कहानी- गंगा तट पर (Short Story- Ganga Tat Par)

 

ganga tat final
“मेरी मृत्यु के बाद जिस रोज़ मेरा अस्थि विसर्जन हो, तब उस अस्थि-कलश के साथ इस संदूक को भी गंगा में विसर्जित करवा देना बिटिया… बड़े दिनों से यह बात दिल में दबाकर रखी थी, पर अब दिल भी कमज़ोर पड़ता जा रहा है. कौन जाने कितनी सांस शेष है. पता नहीं कब गहरी नींद लग जाए. ऐसा न हो कि दिल की बात बताने का मौक़ा ही न मिल पाए. यही सोचकर आज तुम से कह दिया. देखो तो, मन कितना हल्का हो गया…”

 

“बस कर संध्या… कब तक पैर दबाती रहेगी. बुढ़ापे का दर्द है. मेरे साथ ही जाएगा…” गहरी सांस लेते हुए दादी मां करवट लेते हुए उठ बैठीं, तो संध्या ने भी तुरंत उठकर उनकी पीठ के पीछे तकिया लगा दिया और भागवत गीता उठाने लगी. वो जानती थी कि दादी लेटे-लेटे रामायण और गीता सुनना पसंद नहीं करतीं. लाख दर्द के बावजूद इसी तरह उठकर बैठ जाती हैं.
पर दादी ने हाथ से भागवत लेते हुए कहा, “आज नहीं सुनना है मुझे कुछ… बैठ मेरे पास. आज तो तुझसे कुछ कहना है बेटी.”
“हां… हां… बोलिए न दादी, क्या बात है?” संध्या पलंग के बगल में कुर्सी खींचकर बैठ गई.
“ये संदूक देख रही हो न…” आंखें मूंदकर एक दीर्घ सांस लेते हुए दादी बोलीं, “मेरी मृत्यु के बाद जिस रोज़ मेरा अस्थि विसर्जन हो, तब उस अस्थि-कलश के साथ इस संदूक को भी गंगा में विसर्जित करवा देना बिटिया… बड़े दिनों से यह बात दिल में दबाकर रखी थी, पर अब दिल भी कमज़ोर पड़ता जा रहा है. कौन जाने कितनी सांस शेष है. पता नहीं कब गहरी नींद लग जाए. ऐसा न हो कि दिल की बात बताने का मौक़ा ही न मिल पाए. यही सोचकर आज तुम से कह दिया. देखो तो, मन कितना हल्का हो गया…” पोपले मुंह से हंसते हुए दादी ने संध्या की हथेली खींचकर अपने सीने पर रख ली, तो संध्या भी मुस्कुरा दी, पर साथ ही दादी के अनपेक्षित बातों से विस्मित भी थी वह.
“ऐसा क्यों कहती हो दादी? अभी तो आपको और भी लंबी ज़िंदगी जीनी है…” कहते हुए संध्या ने संदूक पर नज़र डाली, जिस पर जंग लगा बड़ा-सा ताला लटक रहा था. “इस पर तो ताला लटक रहा है दादी. चाबी कहां है इसकी?”
“चाबी का क्या करना है… ताले को यूं ही लटके रहने दो. किसी के काम का कुछ नहीं मिलेगा इसमें. वैसे भी चाबी गुम हो गई है. मैंने ही गुमा दी…” दादी मुस्कुरा दीं.
“क्या? गुमा दी मतलब?” संध्या ने अचरज से पूछा तो दादी कुछ संजीदा होते हुए बोली, “मतलब मैंने जान-बूझकर उस चाबी को गहरे दरिया में फेंक दिया, ताकि ये ताला कभी न खुले. संध्या, वो जो तुम अपने कमरे में बजाती हो न नए ज़माने का रेडियो. वो क्या कहते हैं उसको, जिसमें कैसेट डालकर चलाती हो. एक ही गीत अच्छा लगने पर बार-बार बटन दबाकर दोबारा वही गीत सुनती हो…”
“टेप… दादी मां टेपरिकॉर्डर…” संध्या को हंसी आ गई.
