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कहानी- एक सबक ये भी… (Short Story- Ek Sabak Ye Bhi…)

"क्या वाहियात चीज़ें देखते रहते हो? अच्छा लगता है बढ़ते बच्चों के सामने इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना, कुछ तो पर्दा रखो."
"ओफ्फो गीता! तुम भी हमेशा कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर मेरे पीछे पड़ी रहती हो. बड़े हो चुके हैं बच्चे. सब समझते हैं वो. आजकल आपस में भी ऐसे ही बात करते होंगे."
"हां करते होंगे, लेकिन तुम्हारे सामने तो नहीं करते ना?.."

"स्साsssssले… हराssssम… तेरी…" दो दिन पहले ड्रॉइंगरूम में टीवी पर चल रहे वेब सीरीज़ में हीरो विलेन के साथ हाथापाई करने से पहले उसे मां-बहनों से संबंधित हर प्रकार की गाली से नवाज रहा था कि अचानक दरवाज़ा खुला और विभोर अपने कमरे से बाहर निकला. उसे देखते ही अशोक ने टीवी की आवाज़ बंद कर दी. लेकिन अब तक विभोर के कान सब सुन चुके थे और इन सब के बीच शर्मिंदा सी गीता, अशोक की खाने की थाली रख कर तेजी से रसोई में चली गई.
मां को ऐसे झेंपता देख कर विभोर का चेहरा भी शर्म और ग़ुस्से से लाल हो गया और वो खीझ कर बोल पड़ा, "क्या है पापा? आप क्या-क्या देखते रहते हो, इतना ही पसंद है, तो अपने लैपटॉप पर देखा करिए ना."
"अरे यार! अचानक से गालियां देने लग गया हीरो, मुझे सपना थोड़ा न आना था कि वो ये सब बोलने लगेगा. आवाज़ बंद तो कर दी न मैंने." दांत निपोर कर अपनी झेंप मिटाने का प्रयास करता अशोक बोला.
विभोर कहना तो चाहता था कि हमेशा यही होता है. आपको तो कभी भी नहीं पता चलता, जबकि इस तरह के वेब सीरीज़ में कहानी कम और वाहियात गालियां ज़्यादा होती हैं. लेकिन पिता का लिहाज़ करके चुप रह गया.
अब तो ये रोज़ का काम हो गया था. कोराेना तो बहुत से खौफ़नाक मंज़र दिखा कर चला गया था, पर कुछ और भी था जिसकी भरपाई ये परिवार कर रहा था और शायद ये परिवार ही नहीं… आज अधिकांश परिवारों में यही दृश्य है.
लाॅकडाउन के दौरान टीवी पर रोज़ आनेवाले सीरियल बंद हुए तो अशोक जैसे टीवी प्रेमियों के दिल में मायूसी छा गई. पर उसके बाद ही शुरू हुआ वेब सीरीज़ और ओटीटी का सिलसिला, जिसने अशोक जैसे लोगों को थाली में परोस कर मनोरंजन दिया.
बस तभी से ये सब लोग अशोक के टीवी प्रेम का हर्ज़ाना भर रहे हैं.
ये घटना तब की है, जब लॉकडाउन के तक़रीबन दो साल बाद स्कूल और ऑफिस वगैरह सब पूरी तरह से खुल चुके थे.

