"हम टीवी नाही देखत का? इहां धोती-कुर्ता में रहेंगे तथा फॉरेन गए तो सूट-बूट पहनकर अंग्रेज़ी में बातें करके अंग्रेज बन जाएंगे." एक साधारण मेहनतकश नारी ने एक कटु सत्य उजागर कर दिया था. वास्तव में आज हमारी कथनी और करनी में कितना अंतर आ गया है.

बारह बज गए, अभी तक काम करने वाली नौकरानी नहीं आई, सारा काम पड़ा है, समझ में नहीं आ रहा, कहां से शुरू करूं? पता नहीं कैसे वह इतना सारा काम घंटे भर में निबटा जाती है.. सोच ही रही थी कि घंटी बजी. दरवाज़ा खोला तो देखा शीला खड़ी थी. देखकर चैन की सांस ली कि काम से छुट्टी मिली. फिर बनावटी क्रोध में पूछा, "आज देर कैसे हो गई?"
"बीबीजी, अपने मोहन को अंग्रेज़ी स्कूल में दाखिल करवाने गई थी. हम आज बहुत ख़ुश है... लगता है हमारा सपना सच हो जाएगा, उसे स्कूल में दाखिला मिल गया है."
"क्या इंग्लिश स्कूल में दाखिला मिल गया है." मैंने आश्चर्य से पूछा.
मन में विचार उठे... अपने बेटे अजिताभ का दाखिला करवाने गए थे, तो हेड मिस्ट्रेस के सारे प्रश्नों का सामना मुझे ही करना पड़ा था, जिससे खीझकर मैं पूछ बैठी थी, "दाखिला तो बच्चे का करवाना है, फिर इंटरव्यू मेरा क्यों?"
"वह इसलिए कि आप उसको पढ़ा भी पाएंगी या नहीं." हेड मिस्ट्रेस मुस्कुराकर बोली थी. अतीत से वर्तमान में आकर पूछ बैठी, "तुम इंग्लिश स्कूल में पढ़ा तो रही हो, लेकिन पढ़ा भी पाओगी."
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"हम नहीं पढ़ा पाएंगे तो क्या, ट्यूशन लगवा देंगे, एक ही तो बेटा है मेरा... उसको पढ़ाने के लिए रात-दिन मेहनत करूंगी, पर पढ़ाऊंगी अंग्रेज़ी स्कूल में ही, नया स्कूल खुला है. मोहन के बापू ने अपने साहब से सिफ़ारिश करवा दी तो दाखिला मिल गया, वरना मिलता ही नहीं. उसकी फीस, ड्रेस, किताबों इत्यादि में काफ़ी पैसा लग जाएगा. आप यदि हज़ार रुपया उधार दे देंगी, तो मदद मिल जाएगी. धीरे-धीरे हमारी पगार से काट लीजिएगा."
"वह तो ठीक है किन्तु अपनी मातृभाषा में शिक्षा दिलाने से बच्चा शिक्षा को अच्छी तरह समझ सकता है, वरना तोते की तरह रटता रहता है." मैंने समझाते हुए कहा.
"आप ठीक कह रही हैं बीबीजी, पर सब कहते हैं कि आजकल इंग्लिश बोलने वाला ही अच्छी नौकरी पा सकता है... उसी को सब पढ़ा-लिखा समझते हैं. नेता लोग हमें कहते हैं कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है... हिन्दी में सारे काम करो, हिन्दी में शिक्षा दिलवाओ, किन्तु अपने बच्चों को फॉरेन में पढ़ाएंगे. ज़रा-सी तबियत ख़राब होने पर इलाज के लिए विदेश भागेंगे और आप भी तो आशु बाबा को अंग्रेज़ी में पढ़ा रही हैं. मैं तो मोहन को अंग्रेज़ी स्कूल में ही पढ़ाऊंगी,"
"इतनी बातें कहां से जान गई?"
"हम टीवी नाही देखत का? इहां धोती-कुर्ता में रहेंगे तथा फॉरेन गए तो सूट-बूट पहनकर अंग्रेज़ी में बातें करके अंग्रेज बन जाएंगे." एक साधारण मेहनतकश नारी ने एक कटु सत्य उजागर कर दिया था. वास्तव में आज हमारी कथनी और करनी में कितना अंतर आ गया है. मैंने बात समाप्त करने की गर्ज से कहा, "ठीक है कल ले लेना."

