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लघुकथा- फरमान (Short Story- Farman)

शादी के पांचवे दिन ही अपना फरमान सुनाकर मुदित घर से बाहर निकल गया था. माधुरी कुछ समझ ही नहीं पा रही थी.

आज उसने अरसे बाद लाल लिपस्टिक लगाई थी. अपने नए चेहरे को देख उसे ख़ुद ही इतना अजीब लग रहा था कि वो बार-बार आईना देखती और लिपस्टिक को हल्का करने की कोशिश करती.

शाम धीरे‌ धीरे गहरी हो रही थी और उसकी आंखों से बहता काजल आसमान में घुलने लगा था, पर चिड़ियों की वापसी का शोर उसके मन के शोर को नहीं दबा पा रहा था.

“आज के बाद से ये लाल लिपस्टिक लगाई तो तुम्हारा मुंह तोड़ दूंगा.”

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शादी के पांचवे दिन ही अपना फरमान सुनाकर मुदित घर से बाहर निकल गया था. माधुरी कुछ समझ ही नहीं पा रही थी. उसे सजने संवरने का बहुत शौक था, लेकिन मायके में उसके हर शौक को “ससुराल जाकर पूरा करना…” कहकर रोका गया.

   इन दस सालों में मुदित की हर बात मान कर भी कई बार ख़ुद को तुड़वा चुकी थी, पर अब उसने हड्डियों के साथ ख़ुद को भी जोड़ने का फ़ैसला ले लिया था.

 तभी दरवाज़े की घण्टी बजी और उसने अपने होठों पर लिपस्टिक की एक परत और लगा ली.

मुदित को अपना फरमान सुनाने के लिए उसने ख़ुद को पूरी तरह तैयार कर लिया था.

– पल्लवी विनोद

लघुकथा- फरमान

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Photo Courtesy: Freepik

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