कहानी- अन्तिम युद्ध (Hindi Short Story- Antim Yudh)

Hindi Short Story

 

“देखो विवेक, आज ज़माना बहुत बदल गया है. आज औरत के लिए आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी है. इतने सालों की तपस्या के बाद मैंने समाज में अपने लिए एक सम्मानित पद प्राप्त किया है. स्पोर्ट्स मेरे लिए करियर नहीं, बल्कि एक जुनून की तरह है. नौकरी तो मैं किसी क़ीमत पर नहीं छोड़ सकती.” (Hindi Short Story)

 

आज के हालात से मिसेज़ सीमा कश्यप को लगता था कि उसे रहना चाहिए. हर रोज़ जिस तरह उस पर वैचारिक प्रहार हो रहे थे, उससे तो साफ़ था कि छात्र-शक्ति के आगे झुकना ही पड़ेगा. हर तरफ़ उसकी काफ़ी छीछालेदर हो रही थी.

राजकीय कन्या महाविद्यालय की शारीरिक शिक्षा की प्राध्यापिका मिसेज़ कश्यप ने पहली बार महसूस किया था कि उसे आवेश में आकर यूं अपनी छात्रा को सब के सामने थप्पड़ नहीं लगाना चाहिए था. हालांकि सारी ग़लती उस छात्रा की थी. लेकिन उसे टीचर होने के नाते थोड़ा समझदारी से काम लेना चाहिए था. ज़माना अब वह नहीं रहा कि बच्चों के साथ इतनी सख़्ती से निबटा जाए.

मामला अनावश्यक ही तूल पकड़ गया था. इन दिनों मीडिया काफ़ी चतुर-सुजान होने के साथ साहसी और चंट हो गया है. जिसका डर था वही बात हो गई. एक प्रेस रिपोर्टर का उसे फ़ोन भी आया था, जिसने सारे मामले को उसके हक़ में मोड़ने की क़ीमत तीस हज़ार रुपए मांगी थी. सीमा ने तो आवेश में आकर उस पत्रकार को बुरा-भला कह दिया था. बस फिर क्या था, सारी पत्रकार बिरादरी हाथ धोकर उसके पीछे पड़ गई थी. जिस अतीत को वह भूल चुकी थी, उसे फिर से उसके सामने लाया जा रहा था.

सारे कॉलेज की छात्राएं बुरी तरह उसके पीछे पड़ गई थीं. उन्होंने अपनी कक्षाओं का बिल्कुल बायकॉट कर दिया था. हर रोज़ गेट पर मीटिंग होती और सीमा कश्यप और प्रिंसिपल के नाम पर मुर्दाबाद के नारे लगाए जाते. कल तो गेट मीटिंग बहुत ही उग्र हो गयी थी. कई टीवी चैनल इस घटना को कवर कर रहे थे. छात्राओं ने सीमा कश्यप का पुतला भी जलाया था. अब तो एक ही शर्त पर अपनी कक्षाओं में वापस लौटने के लिए तैयार थीं कि ख़ुद सीमा कश्यप आकर उनसे माफ़ी मांगें. छात्राओं ने तीन दिन का अल्टीमेटम दे दिया था. शिक्षा विभाग के उप निदेशक ने ख़ुद आकर छात्राओं को आश्वासन दिया था कि वे संबंधित टीचर से इस मामले की जांच करेंगे.

सीमा ने तो उस दिन के बाद ख़ुद को स्टाफ़ कॉलोनी के अपने घर में कैद कर रखा था. स्टाफ़ की अन्य मेम्बर रोज़ाना की ख़बरें उसे देती रहतीं. हर रोज़ प्रिंसिपल मैडम भी उसके घर आती थीं. शुरू में मैडम का नैतिक बल सीमा को मिल रहा था, क्योंकि यह मामला सारी टीचर बिरादरी के लिए इ़ज़्ज़त का सवाल बन चुका था. बाकी के स्टाफ़ का भी यही मानना था कि यूं छात्राओं के सामने जाकर गिड़गिड़ाने से टीचर का मान-सम्मान तो धूल में मिल जाएगा.

