“ऑपरेशन दोनों का हुआ है, पर आराम की ज़रूरत केवल पति को है, मुझे नहीं. सबसे कठिन प्रत्यारोपण शरीर का नहीं, संवेदना का है.”
शालू के पति एक व्यापारी थे, अक्खड़ थे, शराबी थे. देर रात घर में घुसते थे. शालू ने चुपचाप नौकरी की, बच्चों को पढ़ाया, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया. दोनों बच्चे उड़ गए.
समय ने करवट ली. तब तक पति को शुगर, लीवर की बीमारी हो गई. अब देखरेख, अस्पतालों के चक्कर शुरू हो गए. तब जाकर पति का स्वभाव थोड़ा नरम हुआ तो शालू को अच्छा लगने लगा.
तभी पता चला पति की दोनों किडनी भी गई. डॉक्टर ने किडनी प्रत्यारोपण की बात कही.
शालू ने बिना एक पल सोचे अपनी एक किडनी दे दी.
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ऑपरेशन दोनों के हुए. मिलने वाला जो भी आता- पति को सांत्वना देता, फ़िक्रमंद होता… और चला जाता. एक दिन अस्पताल से घर पहुंच गए.
बहू खाना बनाती. बहू पापा को भोजन की थाली देती तो पति धीरे से शालू से कहते, “तुम दो रोटी तो बना कर दे ही सकती हो… देखो बहू कैसी रोटी बनाती है.”
घर में शांति रहे यही सोच कर शालू टांकों का दर्द दबाए धीरे-धीरे उठती. रोटियां सेंकती और थाली की रोटियां इधर-उधर करती.
बहू के पूछने पर बहाने बनाती… “गिर गई…” कभी “ज़्यादा खाना है…” आदि आदि
शालू से मेरी फोन पर बात होने पर शालू कहती, “ऑपरेशन दोनों का हुआ है, पर आराम की ज़रूरत केवल पति को है, मुझे नहीं. सबसे कठिन प्रत्यारोपण शरीर का नहीं, संवेदना का है.”
– नील मणि
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