
आधे घंटे पहले वेदिका के मन में उमड़ रहे सवालों के तूफ़ान थम चुके थे. कब मौलिक ने उसके माथे को चूमा और कब वेदिका सिमट कर उसके सीने से लग गई, ये बाहर से ताक-झांक करते चांद को पता भी नहीं चला. सुबह ने फुसफुसाहट सुनी, “मैं आपके बिना कैसे रहूंगी?”
“बहुत जल्दी आऊंगा.”
“आंटी तुझे इतनी देर से कॉल कर रही हैं. फोन क्यों नहीं उठा रहा है?”
“मैंने देखा ही नहीं! शायद साइलेंट मोड पर है.”
“फोन साइलेंट है या तू? मौलिक, क्या बात है यार? क्यों ऐसे बिहेव कर रहा है?”
“कोई बात नहीं है भाई, अभी मां से बात करता हूं.”
मौलिक अपने दोस्त से कुछ तो छिपा रहा था. उसके पापा की हार्ट सर्जरी के बाद से ही वो शांत हो गया था, लेकिन इतना बेचैन कभी नहीं रहता था.
दोस्त ने थोड़ा और कुरेदा तो वो खुल गया.
“मां चाहती हैं मैं शादी कर लूं.”
“तो क्या ग़लत चाह रही हैं? अठ्ठाइस साल का हो रहा है. कर ले शादी. तू तो ऐसी बात मत कर रहा जैसे…”
“कैसी बात?”
“तेरा ब्रेकअप हुए ऑफिशियली चार साल हो गए हैं. कब तक उसमें अटका रहेगा? आगे बढ़ यार.”
मौलिक ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया. मां से बात किया, तो उन्होंने किसी लड़की के बारे में बताया और बोलीं, बनारस आकर उसको देख ले.
मौलिक ख़ुद पुरानी यादों से बाहर निकलना चाहता था. बस थोड़ा और समय चाह रहा था, पर पापा के बीमार रहने के चलते मां को मना नहीं कर पा रहा था. इस बीच वो लड़की मां को बहुत पसंद आ गई. वो चाह रही थीं कि मौलिक एक बार उससे मिल ले.
“मां, मुझे अभी छुट्टी नहीं मिलेगी. आप देख लो जो आपको ठीक लगे, वो कर लो.”
“आज के ज़माने में ऐसा कहां होता है बेटा? फिर लड़की भी तो तुझे देखना चाहती होगी.”
“तो आप उसे मेरा एड्रेस दे दीजिए. आकर मुझे देख ले.”
“ये क्या बोलता रहता है, लड़की भला लड़के को कब देखने जाती है? तू जान-बूझकर ऐसा कर रहा है ना!”
“सच में अभी छुट्टी नहीं मिलेगी मां, अच्छा ऐसा करो वीडियो कॉल पर देखना/दिखाना कर देते हैं. अगर उसे मैं ठीक लगूंगा, तो आप फाइनल कर दीजिएगा.”
“लेकिन ऐसे कैसे…”
तभी पापा की आवाज़ आई, “ज़िंदगी के ़फैसले ऐसे नहीं लिए जाते हैं मौलिक. इस संडे को आ जाओ. शाम की फ्लाइट से वापस चले जाना.”
पापा की बात मौलिक नहीं टाल सका और बनारस आ गया.
मौलिक और वेदिका ने एक-दूसरे को देखा. गुलाबी रंग के कुर्ते में वो लड़की मौलिक को अच्छी ही लग रही थी. पोस्ट ग्रेजुएशन कंप्लीट कर बनारस के ही कोचिंग सेंटर में पढ़ा रही थी. मौलिक ने मां को हां तो कह दिया था, लेकिन उसका दिमाग़ अभी भी इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पा रहा था. मन ही मन वेदिका की तुलना अपनी गर्लफ्रेंड से करने लगता. फिर ख़ुद को इस हरकत के लिए डांटता भी था.
