कहानी- आत्मतृप्ति (Short Story- Atmatripti)

पूरी रात मैं सो न सकी. यही सोचती रही कि ऐसा क्या कर सकती हूं, जिससे ये सब लड़के राजू न बनने पाएं… तभी मुझे याद आया कि मेरी मौसी की लड़की ने मुंबई में एक प्लेसमेंट कन्सलटेंसी खोली है. सुबह उठते ही उसे फ़ोन मिलाया…

ऑफ़िस से घर पहुंचकर ताला खोलने ही जा रही थी कि देखा सामने गुप्ताजी के घर काफ़ी भीड़ है. सोचा, किसी से पूछूं आख़िर हुआ क्या है? तभी पड़ोसन मिसेज़ वर्मा दिखाई दे गईं.

मैंने उनसे पूछा, “गुप्ता जी के यहां ये भीड़ कैसी है?”

वे बोलीं, “अरे दीदी, उनके साथ एक बहुत बड़ा हादसा हो गया है. उनका बेटा था ना राजू, वो नहीं रहा.”

“अरे, कैसे? अभी दो-तीन दिन पहले ही तो भला-चंगा देखा था मैंने उसे.” मुझे सहसा विश्‍वास ही नहीं हुआ.

मिसेज़ वर्मा ने कहा, “क्या हुआ, ये तो हमें भी नहीं मालूम. पर कहते हैं कि उसका मर्डर हुआ है. चाकू से गोद-गोद कर मारा गया है उसे. वैसे भी आप तो जानती हैं दीदी, कितने दिनों तक वो बेरोज़गार था. फिर अचानक जाने कैसे ऐसी नौकरी मिली कि तीन सालों में क्या कुछ नहीं कर लिया उसने? क्या करता था, ये उसके परिवारवालों ने कभी बताया नहीं किसी को?”

इससे पहले कि मिसेज़ वर्मा की गुप्ता जी के परिवार पर टीका-टिप्पणी आगे बढ़ती, मैंने ताला खोला और घर के अंदर हो ली.

मन अनमना हो आया इस दुर्घटना की बात सुनकर. उम्र ही क्या रही होगी उसकी? 29-30 बरस. हाथ-मुंह धोया और सोचा गुप्ताजी के यहां हो आती हूं. बाहर जाकर देखा, तो उनके घर पर लोगों की भीड़ बहुत हो गई थी और पुलिस भी थी… मुझे लगा कि इस समय उनके यहां जाना उचित नहीं होगा. मैं अंदर आई और चाय बनाने लगी. जी इतना ख़राब हो आया था कि घर के अंदर अकेले चाय पीने का मन नहीं हुआ. चाय का प्याला लिए अपने बरामदे में आ बैठी. छोटे शहरों में घरों के बरामदे भी तो एक-दूसरे से लगे हुए ही होते हैं. मिसेज़ वर्मा अब तक बाहर ही थीं, मुझे देखा तो वो मेरे पास ही आ गईं और ख़ुद ही शुरू हो गईं.. “दीदी, दोपहर में पुलिस ले कर आई थी राजू की लाश. अब शायद पोस्टमार्टम के लिए ले गए हैं. अंतिम संस्कार तो कल ही हो सकेगा…”

बस, मैं इतना ही सुन सकी और उसके बाद की उनकी बातों का “हूं…हां” में जवाब देकर चाय का प्याला रखने के बहाने अंदर आ गई.

किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था. रह-रह कर राजू का चेहरा मेरी आंखों के आगे घूम रहा था.

“नमस्ते दीदी!” मेरे ऑफ़िस से आते और जाते दोनों ही व़क़्त नुक्कड़ के पान वाले की दुकान पर ये आवाज़ मुझे रोक लेती थी. समय होता तो पूछ लेती, “कैसे हो राजू?” वरना नमस्ते का जवाब दे कर मैं अपने रास्ते हो लेती.

