ग़ज़ल- तस्तीक़ (Gazal- Tastik)

ग़ज़ल- तस्तीक़ (Gazal- Tastik)

अब न कोई शक़-ओ-शुबा है, हर ढंग से तस्तीक़ हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई

लहू नसों में कुछ करने का, धीरे-धीरे ठंड पा गया

ज़ख़्म अभी बाकी है पर, भरने का सा निशां आ गया

उठती-गिरती धड़कन भी, इक सीधी-सी लीक हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई

अब न जुनूं कुछ करने का, बेचैन रूह को करता है

अब न दिल में ख़्वाबों का, दरिया बेदर्द बहता है

ख़्वाब फ़ासला पा गए और हक़ीक़तें नज़दीक़ हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई…

bhavana prakaash
भावना प्रकाश

शक-ओ-शुबा- संदेह
तस्तीक़- सत्यता प्रमाणित होना
लीक- लकीर

(इस ग़ज़ल का मतलब है कि अब ख़्वाबों को पूरा करने के लिए पागलपन की हद तक संघर्ष करते रहने की आदत ख़त्म हो रही है…)

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Gazal