देखते ही देखते शादी का दिन पास आ गया. मां के साथ ख़रीदारी करने वेदिका भी गई थी. वीडियो कॉल पर मौलिक को लहंगा दिखाया जा रहा था. मौलिक को लगा मां की पसंद के लहंगे वेदिका को पसंद नहीं आ रहे, लेकिन वो कुछ कह नहीं पा रही है. वो ख़ुद भी बेमन से ही देख रहा था. अचानक उसकी नज़र एक गुलाबी लहंगे पर गई जिस पर सुनहले रंग का काम था. उसके मुंह से निकला, “वो लहंगा कैसा है? बेबी पिंक में…”
दूसरी तरफ़ से वेदिका की आवाज़ आई, “बहुत ज़्यादा सुंदर है.”
मां ने मुस्कुराकर कहा, “चलो दोनों की पसंद एक ही है.”
शादी के दिन जब वेदिका उस लहंगे को पहन कर स्टेज की तरफ़ बढ़ रही थी, सारे लोग उसकी तरफ़ मंत्रमुग्ध होकर देख रहे थे. वेदिका के चेहरे पर एक अलग तरह की सादगी थी जो उसे और ख़ूबसूरत बना रही थी. शादी की रस्मों के बीच वो चुपके से मौलिक की तरफ़ देखती, लेकिन मौलिक को कहीं और देखता हुआ पाकर उदास हो जाती. मौलिक उसे पहली नज़र में ही पसंद आ गया था.
जब मौलिक ने उससे पूछा था, “वेदिका आप इस शादी के लिए पूरी तरह तैयार हैं ना?” तभी उसके मन में मौलिक पति के रूप में स्थापित हो गया था. उसने अपने परिवार में महिलाओं से इजाज़त लेते पुरुष नहीं देखे थे. लहंगा पसंद होने के बाद जब कुछ और कपड़े लेने की बात आई, तो उसने अपनी मां से कहा था, “मां कपड़े जिसे पहनने हैं उसकी पसंद के होने चाहिए.” ये सुनकर वो पूरे दिन ख़ुशी से गुनगुनाती रही.

उसकी किसी सहेली ने कहा, “मौलिक तुझे कॉल नहीं करते. ये कुछ अजीब नहीं लगता है!” तब उसने कहा था, “कोई दूसरों से अलग है इसका मतलब ये तो नहीं कि वो अजीब है.”
यहां तक कि शादी के दूसरे दिन जब मौलिक ने कहा, “वेदिका, हमारी शादी इतनी जल्दी में हो गई कि हमें एक-दूसरे को जानने का मौक़ा ही नहीं मिला. मुझे इस रिश्ते को अपनाने में थोड़ा टाइम लगेगा.” उसे तब भी कुछ अजीब नहीं लगा.
पापा की बीमारी के चलते हनीमून के लिए कुछ महीनों बाद जाने की बात पर भी वो सहज बनी रही. घर के सभी लोग वेदिका को पसंद करने लगे थे. मौलिक की छुट्टियां भी ख़त्म होने वाली थीं. जाने के एक दिन पहले वो उसे लेकर अस्सी घाट गया था. सामने नदी और अंधेरा एक-दूसरे से इस तरह मिल गए थे कि दूसरे किनारे की रेत भी नदी ही लग रही थी. टिमटिमाती रोशनी में मौलिक ने वेदिका की तरफ़ देखा, उसे लगा कि वेदिका को उसके पास्ट के बारे में पता होना चाहिए. वो आज उसे सब कुछ बताना चाहता था. तभी वेदिका ने कहा, “मौलिक, आपकी तस्वीर देखते ही मैंने आपको पसंद कर लिया था. फिर जब पहली बार हमारी बात हुई, आप और ज़्यादा अच्छे लगने लगे. हमारी फैमिली बहुत ऑर्थोडॉक्स है. हमारे ऊपर इतनी बंदिशें थीं कि किसी लड़के से दोस्ती क्या सामान्य बातचीत भी बहुत मुश्किल थी. मुझे हमेशा से लगता था कि मेरे जीवन में एक ऐसा इंसान आएगा, जो इन लोगों जैसा नहीं होगा. जो मुझे भी अपनी तरह एक इंसान समझेगा.”
मौलिक उसकी बातों को सुनकर मुस्कुरा रहा था.
“आप भी सोच रहे होंगे मैं क्या-क्या बोले जा रही हूं, पर मैं आज आपको सब कुछ बताना चाहती हूं. पता है, आपसे जुड़कर मुझे मेनिफेस्टेशन पर और विश्वास होने लगा है.”