हमारे मोहल्ले के  नुक्कड़ पर बनी पान की दुकान ही तो अड्डा है इन शिक्षित बेरोज़गार युवाओं का. ये लोग दिन भर यहां बैठे रहते हैं, गप्पे मारते हैं, मसखरी भी करते हैं यहां से गुज़रने वालों के साथ. हमारे मोहल्ले के नौकरीपेशा पिताओं और भाइयों ने तो इन सभी नुक्कड़ पर बैठनेवाले लड़कों को बाक़ायदा आवारा और निकम्मा करार दे दिया है. दूर क्यों जाना? हमारे पड़ोसी शर्माजी तो जब-तब इन युवाओं पर बिफर पड़ते हैं. तब उनका ख़ास डायलॉग होता है, “काम-धाम कुछ है नहीं सालों को, इसलिए यहां खड़े-खड़े गरियाते रहते हैं.”

कोई तीन बरस पहले तक राजू भी इन शिक्षित बेरोज़गारों की जमात में शामिल था…

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अचानक मैं उठी और स्टडी टेबल पर आ गई. सोचा, जो आर्टिकल ऑफ़िस में अधूरा रह गया था उसे पूरा कर लूं. पेन हाथ में ले तो लिया, लेकिन ध्यान लिखने में नहीं लगा… विचारों में तो राजू ही घूम रहा था. उसने बी.कॉम किया था- फ़र्स्ट डिविज़न में. ये बात उसने मुझे ख़ुद ही बताई थी, वहीं नुक्कड़ वाली पान की दुकान पर. उस

दिन मैं ऑफ़िस से जल्दी लौट आयी थी. नुक्कड़ पर वही चिर-परिचित आवाज़ सुनाई दी, “नमस्ते दीदी!”

“कैसे हो राजू?” मैंने पूछा.

“ठीक हूं दीदी.”  कहता हुआ वह अपने दोस्तों के बीच से निकलकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ.

“दीदी, आपसे कुछ कहना था.” झिझकते हुए उसने कहा.

“कहो.”

“दीदी, मैंने बी.कॉम किया है फ़र्स्ट डिविज़न में. काफ़ी तलाश के बाद भी मुझे कोई नौकरी नहीं मिल रही है. यदि आपके अख़बार में कोई जगह हो तो देखिएगा.”

“हां, ज़रूर. अभी तो कोई जगह खाली नहीं है, लेकिन मैं ध्यान रखूंगी. कुछ हुआ तो ज़रूर बताऊंगी.”

नुक्कड़ पर बैठने वाले इन बेरोज़गार लड़कों की बातें कई बार सुनी हैं मैंने- ‘इस बार एसबीआई की 40 पोस्ट निकली हैं, फॉर्म भरा कि नहीं तुमने.’ ‘अरे यार पिछली बार दो नंबर से ही चूक गया था. पिछले डेढ़ साल से पीएससी की भर्ती का फॉर्म ही नहीं निकला.’ ‘अरे! जल्दी कुछ करना होगा. घर पर बैठो तो पिताजी डांटते रहते हैं. कहते हैं सबको नौकरी मिल जाती है… तुझे ही पता नहीं, क्यों नहीं मिलती. सारे इंटरव्यू दिया कर… दिन भर तो नुक्कड़ पर बैठा रहता है आवारा लड़कों के साथ, तुझे नौकरी

क्या ख़ाक मिलेगी?’ यही सब बातें तो करते रहते हैं ये.

वैसे मोहल्ले भर के लोग इन्हें आवारा कहते मिल जाएंगे, लेकिन जब दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव और दही हंडी का अवसर होगा तो ये बच्चे ही दौड़-दौड़ कर बड़े उत्साह से काम करते हैं. तब सभी इन्हें बेटा-बेटा कह कर बुलाते हैं. इन त्योहारों के जाने भर की देर है, फिर दोबारा इन्हें आवारा-बदमाश की जमात में शामिल कर दिया जाता है.

