“ग़लत कुछ नहीं है. जिसे अच्छा लगे, वह करवाए. लेकिन मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार चाहती हूं कि कोई मुझे मेरे असली रंग में स्वीकार करे.”
रिया का रंग बचपन से ही उसके नाम के बिल्कुल उलट था. उसका नाम सुनते ही लोगों के मन में एक नाज़ुक, गोरे चेहरे वाली लड़की की तस्वीर बनती थी, लेकिन रिया का रंग गहरा सांवला था. चेहरे की बनावट अच्छी थी, आंखें बड़ी और सुंदर थीं, बाल लंबे और घने थे, मगर लोगों की नज़रें अक्सर उसके चेहरे पर टिकने की बजाय उसके रंग पर जाकर ठहर जाती थीं.
बचपन में जब भी कोई रिश्तेदार घर आता तो उसकी मां से एक सवाल ज़रूर पूछता, “बड़ी बेटी का रंग किस पर गया है?”
मां मुस्कुराकर बात टाल देतीं, लेकिन रिया समझ जाती थी कि सवाल उसके बारे में है.
स्कूल में भी उसे कई बार ऐसे संबोधनों से पुकारा गया, जिन्हें सुनकर वह ऊपर से हंस देती थी, मगर भीतर कहीं कुछ टूट जाता था. कॉलेज पहुंची तो उसे लगा कि शायद अब ये सब बातें पीछे छूट जाएंगी, लेकिन वहां भी रंग का गणित मौजूद था. किसी लड़की की तारीफ़ होती तो उसके गोरे रंग का ज़िक्र ज़रूर आता. रिया की तारीफ़ होती भी तो अक्सर कोई कह देता, “रंग थोड़ा दबा हुआ है, वरना बहुत सुंदर है.”
उसे हमेशा लगता कि उसकी सुंदरता के आगे एक छोटा-सा लेकिन बेहद भारी शब्द लगा दिया गया है- ‘लेकिन’…
पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे एक निजी कंपनी में नौकरी मिल गई. वह अपने काम में अच्छी थी. समय पर ऑफिस पहुंचना, ज़िम्मेदारियों को समझना और मुश्किल कामों को भी धैर्य से पूरा करना उसकी आदत थी. लेकिन कुछ ही महीनों में उसने महसूस किया कि ऑफिस में भी एक अदृश्य तराजू है, जिसमें योग्यता के साथ-साथ चेहरे और रंग का वज़न भी किया जाता है.
कई बार मीटिंग में किसी नई, कम अनुभवी लेकिन गोरी लड़की को ग्राहकों के सामने प्रस्तुत कियाजाता और रिया को पीछे बैठकर काम संभालने के लिए कह दिया जाता. एक बार उसने हिम्मत करके अपने मैनेजर से पूछ भी लिया था कि क्या उसे भी क्लाइंट प्रेजेंटेशन का अवसर मिल सकता है?
मैनेजर ने मुस्कुराकर कहा, “अभी थोड़ा और अनुभव ले लो.”
रिया समझ गई थी कि अनुभव की कमी उसके काम में नहीं, शायद उसके चेहरे में खोजी जा रही थी.
नौकरी के साथ साथ घर में उसकी शादी की चिंता भी बढ़ने लगी थी. उम्र बढ़ रही थी और मां-पिता चाहते थे कि अब उसका घर बस जाए. रिश्ते आने शुरू हुए. तस्वीरें भेजी गईं, परिवार मिले, बातचीत हुई, लेकिन हर बार कहीं न कहीं उसके रंग की बात आकर खड़ी हो जाती.
एक परिवार ने तस्वीर पसंद करने के बाद मिलने की इच्छा जताई. लड़का और उसके माता-पिता घर आए. चाय-नाश्ते के बाद लड़के की मां ने रिया को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर उसकी मां से धीमे स्वर में कहा, “लड़की तो पढ़ी लिखी है, नौकरी भी करती है, बस रंग थोड़ा दबा हुआ है. हमारे बेटे के लिए तो गोरी लड़की के रिश्ते भी आ रहे हैं.”
