लव स्टोरी- आंखों की मूक भाष...

लव स्टोरी- आंखों की मूक भाषा (Love Story- Aankho Ki Mook Bhasha)

मैं तो इस बात से अनभिज्ञ था कि मेरा प्रेम एकतरफ़ा है या फिर तुम भी उतनी ही शिद्दत से मुझसे प्रेम करती हो, जितना की मैं. मेरे हृदय में तो तुम्हारे बचपन की वही तस्वीर अंकित थी, जब तुम्हें शहर छोड़ते हुए अंतिम बार देखा था. टॉप-स्कर्ट पहने, लंबे-लंबे काले गुंथे हुए बाल, कंचन-सा गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श और श्रृंगार के नाम पर आंखों में गहरा काजल और स्मृति पटल पर तुम्हारी असंख्य यादें…

इन यादों का स्वभाव भी कितना चंचल होता है न चाहते हुए भी वक़्त-बेवक़्त आकर दस्तक दे देती हैं. कई बार चेहरे को मुस्कुराने के लिए विवश कर जाती हैं, तो कई बार आंखों को बरसने के लिए. पर मेरी यादें तो आज इस कपटी मौसम के साथ ताल से ताल मिलाते हुए प्रतीत हो रही थीं. बाहर काले-काले मेघों ने पूरे आकाश में अपना आंचल फैला रखा था. ठंडी निर्मल पवन और बादलों कि गर्जन की ताल मेरी यादों या ख़ूबसूरत यादें कहूं, तो अतिशयोक्ति नही होगी की तरफ़ खींच रही थी.
पच्चीस वर्ष में प्रवेश करते ही मां ने लगातार मुझ पर विवाह का दबाव डालना शुरू कर दिया था. वे कहतीं, “बेटा विवाह की अगर उम्र निकल जाए, तो अच्छे रिश्ते आने बंद हो जाते हैं. तुम्हें अगर कोई पसंद हो, तो मुझे बता दो. तुम्हारी पसंद के साथ तुम्हारा विवाह करने में मुझे किंचित भी आपत्ति न होगी. तुम्हारी ख़ुशी ही सर्वोपरि है.” उनका हर बार यही आग्रह होता था और मैं उनकी बात को हां हां, हूं हूं.. में टाल देता.
करता भी क्या… कैसे बताता उन्हें की मुझे तो तुम पसंद थीं. मेरे बचपन का प्यार, जिसे मैंने बचपन से अब तक बड़े जतन के साथ अपने हृदय में सहेजकर रखा था. तुम तो मेरी बचपन की सबसे अच्छी दोस्त थीं, जिसके साथ मैं बिना किसी संकोच के बात करता था.

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मैं तो इस बात से अनभिज्ञ था कि मेरा प्रेम एकतरफ़ा है या फिर तुम भी उतनी ही शिद्दत से मुझसे प्रेम करती हो, जितना की मैं. मेरे हृदय में तो तुम्हारे बचपन की वही तस्वीर अंकित थी, जब तुम्हें शहर छोड़ते हुए अंतिम बार देखा था. टॉप-स्कर्ट पहने, लंबे-लंबे काले गुंथे हुए बाल, कंचन-सा गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श और श्रृंगार के नाम पर आंखों में गहरा काजल और स्मृति पटल पर तुम्हारी असंख्य यादें.
याद है मुझे जब तुम अपने परिवार के साथ हमारे पड़ोस में रहने आई थीं. पहली बार देखते ही मैं तुमसे एक अनजानी-सी डोर से बंध गया था.
कुछ ही दिनों में हमारे परिवार के बीच घनिष्ठ संबंध हो गए थे. मेरी मां भी तुम्हें बहुत पसंद करती थी, यह सोच मैं मन ही मन ख़ुश होता था. मैं नित्य तुम्हारे घर आने का कोई न कोई बहाना तलाशता था, पर जब पता चला कि तुम्हारा दाख़िला मेरे ही स्कूल में हुआ, तो मुझे तो जैसे मनचाही मुराद मिल गई थी. तुम दसवीं में और मैं बारहवीं में, मात्र एक वर्ष के लिए ही सही तुम्हारा साथ तो मिलेगा यह सोचकर संतुष्टि कर लेता था. घर से स्कूल, फिर स्कूल में और फिर वापस घर तक का साथ मुझे अत्यंत रोमांचित कर देता था. तुम्हारी मां मुझ पर बहुत विश्वास करती थीं, इसलिए साथ जाने में उन्हें कोई आपत्ति न होती. रोज़ जब सुबह हम स्कूल के लिए निकलते, तो पूरे रास्ते बातचीत के नाम पर सिर्फ़-
“कैसी हो?”
“ठीक हूं और तुम..?”
“हूं मैं भी ठीक हूं. अच्छा सुनो दिन में मैं तुम्हारा गेट नम्बर एक के पास इंतेज़ार करूंगा.”
“ठीक है.” बस यही संक्षिप्त-सी बात होती.
बस इसी बातचीत में पूरा एक वर्ष बीत गया.
किंतु जो मेरे हृदय में था, वो कभी तुम्हारे समक्ष बोल न पाया. अब हृदय हमेशा पुकारता की- काश तुम मेरी आंखों की मूक भाषा को समझ लो… किंतु, इसी बीच मेरा स्कूल ख़त्म हो गया था और साथ में हो गया मेरे पिताजी का तबादला.
याद है मुझे जब हम आख़िरी बार मिले थे. पहली बार तुम्हारी आंखों में आंसू देखे थे. कहते है ना कि कुछ बातें अल्फ़ाज़ बोल नही पाते, किंतु आंखों की मूक भाषा उन्हें समझा देती हैं. जिस पल का पूरे वर्ष इंतज़ार किया, आज वो पल मेरे पास था, किंतु
परिस्थितियों के आगे वो पल रेत की तरह हाथ से फिसल रहा था और मैं विवश कुछ नही कर पा
रहा था.
ख़ामोश एहसास को मिल न पाए कभी अल्फ़ाज़
समझो आंखों की मूक भाषा बस यही है आस
दोस्ती हमारी कभी कलंकित न होगी
तुम न चाहो तो कभी न आऊंगा तुम्हारे पास…

