कहानी- अप्रत्याशित (Short Story- Apratyashit)

वे दुर्लभ क्षण थे. हमने मैडम की चढ़ी हुई नज़रों को मुलायम पड़ते देखा. मुस्कुराते देखा, जो अब तक नहीं देखा था. शायद सिंधु ने देखा होगा. मैडम साफ़तौर पर परिवर्तन से गुज़र रही थीं. प्रेम में बड़ी शक्ति होती है, यह प्रमाणित हो रहा था. सप्रे सर अनोखे सिद्ध हो रहे थे.

Kahaniya

कॉलेज के वे दिन भी क्या दिन थे. हम छात्राओं पर हरदम ज्वाला मैडम का आतंक बना रहता. ज्वाला मैडम, एक उलझा हुआ व्यक्तित्व. सांवला रंग, मझौला क़द, चालीस के आसपास का प्रसाधन विहीन सख़्त चेहरा, क्रोधी कपाल, सिकुड़ी हुई शुष्क आंखें, जहां किसी चमकीले सपने को कभी जगह न मिली होगी. कुंठा भरे कुटिल जान पड़ते अधर, एक मज़बूत चोटी की शक्ल में बंधे सज़ा पाए से केश, नियमित स़फेद ब्लाउज़ के साथ पहनी गई कलफ़ लगी हल्के रंग की सूती साड़ी. रजिस्टर और चॉक का डिब्बा संभालती हुई मैडम तेज़ी से कक्षा में दाख़िल होतीं और इस तरह पढ़ाने लगतीं, मानो देर से पढ़ाते हुए अब पूरी फ्लो में आ गई हैं.

बी.एससी. फाइनल में ज्वाला मैडम हमारी क्लास सप्ताह में दो दिन लेती थीं. वे अच्छा पढ़ाती थीं और प्रश्‍न बहुत पूछती थीं. आतंकित करती उनकी मुद्रा और स्वर के मद्देनज़र हम उन प्रश्‍नों के उत्तर भी न दे पाते, जो हम जानते थे. एक प्रश्‍न का उत्तर दे दो, तो दूसरा प्रश्‍न, फिर तीसरा, जब तक निरुत्तर न हो जाओ सवालों का दौर चलता रहता. निरुत्तर छात्राओं की गर्दनें झुक जातीं. मैडम क्रोधित होकर कहतीं, “मैं इतना समझाकर पढ़ाती हूं, लेकिन तुम लोगों से कुछ नहीं बनता. तुम लोग बेवकूफ़ हो या मुझे पढ़ाना नहीं आता? पढ़ाना नहीं आता, तो मैं अपनी डिग्री रद्द करा लूं?…

तो… तो…”

उनकी प्रत्येक तो पर हम छात्राएं डरी हुई और मौन. मैडम समझ जातीं कि इस तरह हमसे उत्तर नहीं उगलवा पाएंगी. वे चॉक का टुकड़ा उछाल देतीं. चॉक जिस छात्रा पर पड़े वह हलाल.

“खड़ी हो जाओ.”

छात्रा खड़ी हो जाती.

“मैंने जो पढ़ाया समझ में आया?”

“जी”

“क्या?”

“सब”

“तो इस बोगस बैच में एक गुणी है, जिसे सब समझ में आता है. आओ, चॉक पकड़ो. ब्लैकबोर्ड पर वह सवाल समझाओ, जो तुम्हें समझ में आ गया है.”

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ज्वाला मैडम के मुख पर निर्मम क़िस्म का आनंद छा जाता. मानो छात्राओं को उत्पीड़ित करने में उन्हें तृप्ति मिलती है.

“पर… मैडम, आधा समझ में आया.”

“आधा समझा दो, आधा मैं समझा दूंगी. बार-बार समझाऊंगी. यदि तुम लोग समझना चाहो. ऐसा बोगस बैच मैंने आज तक नहीं देखा. तुम लोग पास नहीं हो सकतीं. रसायनशास्त्र में तो बिल्कुल नहीं. सिंधु, मैंने जो प्रश्‍न पूछा, तुम उसका उत्तर जानती हो?”

सिंधु उत्तर बता देती.

सिंधु मैडम के साथ उनके घर में रहती थी. हमें संदेह था कि मैडम उसे बता देती होंगी कि वे क्लास में क्या पूछनेवाली हैं.

“सिंधु जैसी अच्छी लड़की क्लास में है, वरना मैं इस क्लास में आना छोड़ दूं.”

पहले हम नहीं जानते थे कि ज्वाला मैडम, सिंधु की संरक्षिका हैं. एक बार हम सभी छात्राएं ज्वाला मैडम की चर्चा में लिप्त थीं. सभी अपना-अपना राग आलाप रही थीं.