“हां-हां… वही टेप… इंसान की ज़िंदगी वैसी नहीं होती… जो पल हम एक बार जी लेते हैं, उन्हें किसी बटन से दोबारा नहीं जिया जा सकता. जो दिन बीत गए सो बीत गए, बस इसीलिए गुमा दी मैंने चाबी.”
दादी की ये दार्शनिक बातें संध्या की समझ से परे थीं. संध्या को बार-बार घड़ी पर नज़र डालते देख दादी ताड़ गईं कि संतोष के ऑफ़िस से लौटने का व़क़्त हो रहा है. संतोष रोज़ ऑफ़िस से लौटते व़क़्त संध्या के लिए मोगरे की वेणी लाता था. यदि संध्या ने बाल संवारे न हों, तो उसका मूड ख़राब हो जाता था. दादी की अनुभवी आंखें सब देख-समझ जाती थीं. तभी तो बोलीं, “अब उठो… बैठी क्यों हो… छः बजने को है. संतोष आने ही वाला होगा. बाल-वाल संवार लो. अब हमारे दिन तो हैं नहीं वेणी लगाने के…”
“ओह दादी मां, आप भी…” संध्या शर्मा गई, तो दादी ने फिर अपना पोपला मुंह खोल दिया और हो हो… कर हंसने लगी.
“बहू… ओ बहू…” लगभग झकझोरते हुए मांजी ने संध्या को हिलाया, जो बड़ी देर से आंखें मूंदे दीवार पर सिर टिकाए अचेतन-सी कोने में बैठी थी. “… चलो उठो, चलकर अंदर के कमरे में बैठ जाओ. तुम्हारे बाबूजी और बाकी लोग लौट आए हैं.”
मांजी की आवाज़ से जैसे संध्या की चेतना जागी. उसने देखा कि घर के सारे पुरुष- बाबूजी, संतोष और तीनों जेठजी दादी की अंत्येष्टी कर लौट आए हैं? आंगन में अब भी पास-पड़ोसियों व नाते-रिश्तेदारों की भीड़ थी. संध्या भीतरी कमरे में आकर अन्य स्त्रियों के पास बैठ गई.
दादी ने उम्र की लंबी पारी जी लेने के पश्‍चात प्राण त्यागे थे, इसलिए रोना-पीटना व मातमपुरसी का माहौल अपेक्षाकृत कम ही था. विधि-विधान से सारे कार्य शांति से निबटाए जा रहे थे. सहानुभूति प्रकट करने आई अधिकांश महिलाएं दादी मां के गुणगान में व्यस्त थीं. साथ ही इस बात को लेकर जिज्ञासा भी हो रही थी कि जाते-जाते किसको क्या-क्या दे गईं दादी मां. पर मांजी ने बड़ी समझदारी से बातों को एक अलग मोड़ देकर उनकी बातों पर पूर्णविराम लगा दिया था, “अम्मा के आशीर्वाद से ही अब तक परिवार में हंसी-ख़ुशी का माहौल बना रहा है. मैं तो उनकी इकलौती बहू रही हूं, पर अम्मा ने मेरे साथ-साथ मेरी चारों बहुओं पर भी इतना स्नेह लुटाया है कि किसी को कभी मायके की कमी नहीं खलने दी. उनके आशीर्वाद से यहां प्रेम-भाव परिवार में कायम रहे. बस और हमें क्या चाहिए?”
सबसे छोटी होने के नाते संध्या पर विशेष स्नेह था मांजी का, तभी तो उन्होंने अपने मन की बात संध्या को बताई थी. शायद उन्हें आभास हो गया था कि वे जल्दी ही सबसे दूर जानेवाली हैं और कल अचानक ही नींद में दादी मां को हार्टअटैक आ गया था. रात की दवा देने मांजी जब उनके कमरे में गईं, तो देखा दादी मां चिर निद्रा में लीन हो चुकी हैं. डॉक्टर ने बताया कि लगभग आधे घंटे पूर्व ही उन्होंने अंतिम सांस ली है.