वह काम में लग गई और मन में एक बार फिर विचारों का सैलाब उमड़ पड़ा. पिछले वर्ष मकान की छत बनवाने हेतु इसने पांच सौ रुपए मांगे थे, मेरे मना करने पर आशुतोष कितना बिगड़े थे... "जब तुमको आवश्यकता पड़ती है, तो तुरंत मांग बैठती हो या बैंक से लोन लेकर आवश्यकता की पूर्ति करती हो और यह बिचारी, जो दिन-रात खून-पसीना बहाकर तुम्हारी तीमारदारी में लगी रहती है, उसे पांच सौ रुपया देने से इंकार कर दिया. याद है पिछले वर्ष जब तुम्हें टायफाइड हुआ था तो महीना भर इसी ने तुम्हें और तुम्हारे घर को संभाला था, वरना मेरा क्या हाल होता..? आवश्यकता के समय तुमसे नहीं मांगेगी तो और कहां जाएगी. उधार ही तो मांग रही है, काट लेना धीरे-धीरे उसके वेतन से."
बहुत ही आदर्शवादी हैं आशुतोष. एक नामी पेपर के प्रधान संपादक जो हैं. बहुत मान-सम्मान है उनका समाज में. अपने निर्भीक एवं निष्पक्ष विचारों के कारण सदैव चर्चित रहे हैं.
शाम को आशुतोष आए तो चाय पेश करते हुए सहमति लेने की गर्ज से बोली, "शीला हज़ार रुपया मांग रही है, दे दूं क्या?"
"दे दो भई. होम मिनिस्टर हो घर की, अपने निर्णय स्वयं ले सकती हो, मुझसे पूछने की क्या आवश्यकता?"
"निर्णय तो ले सकती हूं, किन्तु घर ख़र्च के लिए रुपए तो आप ही लाकर देते हैं. जरा भी ज़्यादा ख़र्च होने पर तुरंत पेशी भी हो जाती है."
"तुम्हारा आरोप ठीक है, लेकिन जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने चाहिए. उधार मांगकर घर चलाना मेरे उसूलों के विरुद्ध है. बेचारी गरीब है, उसे आवश्यकता है तो दे दो. अपने अनावश्यक ख़र्चों में कटौती कर लेना... एक साड़ी कम ख़रीदना."
"साड़ी ख़रीदती तो बुरा लगता है.. मुझे क्या, मैं तो कुछ भी पहनकर चली जाऊंगी, नाक तो आपकी ही कटेगी समाज में... मामूली लेखक तो हो नहीं, प्रमुख दैनिक के संपादक हो." मैं तुनककर बोली.
"अच्छा छोड़ो... यह बताओ उसे हज़ार रुपए की आवश्यकता किसलिए पड़ गई." चाय पीते हुए मुस्कुराकर बोले.
"उसके लड़के को इंग्लिश स्कूल में दाखिला मिल गया है. अतः उसकी फीस, ड्रेस और किताबों के लिए उसे रुपए चाहिए."
"इंग्लिश स्कूल में दाखिला मिल गया, किन्तु क्या वह पढ़ा पाएगी..?"

"यही प्रश्न मैंने उससे किया था? और उसने जो जवाब दिया उससे मैं स्वयं भी चकित रह गई थी." एक-एक शब्द मैंने आशुतोष को उसी के शब्दों में सुना दिया. सुनकर आशुतोष कह उठे थे, "सचमुच भारत तरक़्क़ी कर रहा है. कौन कहता है कि भारत के मतदाता जागरूक नहीं है, तभी तो पल भर में ही सरकारें बदल जाती है."
"वह तो ठीक है, किन्तु इनके बच्चे भी अंग्रेज़ी पढ़कर बाबू बनने लगेंगे, तो घर का काम कौन करेगा. यहां तो किसी को अपने हाथ से एक ग्लास पानी लेकर पीने तक की आदत नहीं है."
"तुम्हारी मानसिकता भी अंग्रेज़ों जैसी हो गई है. उन्होंने भी अंग्रेज़ी भारतीयों पर इसलिए थोपी थी कि भारतीय ज़्यादा पढ़-लिख न सकें, क्लर्क ही बने रहें... उनके ग़ुलाम बनकर उम्रभर उनकी सेवा करते रहें. जब अपने देशवासी स्वजनों के लिए ऐसा सोचते हैं तो उन्होंने क्या ग़लत किया था... वह तो विदेशी थे, तभी भारत के ग़रीब एवं पिछड़े लोगों के लिए संविधान निर्माताओं को आरक्षण की नीति अपनानी पड़ी... जो राजनैतिक दुराग्रह के कारण समाज के लिए कोढ़ बनती चली जा रही है... धर्म और जाति के नाम पर आज समाज कई टुकड़ों में बंट गया है."
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"आप ठीक ही कह रहे हैं, मैं ही ग़लत थी, सभी को समान अधिकार एवं सुविधाएं मिलनी ही चाहिए. प्रत्येक व्यक्ति को अपना कार्य स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए. तभी समाज का उत्थान एवं सुधार संभव है... प्रतिभाएं किसी जाति एवं धर्म विशेष की बपौती नहीं होती. सुअवसर प्राप्त कर वे दलदल में खिले कमल के सदृश चतुर्दिक दिशाओं को अपनी सुगंध से सुवासित करने की क्षमता रखते हैं एवं सही अर्थों में मानव कहलाने की अधिकारी होते है."
"अरे, तुम भाषण कब से देने लगीं?" आशुतोष मुस्कुराकर बोले.
"आपकी संगत का असर है, उचित अवसर प्राप्त कर गूलर भी गुलाब बन जाता है." मैंने नहले पर दहला मारते हुए कहा.
- सुधा आदेश

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