कई बार सीमा ने सोचा कि क्यों न वह यह नौकरी छोड़ दे. उसकी लिखी पाठ्य पुस्तकों से उसे इतनी रॉयल्टी तो मिलती ही है कि उस अकेली जान का गुज़ारा हो सके. यहां सरकारी नौकरी से काफ़ी पैसा मिलेगा उसे. कहीं दूसरी जगह नौकरी मिल ही जाएगी, फिर अगले पल वह घबरा गई. उम्र के इस मोड़ पर कहां जाएगी वह. यहां पिछले बीस सालों से वह आराम से रह रही थी. स्टाफ़ कॉलोनी में अच्छी इ़ज़्ज़त थी उसकी. यहां से नौकरी छोड़ेगी, तो आवास की समस्या भी खड़ी हो जाएगी.

कॉलेज की हर तरफ़ हो रही बदनामी के कारण प्रिंसिपल मैडम के रुख़ में कुछ अन्तर आ रहा था. शायद विभाग के ऊपर वाले अफ़सरों ने मैडम को सीमा पर दबाव बढ़ाने के लिए कहा हो. कल तो प्रिंसिपल मैडम ने सीमा को साफ़ ही कह दिया था कि अब या तो टीचर भी छात्राओं के सामने आंदोलन पर उतर आएं या सीमा को ख़ुद ही बड़प्पन दिखाकर छात्राओं से माफ़ी मांगकर सारी समस्याओं को ख़त्म कर देना चाहिए. किसी को तो पहल करनी ही होगी. आज की पीढ़ी तो झुकने से रही. अब हर तरफ़ बहुत खुलापन आ गया है. मां-बाप भी अपने बच्चों को झिड़क नहीं सकते. सीमा पर अब हर तरफ़ से दबाव बढ़ रहा था कि उसे झुक जाना चाहिए.

ऐसे ही जीने-मरने का प्रशन उसके लिए तब खड़ा हो गया था, जब उसकी शादी हुई थी. ऐसी ही नौबत उसके पति विवेक के साथ आई थी. उस समय भी हालात बिल्कुल सीमा के ख़िलाफ़ हो गए थे. तब भी ऐसा ही कोहराम मचा था घर-बाहर. मन के भीतर ज़ोरों की झंझावत और जी को उमेठती हुई काली आंधियां चली थीं, जब उसे विवेक कश्यप से प्यार हुआ था.

उन दिनों समाज में लड़कियों को फिज़िकल एज्युकेशन जैसे कोर्स करवाना अच्छा नहीं समझा जाता था. सीमा ऊंची-लंबी, गोरी स्मार्ट लड़की थी. पिता फौज में कर्नल थे. वह अपनी लाडली बेटी को इंटरनेशनल लेवल की टेनिस स्टार बनाना चाहते थे. सीमा खेल-कूद में बहुत आगे थी. कॉलेज में ही नेशनल लेवल तक पहुंच गई थी वह.

पिता के दिल के दौरे के कारण अचानक मौत होने से सीमा के जीवन में भारी उथल-पुथल मच गई. दिल्ली में अच्छे कोच थे, मगर अब मजबूरीवश उसे दिल्ली शहर छोड़ना था. यहां छोटे पुश्तैनी शहर में मां ने श़िफ़्ट कर लिया था. उसे दिल्ली में हॉस्टल में ही रखने के बारे में भी विचार हुआ, मगर उसके छोटे भाइयों की पढ़ाई के भी इतने ख़र्च थे, सो मां ने उसे समझाया कि खेल को अब वह करियर नहीं, बल्कि अच्छी नौकरी पाने के लिए इस्तेमाल करे.

सीमा का शैक्षणिक प्रोफ़ाइल ही इतना शानदार था कि वह फटाफट यहीं स्थानीय कॉलेज में फिज़िकल एज्युकेशन की लेक्चरर बन गई. फिर उसने गोल्ड मेडल के साथ पोस्ट ग्रेज्युएशन किया और पंजाब यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट करके यहां चण्डीगढ़ के अच्छे कॉलेज में फिज़िकल एज्युकेशन की विभागाध्यक्ष बन गई. स्टाफ़ कॉलोनी में ही उसे बड़ा-सा घर मिल गया. अच्छे घरों से रिश्ते आने लगे. वह इतनी सुन्दर थी कि लगता था जैसे हाथ लगाते ही मैली हो जाएगी.