“मेनिफेस्टेशन? सीक्रेट वाला…”
“हां, वैसा ही कुछ… आप जैसा सोचते हैं आपके साथ वैसा ही होने लगता है. मेरी सहेलियां हंसती थीं कि मैं इतनी पॉजिटिव कैसे हो सकती हूं. लेकिन आपने मेरी ज़िंदगी में आकर मेरी सोच को सही कर दिया.”
वेदिका की इन बातों को सुनकर मौलिक ने उसे अभी अपने पास्ट के बारे में बताने का विचार छोड़ दिया.
“अच्छा अब जब मैं तुम्हारी लाइफ में आ गया हूं, तो तुम क्या मेनिफेस्ट करोगी?”
वो सिर झुका कर मुस्कुराने लगी. मौलिक कुछ और कहता, उससे पहले उसका फोन बजने लगा.
“हां मां, बस थोड़ी देर में आते हैं.”
“पापा को अटैक आ गया है बेटा.” मां लगातार रो रही थीं. मौलिक बदहवास हो गया.
हॉस्पिटल जाकर पता चला पापा कि कंडीशन बहुत सीरियस है. डॉक्टर्स के हिसाब से उनके बचने के बस तीस प्रतिशत चांस थे. उम्मीदों और चमत्कार के इंतज़ार में दिन कट रहे थे. मौलिक के छोटे भाई ईशान के फाइनल सेमिस्टर के एग्ज़ाम्स थे, तो उसका जाना बहुत ज़रूरी था. मौलिक और वेदिका ही हॉस्पिटल में रहते थे.
वेदिका जब घर में होती तो मां को संभालती, हॉस्पिटल में मौलिक को. मौलिक के लिए इतनी लंबी छुट्टी मुश्किल थी, तो उसने वर्क फ्रॉम होम ले लिया था. पर सारी कोशिशें बेकार हो गईं. तक़रीबन एक महीने बाद मौलिक के पिता चले गए. जैसे मौलिक की शादी देखने के लिए ही ईश्वर से ज़िंदगी मांगी हो और शादी होते ही उनका समय पूरा हो गया. एक महीने पहले जिस घर में शादी की रौनक़ थी, वहां मातम की चुप्पी पसरी हुई थी.
वहां और भी कुछ बदल रहा था. जिन रिश्तेदारों ने वेदिका की तारीफ़ के कसीदे पढ़े थे, वो उसकी शुभता पर सवाल उठा रहे थे. कानाफूसी का शोर वेदिका तक भी पहुंच रहा था, लेकिन वो उन्हें अनसुना कर घर के कामों में लगी रहती थी.
मौलिक, पापा का जाना स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था. एकदम शांत हो गया था. तेरहवीं की रस्मों के बाद उसे वापस भी जाना था. वेदिका मां को रिश्तेदारों के साथ अकेला नहीं छोड़ती थी. पूरे समय उनके आगे-पीछे लगी रहती थी. सारी रस्मों के ख़त्म होने के बाद रिश्तेदार वापस जाने लगे.
“भाभी अपना ख़्याल रखिएगा. हमें क्या पता था कि मौलिक की शादी के महीने भर बाद ही आपको इस रूप में देखना पड़ेगा. आपने बहू की कुंडली तो दिखवाई थी ना?”
वेदिका वहीं खड़ी थी. उसके सीने की घुटन गले तक बढ़ती जा रही थी. तभी मां बोलीं, “जब भी दूसरों की बहुओं को देखती, तो लगता कि जाने मेरी बहू कैसी आएगी? वेदिका जैसी बहू मिलेगी ये तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था. अब सोचती हूं ये नहीं होती, तो इस हालत में मेरा क्या होता?”
उनकी बातें सुन चाची चुप हो गईं. तभी किसी ने कहा, “ठीक ही है, अब भगवान ने जो दिया है, वो बनाए रखें!”
वेदिका ने सबके जाने के बाद मां के गले लगते हुए उन्हें थैंक यू बोला. लेकिन उसे इस बात का दुख हुआ कि वहीं पर खड़े मौलिक ने उसके पक्ष में कुछ नहीं कहा.