“मैडम बहुत दुष्ट हैं. इतना डांटती हैं कि आता हुआ उत्तर भी मैं भूल जाती हूं…”

“मैं तो उत्तर जानते हुए भी नहीं बताती कि मैडम को खीझने दो. वे चिल्लाती हैं, तो मुझे मज़ा आता है…”

“सोचती हैं पढ़ाकर हम लोगों पर एहसान कर रही हैं. पढ़ाती हैं, तो वेतन भी तो लेती हैं…”

“प्रैक्टिकल में नंबर काट लेंगी, वरना मैं तो उन्हें करारा जवाब दे दूं…”

“लड़कों के कॉलेज में पढ़ातीं, तो लड़के इन्हें दुरुस्त कर देते… ”

“मुझे लगता है कि इनकी शादी नहीं हुई है, इसलिए निराश रहती हैं…”

“शादी होती, तो पति इन्हें एक दिन न रखता, क्योंकि वह इनका छात्र न होता…”

“सैडिस्ट हैं. इन्हें किसी साइकियाट्रिस्ट से सलाह लेनी चाहिए…”

हम सभी ज्वाला मैडम पर अपनी भड़ास निकाल ही रहे थे कि अचानक सिंधु किसी बेंच से प्रगट हो गई. शायद वह धैर्य से परख रही थी कि हम किस सीमा तक निंदारत हो सकते हैं. प्रायः चुप रहनेवाली सिंधु का पतला चेहरा तप रहा था, “तुम लोग मैडम के बारे में क्या जानती हो? बस, यही कि वे दुष्ट हैं, सैडिस्ट हैं. तुम सबकी सोच घटिया है. दरअसल, मैडम छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं. ठीक से पढ़ भी न पाई थीं कि सड़क दुर्घटना में उनके माता-पिता चल बसे. मैडम ने पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की और परिवार को संभाला. भाई-बहनों को सेटल किया. अब वे सब अपनी दुनिया में मस्त हैं. मैडम अकेली रह गईं. मैं और मैडम एक गांव के हैं. मैडम ने मेरी विधवा-बेसहारा मां और मुझे अपने पास बुला लिया. मां घर संभालती हैं और एवज में मैडम मुझे पढ़ा रही हैं, वरना मैं और मां गांव में न जाने कब का मर-खप जाते.”

सन्नाटा.

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फिर एक छात्रा की वाणी ने हरकत ली, “मैडम ने जो भी त्याग किया हो, पर हम लोगों को क्यों सताती हैं?”

“वे सताती नहीं हैं, बस थोड़ी सख़्त हैं. वे ख़ुद को स्ट्रिक्ट न बनातीं, तो उनके भाई-बहन बिगड़ जाते. भाई-बहनों को अनुशासित करते, अपनी इच्छाओं को दबाते हुए मैडम अब सचमुच स्ट्रिक्ट हो गई हैं. वे इस तरह परिस्थितियों के कारण हुई हैं.”

“उनकी जो भी परिस्थिति रही हो, पर वे हमें इस तरह पढ़ाती हैं, जैसे हम लोगों पर एहसान कर रही हैं. हम उनका एहसान क्यों मानें?” एक छात्रा ने उखड़कर कहा.

“यह मैडम का फ्रस्टेशन है. वे चाहती हैं कि उनके भाई-बहन उनका एहसान मानें. उनका मान-सम्मान व लिहाज करें. ज़रूरत में उनके पास आएं, लेकिन वे लोग अपनी दुनिया में मस्त हैं. शायद इसलिए मैडम छात्राओं को दबाने की कोशिश करती हैं कि कहीं तो उनका रुतबा व शासन दिखाई दे.”

आख़िरकार थक-हारकर सिंधु कहती, “जाने दो, तुम लोग उन्हें नहीं समझ सकोगी.”

ज्वाला मैडम पूरे सत्र कहती रहीं कि तुम लोग पास नहीं हो सकतीं, फिर भी हमारे बैच की प्रायः सभी छात्राएं उत्तीर्ण हो गईं. हम ग्यारह छात्राओं ने एमएससी के लिए केमिस्ट्री चुना. मैडम ने स्वागत किया, “तुम लोग पास हो गईं? और सब्जेक्ट केमिस्ट्री चुना? ऐसा बोगस बैच विभाग की छवि ख़राब कर देगा. और सुनो, तुम लोगों के आते ही हमारे इतने अच्छे एचओडी का ट्रांसफर हो गया.”