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इस परिवार में अशोक, उसकी पत्नी गीता और दो बेटे विभोर और सौरभ हैं, जो अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं जब बच्चे, बच्चे न रह कर वयस्कों की श्रेणी में आने लगते हैं और शरीर में होते हार्मोनल बदलाव उनकी मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करते हैं. वैसे भी कोरोना काल में दो साल तक घर पर रहने से बच्चों में बहुत से भावनात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं.
अशोक हमेशा से ही टीवी देखने का बहुत शौकीन है. हर चैनल पर आनेवाले सीरियल के बारे में उसे पता होता था. ऑफिस से आते ही जैसे वो टीवी का रिमोट अपने हाथ में ले लेता था, उसे देख कर गीता कई बार सोच में पड़ जाती थी कि लोग तो औरतों को यूं ही बदनाम करते हैं कि वो डेली सोप बहुत देखती हैं. यहां तो उल्टा ही हिसाब है.
कई बार वो हंसते-हंसते अशोक को छेड़ती, तो वो खिसिया कर जवाब देता, "जुआ तो नहीं खेलता? शराब तो नहीं पीता? औरों की तरह दोस्तों की मंडली में तो नहीं जमा रहता आधी-आधी रात तक?.. टीवी देखकर रिलैक्स होता हूं, तुमसे वो भी बर्दाश्त नहीं होता." और गीता चुप लगा जाती.
सच ही तो कहता है अशोक, बहुत बार तो किचन में खाना बनाते-बनाते वो भी टीवी देखती और दोनों एक साथ थोड़ा समय बिता लेते. लेकिन जब से लाॅकडाउन में सब लोग घर बैठे और टीवी पर नए प्रोग्राम आने बंद हुए तब से अशोक को समय बिताना बहुत मुश्किल लगता था. तभी से उसे इंटरनेट पर वेब सीरीज़ देखने का चस्का लग गया था.
उसके वेब सीरीज़ देखने से किसी को कोई ऐतराज़ नहीं था, लेकिन समस्या थी कि हर दो मिनट बाद उसमें किसी न किसी के अंतरंग दृश्य होते थे और तक़रीबन हर तीसरे डॉयलाग में अभद्र शब्दों का भरपूर प्रयोग किया जाता था.
शुरुआत में गीता ने ध्यान नहीं दिया, पर जब आए दिन यही सब ड्रॉइंगरूम के टीवी पर चलने लगा, तो उसने अशोक को टोका था, "क्या वाहियात चीज़ें देखते रहते हो? अच्छा लगता है बढ़ते बच्चों के सामने इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना, कुछ तो पर्दा रखो."
"ओफ्फो गीता! तुम भी हमेशा कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर मेरे पीछे पड़ी रहती हो. बड़े हो चुके हैं बच्चे. सब समझते हैं वो. आजकल आपस में भी ऐसे ही बात करते होंगे."
"हां करते होंगे, लेकिन तुम्हारे सामने तो नहीं करते ना?..
जो बात बच्चों को समझानी चाहिए, वो तुम्हें समझानी पड़ रही है. माता-पिता और बच्चों के बीच मर्यादित व्यवहार ही तो बड़े-छोटे का फ़र्क़ रखता है और तुम ख़ुद ही उन्हें उकसा रहे हो. तुम्हें पता है मुझे कितनी शर्मिंदगी होती है जब अचानक से ऐसा कोई सीन आ जाता है और ऊपर से बच्चे भी सामने आ जाते हैं." गीता दबे स्वर में बोल रही थी.
"अच्छा अब तुम डिस्टर्ब मत करो मैं ध्यान रखूंगा कि बच्चों के सामने ऐसा कुछ न हो… मैं टीवी ही बंद कर दिया करूंगा." अशोक बेसब्री से गीता को टालता हुआ बोला.
"तुम अपने बेडरूम में जाकर देख लिया करो न." आज गीता भी ज़िद पर आ गई थी. दरअसल, पिछले दिन विभोर ने सकुचाते हुए उससे कहा था कि ड्रॉइंगरूम में आते समय भी झिझक होती है कि पता नहीं पापा क्या देख रहे होंगे." उसे तो गीता ने हंसते हुए टाल दिया था कि, "तू भी दादाजी की तरह गला खंखार कर आया कर…" लेकिन दिल में तो वो समझ रही थी कि अशोक के इस नए मनोरंजन के कारण बच्चों की नज़रों में उसकी गरिमा कम होने लगी है, इसीलिए आज वो अशोक के पीछे पड़ गई थी.

