
संगीता माथुर
मेरे माथे पर पसीना झिलमिला उठा. मैं धीरे से नीति के कान में फुसफुसाया, “पागल है क्या यह लेडी? अच्छा-भला बच्ची का मनोबल बढ़ाते-बढ़ाते यह क्या हरकत कर बैठी? कहीं भूल जाऊंगी वाली चिट निकल गई तो?”
“मेरी तो ख़ुद की दिल की धड़कनें बेकाबू हो रही हैं...”
आज तीसरा दिन था जब मां को ओटी से बिना ऑपरेशन ही वापस भेज दिया गया था. पता चला बीपी बहुत लो चला गया था.
“ऐसे कैसे चलेगा मां? कभी शुगर ज़्यादा, कभी बीपी लो! यहीं अस्पताल में ही रहना है क्या? घर नहीं चलना?” मैं निराश होने के साथ-साथ थोड़ा आवेश में भी आ गया था.
“मुझे नहीं करवाना ऑपरेशन-वोपरेशन. मैं ऐसे ही ठीक हूं. मुझे घर ले चल.” मां का तनाव समझ मैं शर्मिंदा हो उठा. 80 के समीप पहुंचती मां पर मेरा इस तरह झुंझलाना कदापि न्याय संगत नहीं था. ख़ुश चेहरे के पीछे छिपा मलाल जान लेती है. मां ही है, जो हमेशा दिल का हाल जान लेती है. और मैं हूं कि जानते-बूझते भी अनजान बन रहा हूं. वह तो ख़ुद ही अस्पताल के झमेले से निजात पाकर जल्द से जल्द घर लौटने की इच्छुक है. पर चिंता और व्यग्रता पर किसका बस चला है? बिन बुलाए मेहमान की तरह वे तो कहीं भी घर कर बैठती हैं. कभी शुगर बढ़ा देती है, कभी बीपी लो कर देती है. अब तक नीति और पीहू भी आ गए थे.
“क्या हुआ? हो गई सर्जरी? मांजी कहां हैं?”
“नहीं आज भी नहीं हो पाई. ऐन वक़्त पर बीपी लो हो गया था. आईसीयू में ही हैं. मिल आओ. विजिटिंग अवर्स ख़त्म होनेवाले हैं. मैं और करण थोड़ा डॉक्टर से मिलकर आते हैं.” कुछ ही देर बाद हम डॉक्टर विनय गुप्ता के चेंबर में उनके सामने की कुर्सियों पर विराजमान थे.
“मैं आपकी परेशानी और चिंता समझता हूं. लेकिन जब तक सारे पैरामीटर सही ना आ जाएं, ऑपरेशन नहीं किया जा सकता. मरीज़ की जान को ख़तरा रहता है. हर्निया बहुत बढ़ चुका है. टाला भी नहीं जा सकता. फिर आपकी माताजी जैसी उम्र में तो यह ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है.”
“पर डॉक्टर कुछ तो उपाय होगा. मां की उम्र के और मरीज़ भी तो आते होंगे.”
“हां, कइयों के साथ हो जाती है ऐसी समस्या. मैं कुछ करता हूं. आप परेशान मत होइए. कोशिश करता हूं कल हर हालत में सर्जरी हो ही जाए.”
“थैंक यू डॉक्टर.” नमस्ते करके मैं और करण बाहर आ गए थे. लॉबी में नीति और पीहू हमारा इंतज़ार कर रहे थे.
“पीहू, तुम चाचा के साथ उधर उस सोफे पर कल की वाद-विवाद प्रतियोगिता की तैयारी करो. तब तक मैं पापा से कुछ ज़रूरी बात कर लूं.” नीति ने समझाया, तो पीहू और करण दूसरे सोफे पर चले गए. मैं नीति के पास बैठ गया. जानता था वह भी मां की तबीयत को लेकर ही चिंतित है.
“देखते हैं! वैसे कल हो जानी चाहिए सर्जरी. डॉक्टर ने आश्वस्त तो किया है.”
“मांजी का तो रूटीन में भी शुगर और बीपी इतना ऊपर-नीचे होता रहता है! तो यहां अस्पताल के ऐसे तनावपूर्ण माहौल में कैसे सामान्य रह सकता है? अभी भी बेचारी बहुत परेशान हो रही थीं. कल तो अब हो ही जाना चाहिए.”
“समस्याओं की भी एक उम्र होती है. और उसके पश्चात उनका समाप्त हो जाना निश्चित है. खैर छोड़ो! यह पीहू के स्कूल में कल क्या है? रोज़ ही कुछ ना कुछ चलता रहता है.”
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“अच्छा ही है. बच्चे एक्टिव रहते हैं.”
“और मांओं को भी एक्टिव रखते हैं.” मैंने हंसकर कहा. तो नीति भी मुस्कुरा दी. इसी बहाने माहौल थोड़ा हल्का हो गया था. हमें हंसते देख पीहू दौड़कर हमारे पास आ गई.
“चाचू के सामने एक जगह थोड़ा सा भूल गई थी.”
“कोई बात नहीं! प्रैक्टिस करोगी तो फिर नहीं भूलोगी. पापा के सामने बोल दो एक बार पूरी स्पीच.” नीति ने बेटी का उत्साहर्द्धन किया.
