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फेस्टिवल पर परफेक्शन से ज़्यादा ज़रूरी है हैप्पीनेस (During festivals, happiness is more important than perfection)

 

जब हम परफेक्शन की शर्तों को पीछे छोड़कर अपनों के साथ जैसे हैं वैसे ही जश्‍न मनाते हैं, तब हर त्योहार सच मायने में त्योहार बनता है. आइए समझें कि क्यों इस बार हमें चीज़ों की चमक से ज़्यादा रिश्तों की गर्माहट को प्राथमिकता देनी चाहिए.

घर की ज़रा सी अव्यवस्था, पूजा की सामग्री में रह गई कोई कमी या पकवान का थोड़ा-बहुत बिगड़ जाना, क्या ये बातें त्योहार की ख़ुशी से बढ़कर हो सकती हैं? नहीं ना, तो फिर क्यों हम त्योहार पर अपने घर की साफ़-सफ़ाई और पकवान बनाने में ख़ुद को इतना थका देते हैं कि त्योहार मनाने के लिए वो उल्लास थकान में कहीं दब जाता है. अगर किसी ने कह भी दिया कि देखो इनका घर तो गंदा था, तो क्या हुआ कहने दो. आप किसी की बातों पर ध्यान ना दें. बस अपने परिवार की खिलखिलाहटों पर ध्यान दें, बच्चों की ख़ुशी पर ध्यान दें.
अचानक गेस्ट के आने पर मुंह ना फुलाएं
आपने महसूस किया ही होगा कि आजकल किसी के घर जाने से पहले उन्हें इन्फॉर्म किया जाता है. लेकिन त्योहार एक ऐसा मौक़ा होता है जब कोई बिना बताए अचानक यूं ही किसी के भी घर पहुंच जाता है. ये बात हर किसी को पसंद नहीं आती है. उन्हें लगता है ये क्या तरीक़ा है किसी के घर आने का? मुझे पहले पता होता तो घर साफ़ करती? अरे अभी तो मैं किचन से फ्री हुई थी, अब इनके लिए क्या बनाऊं? इस तरह की जाने कितनी बातें घूमने लगती हैं और आए हुए मेहमान के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करने की बजाय ये सभी बातें हमारे चेहरे पर आ जाती हैं. सामने वाला भी समझ जाता है कि हमें इस टाइम नहीं आना चाहिए था. इस तरह एक अच्छी ख़ासी त्योहार की वाइब ख़राब हो जाती है.
अरे भई, कोई बिना बताए आ भी गया तो क्या हुआ? जब जिसको समय मिला, वो आ गया. एक दिन खाली चाय की पार्टी हो जाए. ऑनलाइन फूड मंगवा लें. अगर आप तैयार नहीं हो पाईं, कपड़े चेंज नहीं कर पाईं, तो क्या हुआ. किसी दिन आप उनके घर अपने मन मुताबिक़ तैयार होकर चले जाना. अब अगर कोई आया है, तो मन ना ख़राब करें, बल्कि जो जैसा है उसी हालत में उनके साथ त्योहार एंजॉय करें. ख़ूब हंसी-मज़ाक करें, पटाखे जलाएं, ताकि त्योहार मन जाए.

 

 

त्योहार पर शॉपिंग को लेकर होने वाला तनाव
ये घर-घर की कहानी है. त्योहार पर हर कोई नए कपड़े पहनना चाहता है, लेकिन कई बार परिस्थिति ऐसी बन जाती है कि चाहकर भी शॉपिंग नहीं हो पाती. इस तरह त्योहारों पर ख़रीदारी को लेकर होने वाला तनाव भी अक्सर त्योहार की ख़ुशी को पूरी तरह फीका कर देता है. अक्सर लोग शॉपिंग को स्टेटस सिंबल या त्योहार की अनिवार्य शर्त मान लेते हैं. लेकिन इस बात को समझना बहुत ज़रूरी है कि चीज़ों से ज़्यादा भावनाएं मायने रखती हैं. नए कपड़े या महंगी चीज़ें ख़ुशियां ला सकती हैं, लेकिन वे त्योहार की बुनियाद नहीं हैं. अगर किसी वजह से शॉपिंग नहीं हो पाई या बजट कम रहा, तो उस पर हंगामा करना या मनमुटाव होना केवल त्योहार का मज़ा बिगाड़ता है. आप चाहें तो अपने पुराने कपड़ों को भी मिक्स मैच करके नया बना सकती हैं. दो साड़ियों को मिक्स करके लहंगा स्टाइल में पहन सकती हैं. त्योहार बाज़ार की चीज़ों से नहीं, बल्कि घर के लोगों की समझदारी, प्यार और चेहरे की मुस्कान से सजते हैं. शॉपिंग छूट भी जाए, तो कोई बात नहीं, साथ मिलकर वक़्त बिताना और हंसना-मुस्कुराना ही असली त्योहार है.