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"बेडरूम वाला टीवी स्मार्ट टीवी थोड़ा न है, जो उस पर ऑनलाइन प्रोग्राम आएंगे, तुम भी ना…"
अशोक ने गीता को ऐसे देखा जैसे वो मूर्ख हो.
"तो लैपटाप पर देखो, अपने मोबाइल पर देखो इतनी ही इच्छा है तो, पर यहां ये नहीं चलेगा." अब गीता ग़ुस्से में थी.
"ठीक है नहीं देखता." कहकर अशोक ग़ुस्से में रिमोट पटक कर उठ खड़ा हुआ.
गीता ने चैन की सांस ली, 'चलो ऐसे ही सही… पीछा तो छूटा… पता नहीं यह वेब सीरीज़ वाले भी ऐसे-ऐसे सीरियल क्यों बनाते हैं… क्या इनका कोई सेंसर बोर्ड  नहीं होता?' गीता के मन में आ रहा था.
तीन-चार दिन तो बड़ी शांति रही… बच्चे भी आराम से ड्रॉइंगरूम में बैठकर एक-दूसरे के साथ मस्ती-मज़ाक कर रहे थे. चाहे अशोक मुंह फुलाए घूम रहा था, लेकिन उसके बाद फिर वही ढाक के तीन पात… धीरे-धीरे अशोक ने फिर से टीवी ऑन करना शुरू किया, पर अब शेर के मुंह में खून लग चुका था. डेली सोप की बजाय उसे वेब सीरीज़ में ज़्यादा आनंद आने लग गया था.
डेली सोप से चैनल बदलकर वेब सीरीज़ कब शुरू हो जाती, इसका पता तब चलता, जब गालियां कानों में पड़ती. गीता छटपटा के रह जाती कि इस बात पर कितना क्लेश किया जाए.
कोरोना काल ख़त्म हुआ और सब अपने-अपने कामों पर वापस लौटे, तो गीता को लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा, पर ये उसकी भूल साबित हुई. बल्कि अब तो पूरा-पूरा वीकेंड इन वेब सीरीज़ की भेंट चढ़ जाता. कहीं आना-जाना होता, तब भी टाइम टेबल बनाना पड़ता कि कितने बजे एपिसोड ख़त्म होंगे.
नतीज़ा ये हुआ कि बच्चे धीरे-धीरे अपनी दुनिया में सिमटते चले गए और पिता से दूर होने लगे.
अपने-अपने कॉलेज से आकर वो या तो घर से बाहर निकले रहते या फिर अपने कमरों में घुसे रहते.
अशोक का कहना था, "बच्चे भी अपने मतलब की सब चीज़ें देखते होंगे. तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी रहती हो?"
वो इस नए नशे में डूबा ये देख ही नहीं पा रहा था कि परिवार हो या समाज, हर व्यक्ति को अपने अधिकारों की सीमा रेखा तय करनी पड़ती है, तभी सब कुछ मर्यादित रहता है.
गीता ख़ुद को बहुत असहाय सा महसूस कर रही थी. पुराने दिनों की याद, जब पूरा परिवार एक साथ बैठ कर डिनर करता था और एक-दूसरे से अपनी बातें शेयर करता था… गीता की आंखें नम कर जातीं. कल को बच्चों के शादी-ब्याह होंगे तब? ये सोच गीता परेशान सी हो जाती.
यूं लग रहा था जैसे अशोक को किसी नशे की लत पड़ गई हो. अचानक एक रविवार को, जब सारी दोपहर एक के बाद एक एपिसोड देखते अशोक ने पूरे घर को अपने-अपने कमरों में बंद रहने की मानो सज़ा सुनाई हुई थी. विभोर तमतमाता हुआ अपने कमरे से निकला और छोटे भाई सौरभ के कमरे में पहुंचकर ऊंची आवाज़ में उसे वो सारी गालियां एक सांस में दे गया, जो वेब सीरीज़ पर सुनाई पड़ती थीं.
छोटे बेटे के कमरे में कपड़े तह करती गीता ने कानों में उंगलियां दे दीं… छोटा सौरभ बड़े भाई विभोर को हकबकाया सा देख रहा था कि मैंने क्या किया और दूसरी तरफ़ अशोक को काटो तो खून नहीं… टीवी तो जाने कब का बंद हो गया था और पूरे घर में ऐसा सन्नाटा था कि सुई भी गिरे तो आवाज़ आए.
"ये क्या बदतमीज़ी है? ये कोई तरीक़ा है बात करने का?" ग़ुस्से में उबलता अशोक का स्वर सुनाई दिया.
"क्यों पापा? यह तो बहुत आम है ना? आपको भी सब गालियां पता है और हमें भी और अब तो मम्मा भी रोज यहां बैठकर यही सब तो सुनती हैं… यह तो नॉर्मल हो चुका है अब हमारे घर में… तो अगर मैंने दो-चार गालियां दे दीं, तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?"
बेटे की बात सुनकर गीता ने तो मुंह नीचे झुका कर अपनी मुस्कान छुपा ली और छोटा बेटा हंसी छुपाने के लिए बाथरूम भाग गया.


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उसी दिन ऐमेज़ॉन स्टिक का ऑर्डर प्लेस कर दिया गया और जब तक स्टिक नहीं आई, तब तक ड्रॉइंगरूम में ऐसी वेब सीरीज़ नहीं चली, जिसमें इस तरह की गाली-गलौज वाली भाषा थी.
ये विडंबना नहीं तो और क्या है कि मर्यादा की सीमा रेखा खींचने के लिए एक बेटे को ये रास्ता अख़्तियार करना पडा.
निश्चित ही बेटे का तरीक़ा ग़लत था, पर सीख सही थी. सच में आजकल जो वेब सीरीज़ दिखाई जा रही है उन्हें आप परिवार के साथ बैठकर तो देख ही नहीं सकते. कई बार अकेले में पति-पत्नी भी शर्मिंदा हो जाते हैं. जितनी बढ़िया कहानी होती है, उतनी ही ज़्यादा गाली-गलौज भी!
अठारह साल से ऊपरवाली फिल्मों को ए सर्टिफिकेट दिया जाता है. जहां सिनेमा हॉल में अवयस्क बच्चों का प्रवेश वर्जित होता है. अगर वो फिल्म टीवी पर आती भी है, तो सेंसर होकर, लेकिन इस तरह की वेब सीरीज़ को सर्टिफिकेट देना न देना बराबर है, क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से ये हर घर में अपनी पैठ बना चुके हैं.
इनका तोड़ है, तो सिर्फ़ यही कि घर के बड़े इस नए और तकनीकी नशे के आदी न होकर उदाहरण सैट करें, ताकि बच्चे भी उनके नक्शे कदम पर चलें, क्योंकि नशा कोई भी हो, बर्बादी ही लाता है.

- शरनजीत कौर

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