लोग कहते कि कमबख़्त को खुदा का भी डर नहीं था. मासूम और बेजुबान बच्चों तक को माफ़ नहीं करता. ज़रूर नरक की आग में जलेगा... लेकिन यह सब वे उसकी पीठ के पीछे कहते.
उसका नाम तो रहीम खां था, लेकिन उस जैसा जालिम शायद ही कोई और होगा. सारा गांव उसके नाम से कांपता था. एक दिन रामू लोहार के बेटे ने उसके बैल की पूंछ में कांटे बांध दिए, तो रहीम ने बच्चे को मार-मार कर अधमरा कर दिया. अगले दिन इलाके के सरकारी अफसर की घोड़ी उसके खेत में घुस गई, तो लाठी लेकर उसे इतना मारा कि वह लहुलुहान हो गई.
लोग कहते कि कमबख़्त को खुदा का भी डर नहीं था. मासूम और बेजुबान बच्चों तक को माफ़ नहीं करता. ज़रूर नरक की आग में जलेगा... लेकिन यह सब वे उसकी पीठ के पीछे कहते. एक दिन बिंदू की जो शामत आई तो एक व्यक्ति ने कह दिया, "अरे भई, रहीम खां, क्यों बच्चों को मारता है?" और तब उस की वह दुर्गति बनी कि उस दिन से लोगों ने रहीम खां से बात करना भी छोड़ दिया कि पता नहीं किस बात पर बिगड़ बैठे.

हालांकि गांव भर ने उससे बात करनी छोड़ दी थी, पर उस पर कुछ असर न हुआ. सुबह सवेरे वह कंधे पर हल रखे खेत की ओर जाता दिखाई देता था. रास्ते में किसी से न बोलता, लेकिन खेत में जाकर बैलों से आदमियों की तरह बातें करता. उसने दोनों के नाम रखे थे नत्थू और छिडू. हल चलाते-चलाते वह बोलता जाता, "क्यों बे नत्यू, तू सीधा नहीं चलता. यह स्वेत आज तेरा चाप पूरा करेगा? और बिडू तेरी भी शामत आई है."
और तब सचमुच उन बेचारों की शामत आ जाती. रहीम खां शाम को घर आता तो बीवी-बच्चों पर ग़ुस्सा उतारता. दाल या साग में नमक कम हुआ तो बीवी को उधेड़ डालता. किसी बच्चे ने शरारत की, तो उल्टा लटका कर पीटते-पीटते बेहोश कर देता. मार खा-खा कर बीवी अधमरी सी हो गई थी. बच्चे छोटी उम्र में तो पिटते रहे, पर बड़ा लड़का जब बारह साल का हुआ, तो एक दिन ऐसा भागा कि कभी लौट कर न आया. पास के गांव में रिश्ते का एक चाचा था, उसने उसे अपने पास रख लिया था. एक दिन बीवी ने डरते-डरते कहा, "हलासपुर की तरफ़ जाओ, तो नूरू को लेते आना."
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बस, फिर क्या था, वह आगबबूला हो गया और बोला, "मैं उस बदमाश को लेने जाऊं? अब तो वह ख़ुद भी आया तो टांग चीर कर फेंक दूंगा."
वह बदमाश भला क्यों मौत के मुंह में वापस आता. दो साल बाद छोटा लड़का बिंदू भी भाग गया और भाई के पास रहने लगा. अब रहीम खां के लिए ग़ुस्सा ठंडा करने के लिए बस बीवी ही रह गई थी. इतनी पिट चुकी थी कि उसे इसकी आदत सी पड़ गई थी. लेकिन एक दिन रहीम खां ने उसे इतना मारा कि उससे भी रहा न गया और मौक़ा पाकर अपनी मां के यहां चली गई और अपनी पड़ोसिन से कह गई कि रहीम खां आए, तो उसे बता दे कि वह कुछ दिनों के लिए अपने मायके रामनगर गई है.
शाम को रहीम खां को इसका पता लगा, तो वह हमेशा की तरह ग़ुस्सा करने की बजाय चुप सा अपने बैल बांधने चला गया. उसे यक़ीन था कि उसकी बीवी अब कभी वापस नहीं आएगी.
बैल बांध कर जब वह घर में गया, तो वहां एक बिल्ली म्याऊं-म्याऊं कर रही थी. कोई और तो घर में था नहीं, सो रहीम खां ने उसी को पूंछ से पकड़ कर दरवाज़े से बाहर फेंक दिया. चूल्हा ठंडा पड़ा था. आग जलाकर रोटी कौन बनाता? सो, बिना कुछ खाए-पीए ही वह सो गया.
अगले दिन जब वह सो कर उठा, तो दिन चढ़ चुका था. लेकिन आज उसे खेत पर जाने की जल्दी न थी. बकरियों का दूध दह कर पीया और हुक्का भर कर चारपाई पर बैठ गया. अब घर में धूप भर आई थी. एक कोने में जाले लगे हुए थे. सोचा कि सफ़ाई ही कर डाले.
