कहानी- मदर्स डे

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मनिकना मुखर्जी
हमारी मांएं हमें पाल-पोसकर बड़ा करती हैं और कुछ सालों बाद हम ससुराल आ जाती हैं. वहां हमें सास के रूप में दोबारा मां मिलती है. वो हमारा ख़्याल रखती है और कुछ सालों बाद हमारी अपनी बहुएं आती हैं. वे सबसे लंबा समय हमारे साथ बिताती हैं. वह समय हमारी बीमारी, कमज़ोरी और कष्ट का होता है. वे अपनी मां से ज़्यादा हमारी सेवा करती हैं. हमारा ख़्याल रखती हैं, तो हमारी मां से बढ़कर हुई ना.

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बाहर ‘मदर्स डे-मदर्स डे’ का ख़ूब हल्ला हो रहा है. अम्माजी (जानकी देवी) बोलीं, “बहू, ये मदर्स डे हम लोगों के ज़माने में तो नहीं था. अपने यहां तो एक ही मां और एक ही बाप होते हैं. विदेश में तो न जाने कितनी शादियां होती हैं, तो मां-बाप भी बदलते रहते हैं. अपनी मां को पहचान पाएं, इसके लिए ये दिन मनाते हैं. इन विदेशियों की ये चोंचलेबाज़ी देखकर सिर घूम जाता है.”
अम्माजी के बेटे रिटायर्ड प्रो. धनंजयजी बोले, “अच्छा ही तो है अम्मा, कम से कम एक दिन तो मां का अलग से ख़्याल रखते हैं. हमारे देश में भी यह चलन बढ़ रहा है, अच्छी बात है.”
नई-नई सास बनी उनकी बहू नम्रताजी बोलीं, “अम्मा, अपनी मां की ख़ुशी के लिए इस दिन को ख़ास बनाते हैं ये बच्चे. भले ही व्यावसायिकता के कारण इन नए-नए दिवसों को बढ़ावा मिल रहा है, पर कहीं न कहीं यह एक सकारात्मक शुरुआत है.”
अम्माजी की बड़ी बहू नम्रता ने अपने नाम के अनुरूप ही ससुराल को बांधे रखा है. हर ज़रूरत पर पति, सास, ससुरालवालों एवं बच्चों का साथ दिया. तीन ननदों और दो देवरों की शादियां कीं.
अम्माजी को जैसे कुछ याद आया, उन्होंने नम्रताजी से पूछा, “सुन बहू, तेरी परकटी बहू का फोन आया कि नहीं?”
दरअसल, नम्रता के बड़े बालों को देखकर ही उसे पसंद किया था अम्माजी ने, पर कली के बॉयकट बाल देखकर कुनमुनाती रहती हैं.
नम्रताजी की बहू कली एक हंसमुख व मिलनसार इंजीनियर है, जो एमबीए बेटे अर्णव के साथ ही काम करती है. शादी के बाद कम समय तक ही कली यहां रह पाई थी, पर फोन पर बराबर बात करती रहती है.
मदर्स डे के दिन नम्रताजी ने धनंजयजी को एक साड़ी दी, “अम्माजी को दे दीजिए और ये रबड़ी भी. कहिएगा आप लाए हैं. उन्हें अच्छा
लगेगा. उनको मदर्स डे की शुभकामनाएं दीजिए और आशीर्वाद लीजिए.” तभी फोन की घंटी बजने लगी. नम्रताजी ने फोन उठाया, उधर से कली की आवाज़ आई, “हैप्पी मदर्स डे! कैसी हैं मम्मा?”
“थैंक्यू बेटा, मैं ठीक हूं.”
“अम्माजी को भी फोन दीजिए ना, उन्हें भी मदर्स डे की शुभकामनाएं देनी हैं.”
“अम्माजी पूजा कर रही हैं. अच्छा कली, तुम बताओ, तुम्हें क्या उपहार चाहिए?”
कली बोली, “मम्मा, आप ख़ुद स्वस्थ रहें.