यूथ फेस्ट में विवेक कश्यप से उसकी मुलाक़ात क्या हुई कि वह तो पहली बार देखते ही उसे दिल दे बैठा. कॉलेज के उत्सव में वह मुख्य अतिथि था. क्या तेज़ था उसके चेहरे पर. आई.ए.एस. अधिकारी विवेक कश्यप से मिलकर सीमा बहुत दिनों तक सातवें आसमान पर उड़ती-फिरती रही. उसे यक़ीन नहीं था कि दो सप्ताह में ही बात शादी तक पहुंच जाएगी. उसकी उड़ान वहां तक नहीं थी.

उसने शादी के लिए मना कर दिया. इस घटना के तीन साल तक सीमा और विवेक के बीच कोई बात या मुलाक़ात नहीं हुई. विवेक यहां से प्रमोट होकर उपायुक्त बनकर किसी अन्य जिले में चला गया था. सीमा के मन में उसके लिए कुछ नहीं था. सब कुछ भुलाकर वह अपने काम में लगी रही.

एक बार फिर उसका सामना विवेक से हुआ. परिवार की एक शादी में वह दिल्ली गई तो वहां विवेक भी मिला. विवेक ने अभी तक शादी नहीं की थी. सीमा के चाचा ने विवेक और सीमा के रिश्ते की बात चलाई, तो विवेक ने कहा कि पहले सीमा से पूछ लो, तभी कोई बात आगे बढ़ाई जाए. सीमा की मम्मी ने सीमा की ‘हां’ करवा ही ली.

शादी के पहले साल कोई द़िक़्क़त नहीं आई. न सीमा को और न ही विवेक को. घर-परिवारवालों के पास आने-जाने में ही समय गुज़र गया. सीमा ने कॉलेज से छुट्टियां ले रखी थीं. छह महीने बाद कॉलेज से फ़ोन आने लगे कि बच्चों के कोर्स अधूरे हैं, सो जल्दी कॉलेज ज्वॉइन करो. दबे मन से विवेक के घरवालों ने सीमा से कहा कि उसे अब नौकरी की ज़रूरत क्या है?

सीमा ने तर्क दिया कि उसकी कई क़िताबें कोर्स में लगी हैं. वह नौकरी तो छोड़ नहीं पाएगी. शादी से पहले ऐसी कोई बात तो हुई ही नहीं थी. उसने विवेक से भी दो टूक बात की, “देखो विवेक, आज ज़माना बहुत बदल गया है. आज औरत के लिए आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी है. इतने सालों की तपस्या के बाद मैंने समाज में अपने लिए एक सम्मानित पद प्राप्त किया है. स्पोर्ट्स मेरे लिए करियर नहीं, बल्कि एक जुनून की तरह है. नौकरी तो मैं किसी क़ीमत पर नहीं छोड़ सकती.”

विवेक कोई बहस नहीं कर सका. सीमा ने कॉलेज ज्वाइन कर लिया. उसके ससुरालवालों ने विवेक के लाख कान भरे, मगर उनके रोमांटिक जीवन में दो-तीन साल तक कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. दोनों पिछली पीढ़ी की पिछड़ी सोच से वाकिफ़ थे.

विवेक को जब दिल्ली जाना पड़ा तब असली द़िक़्क़तें शुरू हुईं. वहां केन्द्रीय सचिवालय के एक मंत्रालय में उसकी तैनाती हुई थी. दिल्ली-चण्डीगढ़ के बीच का यह 250 किलोमीटर का फ़ासला नवदम्पति के लिए बहुत था. सीमा की सप्ताह में एक ही छुट्टी होती थी. उसने अपनी सारी छुट्टियां शादी के पहले साल में ही ख़त्म कर ली थीं. विवेक उसके पास कुछ समय आकर रहता तो उसके घरवालों की अजीब-सी बातें सुननी पड़ती थीं सीमा को. कुछ समय बाद विवेक ने भी महीने में एक दिन के लिए सीमा के पास आना शुरू कर दिया था.

