लघुकथा- अपनी जिंदगी… (Short...

लघुकथा- अपनी जिंदगी… (Short Story- Apni Zindagi…)

जीवन का अधिकांश हिस्सा दूसरों की मर्ज़ी से जीते ही निकल गया, पहले पिता, फिर भाई और अब पति. इसके बाद शायद बेटों के इशारों पर चलना होगा, तो उसे अपना जीवन जीने का समय कब मिलेगा?

शॉवर के बहते पानी के बीच मीरा की आंखों से आंसू भी बहते जा रहे थे. ये कोई आज की बात नहीं है. अरुण जब-तब उसे अपमानित करता रहता है. एक दायरे में क़ैद कर रखा है उसे. उस दायरे से ज़रा बाहर होकर वह खुल कर सांस नहीं ले सकती. कभी कोशिश की, तो तुरंत अरुण के व्यंग्यबाण उसे आहत करने मन पर आ चुभते.
जीवन का अधिकांश हिस्सा दूसरों की मर्ज़ी से जीते ही निकल गया, पहले पिता, फिर भाई और अब पति. इसके बाद शायद बेटों के इशारों पर चलना होगा, तो उसे अपना जीवन जीने का समय कब मिलेगा?

Kahani


याद आया अगले सप्ताह ही वह पचास वर्ष की हो जाएगी. फिर उम्र ही कितनी रह जाएगी. उसे सहना पड़ा, क्योंकि उसमें परिस्थितियों को बदलने का साहस नहीं था.
शॉवर के बहते पानी के बीच वह अपने बहुत से डर भी बहा कर बाहर निकली. एक अच्छा-सा सूट पहना. ढंग से तैयार हुई. चाय बनाकर एक कप अरुण को थमाया.
“इतनी सज-धजकर किसे रिझाने जा रही हो?” अरुण ने व्यंग्य से कहा.


“रिझाने की ही इच्छा होती, तो अब तक तुम्हें नहीं झेलती रहती. और कुछ काम इंसान अपनी पसंद के लिए भी करता है. पचास बरस की होने को आई हूं. अब भी दूसरों के ही इशारे पर नाचती रहूंगी, तो अपनी ज़िंदगी कब जी पाऊंगी.


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तुम्हे बुरा लगता है, तो अपनी आंखें बंद कर लो, लेकिन अब मैं अपनी ज़िंदगी अपनी पसंद से ही जियूंगी.” कहते हुए मीरा बालकनी में जाकर खड़ी हो गई. सामने खुला आसमान जैसे बांहें पसारे उसके फ़ैसले पर उसे बधाईयां दे रहा था.

डॉ. विनीता राहुरीकर

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