शादी के तीन दिन बाद जब चाची ने मौलिक से कहा था, “आप शादी करने में देर कर रहे थे, तो हमें लगा अपनी पसंद की इंजीनियर-डॉक्टर लाएंगे. पर आप तो…”
मौलिक ने उनकी बात काटते हुए कहा था, “अरे चाची, अपनी पसंद की ही लाने में तो इतनी देर हो गई. आजकल ऐसी लड़कियों की शॉर्टेज हो गई है.”
चाची एकदम चुप हो गई थीं. आज इतनी बड़ी बात पर भी मौलिक ने कुछ नहीं कहा. वेदिका के दिमाग़ में यह बात लगातार चल रही थी. कहीं मौलिक को भी तो यह नहीं लगता कि उसके आने से पापा के साथ ऐसा हो गया!
“वेदिका अगले हफ़्ते मुझे भी हैदराबाद जाना पड़ेगा.”
“अचानक!”
“हम्म… मुझे लग रहा था कुछ दिन और वर्क फ्रॉम होम मिल जाएगा, लेकिन हो नहीं पा रहा.”
मौलिक के जाने की बात से ही वेदिका रूआंसी हो गई. भले ही परिस्थितियों के चलते उनके बीच बहुत नज़दीकी नहीं हो पाई थी, लेकिन उसे बिस्तर के दूसरे कोने पर उसकी आदत हो गई थी.
“अच्छा सुनो! अपना सामान पैक कर लो.”
“लेकिन मां को इस हालत में अकेला छोड़कर…”
“अभी तो मैं हूं, तब तक तो तुम अपने घर जा ही सकती हो. शाम को ही चलते हैं. मैं तुम्हें छोड़कर आ जाऊंगा.”
मतलब… मौलिक वेदिका को हैदराबाद लेकर जाने की बात नहीं कर रहा था. वो अभी वहां जाना भी नहीं चाहती थी, लेकिन इस तरह मौलिक को छोड़कर भी नहीं जाना चाहती थी. वो सोचने लगी, क्या मौलिक के मन में उसके लिए इस तरह की कोई फीलिंग्स नहीं हैं? क्या उन्हें नहीं लगता कि इतने दिनों से हम किस तरह की ज़िंदगी जी रहे हैं. कुछ दिन तो उसके साथ अच्छा समय बिताते.
मायके आकर भी वेदिका का मन मौलिक के ही पास था. मौलिक की शांत आंखें, उदास चेहरा सब कुछ उसे बहुत परेशान कर रहा था.
“क्या हुआ बेटा, जब से यहां आई है, तू परेशान ही लग रही है? कोई बात है? मौलिक और उसकी मां ने तुझे कुछ कहा है क्या?”
“नहीं मम्मी… और वो मुझे क्यों ही कुछ कहेंगे?”
“अरे बेटा, हम लोग तो बहुत डरे हुए थे. शादी के एक महीने बाद ही तेरे ससुर… लगा कहीं सारा दोष तुझ पर ही ना आ जाए. वो लोग बहुत अच्छे हैं. तेरी सुधा मौसी की शादी के एक साल बाद उनकी सास चल बसी थीं, तो कितनी बातें सुनाई गई थीं. तेरे मौसा जी तो 3-4 साल तक उनसे उखड़े रहे थे.”
“ऐसा थोड़े ही होता है मम्मी कि नई बहू के आने से सास-ससुर को कुछ हो जाएगा.”
“होता तो नहीं है, लेकिन लोगों के मुंह का क्या किया जा सकता है?”
मम्मी की इन बातों ने वेदिका को और परेशान कर दिया. रह-रह कर उसे मौलिक का उदास चेहरा याद आ जाता था. यहां आने के बाद उसकी मौलिक से दो-तीन बार ही बात हुई, वो भी बहुत औपचारिक. मां का फोन आता, तभी उसे वहां की जानकारी मिलती थी.
मौलिक के जाने से दो दिन पहले वो वापस आ गई. उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था, लेकिन उसने मौलिक से कुछ नहीं कहा. अपने मन को बार-बार समझाती थी, मौलिक ने अपने पापा को खोया है, अभी इस तरह की बातें सोचना भी ग़लत है. पर मन रह-रह कर कमज़ोर पड़ जाता था.