एक बार तो गुप्ताजी की पत्नी ख़ुद आई थीं मेरे पास. राजू की नौकरी को लेकर काफ़ी परेशान थीं. कहने लगीं, “नीलम, राजू के पापा तो उसकी नौकरी ना लगने की वजह से हमेशा ही उस पर चिल्लाते रहते हैं. मुझसे देखा नहीं जाता. वह अपनी तरफ़ से कोशिश तो करता ही रहता है, पर ज़रा तुम भी देखो ना… अपने ऑफ़िस में उसकी कोई छोटी-मोटी नौकरी ही लगवा दो.”

मैंने कहा, “भाभी! अभी तो हमारे यहां कोई जगह ख़ाली नहीं है, मैं ध्यान रखूंगी. उसके लायक कोई काम निकलातो ज़रूर बताऊंगी.”

…पर मैं जानती थी. हमारे यहां तो वैसे भी स्टाफ़ ज़रूरत से ़ज़्यादा है और कुछ समय तक कोई जगह खाली होने का कोई सवाल ही नहीं उठता. गुप्ता जी की पत्नी चली गयीं और बात आयी-गयी हो गई.

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तकरीबन महीने भर बाद वो दोबारा आयी थीं मेरे यहां. बड़ी ख़ुश थीं और हाथ में मिठाई का डिब्बा भी था. आते ही बोल पड़ीं, “नीलम! राजू की नौकरी लग गई है.”

“बधाई हो भाभी! कहां?”

“मुंबई की कोई कंपनी है, ज़्यादा तो मुझे पता नहीं.”

“काम कहां करेगा, क्या वो मुंबई जा रहा है?”

“15 दिन यहीं रहेगा और 15 दिन टूर पर.”

इसके बाद वो दुनिया-जहां की दूसरी बातें कर के चली गईं.

कुछ दिनों बाद जब मैं ऑफ़िस से घर लौटी तो मिसेज़ वर्मा बाहर ही मिल गईं. उन्होंने मुझे देखते ही पूछा, “दीदी, क्या आपको पता है कि राजू कहां नौकरी करता है?”

“मुंबई की कोई कंपनी है, क्यूं?”

“जानती हो दीदी, अपनी पहली ही कमाई से वह घर में नया टीवी, फ्रिज ले आया. और तो और, नई वाशिंग मशीन भी ख़रीद कर दे दी है अपनी मां को”

“अच्छा तो है.” मैंने मुस्कराते हुए जवाब दिया.

पूरे मोहल्ले में बात आग की तरह फैल गई. फिर क्या था, उड़ते-उड़ते मेरे कानों तक भी बात आ पहुंची कि राजू अंडरवर्ल्ड के लिए हथियार सप्लाई करने का काम करने लगा है. मुझे मोहल्लेवालों के दोगलेपन पर बड़ा अचरज हुआ. जब राजू बेरोज़गार था, तो उसे बेरोज़गार होने के ताने देते थे. जब नौकरी पर लगा है, तो भी इन्हें चैन नहीं है.

…लेकिन जिस तरह कहते हैं कि आग लगने पर ही धुआं निकलता है, उसी तरह जहां धुआं निकलता है, वहां ढूंढ़ो तो आग निकल ही आती है. एक शाम जब लौटी, तो पता चला कि गुप्ताजी के यहां पुलिस का छापा पड़ा है. मैं उसी मोहल्ले में रहती थी, सो ऑफ़िस के लिए इस ख़बर को हैंडल करने का ज़िम्मा मुझ पर ही आ गया. इस सिलसिले में पुलिस स्टेशन जाकर तहक़ीकात की, तो पता चला कि पुलिस को गुप्ताजी के यहां गैरलाइसेंसी हथियार रखे होने की सूचना मिली थी. हालांकि छापे में पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा था और मामला भी ख़त्म हो गया था, लेकिन इस घटना के बाद से गुप्ताजी का परिवार मोहल्ले के लोगों से कुछ कटा-कटा रहने लगा था.

ये सब सोचते-सोचते अचानक घड़ी पर नज़र गई…सवा दस बज गए थे. बाई जो खाना बना गई थी, उसे बेमन से गर्म किया और खाकर बिस्तर पर आ गयी. सुबह उठी तो सिर भारी हो आया था. जल्दी-जल्दी तैयार होकर 9 बजे ही ऑफ़िस पहुंच गयी. अपना अधूरा आर्टिकल पूरा किया और हाफ़-डे लेकर ऑफ़िस के पास ही बने पार्क में आ गयी.

