लघुकथा- मुखौटा (Laghukatha- Muk...

लघुकथा- मुखौटा (Laghukatha- Mukhauta)


ओ हो, बडी गर्मजोशी के साथ ख़ातिरदारी हो रही है.” इलू ने उसे छेड़ा.
अनु बोली, “हां, हां उनके पति भी बैठे हुए हैं. मुझे करने दे मेहमांनवाजी. पता है करोड़ों-अरबों का बिज़नेस है. अभी-अभी सिंगापुर घूमने की योजना बना रहे हैं.”
“यार इलू, महारानी की तरह रखते होंगे मैडम को है ना!” कहकर मंत्रमुग्ध अनु व्यंजन लेकर चली गई.


“अरे, अरे, ज़रा आराम से…” इलू ने मीठा-सा उलाहना दिया, तो अनु अपनी बेसब्री को बरक़रार रखते हुए बोली, “मेरी टेबल पर जो सुन्दर सी मैडम पसरी हुई है ना वो शीतल जल मंगवा रही हैं.”
“ओह हां! अच्छा.” कहकर इलू ने उचककर देखा.
“वाह बहुत सुन्दर है.” इलू ने कहा, पर अनु ट्रे लेकर रवाना हो चुकी थी.
आलीशान रिसार्ट की दावत बेहद शाही अंदाज़ में परवान चढ़ रही थी. लगभग सारे मेहमान आ गए थे. इलू की टेबल पर भी अतिथि विराजमान हो गए थे. इलू ने गौर किया कि अनु बहुत ही उमंग से अपनी टेबल पर सेवा दे रही थी.
“ओ हो, बडी गर्मजोशी के साथ ख़ातिरदारी हो रही है.” इलू ने उसे छेड़ा.
अनु बोली, “हां, हां उनके पति भी बैठे हुए हैं. मुझे करने दे मेहमांनवाजी. पता है करोड़ों-अरबों का बिज़नेस है. अभी-अभी सिंगापुर घूमने की योजना बना रहे हैं.”
“यार इलू, महारानी की तरह रखते होंगे मैडम को है ना!” कहकर मंत्रमुग्ध अनु व्यंजन लेकर चली गई.
इलू का मन अपने परिवार पर जा टिका. अनु और इलू एक ही काॅलोनी में पड़ोसी थीं. उन दोनों के ही पति मिल मजदूर थे. आज तीन घंटे बाद दावत ख़त्म हो जाएगी, तो वो दोनों आज का मेहनताना कल रविवार अपने पति को फिल्म दिखाने और चाट-समोसा खिलाने में ख़र्च कर देंगी. यही बात उन दोनों के बीच तय हुई थी. इलू और अनु जानती थी कि पति के वेतन से किराया और दाल-रोटी ही मिल पाती है. वो तो भला हो इस इवेंट कंपनी का कि वो शादीशुदा महिलाएं भी मजदूरी पर रख लेता है.


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इलू और अनु का साथ है, इसलिए विवाह या जन्मदिन पर ऐसी सेवा के लिए उनके पति ने कभी रोका नहीं.
“ओह हद है…” अचानक अनु की घबराहटभरी आवाज़ ने इलू को डरा ही दिया.
“अरे, अनु क्या हुआ?” अनु उदासी से बोली, “इलू, सचमुच हम ग़रीब हैं और इन दौलतवाले अहंकारी लोगों से हमारे हमसफ़र हज़ारों गुना बेहतर.” वो कांप और हांफ रही थी. “पता है वो मैडम के पति नशे में है और मैडम को इतनी गंदी और भद्दी गालियां बक रहे हैं, पर मैडम सब सुन रही हैं. पास शवाली मेज पर लोग साफ़ सुन रहे हैं.”
“चल जाने दे.” कहकर इलू ने अनु को समझाया. मन ही मन उसे अपने घर पर अपना मान-सम्मान याद करते हुए बेहद इतराने का मन हुआ.

– पूनम पांडे


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Laghukatha

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