कहानी- मैं भई री कुंती (Short Stories- Main bhayi ree kunti)

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संगीता सेठी

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‘तू तो बहुत सोचती रही कुंती बनने के लिए… एक क़तरा विचार भी गर समाज का तेरे साथ होता… तो तू बन जाती कुंती… पर आज फिर से अवसर है… उठ… चल… बना अपना विचार… बन जा कुंती और आरती को दे दे सारे जहां की ख़ुशियां.’

 

मैं… न सतयुग की देवी… न त्रेता युग की अवतार… न मैं द्वापर युग की कुंती… मैं तो कलयुग की सरला देव राय… अपने इर्द-गिर्द स़िर्फ मां नाम के पात्र के साथ ज़िंदगी गुज़ारते हुए आज इस मुक़ाम पर आ गई हूं. भले ही मेरे नाम में ‘देव’ उपनाम पिता का ही है, पर वो पिता नाम का शख़्स मेरे होश में आने से पहले ही इस संसार से कूच कर गया. पिता जुआरी-शराबी थे. मैं उनसे कभी नहीं जुड़ पाई.
मां की एकमात्र संतान. वो भी लड़की और घोर कलयुग. अनपढ़-भोली मां नहीं समेट पाई पिता की विरासत में मिली ज़मींदारी, खेत-खलिहान. सब कुछ हाथ से जाता रहा. गांववालों के तानों-उलाहनों से तंग आकर हम नाना के गांव आ गए. मामा की कर्त्तव्यपारायणता मां को काले-कलूटे अज्ञान से बाहर खींच लाई और मेरी अज्ञानता को रौंदने का भरपूर अवसर दिया. हाथ में क़लम-स्लेट, स्याही, गले में बस्ता मेरे अस्त्र-शस्त्र बने. मां के जीने का एकमात्र उद्देश्य मैं… और मेरा दायरा ‘मां’ ही एक-दूसरे का संबल बने.