कुछ दिनों बाद उनका जवाब आ गया- उन्हें रिश्ता आगे नहीं बढ़ाना था.
दूसरी बार एक लड़के से रिया की फोन पर अच्छीबातचीत हुई. दोनों की पसंद मिलती थी. लड़के नेउसकी नौकरी और विचारों की तारीफ़ भी की. लेकिन जब परिवार ने उसकी तस्वीर देखी तो अचानक बातचीत का सिलसिला धीमा पड़ गया. बाद में पता चला कि लड़के की बहन ने कह दिया था कि इतनी अच्छी नौकरी करने वालीलड़की है तो रंग भी थोड़ा अच्छा होना चाहिए था.
एक और रिश्ता तो लगभग तय होने की स्थिति में था. लड़के के परिवार को रिया की नौकरी, स्वभाव और घर परिवार सब पसंद था. लेकिन जाते समय लड़के की बुआ ने मां से कह दिया, “बहू तो घर की शोभा होती है. थोड़ी गोरी होती तो बात ही कुछ और थी.”
इस बार भी बात नहीं बनी.
हर बार मां रिया के सामने सामान्य बने रहने की कोशिश करतीं, लेकिन रात को उनके कमरे से आती धीमी बातचीत और पिता की लंबी ख़ामोशी रिया से छिपी नहीं रहती थी.
एक दिन उसने मां को फोन पर किसी रिश्तेदार सेकहते सुना, “क्या करें बहनजी, लड़की में कोई कमी तो है नहीं. बस रंग थोड़ा सांवला है.”
रिया उस दिन देर तक अपने कमरे में बैठी रही. उसे पहली बार अपने रंग से शिकायत होने लगी थी. वह आईने के सामने खड़ी होकर अपना चेहरा देखती और सोचती कि आख़िर इसमें ऐसा क्या है जिसे हर कोई बदल देना चाहता है?
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समय बीतता गया. आख़िरकार एक रिश्ता पसंद आया. लड़के का नाम आदित्य था. वह एक अच्छी नौकरी में था और उसका परिवार भी ठीक-ठाक था. पहली मुलाक़ात में आदित्य ने रिया से उसके काम, पसंद और भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा. उसने उसके रंग पर कोई टिप्पणी नहीं की. रिया को यह बात अच्छी लगी, हालांकि उसने इसे कोई बहुत बड़ी बात नहीं माना.
शादी तय हो गई.
घर में तैयारियां शुरू हो गईं. मां ने साड़ियों और गहनों की ख़रीदारी शुरू कर दी. बहन ने शादी के लिए मेकअप आर्टिस्ट की तलाश शुरू कर दी. एक दिन वह एक मशहूर ब्यूटी पार्लर का ब्रोशर लेकर आई.
“दीदी, मैंने बात कर ली है. शादी से पहले तीन चार सेशन होंगे. गोल्ड फेशियल, स्किन पॉलिशिंगऔर ब्राइडल ट्रीटमेंट. शादी वाले दिन तो ऐसा मेकअप होगा कि तुम पहचान में ही नहीं आओगी.”
रिया ने ब्रोशर हाथ में लिया. उसमें सजी धजी दुल्हनों की तस्वीरें थीं. हर तस्वीर में चेहरे का रंग लगभग एक जैसा था. चमकदार, उजला और एक ख़ास तरह का सुनहरापन लिए हुए.
“मतलब मैं पहचान में नहीं आऊंगी?” उसने मुस्कुराकर पूछा.
बहन हंस पड़ी, “अरे, मेरा मतलब है कि बहुत सुंदर लगोगी. पार्लर वाली कह रही थी कि तुम्हारे चेहरे पर ऐसा बेस बनाएगी कि रंग एकदम साफ़ हो जाएगा.”
मां भी वहीं बैठी थीं. उन्होंने कहा, “बेटा, शादी ज़िंदगी में एक ही बार होती है. थोड़ा बहुत करवा लेने में क्या जाता है? लोग भी तो देखते हैं.”