एक छोटे से ख़त में यह लिखकर जाने से पहले तुम्हारे हाथ में दिया था और आंखों में तुम्हारे मूक भाषा को अपने हृदय में सुरक्षित रख कर मैं कानपुर आ गया. कुछ समय पश्चात मां से पता चला की तुम्हारे पिताजी का भी तबादला हो गया था. कहां, पता नही?
इतने वर्ष बीत गए. इतने वर्षों में मैंने तुम्हारा पता जानने का हर संभव प्रयास किया, किंतु निष्फल रहा. मैं तुमसे अपने हृदय की बात कहना चाहता था किंतु…

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इस बार मां की क़सम के आगे विवश हो कर मुझे लड़की देखने जाना पड़ा. वहां पहुंच कर हमें बैठक में बैठा दिया. बैठक में किसी को न पाकर थोड़ा अटपटा तो लगा, किंतु ‘मुझे कौन-सा यहां अपना रिश्ता तय करना है, इसलिए मुझे क्या इनके व्यवहार से…’ सोच कर मैं शांत हो गया. अनमना-सा मैं वहां अपना सिर नीचे कर के बैठा था कि-
अल्फ़ाज़ जो न कह पाए कभी
उन्हें इन आंखों ने समझ लिया
साथ तुम्हारा सदा से मैंने भी चाहा है
विवाह बंधन ही अब हमारी राह है…
पंक्तियों को सुन कर जब मैंने अपना चेहरा ऊपर किया, तो तुम मेरे समक्ष खड़ी थीं. मुझे तो अपने भाग्य पर विश्वास नही हो रहा था. बिल्कुल वही चेहरा, वही नैन-नक्श जो मैंने बचपन की अपनी कल्पना से सृजन कर रखी थी. मैं किंकर्तव्यविमूढ़ अनिमेष दृष्टि से तुम्हें निहार रहा था कि हंसी की गूंज ने मेरी तंद्रा तोड़ी.
“अरे मुझे तो काजल बचपन से ही पसंद थी. बस, इनका कुछ अता-पता नही था. वो तो कुछ दिन पहले ही अचानक एक शादी में काजल मिली. बातचीत से ज्ञात हुआ कि इनका तबादला अब इसी शहर में हो गया है. बस तभी यह योजनाबद्ध हो गई. काजल के हृदय की बात तो पता चल गई थी, किंतु तुम्हारी… अब तो प्रतीक्षा थी, तो तुम्हारे उत्तर और तुम्हारी प्रतिक्रिया की, जो आज तुमने स्वयं दे दी…” मां एक ही सांस में सब कुछ कह गईं. मैं ठगा-सा उन्हें देखता रह गया. सब कुछ एक सपने-सा प्रतीत हो रहा था. कभी कल्पना भी नही की थी कि मेरी बचपन की मोहब्बत मेरी जीवनसंगनी बन जाएगी.

कीर्ति जैन

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