तू क्यों न भई रे सत्यवती…

समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा… आहिस्ता-आहिस्ता… मैं समय के साथ ज़रूर चली अपने मामा के सहयोग और मार्गदर्शन से. मामा ने कभी अति लाड़-प्यार नहीं दिखाया. बस, अपना कर्त्तव्य निभाते चले गए मुझे पढ़ाने का, मुझे निखारने का. पर आज ज़िंदगी के जिस मुक़ाम पर मेरे मामा ने पहुंचाया, तो लगा उन्होंने मेरे साथ सब किया.
पढ़ाई पूरी कर शिक्षिका बनने के बाद नौकरी के लिए पड़ोसी शहर में आना पड़ा. जीवनशैली का भयंकर बदलाव. अपने आसपास के लोगों को देखती तो लगता कितने पात्र जुड़े हैं उनकी ज़िंदगी के साथ. मां-पिता, भाई-बहन, चाचा, ताई आदि की लंबी फेहरिस्त. और मेरी ज़िंदगी में केवल मां. प़ढ़ने-लिखने के कारण दिमाग़ में कई ताने-बाने चलने लगे थे. मां दूसरी शादी नहीं कर सकती थीं? मुझे पिता का प्यार नहीं दिला सकती थीं? कहां थे कलयुग के विवेकानंद?… कहां थे राजा राम मोहन राय?… कहां थे दयानंद, जिन्होंने विधवा विवाह को प्रचारित किया? उनको मेरी मां नहीं दिखी तपती रेत पर मछली-सी तड़पती?
कभी लगता, काश! मेरा भी भाई होता… मैं उसे राखी बांधती. हम दोनों लड़ते-झगड़ते, हंसते-खेलते… जैसे मेरी सहेली चंपा का भाई करता है. पर कैसे संभव होता ये सब! शहर में नौकरी करते-करते मुझमें आत्मविश्‍वास आ गया था. मां के चेहरे पर भी हल्की-सी आभा आ गई थी.
हम मां-बेटी नाश्ता करते हुए दूरदर्शन पर महाभारत धारावाहिक देख रहे थे. पर मैं पहले एपिसोड से ही उसे आत्मसात् नहीं कर पाई. कुरुवंश के राजा शांतनु का गंगा से विवाह इस शर्त पर कि वो उसके किसी कार्य में बाधा नहीं डालेंगे और न ही प्रतिप्रश्‍न करेंगे और गंगा का एक-एक करके अपने सात पुत्रों को नदी में फेंकना… कैसे सहन कर पाए शांतनु… मैं टीवी के सामने बैठी कुढ़ती हुई परांठा कुतरती रहती. मां से ज़िरह करती, “मां, कैसे लोग थे उस युग में? कोई अपनी संतान को नदी में फेंकता है भला?” मां महाभारत के पात्रों पर मेरे वारों के सामने ढाल बनकर खड़ी हो जातीं, “अरे रानी! कोई राज़ होवे है इनमें. उस युग में देवता लोग बसे थे, कुछ सोचकर ही करे थे वे सब!” मैं अपनी संस्कृति को जानने के निमित्त महाभारत धारावाहिक देखती, इसलिए इसे देखना मेरी दिनचर्या की निरंतरता बन गई थी.
गंगा के आठवें पुत्र को नदी में विसर्जित करते समय शांतनु का टोकना शर्त से भटकाव था और गंगा अपने आठवें पुत्र को छोड़कर लुप्त हो गई. वह पुत्र बाद में देवव्रत और फिर भीष्म बना. विचित्र लीला देखिए- देवव्रत अपने पिता के लिए एक गांव के मछुआरे से उसकी बेटी सत्यवती का हाथ मांगता है. क्या कोई बेटी अपनी मां के लिए किसी पुरुष का हाथ मांग सकती है? मैंने टीवी स्क्रीन से नज़रें हटाकर मां की तरफ़ फेर ली थी. कनखियों से मां का चेहरा तटस्थ दिख रहा था. मेरा चेहरा तमतमा गया था और मैं अपने चेहरे की तपिश कानों की लौ से निकलती महसूस कर रही थी.
ज़िंदगी के कई पक्ष छूटते-से नज़र आए थे मुझे. समाज के बेबुनियाद नियम-क़ानूनों को क्या हक़ है कि किसी की ज़िंदगी से हंसी छीन ले, उसके जीने की ललक ही ख़त्म कर दे. अगर कोई किसी को ख़ुशी नहीं दे सकता तो उसको उसकी ख़ुशी छीनने का भी कोई हक़ नहीं. फिर ग़मों के बोझ ढोते रहने से तो अच्छा है मर जाना. अंदर एक तूफ़ान चलता रहता था. पर मां अपनी ज़िंदगी को तटस्थ, समय की मंथर गति के पहिए-सा चला रही थी. किस मिट्टी की बनी है मां!
कभी-कभी स्कूल के प्रिंसिपल साहब से भी उलझ पड़ती जब वो कोई धार्मिक दंतकथा सुनाते. कृष्ण के सुदर्शन चक्र की कथा सुनते ही मैं फट पड़ी, “सर! सब फैंटेसी है…
कोई सत्य नहीं… ये सब लिखे जाने के लिए लिखा गया है.”
“फैंटेसी?…” काले और मोटे फ्रेम के चश्मे को नाक पर लाकर पिछली आंखों से झांकते हुए पूछते.
“फंतासी सर! फंतासी!… कोरी कल्पना कहते हैं जिसे…” और वे हंस पड़ते.
समय का चक्र चलना ही था और वो चला भी. मंथर गति के पहिए में वो क्षण भी थे, जब मेरी शादी का फैसला हुआ. मामा ही लेकर आए थे रिश्ता. लड़का मेरे ही शहर में पुरातत्व विभाग में सुपरवाइज़र के पद पर था. मां ने भी कोई विरोध नहीं किया. अकेले कैसे रहेंगी मां? क्या ज़रूरी है शादी करना?… जैसे तमाम प्रश्‍नों के बाद अंतिम हथियार हां ही था. हेमराज से मेरी शादी धूमधाम से तो नहीं, हां सादगी से अवश्य हो गई थी.