पांच साल हो गए थे उनकी शादी को, लेकिन अब तक उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई थी. ससुरालपक्ष ने विवेक के कान में ज़हर भरना शुरू किया, तो उसका ईगो भी जाग उठा. अब हर बार वह सीमा के पास आता तो एक ही रट लगाता कि सीमा नौकरी छोड़ दे और उसके पास आकर दिल्ली में रहे. फ़ासले बढ़ते जा रहे थे. एक मोड़ ऐसा आया कि दोनों ने एक-दूसरे के पास जाना छोड़ दिया. कोई खुलकर विवाद भी नहीं हुआ. दोनों एक-दूसरे को झुकाने पर तुले थे. इस दौरान क्या कुछ नहीं हुआ. सीमा की मम्मी को दिल का दौरा पड़ा और विवेक ने आने की ज़रूरत नहीं समझी. दोनों के बीच संदेह और बेरुखी की खाईं ब़ढ़ती ही गई और सीमा ने भी इंतज़ार करना छोड़ दिया. खेलकूद विषय में उसने क़िताबें लिखनी शुरू कर दीं. वह क़ामयाब होती चली गयी. जब विवेक ने ही उसकी सुध लेनी छोड़ दी थी तो फिर सीमा कैसे बेशर्मी के साथ उसके पास जा सकती थी.

अब कॉलेज में थप्पड़ विवाद के बहाने मीडिया ने सीमा कश्यप की बीती ज़िन्दगी की कड़वी कहानी एक बार फिर लोगों के सामने लानी शुरू की तो सीमा बुरी तरह कांप उठी. उसने सोचा था कि उसका अतीत बरसों पहले दफ़न हो चुका है. सारी रात वह सो नहीं पाई. सोचती रही कि क्या लगातार क्रोध और आवेश में रहकर जीवन को सहजता से जीया जा सकता है. विवेक ने उससे कभी ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं की. ख़ुद सीमा ने ही पहले दिन से ही अपनी सुंदरता और गर्व के कारण विवेक को हमेशा झुकाने की कोशिश की थी. क्या वह विवेक को माफ़ नहीं कर सकती?

सीमा सोचने लगी कि अच्छा हो कि अब वह नौकरी छोड़कर विवेक के पास चली जाए. फिर उसे ख़याल आया कि जीवन से भागकर कोई फैसला नहीं किया जा सकता. जिस लड़की को उसने सरेआम बीस खिलाड़ियों के सामने थप्पड़ मारा, उसके आत्मसम्मान को भी तो उसने ठेस पहुंचाई थी. अगर उसे ‘सॉरी’ कह देगी तो छोटी नहीं हो जाएगी वह. अगर वह आज भी विवेक को ‘सॉरी’ कह दे तो उसे पक्का यक़ीन था कि वह उसे माफ़ कर ही देगा.

सारी रात जागते ही कटी और सुबह उठकर भी सीमा अपने उसी फैसले पर अडिग थी कि वह माफ़ करेगी तभी उसे माफ़ी मिलेगी. प्रिंसिपल मैडम को जैसे ही उसने अपना फैसला सुनाया वह तो ख़ुशी के मारे चीख उठी. “थैंक्स सीमा, तुमने हमें बचा लिया.” मैडम फटाफट उसके घर आईं. अन्दर उसने देखा कि सीमा फ़ोन पर किसी से बातें कर रही थी और ख़ुश नज़र आ रही थी. मैडम को उसने विवेक का सारा क़िस्सा सुनाया. अब हर तरफ़ से काली घटाएं छंट चुकी थीं. देर से ही सही, मगर वह माफ़ कर देने के पीछे छिपे मर्म को महसूस कर चुकी थी. अपनी डायरी में लिखा एक आशार उसे याद आ गया. ‘अब मुझको चैन है तो सबको करार है, दिल क्या ठहर गया कि ज़माना ठहर गया.’ वह तेज़ी से प्रिंसिपल मैडम के साथ कॉलेज की तरफ़ जा रही थी.

– जसविंदर शर्मा
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