रिया ने ब्रोशर वापस रख दिया.
“मां, लोग मुझे बचपन से देख रहे हैं. कभी मेरे रंग से ख़ुश नहीं हुए. कई रिश्ते सिर्फ़ इसी वजह से टूट गए. अब शादी में भी अगर मैं अपना रंग छिपाकर किसी के सामने जाऊंगी तो क्या बदल जाएगा?”
मां कुछ नहीं बोलीं.
“मैं मेकअप ज़रूर करवाऊंगी. बाल बनवाऊंगी, सजूंगी-संवरूंगी भी. लेकिन मुझे गोरा बनाने की कोशिश मत करना. मैं जैसी हूं, वैसी ही दुल्हन बनना चाहती हूं.”
बहन ने समझाने की कोशिश की, “दीदी, आजकल तो सब करवाते हैं. इसमें ग़लत क्या है?”
“ग़लत कुछ नहीं है. जिसे अच्छा लगे, वह करवाए. लेकिन मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार चाहती हूं कि कोई मुझे मेरे असली रंग में स्वीकार करे.”
उस रात रिया ने आदित्य से भी इस बारे में बात की. उसने पूछा, “तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं होगी अगर मैं शादी में अपने सामान्य रंग के साथ ही रहूं? मेरा मतलब है, ऐसा मेकअप नहीं करवाऊंगी, जिससे मेरा चेहरा मेरे असली रंग से बिल्कुल अलग दिखाई दे.”
आदित्य कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “रिया, तुम शादी करने आ रही हो या किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने? मुझे तुम्हारे चेहरे पर तुम्हारा चेहरा हीदेखना है.”
रिया हल्के से मुस्कुरा दी.
शादी का दिन आ गया.
पार्लर में मेकअप आर्टिस्ट ने रिया से पूछा, “मैम, आपको थोड़ा फेयर लुक चाहिए या नेचुरल?”
रिया ने आईने में ख़ुद को देखा. कुछ क्षण बाद बोली, “नेचुरल. बस इतना कि मैं अच्छी लगूं, कोई और न लगने लगूं.”
मेकअप आर्टिस्ट ने उसके चेहरे के अनुरूप हल्कामेकअप किया. माथे पर छोटी सी बिंदी, आंखों में काजल और होंठों पर हल्का रंग. लाल जोड़े में रिया बेहद सुंदर लग रही थी. उसका रंग वैसा ही था, जैसा वह हमेशा से था.
जब वह मंडप में पहुंची तो आदित्य की नज़रें कुछ देर उस पर ठहर गईं. उसने धीरे से कहा, “तुम बहुत अच्छी लग रही हो.”
रिया मुस्कुराई. शायद यह तारीफ़ उसे पहले भी कई बार मिली थी, लेकिन आज पहली बार उसे लगा कि इसके बाद कोई ‘लेकिन’ नहीं आएगा.
विदाई के समय मां ने उसे गले लगाया. उनकी आंखें नम थीं. उन्होंने धीरे से कहा, “तू जैसी है, बहुत अच्छी है बेटा. पता नहीं मैं ही क्यों तुझे हमेशा बदलने की सलाह देती रही.”
रिया ने मां का हाथ अपने हाथ में ले लिया.
गाड़ी आगे बढ़ी तो उसने शीशे में अपना चेहरा देखा. वही सांवला चेहरा, वही आंखें और वही मुस्कान. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि आज उसे अपना चेहरा किसी और की नज़र से देखने की ज़रूरत नहीं थी.
उसे पहली बार लगा कि सुंदर दिखने के लिए रंग बदलना ज़रूरी नहीं होता. कभी कभी इंसान को सिर्फ़ अपनी नज़र बदलने की ज़रूरत होती है.
रिया आज ख़ुश थी, वह बहुत सुंदर लग रही थी, क्योंकि वजह उसी रंग की थी, जिस रंग में वह पैदा हुई थी.
तेजस मिश्रा
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