“… पता नहीं कब गहरी नींद लग जाए… कहीं दिल की बात दिल में न रह जाए, इसलिए तुम्हें बता रही हूं…” बार-बार दादी मां के ये शब्द संध्या के कानों में गूंज रहे थे. एकांत पाते ही उसने मांजी को संदूक को अस्थि कलश के साथ प्रवाहित करने की बात बता दी. “… यही दादी मां की इच्छा थी मांजी, पिछले ह़फ़्ते ही उन्होंने मुझे यह बात बताई थी, पर मैं क्या जानती थी कि वो हमें छोड़कर जानेवाली हैं.” कहकर संध्या मांजी से लिपटकर फफक पड़ी. मांजी ने संध्या की पीठ पर हाथ फेरते हुए धीरज दिलाया, पर स्वयं उनके मन में उथल-पुथल मच चुकी थी.
उस संदूक से जुड़ी अतीत की घटना स्मरण हो आई. जब वह इस घर में नई-नई बहू बनकर आई थी, तब एक रोज़ सफ़ाई करते-करते उन्होंने दादी मां की संदूक को स्टूल पर से उतारकर ज़मीन पर रख दिया था, तो कैसे बरस पड़ी थीं वह, “किसने कहा था इसे ज़मीन पर रखने के लिये? चल उठा जल्दी और रख ऊपर.” कहते हुए सहारा देकर संदूक तुरंत पुनः स्टूल पर रखवा दिया था और दोबारा इसे हाथ न लगाने की सख़्त हिदायतें दे डाली थीं.
मांजी पुराने ज़माने की बहू थीं, इसलिए दादी मां के व्यवहार को सास का रौब समझकर सह गई थीं, परंतु फिर भी उनके मन में यह जानने की उत्कट अभिलाषा अंकुरित हो चुकी थी कि आख़िर इस संदूक में है क्या? सोचती थीं, होंगी अम्मा के ज़माने की क़ीमती साड़ियां और कुछ गहने. क्या करेंगी इनका. न देती हैं, न ख़ुद पहनती हैं. आख़िर एक दिन तो मुझे ही मिलेगा यह सब… यही सोचकर उन्होंने दोबारा उस संदूक पर ग़ौर ही नहीं किया. परंतु व़क़्त के साथ जब मांजी की भी चारों बहुएं आ गईं, तब कई बार उनके अन्तर्मन में यह ख़याल उठता रहा कि चलो अपनी बहू को न सही, पर पोतों की शादी में तो दादी मां अपनी संदूक से कोई उपहार निकालकर चारों बहुओं को ज़रूर देंगी. पर संदूक कभी नहीं खुला. न उनके लिए, न उनकी बहुओं के लिए. और आज संध्या के मुख से दादी मां की अंतिम इच्छा जानकर तो जैसे मांजी सकते में आ गई थीं. मन में झल्लाहट भी थी कि आख़िर यह कैसी इच्छा हुई.
मांजी ने बाबूजी को बताया, तो वह भी असमंजस में पड़ गए थे. उस संदूक से अम्मा को विशेष लगाव है यह तो वे बचपन से जानते थे, पर मरणोपरांत भी वे अपनी वस्तुओं को बांटना नहीं चाहतीं, यह बात उनकी भी समझ में नहीं आ रही थी. उन्हें याद आया कि बचपन में कई बार वे ज़िद किया करते थे कि “मां, खोलो न इसे… क्या रखा है इसमें बताओ ना…” लेकिन उनके बालहठ पर भी वे कभी नहीं पसीजी थीं, बल्कि ज़ोर की फटकार लगा देती थीं, “तेरे पिताजी ने कभी नहीं खुलवाया मेरा संदूक और तुझे बड़ी ज़िद आ रही है. चल भाग. अपना काम कर.”