“बेटा, मौलिक सुबह कितने बजे निकलेगा?”
“एक बजे की फ्लाइट है मां, 10 बजे तक तो निकलना ही पड़ेगा.”
“तुम एयरपोर्ट तक साथ चली जाना, ड्राइवर को बोल दे रही हूं.”
वो रात वेदिका के लिए बहुत भारी थी. रह-रह कर उसकी आंखें भीग रही थीं. कभी उसे मौलिक पर ख़ूब ग़ुस्सा आता तो कभी प्यार उमड़ता. वो अपने दिल और दिमाग़ से लड़ रही थी.
मौलिक ने अपनी पैकिंग कर ली थी. लैपटॉप को चार्ज में लगा कर बेड पर आ गया. वेदिका को लगा आज तो वो मुझसे कुछ कहेगा!
“वेदिका मां के लिए पूरे दो महीने की दवाइयां ले आया हूं. डॉक्टर का नंबर तो है ना तुम्हारे पास?”
“हम्म…”
“15-20 दिन में ईशान आएगा. दो-तीन हफ़्ते रहेगा. तुम उस बीच अपनी दोस्तों से मिल लेना. कुछ दिन के लिए अपने घर भी चली जाना.”
“हम्म…”
फिर से सन्नाटा छा गया. खिड़कियों के कांच के बाहर से चांद उनके कमरे में झांक रहा था. तुम कोचिंग क्लास कब जॉइन करोगी?”
“अभी कुछ सोचा नहीं हैं.”
“अगर जॉइन करने का मन हो, तो कर लो. सारा दिन घर पर रहकर ऊब जाओगी. मैं मां से बात कर लूंगा.”
वेदिका सोच रही थी. कोचिंग जॉइन करने का मतलब इस पूरे सेशन पढ़ाना पड़ेगा. मतलब मौलिक मुझे हैदराबाद नहीं ले जाना चाहते हैं. मां के लिए? शायद फिर से वर्क फ्रॉम होम लेकर आ जाएं! या कुछ और है इनके मन में… एक बार भी नहीं कहा कि मेरे बिना अच्छा नहीं लगेगा. कुछ भी तो नहीं कहा.
दिमाग़ में जितनी बातें चल रही थीं, सीने में उतनी ही घबराहट हो रही थी. उसे अपने और मौलिक के रिश्ते का भविष्य नहीं समझ आ रहा था. जब बहुत देर तक मौलिक ने कुछ नहीं बोला, तो उसे लगा वो सो गया. लाइट्स ऑफ थीं, तो कुछ दिख नहीं रहा था.
“सो गए?”
“नहीं.”
“एक बात पूछूं?”
“हम्म.”
“क्या आपको भी दूसरों की तरह लगता है…?”
“क्या लगता है?”
वेदिका के मन में चल रहे तूफ़ान ने उसकी आवाज़ को अवरुद्ध कर दिया था. बहते आंसू उसको हल्का कर रहे थे मगर…
“मुझे क्या लगता है वेदिका?”
“कि पापा मेरी वजह से चले गए…”
“ये क्या बकवास कर रही हो? ये सब तुमसे किसने कहा?”
“सब लोग. उस दिन चाचीजी भी तो कह रही थीं. मां ने उन्हें चुप करा दिया, लेकिन आप कुछ नहीं बोले.”
“मुझे याद नहीं आ रहा. पापा के जाने के बाद मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? हर वक़्त लगता है पापा सामने बैठे हैं. मैं हंसूंगा तो वो क्या सोचेंगे? खाना खाता हूं तो लगता है पापा को आख़िरी समय में खाना तक नहीं मिला. कितना कुछ करना था उनके लिए. मौक़ा ही नहीं मिला.” यह सब कहते समय मौलिक की आवाज़ अवरुद्ध हो रही थी.
वेदिका लाइट ऑन करके पास आ गई और उसके आंसुओं को पोंछने लगी.
“पापा को हार्ट प्रॉब्लम तो हो ही गई थी, लेकिन कभी ये नहीं लगा कि वो इतनी जल्दी चले जाएंगे. अब लगता है तुम नहीं आई होती, तो हम लोगों का क्या होता?”
“अच्छा आप इस समय ये सब बातें मत कीजिए. सुबह जाना है आपको. दो बज रहे हैं. आप सो जाइए.”