पापाजी और दादीजी को भी स्वस्थ रखें, यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार होगा, क्योंकि अगर आप बीमार हो जाएंगी, तो मैं आपकी उस तरह देखभाल नहीं कर पाऊंगी, जैसे आप दादीजी की करती हैं.”
कली की बात सुनकर नम्रताजी सोचने लगीं कि कितनी अच्छी बहू मिली है मुझे, बिल्कुल साफ़ मन की. पर क्या कली हमारे परिवार को
उसी तरह बांधकर रख पाएगी, जिस तरह अब तक मैंने रखा है?
तभी कानों में कली की आवाज़ गूंजी, “और पता है मम्मा, आपके बेटे अपनी नई मम्मी को विश करके पटाने में लगे हैं और मैं यहां अपनी मम्मी को. अच्छा मम्मा, बाय-बाय. स्वस्थ और ख़ुश रहिएगा.” तभी अर्णव की आवाज़ आई, “मदर नं. वन, हैप्पी मदर्स डे.” “थैंक यू बेटा.” “चलिए फोन रखता हूं. अपना ख़्याल रखिएगा.”
अम्माजी पूजा करके आ गईं, तो नम्रताजी ने बताया, “अम्माजी, कली और अर्णव का फोन आया था. आपको हैप्पी मदर्स डे विश किया है.”
“मुझे क्यों? मैं क्या उनकी मां हूं?”
“अम्मा, आप तो उनकी मां की मां हैं.” धनंजयजी चहककर बोले.
“मैं ये न जानूं. दादा-दादी डे पर फोन करें, तो जानूं.”
नम्रताजी हंस पड़ीं. धनंजयजी अवाक् मां को देख रहे थे, “ये दादा-दादी डे भी होता है क्या?”
अम्मा बोलीं, “हां तो, हमारी मंदिरवाली सहेली सरला के नाती-पोते विदेश से उसी दिन फोन करते हैं.”
नम्रताजी ने अम्माजी को बताया कि आज कामवाली बाई भी सुबह नहीं आएगी. कल ही कह रही थी कि माताजी कल मां लोगों का त्योहार है न, इसलिए सुधा बिटिया ने पहले से ही कह रखा है कि मदर्स डे पर आप काम पर नहीं जाएंगी. इसलिए सुधा ही काम पर जाएगी.
तभी सुधा आ गई. आते ही उसने नम्रताजी को बताया, “माताजी, आज मदर्स डे है न, इसलिए अम्मा को कहा आज तुम घर पर आराम करो. हम बेटियां उनका काम कर आएंगी. वो रास्ते में सेक्रेटरी साहब मिले थे. कह रहे थे कि आज शाम को सोसाइटी में मीटिंग है. आप दादीजी को भी ले जाइएगा.”
नम्रताजी अम्माजी को हमेशा कॉलोनी की मीटिंग व मंदिर ले जाती हैं, ताकि वे भी लोगों से मिल-जुल सकें.
शाम को सोसाइटी के मैदान में सभी पहुंचे. यहां एक बड़ा-सा ‘मदर्स डे’ का बैनर लगा हुआ है. काफ़ी बड़ा पंडाल है, जिसमें खाने-पीने की व्यवस्था है. कहीं सास-बहू, तो कहीं मां-बेटी ख़ूब सज-धजकर यहां से वहां टहल रही हैं. कोई बहू अपनी सासूमां को स्कूटी पर बिठाकर उनका मेकओवर कर लाई है, तो कोई बेटी अपनी मां को पिक्चर दिखा लाई है. डेज़ी तो अपनी सासूमां को स्कूटी पर बिठाकर डॉक्टर को भी दिखा लाई है. चारों तरफ़ उत्सव जैसा माहौल है. सास-बहू की जोड़ी की अंताक्षरी और डांस भी हुए. इस प्रतियोगिता में नम्रताजी और अम्माजी प्रथम आईं. दोनों ही बहुत ख़ुश हैं. नम्रताजी सोच रही हैं कि काश! कली भी यहां होती, तो कितना अच्छा होता. उसे तो धमा-चौकड़ी करना कितना अच्छा लगता है. उसी समय सेक्रेटरी साहब ने ऐलान किया, “आज का यह ‘मातृ दिवस यानी मदर्स डे’ हमारी बहुओं ऐार बच्चों द्वारा आयोजित किया गया है और इसमें सबसे बड़ी भूमिका अम्माजी की नतोहू (पोते की पत्नी) कली की है. उसी ने मेरे और दूसरे बच्चों के साथ मिलकर यह सरप्राइज़ मदर्स डे का कार्यक्रम रखा है. तो लीजिए, उन्हीं से कुछ सुनते हैं.” नम्रताजी और धनंजयजी भौंचक्के रह गए. ये क्या, उनकी मॉडर्न बहू कली इस तरह पारंपरिक लिबास में सजी-धजी स्टेज पर खड़ी है. नम्रताजी को अपनी आंखों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था.