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तू क्यों न भई रे अंबा-अंबिका…

वही समय, जिसे मैं मंथर गति वाला समझती थी, अब तेज़ी से चलने लगा था. वैवाहिक जीवन की आवश्यकता और उसकी शैली में ढलने की नियति… हेम से मां को अपने पास रखने की बात की, वे मान गए.
ख़ुशी से पागल हो गई थी मैं. मां को ले आई अपने घर. अब मां हमारे साथ रहने लगी थीं. भाई की कमी एक बार और मायूस कर गई थी मुझे.
महाभारत धारावाहिक देखना निरंतर चलता रहा. सत्यवती का शांतनु से विवाह और उसके पुत्रों विचित्र, वीर्य और चित्रांगद का पैदा होना. सत्यवती के पुत्रों की आयु कम थी और विवाह के बाद वे अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए. उनकी संतानहीन पत्नियां अंबा-अंबिका… विधवा पुत्रवधुएं… वंश कैसे चले? राजा कौन बने…? सत्यवती ने वेदव्यास से आग्रह किया कि वो अंबा-अंबिका के संयोग से संतान पैदा करें.
संयोग नहीं… वेदों में इसे ‘नियोग’ कहा गया है. त्रेता युग में सब मान्य… द्वापर युग में सब कुछ मान्य… और कलयुग में वैधव्य जीवन की प्रताड़ना के अलावा कुछ नहीं. उस एपिसोड को देखकर तो मैं बरस ही पड़ी मां पर, “तुम क्यों नहीं बनी अंबा… तुम क्यों नहीं बनी अंबिका… हमारी दादी ने क्यों नहीं धारण किया सत्यवती का आदर्श… हमारा भी वंश चलता… हमारा भी भाई होता… हम भी ख़ुशियों की बगिया में रहते. बोलो ना मां!… क्या आपका मन नहीं सोचता था ये सब.”
पर मां स्याह अनपढ़ता में द्वापर युग के पात्रों को देवता के अलावा कुछ नहीं मानती थी. देवताओं के लिए सब जायज़ है… सब. पर मेरेे लिए वह महज़ पात्र थे… स़िर्फ पात्र! एक फंतासी भरे उपन्यास के.