विभागाध्यक्ष के स्थान पर सांवले, भरे शरीर के प्रसन्न चेहरेवाले सप्रे सर आ गए. सूत्रों से ज्ञात हुआ दो बच्चोंवाले सर विधुर हैं. उनके बेटे तकनीकी पढ़ाई के लिए दिल्ली में हैं और परिसर के क्वार्टर में सर निपट अकेले वास करते हैं. प्रसन्नचित्त सप्रे सर की उपस्थिति में रसायन विभाग में किसी सीमा तक फील गुड वाला माहौल बनने लगा. हमारे शुरुआती दो पीरियड थ्योरी के होते, फिर चार पीरियड प्रैक्टिकल के. जब गैस प्लांट में ख़राबी आ जाती, हाइड्रोजन सल्फाइड गैस का उत्पादन न होता. गैस के बिना प्रैक्टिकल संभव नहीं होगा देखकर फाइनल की छात्राएं दुखी हो जातीं, जबकि स्थिति का लाभ उठाते हुए हम छात्राएं बारह से तीन का समय सिनेमा हॉल में गुज़ार देतीं. सिंधु अपवाद थी. दूसरे दिन क्लास में जोशो-जुनून के साथ फिल्म की समीक्षा की जाती. हम लोग समीक्षा में व्यस्त थे कि कॉरीडोर से गुज़र रही ज्वाला मैडम प्रकट हो गईं.

“किसकी क्लास है?”

हमारे दिल बैठ गए.

सिंधु ने आधिकारिक तौर पर बताया कि निशिगंधा मैडम की फिज़िकल केमिस्ट्री.

“निशिगंधा?” मैडम ने वहशी मुख बनाया.

“निशिगंधा पढ़ाना नहीं चाहती और तुम लोग पढ़ना नहीं चाहतीं. बंक मारकर फिल्में देखो. फेल होकर विभाग की छवि ख़राब करो, ऐसा बोगस बैच…”

मैडम धाराप्रवाह बोलती जा रही थीं कि तभी सप्रे सर दनदनाते हुए क्लास में घुस आए.

“क्या कर रही हो लड़कियां?” मैडम ने सूचना दी, “चीख रही हैं. मास्टर डिग्री लेनेवाली हैं, लेकिन तमीज़ नाममात्र नहीं है.”

मैडम पर कोमल नज़र डाल, सर छात्राओं की ओर मुड़े, “तुम लोग मास्टर डिग्री लेनेवाली हो. हम भी मास्टर. तुम भी मास्टर. पीजी में छात्र और अध्यापक एक बराबर हो जाते हैं. आपस में सामंजस्य होना चाहिए. किसकी क्लास है?”

जवाब मैडम ने दिया, “निशिगंधा की. उनके बच्चे की छमाही परीक्षा है. छुट्टी लेकर उसे कोर्स रटा रही होंगी. मुझे ड्यूटी से भागनेवाले लोग बर्दाश्त नहीं. सर आपको स्ट्रिक्ट होना चाहिए.”

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“ठीक कहती हैं आप.” सर ने प्रेम से मैडम को देखते हुए कहा. सप्रे सर कदाचित पहले शख़्स होंगे, जो मैडम को इस तरह प्यार से देखने का साहस कर सके थे. उनके इस तरह नज़रभर देखने से मानो एक पुख्ता सूत्र हम लोगों के हाथ लग गया और हम लोग अप्रत्याशित पर विचार करने लगे.

सप्रे सर विधुर, ज्वाला मैडम कुंआरी. यदि यह मिलन हो जाए, तो मैडम का घर बस जाए और सर के दिल के वीराने में बहार आ जाए.

“नामुमकिन!”

“सर, मैडम को बहुत दुलार से देखते हैं. पछताएंगे. मैडम झिड़कती कितना हैं.”

“कोई प्रेम करनेवाला नहीं मिला, इसलिए झिड़कती हैं. मिल जाए, तो वे भी सुधर जाएं.”

छात्राएं सप्रे सर की नज़र ताड़ने लगीं.

जल्द ही विभाग ने इस अनुराग का सुराग पा लिया. कॉलेज में अक्सर सेमिनार होते थे, जिसमें बाहर से आए प्राध्यापकों के व्याख्यान होते. सप्रे सर की सुपुर्दगी में यह पहला सेमिनार था. सर के निर्देशानुसार सभी छात्राओं को छोटे-छोटे पुष्प गुच्छ दिए गए कि प्रमुख अतिथि को थमाते हुए अपना परिचय देना होगा. छात्राएं अतिथि को पुष्प गुच्छ पकड़ाएंगी. मैडम नाराज़ हो गईं.

