“फ़ुर्सत मिले भी तो कैसे? छोटे बच्चे, घर, बाहर के काम, रिश्तेदारियां… सब भाभी संभालती हैं और तुम? बैंक, टीवी और ग़ज़ल. कभी उनके हिस्से का थोड़ा-सा जीवन भी जीकर देखो, शायद तुम्हारी ग़ज़लों में और भी सच्चाई उतर आए.”
रक्षाबंधन पर गुप्ता जी बहन के घर पहुंचे. भोजन के बाद संगीत की महफ़िल जम गई.
उन्होंने अपनी नई ग़ज़लें सुनाईं. ख़ूब वाह-वाह हुई.
तभी छोटी बहन बबली मुस्कुराकर बोली, “भइया, ग़ज़लें बहुत सुंदर हैं… पर उन्हें भी तो सुनाओ, जो तुम्हारी ग़ज़लों की असली प्रेरणा हैं.”
“अरे, बबली तेरी भाभी को फ़ुर्सत ही कहां है!” गुप्ता जी हंसकर बोले.
बबली की मुस्कान गंभीर हो गई.
“फ़ुर्सत मिले भी तो कैसे? छोटे बच्चे, घर, बाहर के काम, रिश्तेदारियां… सब भाभी संभालती हैं और तुम? बैंक, टीवी और ग़ज़ल. कभी उनके हिस्से का थोड़ा-सा जीवन भी जीकर देखो, शायद तुम्हारी ग़ज़लों में और भी सच्चाई उतर आए.”
पहली बार महफ़िल में सन्नाटा छा गया.
घर लौटते ही गुप्ता जी ने कहा, “रीना, आज से बैंक, बाज़ार, बिल और बाहर के सारे काम मैं देखूंगा, तुम घर और बच्चे देखो.”
रीना ने उनकी ओर देखा पर विश्वास नहीं कर पाई.
लेकिन गुप्ता जी ने सोच लिया था. इस बार इरादा सच निकला. धीरे-धीरे घर का बोझ बंट गया. घर में सुकून गहराने लगा. रीना के चेहरे पर बरसों बाद खाली समय की मुस्कान लौट आई.
एक शाम गुप्ता जी अपनी नई ग़ज़ल रीना को सुना रहे थे और रीना मुस्कुरा रही थी.
– नील मणि
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