तू क्यों न भई री कुंती…

समय चक्र ने मेरी गोद में न जाने कब आरती डाल दी. समय के बलशाली होने का एहसास हुआ. मेरी गोद में खेलते… नानी के दुलार और हेम की छत्रछाया में आरती बड़ी होने लगी. एक सुकून पनप रहा था चारों तरफ़ और ज़िंदगी में कुछ न पाने का मलाल पीछे छूटता जा रहा था. उम्दा पौध के तैयार होते ही ईश्‍वर उसकी छत्रछाया हटा लेगा, मेरी सोच से भी दूर था. हेम नहीं रहे. दिल का दौरा उन्हें हमसे दूर कर गया. मैं टूट गई और मां तो यह सदमा झेल ही नहीं पाईं.
मैं कुछ नहीं कर पाई… कुछ भी नहीं. जीवन-दर्शन को समझने की पुरज़ोर कोशिश भी मुझे संतुष्ट नहीं कर पाई. ‘ये तो होना ही था, या होनी को कौन टाल सकता है, या जो आया है वो जाएगा’ जैसे सूत्र जीवन को आराम नहीं देते थे, बल्कि बेचैन करते थे.
महाभारत धारावाहिक का वो एपिसोड आंखों के सामने चल रहा था, जब दुर्वासा ऋषि ने कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर उसे मंत्र दिया था कि वो किसी भी देव को मंत्र के माध्यम से बुला सकती है और संतान पैदा कर सकती है. दुर्वासा ऋषि के जाने के बाद कुंती मंत्र की परीक्षा करने की दृष्टि से ही सूर्य को बुलाती है. सूर्य का बाल रूप उसे मंत्र-मुग्ध करता है. सूर्य आते हैं कुंती के पास तो वह डर जाती है कि अब तो संतान देकर ही जाएंगे और वह आग्रह करती है कि वो लौट जाएं, पर वे कहां माननेवाले. वो आश्‍वस्त करते हैं कि तेरा पुत्र कान से पैदा होगा. तभी उसके पुत्र का नाम कर्ण रखा गया. लेकिन कुंती ने लोक-लाज के भय से उस पुत्र को नदी में बहा दिया.
क्या कलयुग में कोई दुर्वासा ऋषि पैदा नहीं हुआ, जो मुझे आरती का भाई लाने के लिए मंत्र दे जाए…? क्या मैं कुंती नहीं बन सकती? यह प्रश्‍न मैं अपनी अनदेखी दादी से करती थी सत्यवती बनने के लिए… यही प्रश्‍न मैं मां से करती रही अंबा-अंबिका बनने के लिए… प्रश्‍न कर रही हूं स्वयं से ही… मालूम है एक फंतासी है… मात्र एक फंतासी… समाज के कड़े नियमों से कहां ले पाऊंगी लोहा…? ये कलयुग है… कलयुग!
समाज क्या जाने वैधव्य की पीड़ा… एक साथी चला जाए तो उसका दुख आत्मा को काट कर फेंक देता है, पर जब समाज की नज़रें ही बदल जाएं तो फिर शरीर भी क़तरा-क़तरा ख़त्म हो जाता है… न चूड़ी-बिंदी… न हार-सिंगार… सब कुछ बुझा-बुझा-सा. आरती की ज़िरह के सामने उसका मन रखने के लिए बिंदी लगा लेती. उसके साथ शादी-ब्याह में चली जाती. जीवन में सब कुछ सामान्य-सा ही दिखता था… मेरा नौकरी पर जाना… खाना-पीना… सोना-उठना… पर अंदर से मन रोता था. समाज की मर्यादाओं को तोड़ने का साहस नहीं कर पाई. क्यों नहीं मेरे जीवन में कोई विवेकानंद, राजा राम मोहन राय, दयानंद सरस्वती आए, जो मुझे वैधव्य की पीड़ा से उबार सकते?
आरती साइंस ग्रेज्युएशन के बाद बायोटेक में एम.एससी. करने कानपुर जाने लगी. लखनऊ से दो घंटे का रास्ता था. वीक एंड पर आ जाती थी. जब-तब अपने हॉस्टल की बातें सुनाती तो कभी अपनी पढ़ाई की बातें बताती. ढेर सारे एक्सपेरिमेंट की बातें करती. मुझे उसकी नई टेकनीक, मानव क्लोन और डिज़ाइनर बच्चों की बातें बहुत आकर्षित करने लगी थीं.
“मॉम! देखो. आनेवाला समय डिज़ाइनर बच्चों का होगा… शोकेस में लगे होंगे बच्चे… हम शोरूम पर जाएंगे और कहेंगे- ‘जरा नीली आंखें हों और गाल गुलाबी… स्किन ज़्यादा स़फेद नहीं, पर गोरी. होंठ पतले हों और हां! आईक्यू लेवल थोड़ा हाई हो… ऐसा बच्चा चाहिए… देना ज़रा…. और वो टेस्ट-ट्यूब में कुछ केमिकल डालेंगे… हिलाएंगे… एक ह़फ़्ते बाद आने को कहेंगे… लो जी बच्चा तैयार…!” आरती आंखें नचा-नचा कर मेरे इर्द-गिर्द चक्कर लगाती और ठठाकर हंस पड़ती. पर मैं मन ही मन सोचती… ऐसा मेरे ज़माने में क्यों न हुआ?
इधर आरती का दो वर्ष का कोर्स समाप्ति की ओर था और उधर रिश्ते भी आने लगे थे. विवाह के लिए आरती का विरोध था, पर मैं जानती थी… लड़कियों का मन ऐसा ही होता है, डांवाडोल-सा… मां को न छोड़ने का मन… और नए रिश्तों को भी अपनाने का मन.
जब संयोग प्रबल होता है, तब कोई किंतु-परंतु सामने नहीं आता. रोहित का रिश्ता आते ही मंज़ूर हो गया था. रोहित मल्टीनेशनल कंपनी में सॉ़फ़्टवेयर इंजीनियर था. माता-पिता का इकलौता बेटा. देश की राजधानी में कार्यरत और विदेशों में घूमने का पूरा अवसर. मेरी आरती तो राज करेगी. इतरा उठी थी मैं.
दिल के टुकड़े को अपने से दूर करना कष्टकारी था, पर समाज के नियम शाश्‍वत हैं. उन्हें अपनाकर ही जीने का अधिकार मिलता है समाज में. पर इस बार भी भाई की कमी और बेटे की कमी आरती को विदा करते समय आंसुओं की धार में शामिल थी.