“ल़ड़कियो, यह ड्रामा नहीं होगा. फूलों को इकट्ठा कर गुलदस्ते में सजाओ और गुलदस्ता गेस्ट की मेज़ पर रखो. परिचय अपने स्थान पर खड़े होकर दे देना. तुम लोगों को तो यहां के नियम मालूम हैं.” अंतिम वाक्य मैडम ने फाइनल की छात्राओं से कहा.

“सप्रे सर भोले हैं.” फाइनल की छात्रा ने स्पष्टीकरण दिया.

“सर क्या जानें.” मैडम ने कुछ-कुछ होता है वाली भावदशा में कहा. सिंधु ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए पुष्प गुच्छ सबसे छीने और गुलदस्ते में ठूंस दिए. व्यस्तता में डूबे सप्रे सर आए और मेज़ पर सजा भारी गुलदस्ता देख दंग हुए, “लड़कियो, तुम लोगों को समझ में नहीं आता?”

मैडम आगे कूद आईं, “हमारी छात्राएं किसी को फूल पकड़ाएं, यह भद्दा लगेगा.”

मैडम पहली मर्तबा छात्राओं को ‘हमारी’ घोषित कर रही थीं. सप्रे सर ने अजब भाव में कहा, “भद्दा क्या है? औपचारिकता है. मैं पहले जहां था, वहां ऐसे ही होता था.”

“यहां नहीं होता.”

“आपकी मर्ज़ी.”

सप्रे सर समर्पित.

वे दुर्लभ क्षण थे. हमने मैडम की चढ़ी हुई नज़रों को मुलायम पड़ते देखा. मुस्कुराते देखा, जो अब तक नहीं देखा था. शायद सिंधु ने देखा होगा.

मैडम साफ़तौर पर परिवर्तन से गुज़र रही थीं.

प्रेम में बड़ी शक्ति होती है, यह प्रमाणित हो रहा था.

सप्रे सर अनोखे सिद्ध हो रहे थे.

मैडम हमारे साथ प्रयोगशाला में होतीं और सप्रे सर किसी बहाने राउंड पर आ जाते.

मैडम हमारी अयोग्यता साबित करने लगतीं.

सर पर फ़र्क़ नहीं पड़ता, “ठंड बहुत है. लड़कियां अपना काम कर रही हैं. आइए, चाय पीते हैं. घर से मंगवाई है.”

“नहीं… नहीं.”

नहीं, नहीं करते हुए मैडम, सर के पीछे जिस आज्ञाकारिता से जातीं, उससे उनके भीतर खिल रहे मधुर भाव का आभास मिलता था.

और हमने पाया ज्वाला मैडम के स्वभाव में मधुरता आ रही है. कठोर मुद्रा नरम पड़ने लगी है. भिंचते जबड़े ढीले पड़ जाते हैं. कटाक्ष करते-करते थम जाती हैं, मानो अपनी कठोर छवि और पिघलती मनःस्थिति के बीच संघर्षरत हैं. छात्राओं को कभी कुछ अनपेक्षित कहना चाहतीं, तो सप्रे सर संतुलन के लिए हाज़िर.

“आप परेशान होना छोड़ो मैडम. ये लोग नहीं सुधरेंगी. बोगस बैच है.”

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मैडम नज़ाकत से सर को देखतीं और पलकें झुका लेतीं. झुकी पलकें विस्मयकारी प्रेम की पुष्टि करती थीं. फिर भी मैडम के विवाह की सूचना हम लोगों को अविश्‍वसनीय, बल्कि अस्वाभाविक लग रही थी. एक अप्रत्याशित घटना. अधीरता में हम सभी छात्राएं एक साथ बोलने लगी थीं, “सर कमाल के निकले. इस्पात को पिघला दिया.”

“प्रेम में बड़ी ताक़त होती है.”

“इस उम्र में सामंजस्य बैठाने में समस्या होगी.

शादी करनी ही थी, तो ठीक उम्र में कर लेतीं.”

“तब सप्रे सर नहीं मिले थे.”

“सोचो तो मैडम सज-धजकर कैसी लगेंगी? चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र…”

“मुझे लगता है, वे ये साज-शृंगार नहीं करेंगी. जैसे सादगी से रहती हैं, वैसे ही रहेंगी.”

सचमुच!

विवाह के बाद कॉलेज आई ज्वाला मैडम की वेशभूषा में कुछ बदलाव के साथ पहले जैसी ही सादगी थी. बस, स़फेद ब्लाउज़ की जगह पर मैचिंग ब्लाउज़, माथे पर छोटी बिंदी, हाथ में कांच के कड़े और वही पुराने डायलवाली घड़ी.

कुल मिलाकर वे हमें पहली बार स्वाभाविक लगी थीं.

Sushma Munindra

     सुषमा मुनीन्द्र

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