दादी मां की इस अनूठी इच्छा के बारे में जानकर घर के सभी लोग अचरज में थे. ऐसी अंतिम इच्छा की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. संध्या के सबसे बड़े जेठ सतीश बोले, “भई औरतों का कपड़ों-गहनों का मोह तो होता है, पर दादी ने तो हद कर दी.”
इस पर दूसरे नंबर के सुरेश कह उठे, “हमें तो कोई आपत्ति नहीं है दादी मां की इच्छा पर… हां, अपनी बहुओं के दिल की तो जान लीजिए पिताजी. बेचारी बरसों से आस लगाए बैठी हैं इस संदूक से.” कहकर ज़ोर से ठहाका लगाया उन्होंने.
सुरेश की बात पर मांजी और तिलमिला गईं. उन्हें लगा जैसे सुरेश ने उनके किसी गहरे ज़ख़्म को छू लिया हो. “यह भी कोई मज़ाक का व़क़्त है सुरेश. तुम्हें तो हर बात में हंसी-ठिठोली सूझती है.”
“वो तो ठीक है मां. पर कुछ न कुछ हल तो निकालना ही पड़ेगा.” तीसरे बेटे सोमेश ने समझाया, ‘मेरे विचार से कोरी भावुकता से काम नहीं चलेगा. वी शुड बी प्रैक्टिकल. गंगा में प्रवाहित करने से पूर्व हमें संदूक का ताला तोड़कर एक बार देखना चाहिए कि इसमें है क्या…”
“होगा क्या बेटा, अम्मा के ज़माने की दो-चार साड़ियां होंगी. बचपन से देखा है मैंने उन्हें. गहने तो उन्होंने अपनी पहनने-ओढ़ने की उम्र में भी नहीं पहने, तो जोड़कर क्या रखेंगी. हां, आम औरतों की तरह घर-ख़र्च से बचाकर रखे दो-चार हज़ार रुपये हो सकते हैं… और क्या होगा…” बाबूजी बुझे स्वर में बोले. अम्मा का यूं जाते-जाते संदूक को लेकर अजीबो-गरीब निर्णय सुना जाना उन्हें मन ही मन झल्लाहट से भर रहा था.
संतोष अब तक चुप्पी साधे एक ओर खड़ा था. उसे लग रहा था कि ये सारा बखेड़ा संध्या की वजह से खड़ा हो गया है. संतोष के चेहरे के भाव पढ़कर ही संध्या बिना किसी ग़लती के अपराधबोध से घिरी खड़ी थी.
सतीश, सुरेश और सोमेश तीनों ही संदूक खुलवाने पर एकमत थे. “जैसी सबकी इच्छा…” कहते हुए मांजी भी अपने चेहरे पर आ रहे उतावलेपन के भावों को छिपाने का असफल प्रयास कर रही थीं. आख़िर बरसों से उनके मन में भी संदूक में झांकने की अभिलाषा दबी पड़ी थी.
जिज्ञासा तो संतोष के मन में भी फन उठा रही थी. उसे याद आया कि पिछली दिवाली पर रंग-रोगन के व़क़्त उसने दादी से कहा था, “…. लाइये दादी, आपकी बाबा आदम के ज़माने की संदूक खाली करके दीजिए. मैं पैंट कर देता हूं. बिल्कुल नई हो जाएगी.” इस पर दादी बोली थीं, “खाली नहीं करूंगी. करना है तो ऊपर से ही पेंट कर दे.” और संतोष ने बंद तालेवाली संदूक बाहर से पोत डाली थी. ऐसा क्या रखा है दादी ने इसमें, जिसकी उन्हें भी कभी ज़रूरत नहीं पड़ी. यह जानने की उत्सुकता संतोष को भी थी.
घर की बहुएं भी मन ही मन प्रफुल्लित थीं, पर अपनी-अपनी उत्कंठाओं को अंतर्मन में दबा-छिपा कर सामान्य बनी खड़ी थीं. सभी जानती थीं कि संदूक में जो भी होगा, उस पर इकलौती बहू होने के नाते सबसे पहले उनकी सासू मां का अधिकार होगा. फिर जैसा वो चाहेंगी वैसा ही होगा. फिर भी एक-एक साड़ी और तोला-दो तोला सोना तो शायद हरेक के हिस्से में पड़ना ही चाहिए. मन ही मन अटकलें ज़ोर मार रही थीं.