मैं सोच रही थी कि यदि राजू अंडरवर्ल्ड से जुड़ा, तो उसने क्या बुरा किया. पढ़ने-लिखने के बाद भी जब हमारी सरकार युवाओं को रोज़गार न दे सके, ऊपर से लोग बेरोज़गारी के ताने दें… तो क्या हमारे युवा पथभ्रष्ट नहीं होंगे? पिछले तीन सालों में अपनी मां की सभी इच्छाएं पूरी कीं उसने, परिवार को ख़ुश भी रखा और बेरोज़गारी से मुक्ति मिली सो मुना़फे में… अगले ही पल लगा, इतना काला और अंधकारमय भविष्य सोच रही हूं मैं अपने देश के युवाओं का… लानत है मुझ पर! …पर मैं क्या करूं? ये सब सोचते-सोचते कब गुप्ताजी के घर आ पहुंची, पता ही नहीं चला. आगे के कमरे में गुप्ताजी अपने पुरुष रिश्तेदारों से घिरे बैठे थे. उनका चेहरा दुख से काला पड़ गया था. अंदर के कमरे में गुप्ताजी की पत्नी की आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. मैं उनके पास जा बैठी. उनके कंधे पर हाथ रखकर मैंने कहा, “धीरज रखिए भाभी!” …और सांत्वना के सारे शब्द मौन हो गए.

इस बार भी अख़बार के लिए राजू के केस को मैं ही हैंडल कर रही थी. शाम को पुलिस स्टेशन पहुंची, तो इंस्पेक्टर सूद ने बताया कि उन्हें कुछ सबूत मिले हैं, जो बताते हैं कि राजू हथियार सप्लाई करने के एक गिरोह से जुड़ गया था. वहीं के किसी दूसरे आदमी ने उसका मर्डर करवाया है. मामले की छानबीन जारी है.

…घटना को 6 माह बीत चुके थे. मानसपटल पर दूसरी घटनाओं की तरह इस हादसे के दाग़ भी धुंधले हो चले थे कि आज शाम अचानक मेरा दिल बैठ गया,

जब नुक्कड़ की पान की दुकान के पास से मैं गुज़र रही थी, तो फिर एक आवाज़ ने मुझे रोका…

“नमस्ते दीदी!”

मैंने मुड़कर देखा, तो उन बेरोज़गार लड़कों की मंडली से वर्माजी का बेटा नंदू मेरी ओर बढ़ा, समस्या उसकी भी वही थी… नौकरी की.

पूरी रात मैं सो न सकी. यही सोचती रही कि ऐसा क्या कर सकती हूं, जिससे ये सब लड़के राजू न बनने पाएं… तभी मुझे याद आया कि मेरी मौसी की लड़की ने मुंबई में एक प्लेसमेंट कन्सलटेंसी खोली है. सुबह उठते ही उसे फ़ोन मिलाया… उसे इस बात के लिए राज़ी किया कि हमारे छोटे से शहर में वो अपनी कन्सलटेंसी की एक ब्रांच खोले. उसे हौसला भी दिया कि मैं इसमें उसकी मदद करूंगी. अगले ह़फ़्ते ही वह आ गयी. तब तक मैंने उसके लिए जगह का इंतज़ाम कर लिया था. दस दिनों बाद ही हमने अपनी कन्सलटेंसी के ज़रिए बेरोज़गार युवाओं के आवेदन मुंबई और दिल्ली की कंपनियों को भेजने शुरू कर दिए.

कुछ दिन गुज़र गए… आज जब कोरियर ब्वॉय कुछ लड़कों के इंटरव्यू लेटर्स लाया, तो मेरी आंखों से ख़ुशी के आंसू छलक गए. इन बेरोज़गार बच्चों को एक दिशा देकर आज मैं तृप्त थी.

– शिल्पा शर्मा

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