मैं भई री कुंती…

समय गतिमान है. उसकी शक्ति के सामने सब नतमस्तक हैं. आरती की शादी को एक वर्ष बीत गया. इस दौरान जीवन जीने की शैली ने एक पलटा और खाया. अकेले रहने की आदत का विकास हुआ. आरती के जब-तब फ़ोन आते रहते. रोहित भी मुझे ‘मां’ कहकर बात करता. अच्छा लगता. आरती का आना-जाना भी लगा रहा. पिछली बार आई तो कुछ बुझी-बुझी-सी थी. इस बार आई तो मैं पूछ बैठी, “वो डिज़ाइनर बच्चे बाज़ार में मिल रहे हैं क्या आरती?” मैं मुस्कुराते हुए शब्दों में नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर ही जवाब खोज रही थी. आरती की आंखों में मुझे सैलाब नज़र आया… मैंने कंधे को छुआ तो सैलाब चेहरे को भिगो गया. मैं हतप्रभ थी. दर्द में डूबी आवाज़ में बताया, “पिछले ह़फ़्ते चेकअप करवाया था. मुझे भी बच्चा चाहिए मम्मा! पर…”
“पर क्या?” मुझे जानने की जल्दी थी.
“मैं नहीं बन सकती मां… मेरी सोनोग्राफ़ी में पता चला, कोई संभावना नहीं. कोई नहीं…” आगे के शब्द आंसुओं में डूब गए थे.
मेरी आंखें बरस पड़ीं. कैसे करूं उसे आश्‍वस्त, जो ज़िंदगीभर ख़ुद को आश्‍वस्त नहीं कर पाई. ईश्‍वर कोे हमारे कुल के साथ ही बदला लेना था. मां तरसती रह गई बच्चों के भरे-पूरे आंगन को. मैं तरस गई. दो बच्चे भी नहीं जुटा पाई और अब आरती… वो एक बच्चे को भी तरस जाएगी… कुछ नहीं था कहने को… कुछ भी नहीं…!
ज्वार रुका तो ख़याल आया, “रोहित का क्या हाल है इस ख़बर के बाद. कहीं वो आरती को तलाक़…?”
“नहीं मम्मा! ऐसा ख़याल भी नहीं है उनके मन में.”
“तो?”
“ढेर सारे विकल्प हैं आज के ज़माने में और तुम तो बायोटेक की स्टूडेंट हो… फिर क्या इतना सोचना…रोहित कहता है.” आरती ने बताया.
आरती का मेरे पास आना-जाना ब़ढ़ गया. अपने और रोहित के विचारों की परत-दर-परत खोलती गई और नए विकल्प बताती गई. अंडे उधार लेने की बात… गर्भाशय किराए पर लेने की बात… मुझे कोई ज़्यादा आश्‍चर्यचकित नहीं कर रही थी. वैदिक काल को पढ़ने वाली मैं जानती थी सब कुछ… पर कलयुग में वैज्ञानिक तरी़के क्या कारगर हो सकेंगे हमारे समाज की मर्यादाओं में?
एक शाम आरती ने बातों की भूमिका बनाते-बनाते कहा, “मां! रोहित का मानना है कि आपसे अच्छा और क्या विकल्प हो सकता है. आपके अंडे और गर्भाशय हमारे काम आएं तो… मम्मा! उसे ‘सेरोगेट मदर’ कहेंगे… और आप सेरोगेट मदर बनें तो हमें अच्छा लगेगा. डॉक्टर भी यही सलाह देते हैं कि नज़दीकी रिश्तेदार हों तो अच्छा है.” मैं मूक श्रोता बनकर आंखें मूंदे उसकी बातें सुनती