“किसी के काम का कुछ नहीं मिलेगा इसमें…” दादी मां के शब्द बार-बार संध्या के कानों में गूंज रहे थे. दादी मां ने बिना ताला खोले ही संदूक को प्रवाहित करने के लिए कहा था. मुझसे कहकर कितनी निश्‍चिंत हो गई थीं वह. कितना विश्‍वास था उन्हें मुझ पर. उनकी इच्छा ज़रूर पूरी होनी चाहिए, “बाबूजी, दादी मां ने ताला खोलने के लिए मना किया था.” अचानक संध्या बोल उठी.
“संध्या…” संतोष के स्वर की तीव्रता कह रही थी कि पहले ही बखेड़ा खड़ा कर चुकी हो. अब चुप रहो. संध्या सहमी-सी एक ओर खिसक गई. आख़िर घर में सबसे छोटी जो थी. कहती भी क्या?
ताला पुराना था, पर मज़बूत था. दस-पंद्रह मिनट की जद्दोज़ेहद के बाद अंततः ताला टूट गया. बाबूजी संदूक को ज़मीन पर रखकर पालथी लगाकर बैठ गए, बगल में मांजी भी बैठ गईं. बेटे-बहुएं आस-पास घेरा बनाए खड़े थे. सर्वप्रथम बाबूजी ने ही संदूक खोला. पर ये क्या! सबके सब अचंभित थे.
न साड़ियां… न गहने… न रुपयों की पोटली! एक गुलेल व साथ में कपड़े की थैली में रखे ढेर सारे छोटे-छोटे पत्थर! संदूक में छिपी गुलाबी पॉलिथिन में कुछ काग़ज़ात होंगे… ज़रूर बंटवारे को लेकर असमंजस में रही होंगी अम्मा. तभी तो… अब के बाबूजी का विचार-चक्र तेज़ी से घूमा. फूर्ति से उन्होंने पॉलिथिन उलटकर काग़ज़ात निकाले. परंतु ये क्या? ढेरों नन्हीं-नन्हीं छोटी-छोटी पर्चियां!
सबका कौतूहल चरम पर पहुंच चुका था. सतीश, सुरेेश, सोमेश, संतोष सभी आस-पास पालथी लगा चुके थे. जिसे जो पर्चा हाथ में आया, उठा लिया पढ़ने के लिए, लेकिन अगले ही क्षण सबके सब स्तब्ध.
ये पर्चे कुछ और नहीं, बल्कि प्रेमपत्र थे, जो किसी अल्हड़ आशिक नंदकिशोर ने अपनी ‘कम्मो’ उर्फ कामिनी यानी दादी मां के नाम लिखे थे… प्रेमरस में आकंठ डूबे छोटे-छोटे अफ़साने जो अधूरे छूट गये थे… किसी में प्यारी कम्मो से सुबह-सुबह आंगन में दर्शन न देने की शिकायत, तो किसी में कम्मो से केवल एक मुलाक़ात की मनुहार! किसी में वर्णित थी रातों की दूरियां, तो किसी में साथ न दे पाने की मजबूरियां!