कली ने बोलना शुरू किया, “शादी के कुछ ही महीनों में मुझे सासूमां से बिल्कुल वही प्यार मिला, जो अपनी मां से मिलता था. इस दिन को मैं अपनी सासूमां, दादीजी और सभी मांओें को समर्पित करना चाहती हूं. हमारी पीढ़ी की यह एक छोटी-सी पहल है. उम्मीद है, आप सभी को पसंद आएगी.”
तब तक अम्माजी ने पारंपरिक परिधान में सजी-धजी कली को पहचान लिया. उन्होंने तुरंत नम्रताजी से कहा, “अरे! नम्मो यह तो अपनी परकटी कली है. बड़ी बुद्धिमान है तेरी बहू. तूने बिल्कुल सही हीरा चुना है.” स्टेज से उतरकर कली सीधे अम्माजी के पास आ गई.
“दादीजी, कैसी हैं आप?”
“अरे बहूरानी! तेरे बाल कैसे बड़े हो गए? अब मैं कभी तुझे परकटी नहीं कहूंगी.”
“दादीजी, आपको बड़े बाल पसंद हैं न, इसलिए बढ़ा रही हूं.”
हर कोई अपनी-अपनी मां या सासूमां के लिए कुछ-न-कुछ कह रहा था. तभी स्टेज पर अम्माजी पहुंच गईं.
सब शांत होकर बैठ गए. सबसे बुज़ुर्ग और सुलझी हुई अम्माजी ने कहना शुरू किया, “आज यहां हम लोग मातृ दिवस मना रहे हैं. विदेशी लहर ने हमें अपनी मां के और क़रीब ला दिया है. हमारी मांएं हमें पाल-पोसकर बड़ा करती हैं और कुछ सालों बाद हम ससुराल आ जाती हैं. वहां हमें सास के रूप में दोबारा मां मिलती है. वो हमारा ख़्याल रखती हैं और कुछ सालों बाद हमारी अपनी बहुएं आती हैं. वे सबसे लंबा समय हमारे साथ बिताती हैं. वह समय हमारी बीमारी, कमज़ोरी और कष्ट का होता है. वह अपनी मां से ज़्यादा हमारी सेवा करती हैं. हमारा ख़्याल रखती हैं, तो हमारी मां से बढ़कर हुईं ना. और अगर हमें नतोहू देखने का सुख मिले, तो क्या कहने. वो इस दिन को अविस्मरणीय बना देती हैं. मैं तो कहती हूं यह दिन ‘मातृ दिवस’ नहीं, ‘बहू दिवस’ की तरह मनाना चाहिए.”
कली ने ज़ोरदार सीटी के साथ ताली बजाई, तो धनंजयजी ने हिप-हिप हुर्रे की हुंकार लगाई. पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट और हिप-हिप हुर्रे की आवाज़ से गूंज उठा.
कली दौड़कर आई और अम्माजी, नम्रताजी और धनंजयजी के पैर छुए.
“दादीजी, आप लोग खाना खा लीजिए. हम लोग भी खा रहे हैं. हमें अभी लौटना है, क्योंकि कल सुबह ऑफिस भी जाना है.”
नम्रताजी इस सरप्राइज़ ‘मदर्स डे’ की ख़ुशी में सराबोर हो गईं.

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