 

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पूजा में कोई कमी रह गई तो मूड ना ख़राब करें
अगर त्योहार मनाते समय पूजा करने में देर हो गई और मुहूर्त निकल गया, तो कौन सी मुसीबत आ गई. आपकी ख़ुशियों का मुहूर्त तो नहीं निकला न. पूजा-पाठ में कमी रह गई, तो ज़िंदगी थोड़े ही ना रुक जाएगी. पूजा के लिए भोग बनाना भूल गए या पंडित जी के कपड़े लाना भूल गए या फिर पूजा पूरे विधि विधान से नहीं की, तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ये नियम-कायदे तभी तक अच्छे हैं जब तक आप ख़ुश हैं, लेकिन अगर ये घर की शांति भंग कर रहे हैं, तो इनका कोई मतलब नहीं हैं. पूजा या त्योहार की भावना कभी भी भौतिक चीज़ों की गिनती या परफेक्शन पर निर्भर नहीं होती. पूजा में अगर कोई एक सामग्री छूट भी जाए, तो श्रद्धा और सच्चे मन से की गई प्रार्थना ही सबसे बड़ी पूजा मानी जाती है. जितना जो आपसे हो रहा है वो करिए, जो नहीं हो रहा, उसे छोड़ दीजिए. कम करें, लेकिन मन से करें, वही सबसे बड़ी भक्ति है. उसमें परफेक्शन मत ढूंढ़िए.

स्वाद से बढ़कर है अपनों का साथ
आपने महिलाओं से अक्सर यह कहते हुए सुना होगा, “ये त्योहार तो आते ही है हमें थकाने के लिए.” वाकई त्योहार पर महिलाओं पर इतना काम लाद दिया जाता है कि वे बस पकवान बनाने में ही रह जाती हैं. और हद तो तब हो जाती है. जब घर के बाकी मेंबर उस बनाए हुए खाने में मीनमेख निकालते हुए परफेक्शन ढूंढ़ते हैं. अगर कोई चीज़ थोड़ी जल गई, मीठा कम-ज़्यादा हो गया या कोई डिश वैसी नहीं बनी, जैसी सोची थी, तो उस पर बहस करने की बजाय हंसकर टाल देना ही असली समझदारी है.
यही वजह है कि अक्सर त्योहारों पर रसोई घर का सबसे बड़ा तनाव केंद्र बन जाती है. पकवानों को एकदम बेमिसाल बनाने के चक्कर में इंसान इतना थक जाता है या चिड़चिड़ा हो जाता है कि जब सब साथ बैठकर खाते हैं, तब तक चेहरे की मुस्कान गायब हो चुकी होती है.
त्योहार का मतलब यह नहीं कि घर का कोई एक सदस्य (ख़ासकर स्त्रियां) पूरे दिन रसोई में खटता रहे और बाकी सब परफेक्शन की उम्मीद करें. साथ मिलकर थोड़ा-बहुत बनाना, एक-दूसरे की मदद करना और जो भी बने उसे ख़ुशी-ख़ुशी बांटकर खाना ही त्योहार का असली मज़ा है. सबसे अच्छा तो ये है थोड़ा कुछ घर पर बना लें और थोड़ा बाज़ार से मंगवा लें, इससे एंजॉय ज़्यादा कर पाएंगे.

घर कितना चमक रहा है ये मायने नहीं रखता
घर की असली चमक दीवारों के पेंट, महंगे सामान या शीशे की तरह चमकते फ़र्श से नहीं, बल्कि घर के लोगों के चेहरों की रंगत और उनके दिलों की ख़ुशी से होती है. कोई भी मेहमान आपके घर ये देखने नहीं आता कि आपका घर कितना साफ़ है और कितना नहीं. वो तो सिर्फ़ आपके साथ ख़ुशी-ख़ुशी त्योहार मानाने आ रहा है. अगर घर का कोई कोना गंदा भी है, तो उसे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और अगर फ़र्क़ पड़ता भी है, तो उससे आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए. अगर बच्चों ने खेलते हुए सामान थोड़ा बिखेर दिया या काम के चक्कर में घर एकदम परफेक्ट नहीं दिख रहा, तो उसमें कोई बुराई नहीं है. वह इस बात का सबूत है कि घर में ज़िंदगी सांस ले रही है, लोग ख़ुश हैं और जीवंतता है. पूरा दिन घर की साफ़-सफ़ाई में लगकर थकने के बाद तो आपमें त्योहार मनाने की ताक़त भी नहीं बचेगी. फिर ऐसे घर को चमकाकर क्या फ़ायदा जब आप ख़ुशियों को भूलकर बस अपनी कमर ही सहलाते रह जाएं.
साफ़-सफ़ाई अपनी जगह सही है, लेकिन आख़िर में वही घर सबसे सुंदर माना जाता है, जहां पहुंचकर हर किसी के चेहरे पर एक बेफिक्र मुस्कान आ जाए. इसलिए प्लीज़ अपना ये परफेक्शन का कीड़ा त्योहार के लिए दबा दें और जो जैसा है, वैसे ही साथ मिलकर ख़ूब एंजॉय करें और ख़ुशियां मनाएं.
– शिखा जैन

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Sources: Shutterstock

 

 

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