पत्रों से ज़ाहिर था कि नंदकिशोर से दादी मां की रू-ब-रू मुलाक़ात कभी नहीं हो पाई थी, क्योंकि एक पत्र में नंदकिशोर ने लिखा था-
प्यारी कम्मो, तुमसे रू-ब-रू बात करने की अभिलाषा लगता है अधूरी ही रहेगी इस जनम में… कृष्णा ने बताया कि अगले माह देव उठनी ग्यारस के अगले दिन ब्याह है तुम्हारा… तुम हमेशा-हमेशा के लिए वो आंगन सूना कर जाओगी, जहां झांकने के लिए मैं न जाने कितनी बार इस छज्जे पर चढ़ता हूं, पर अब शायद न चढ़ सकूंगा. मैं जानता हूं कम्मो कि तुम भी दुखी हो, पर जब तक हाईस्कूल न पास कर लू, तब तक मेरे ब्याह की बात अब्बा सोचेंगे भी नहीं… इसके लिए तो अभी पूरा एक साल बाकी है. हमारे भाग्य में शायद इतना ही साथ लिखा था. मैंने कृष्णा से कहा था कि बस केवल एक बार वो तुम्हें गंगा तट पर ले आए, तो गंगा मैया को साक्षी मानकर हम कसम खा लेंगे कि अगले जनम में ज़रूर मिलेंगे… पर तुम तैयार ही नहीं हुईं कृष्णा के साथ आने को… शायद घरवालों के डर से.. खैर! मैं फिर भी तुम्हारा इंतज़ार करूंगा. यहीं, इसी गंगा तट पर… तुम्हारे ब्याह पर क्या तोहफ़ा दूं कम्मो… जो तुम्हें ज़िंदगीभर याद रहे? इस गुलेल की अब मुझे ज़रूरत नहीं पड़ेगी. इसे मेरी याद के तौर पर रख लो… समझ लो यही मेरा तोहफ़ा है.
हमेशा ख़ुश रहो… तुम्हारा नंदू.

बाबूजी तो जैसे अवाक् रह गए थे यह सब देखकर. जीवन के हर उतार-चढ़ाव पर अम्मा ने पिताजी का साथ दिया था. उन्हें परमेश्‍वर की तरह पूजा था… अपने कर्त्तव्यों को निभाने में रत्तीभर भी कसर नहीं छोड़ी थी अम्मा ने. जीवनभर जिस अम्मा को घर-गृहस्थी, पति-बच्चे, परिवार… सबके लिए तिल-तिल पिसते देखा, आज उसी अम्मा का दूसरा अप्रगट रूप बाबूजी के सामने था.
स्त्री की आसक्ति केवल साड़ियों व गहनों में ही होती है, सबका यह भ्रम टूट चुका था. प्रेम की भावना को कितनी शिद्दत के साथ स्त्री दिल में सहेजती है, इसका साक्षात उदाहरण आज सब के समक्ष था.
अम्मा का ब्याह चौदह बरस की उम्र में हुआ था, तब से अब तक पूरे पचहत्तर वर्षों तक उन्होंने अपने प्रेम को सहेजकर रखा… निश्‍चय ही यह संदूक ज़मीन पर रखने के लिए नहीं था… न ही किसी के साथ बांटा जा सकता था. यह बंद संदूक बता रहा था कि अम्मा ने अपने प्रेम को घर-गृहस्थी के कर्त्तव्यों पर कभी हावी नहीं होने दिया, परंतु प्रेम पर भी कभी कर्त्तव्यों की आंच नहीं आने दी थी उन्होंने… तभी तो उन यादों को एक भक्ति-भाव की तरह सहेजकर रखा था इस संदूक में. बाबूजी की आंखों में अश्रुकण उभर आए. एक-एक कर सारे प्रेम-पत्र उन्होंने पुनः सहेजकर संदूक में रख दिए. नंदू की गुलेल व ढेरों छोटे-मोटे पत्थर अपनी कहानी बयां कर रहे थे. घर का हर सदस्य संदूक के इस अनपेक्षित सत्य को देखकर संजीदा हो उठा था.
संध्या को आज दादी मां का दार्शनिक कथ्य कुछ-कुछ समझ में आ रहा था कि क्यों इस ताले की चाबी उन्होंने दरिया में फेंक दी थी…! “इस जीवन में ‘उन’ क्षणों को दोबारा नहीं जी सकती थीं दादी मां, पर अगले जनम में गंगा तट पर उनकी सारी अधूरी इच्छाएं पूरी हों…” मन ही मन संध्या ईश्‍वर को मना रही थी.

 Snigdha Srivastav
        स्निग्धा श्रीवास्तव
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