रही. यह बात मुझे अंदर तक हिला कर रखनेवाली थी… भला मैं और रोहित… क्या नियोग? ऋषि-मुनियोंवाला? क्या अंबा-अंबिका? या कुंती का सूर्य को आमंत्रण? बरसों का दबा हुआ उथल-पुथल करने लगा… मैं कुछ प्रश्‍न करूं, इससे पहले ही आरती सब कुछ बताती गई डॉक्टरी कार्यवाही के बारे में. कैसे फॉलिकल स्टडी होती है, कैसे वीर्य लिया जाता है, कैसे लैब में समागम करवाया जाता है… सब कुछ पवित्र तरी़के से होता है मां! सब कुछ डॉक्टर के द्वारा होता है.
रातभर सो नहीं पाई. सोचती रही… अपनी मां को कोसती रही… अंबा-अंबिका ही बन जाती… एक भाई तो और होता… मेरा संबल बनता… फिर ख़ुद को कुंती बनने के लिए उकसाती रही… पर नहीं बन पाई कुंती… नहीं कर पाई समाज की मर्यादाओं का उल्लंघन और अब समय ने ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां ख़ुशियों की बंद खिड़कियों की झिर्रियां भी बंद होती नज़र आ रही हैं… सरला देव राय… तू तो बहुत सोचती रही कुंती बनने के लिए… एक क़तरा विचार भी गर समाज का तेरे साथ होता… तो तू बन जाती कुंती… पर आज फिर से अवसर है… उठ… चल… बना अपना विचार… बन जा कुंती और आरती को दे दे सारे जहां की ख़ुशियां.
मैंने देखा सूर्य उतर कर आए हैं आसमान से… और मैं कह रही हूं… देना है तो वो रूप दो, जो आपके बालपन का हो… जन्मों-जन्मों की पूर्ति करनी थी… दुर्वासा ऋषि को मंत्र दिए कितने ही युग बीत गए और मैंने एक भी देवता का आह्वान नहीं किया…
मैंने धर्मराज को बुलाया… युधिष्ठर जैसा, तुम-सा पुत्र चाहिए… वायुदेव को बुलाया… भीम जैसा, तुम-सा पुत्र चाहिए… इंद्रदेवता को बुलाया…. नकुल-सहदेव जैसे जुड़वां तुम-से पुत्र चाहिए… जो माद्रि को दिए तुमने… आज माद्रि का मातृत्व मैं भोगूंगी… पिछले तीन युगों का उधार मांगती हूं तुमसे… तुम सबसे… मुझे पुत्र चाहिए… पुत्र… पुत्र….
“मम्मा, क्या हो गया है तुम्हें?” आरती मेरी अश्रुधार पर अपनी उंगलियां फिराते हुए बोल रही थी. जानती है… वो सब जानती है… मैं भी जानती हूं उसकी स्थिति… मां और बेटी का तो अटूट रिश्ता होता है… एक ही आत्मा होती है दोनों में… आरती के चेहरे को दोनों हाथों में लेकर मैंने कहा, “चलो आरती! कहां चलना है.” और आरती मेरी गोद में गिर गई, “मम्मा!…” एक निःशब्द आदान-प्रदान होता रहा.
“चलो मम्मा! आज ही चलना है डॉक्टर के पास फॉलिकल स्टडी के लिए…”
मुझे महसूस हुआ जैसे मैंनेे तीन युगों का मातृत्व आरती की झोली में डाल दिया है.

 

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