लाइट ऑफ करके वेदिका अपने साइड जाने लगी, तो मौलिक ने उसकी तकिया को अपने पास खींच लिया.
“तुमसे बहुत कुछ बताना है वेदिका… आज नहीं कहा, तो शायद कभी नहीं कह पाऊंगा. मेरे जीवन में कोई थी जिसे मैं बहुत प्यार करता था. हम कॉलेज के दोस्त थे. हमारा प्लेसमेंट भी एक ही कंपनी में हुआ था. तब लगा हम एक-दूसरे के लिए ही बने हैं. तक़रीबन दो साल हमने साथ काम किया. वो बहुत इंटेलिंजेंट थी और उतनी ही एम्बिशियस. उसके लिए उसका करियर मुझसे पहले था. एक जगह टिक कर रहना उसे पसंद नहीं था. फिर सैलरी हाइक के लिए उसने जॉब स्विच की पहले बेंगलुरु फिर न्यूयॉर्क. दूरियां बढ़ने के बाद उसे लगने लगा हम एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं. चार साल पहले हमारे बीच के सारे धागे टूट गए.” वेदिका की धड़कनें बहुत बढ़ गई थीं, तो इसीलिए मौलिक उसे अपना नहीं पा रहा था. वो वापस तो नहीं आ गई?
“मैं हमेशा से ओल्ड स्कूल था. मेरे लिए ये सब इतना आसान नहीं था. फिर मेरी ज़िंदगी में तुम आईं जैसे किसी पुरानी बीमारी को सही इलाज मिल गया हो. उस दिन अस्सी घाट पर तुम्हारे साथ बैठे हुए मैं बहुत ख़ुश था. फिर हॉस्पिटल में तुम्हारा अलग रूप दिखा. जैसे कोई नटखट सी बच्ची अचानक बड़ी हो गई हो.”
ये सब कहते हुए मौलिक ने वेदिका का हाथ अपने हाथ में ले लिया था. इस बात के ख़त्म होने तक वेदिका उसके और पास आ गई थी. मौलिक ने उसके सिर को अपने कंधे पर जगह दे दी. ख़ुद करवट लेकर उसके बालों में उंगलियां फेरने लगा.
“तुमने ये सब कैसे किया? एक हफ़्ते पहले जुड़े रिश्तों के लिए इतना समर्पण. कभी-कभी लगता है तुमसे बहुत पुराना रिश्ता है. मां कह रही थीं कि उनकी अपनी बेटी भी होती, तो इतना ना कर पाती जितना वेदिका ने किया है.”
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आधे घंटे पहले वेदिका के मन में उमड़ रहे सवालों के तूफ़ान थम चुके थे. कब मौलिक ने उसके माथे को चूमा और कब वेदिका सिमट कर उसके सीने से लग गई, ये बाहर से ताक-झांक करते चांद को पता भी नहीं चला.
सुबह ने फुसफुसाहट सुनी, “मैं आपके बिना कैसे रहूंगी?”
“बहुत जल्दी आऊंगा.”
एयरपोर्ट के लिए निकलते समय मां ने कहा, “मेरी चिंता मत करना. यहां मेरी सहेलियां हैं. मामा-मामी हैं, ईशान भी आ रहा है. तुम जल्दी से वहां सारा अरेंजमेंट करके वेदिका को साथ ले जाओ.”
वेदिका ने उन्हें अपनी बांहों में भर लिया, “आप भी मेरे साथ चलेंगी.”
मां की आंखों में भरे हुए आंसुओं का वज़न इतना ज़्यादा हो गया था कि वो वेदिका के कंधे पर लुढ़क गए थे. उन्हें ख़ुद को संभालने के लिए बस थोड़ा सा सहारा चाहिए था, जो उन्हें वेदिका ने दे दिया था. सच ही कहते हैं लोग… ईश्वर हर किसी को मुस्कुराने की एक वजह ज़रूर देते हैं और लोग उस वजह के ज़रिए फिर से जीने लगते हैं. एयरपोर्ट पर दो लोग ऐसे गले लगे जैसे दुनिया की भीड़ में बस वही दो थे.. एक-दूजे के वास्ते..

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