कहानी- जीवनदान (Short Story...

कहानी- जीवनदान (Short Story- Jeevandan)

कितना डर गए होंगे तुम जब वह गाड़ी हमसे टकराई थी. शायद तुमने मुझे ढूंढ़ा भी होगा, कितना दर्द हुआ होगा. पर मेरा दुर्भाग्य मैं तुम्हारे पास थी, पर बेहोश…
कुछ देर बाद शालिनी ने अपने बेजान शरीर और मन को समेटा.

कहानियां या तो सच्ची होती हैं या काल्पनिक, पर कहानियां कभी झूठी नहीं होती. जब व्यक्ति परिस्थितियों के महासागर में ख़ुद को मथता है, तभी जीवन का अमृत ऊपर आता है. ऐसे में किसी न किसी को तो अमृत के साथ निकले विष को पीना ही पड़ता है. यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है, ना झूठी ना काल्पनिक, पर सच्ची..!

कांच का दरवाज़ा खोलकर जब डॉक्टर अंदर आया, तो अर्ध अवस्था में पड़ी शालिनी का दिल रेल की गति से धड़क रहा था. लकवे के कारण दायां शरीर बेजान था, पर मन 12 वर्षीय बेटे की एक झलक पाने को बेचैन था. वह डॉक्टर से अपने बेटे की खोज-ख़बर लेना चाहती थी, पर ना तो हाथ काम कर रहे थे और ना ही जिव्हा में प्राण ही बचे थे. असंख्य नलियों और सुइयों के जाल में वह फंसी हुई थी. डॉक्टर पास बैठ कर बोला, “मैं जानता हूं कि जो बात मैं करनेवाला हूं उसके लिए ना तो यह समय सही है, ना जगह और ना ही परिस्थितियां, आप और हम दोनों जानते हैं पृथ्वी पिछले 15 दिनों से मौत से लड़ रहा है, पर अब हमें ऐसा लगता है कि उम्मीद ना के बराबर है. वेंटिलेटर हटाने का निर्णय आपका होगा. “
शारीरिक और मानसिक तौर पर विवश शालिनी ने डॉक्टर से समय मांगा. वह शिथील-सी बिस्तर पर पड़ी रही. अब उस जाल से बाहर निकलने की जद्दोज़ेहद ख़त्म हो गई थी. अब वह बिस्तर उसे स्मृतियों का अनंत महासागर लग रहा था, जिसमें वह परत दर परत नीचे जा रही थी.
मन के गोताखोर ने स्मृतियों के उस सागर में डुबकी लगाई और वह ख़ुद से बातें करने लगी- पृथ्वी तुम्हारे पापा की मौत के बाद तुम्हारा भविष्य ही तो मेरा जीवन था. तुम जब फुटबॉल खेलते तो लगता जैसे मैं ख़ुद पूरे मैदान में दौड़ रही हूं, तुम्हारे लिए खाना पका कर मेरा पेट भर जाता. उस दिन भी हम कितने ख़ुश थे, जब तक वह एक्सीडेंट ना हुआ था. अगर मुझे पता होता कि वह पल हमारी बातचीत का आख़िरी पल है, तो मैं तुमसे वह सब कुछ कह देती, जो मैं तुम्हें बताना चाहती थी. तुम्हारा माथा चुमती, गले लगाती. कितना डर गए होंगे तुम जब वह गाड़ी हमसे टकराई थी. शायद तुमने मुझे ढूंढ़ा भी होगा, कितना दर्द हुआ होगा. पर मेरा दुर्भाग्य मैं तुम्हारे पास थी, पर बेहोश…
कुछ देर बाद शालिनी ने अपने बेजान शरीर और मन को समेटा.

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दिन में एक बार ब्रेन डेड हुए पृथ्वी को मां का स्पर्श कराने आईसीयू से लाया जाता था, ताकि मां के स्पर्श से पृथ्वी में कुछ हलचल हो. उस दिन भी लाया गया. शालिनी ने अपने अधमरे शरीर से बेटे के सिर पर हाथ फेरा. वह सोच रही थी कि जब इसका जन्म हुआ था, तब यह रोया नहीं था, फिर इसे मेरे छाती पर रखकर मेरी धड़कन सुनाई गई, तब वह रोया था. पर आज शायद ऐसा नहीं होगा…
उसने पृथ्वी के कान में कुछ कहा और फिर डॉक्टर से कहा, “डॉक्टर वेंटिलेटर हटा दें और इसके वाइटल आर्गन किसी ज़रूरतमंद को डोनेट कर दें.”
पृथ्वी को वहां से ले जाया गया.
डॉक्टर ने पूछा, “आपने बेटे से कान में क्या कहा?” शालिनी ने बताया, ” मैंने उससे बोला कि तुम बहुत बहादुर हो, ऐसे ही रहना, मुझे तुम पर गर्व है, क्योंकि तुम कई लोगों को जीवनदान देकर जा रहे हो मेरे बच्चे!.

माधवी निबंधे

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