वह एक बांस के साथ कपड़ा बांधकर जाले उतार रहा था कि खपरैल में अबाबीलों का एक घोंसला दिखाई दिया. वो अबाबीलें कभी अंदर आते थे, कभी बाहर जाते थे. पहले तो उसके दिल में आया कि बांस से घोंसला तोड़ डाले, पर फिर न जाने क्यों एक घड़ोंची लाकर उस पर चढ़ा और घोंसले में झांककर देखा. वहां लाल बोटियों से दो बच्चे पड़े चं-चू कर रहे थे और दोनों अबाबीलें उनकी रक्षा के लिए उन पर मंडरा रहे थे. रहीम खां ने घोंसले की तरफ़ हाथ बढ़ाया ही था कि एक अबाबील ने उस पर अपनी चोंच से वार किया.
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"अरी, आंख फोड़ेगी क्या?" उसने कहा और घड़ींची पर से उतर अया. अबाबीलों का घोंसला सलामत रहा.
अगले दिन से उसने फिर से खेत में जाना शुरू कर दिया. गांव में अब भी कोई उससे बात न करता था. वह दिनभर खेत में काम करता, पर शाम को सूरज छिपने से कुछ पहले ही घर लौट आता. हुक्का भरकर लेट जाता और अबाबीलों के घोंसले की ओर देखता रहता.
दोनों बच्चे उड़ने के काबिल हो गए थे. रहीम खां ने उन दोनों के नाम अपने बच्चों के नाम पर रख दिए थे. संसार में अब उसके दोस्त वे चारों पक्षी ही रह गए थे. लोगों को हैरानी थी कि कई दिनों से उसे बैलों को पीटते हुए नहीं देखा था. दोनों बैल ख़ुश थे. उनकी पीठ पर के घावों के निशान लगभग गायब हो गए थे.
रहीम खां एक दिन खेत से ज़रा पहले ही लौट रहा था कि रास्ते में कुछ लड़के कबड्डी खेलते हुए मिले. उसे देखते ही सभी अपने जूते तक छोड़कर भाग खड़े हुए. वह कहता ही रहा, "अरे, मैं कोई मारता थोड़े ही हूं." आसमान में बादल छाए हुए थे. वह बैलों को जल्दी-जल्दी हांकता हुआ घर पहुंचा. तभी बादल ज़ोर से गरजे और पानी बरसने लगा.
रहीम खां ने घर में आ कर किवाड़ बंद किए और दीया जलाया. फिर रोज़ की तरह बासी रोटी के टुकड़े करके अबाबीलों के घोंसले के पास एक ताक में डाल आया.
"अरे ओ बिंदू! अरे ओ नूरू!" उसने पुकारा, पर दोनों बच्चे घोंसले से बाहर न निकले. तभी उसने घोंसले में झांका, तो चारों पक्षी अपने परों में सिर छिपाए सहमे हुए बैठे थे. उन के ऊपर छत में से पानी टपक रहा था. रहीम खां ने सोचा कि अगर पानी इसी तरह टपकता रहा, तो घोंसला तबाह हो जाएगा. सो, वह घर से बाहर निकला और मूसलाधार बारिश में छत पर चढ़ कर छेद को बंद करने लगा. आख़िर जब वह नीचे आया, तो बुरी तरह भीग चुका था. घर में आते ही उसे कई छींके आईं. उसने गीले कपड़े बदले और चादर ओढ़ कर लेट गया. अगले दिन सुबह उठने पर उसे बुखार था और उसका अंग-अंग दुख रहा था. पर कौन हाल पूछता? कौन दवा लाता? दो दिन तक वह उसी हालत में पड़ा रहा.
जब लोगों ने उसे खेत में जाते हुए नहीं देखा, तो उन्हें चिंता हुई कि कहीं बीमार न हो. कुछ लोग उसके घर आए. उन्होंने झांक कर देखा, तो वह बिस्तर पर पड़ा था और अपने आप से बातें कर रहा था.
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"अरे बिंदू, अरे नूरू, कहां मर गए? आज तुम्हें कौन खाना देगा?"
अबाबीलें उस समय कमरे में फड़फड़ा रहे थे.
"बेचारा पागल हो गया है." कालू जमींदार ने कहा.
"कल सुबह अस्पताल वालों को ख़बर दे देंगे कि इसे ले जाए."
दूसरे दिन सुबह जब लोग अस्पताल वालों को लेकर आए और रहीम खां के घर में दाख़िल हुए, तो उसे मरा हुआ पाया. चारों अबाबीलें उसके पांव की ओर सिर झुकाए बैठे हुए थे.
- ख्वाजा अहमद अब्बास
(अनुवाद- सुखबीर)

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