड़ी, जो असह्य पीड़ा के कारण अपने अंगों को मरोड़ रहा था.
कान्हदत्त बहुत बड़ा पापी था. उसने लोगों को लूटा था, क़त्ल किया था, उनके घरों में आग लगाई थी. पर उसने एक अच्छा काम भी किया था. एकबार रास्ते में एक मकड़ी देख कर वह उसे कुचलने ही जा रहा था कि एकाएक वह रुक गया. उसने उसकी जान नहीं ली.
भगवान बुद्ध को वह घटना याद आ गई. उन्होंने सोचा कि इस एक नेक काम के बदले में उसे नरक से निकालना चाहिए. तभी उन्हें सरोवर में कमल के पत्तों पर जाल बुन रही स्वर्ग की मकड़ी दिखाई दी. उन्होंने उसके धागे को पकड़ा और उसे नीचे नरक की ओर लटकाया.
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नरक के अंधेरे में वह रुपहला धागा चमक रहा था. जब कान्हदत्त ने ऊपर देखा तो उस धागे पर उसकी नज़र पड़े बिना न रही. उसी समय उसके चेहरे पर पीड़ा की बजाय ख़ुशी आई. उसे पता था कि वह धागा स्वर्ग से नीचे लटक रहा था. उसने सोचा, “इसे पकड़ कर मैं नरक से बाहर निकल जाऊंगा. यह भी हो सकता है किइसके सहारे मैं स्वर्ग में ही पहुंच जाऊं, तब मैं यहां के दुखों से हमेशा के लिए छुटकारा पा जाऊंगा…”
अगले ही क्षण उसने उछल कर धागे को पकड़ लिया और धीरे धीरे ऊपर चढ़ने लगा. नरक इतना विशाल था किकाफ़ी देर चढ़ते रहने के बाद भी कान्हदत्त उससे बाहर न निकल सका. आख़िर वह इतना थक गया कि उसके लिए और ऊपर चढ़ना संभव नहीं था. उसने सोचा कि कुछ देर आराम करके फिर ऊपर चढ़ेगा. वह नरक में से हर हालत में निकल जाना चाहता था. उसे इतना संतोष ज़रूर था कि वह नरक की गहराई से काफ़ी ऊपर आ गया था.
एक मौक़े पर उसने नीचे देखा तो गहरा अंधेरा दिखाई दिया.फिर उसने ऊपर देखा तो लगा कि नरक में से निकलने का रास्ता अब बहुत लंबा नहीं है. उसमें नया जोश आया और फिर से ऊपर चढ़ने की तैयारी करते हुए जैसे ख़ुद से कहा, “अब मैं बच जाऊंगा! सचमुच बच जाऊंगा! उसी समय उसने महसूस किया कि उसके नीचे बहुत से पापी उस धागे को पकड़े ऊपर चढ़े आ रहे थे.
कान्हदत्त की आंखें हैरानी से खुली रह गई. उसके चेहरे पर डर का भाव आ गया. उसने सोचा, ‘भला यह धागा इतने लोगों का बोझ कैसे संभाल सकेगा?” उसने सोचा, ‘अगर यह टूट गया तो मैं फिर से नरक में गिर पडूंगा.’
आख़िर उसने ऊंची आवाज़ में कहा, “हे पापियों, यह धागा मेरा है. तुम्हें ऊपर आने की इज़ाजत किसने दी है? उतरो नीचे, उतर जाओ, वरना…” उसी क्षण वह धागा भी टूटा कान्हदत्त के मुंह से चीख निकलती कि वह नरक की गहराइयों में गिर पड़ा.
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सरोवर के किनारे खड़े भगवान बुद्ध ने यह सब देखा और उनके चेहरे पर उदासी छा गई. अगर कान्हदत्त ने सिर्फ़ अपने ही बचाव के बारे में सोचा होता, तो उसके साथ अनगिनत पापी नरक में से निकल गए होते. परंतु वह अपने मन की कमज़ोरी की बदौलत, उन्हें फिर से अपने साथ नरक में ले डूबा.
– रेषा
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