“ओके.” पीहू ने एक लंबी सांस भरी और शुरू हो गई.
“वेरी गुड!” उसके स्पीच ख़त्म करने पर मैंने ताली बजाकर उसका उत्साह बढ़ाया.
“ठीक था ममा?” पीहू मेरे उत्साहवर्द्धन से आश्वस्त नहीं थी. उसे लगता था पापा लोग तो वैसे ही तारीफ़ कर देते हैं.
“मच बेटर! एक जगह थोड़ा अटकी थी, पर फिर तुरंत तुम्हें याद आ गया था.”
“ममा! मैं कल बीच में भूलूंगी तो नहीं?” पीहू नर्वस हो उठी थी.
पास ही रिसेप्शन पर खड़ी एक महिला जो कि काफ़ी समय से यह सब देख रही थी, हमारे पास आई. उन्होंने पीहू के सिर पर हाथ फेरा, “यदि बीच में कुछ भूल भी जाओ, तो रुकना या हिचकिचाना क्यों? सामने कौन सा कोई तुम्हारी स्पीच की कॉपी लेकर बैठा है और वर्ड टू वर्ड मिला रहा है? जहां से भी ध्यान आए बोलते रहो. और रटा रटाया बोलना ज़रूरी नहीं होता. सात-आठ साल की तो होगी तुम?”
पीहू ने सहमति में गर्दन हिलाई.
“तो तुम्हारे पहले जो बोलकर गया है, उसका संदर्भ देकर कह सकती हो कि तुम उसकी इस बात से सहमत नहीं हो या उसकी उस बात का क्या औचित्य है? जज तुम्हें तुम्हारी स्पीच से ज़्यादा तुम्हारे आत्मविश्वास से जज करेंगे. बस उसे डिगने नहीं देना है.”
“हूं...” पीहू का आत्मविश्वास थोड़ा-थोड़ा लौटने लगा था.
“काश उस समय बीच में भूलूं नहीं...”
“चलो एक मैजिक ट्रिक करते हैं. मैंने कई बार आज़माई हुई है. उसमें जो चिट निकलती है, हंड्रेड पर्सेंट वही होकर रहता है.” उस महिला ने रिसेप्शनिस्ट से सुंदर सा गुलाबी काग़ज़ लिया. उसमें से फाड़कर दो चिट बनाई.
“यह लो. एक पर लिख दिया भूल जाऊंगी. दूसरे पर लिख दिया नहीं भूलूंगी.” उन्हें एक सा मोड़कर, हाथों में ज़ोर-ज़ोर से हिलाते हुए, ज़ोर ज़ोर से कोई मंत्रोच्चारण करते हुए पीहू के पास सोफे पर छोड़ दिया.
“कोई भी एक उठा लो.”
मेरे माथे पर पसीना झिलमिला उठा. मैं धीरे से नीति के कान में फुसफुसाया, “पागल है क्या यह लेडी? अच्छा-भला बच्ची का मनोबल बढ़ाते-बढ़ाते यह क्या हरकत कर बैठी? कहीं भूल जाऊंगी वाली चिट निकल गई तो?”
“मेरी तो ख़ुद की दिल की धड़कनें बेकाबू हो रही हैं. अच्छी ख़ासी प्रैक्टिस कर ली थी पीहू ने. अच्छे से बोल ही लेती कल. बीच में ही यह जाने क्या पंगा...” तब तक पीहू ने डरते-डरते एक चिट उठा ली थी.
“खोलकर पढ़ो!” महिला ने आदेश दिया.
कांपते हाथों से पीहू ने चिट खोली. उन चंद सेकंड में ही हम सबकी सांसें ऊपर-नीचे हो गई थीं.
“नहीं भूलूंगी...” पीहू ज़ोर से ख़ुशी से चिल्लाई.
“उफ़!” मेरी रुकी हुई सांसें फिर से चलने लगी थीं. सबके चेहरों पर राहत के भाव उभर आए थे.
“अब तुम लोग निकल लो यहां से. इससे पहले कि और कोई पंगा हो.” नीति के कान में फुसफुसाते हुए मैंने करण को इशारा किया.
“ममा, मैं यह चिट कल यूनिफॉर्म में रखकर स्कूल ले जाऊंगी. यह मेरा लकी चार्म है!” पीहू अत्यंत उत्साहित हो गई थी. उसने चिट फिर से मोड़कर अपनी पॉकेट में डाल ली. उनके जाने के बाद मैं भी अस्पताल में लिए हुए अपने कमरे में जाकर सो गया.
सवेरे आंख खुली, तो सबसे पहले ईश्वर से यही प्रार्थना की कि आज मां का ऑपरेशन हो जाए. आईसीयू के बाहर पहुंचकर मैंने अटेंडेंट से जानकारी ली. अब तक स्टाफ के लोग भी मुझे पहचानने लगे थे. पता चला अभी की जांचों में तो सारे पैरामीटर सही आए थे. अब ओटी टेबल तक पहुंचने तक भी सभी सही रहे तो बात है. थिएटर में ले जाने से पूर्व मां को प्रसन्न देखा, तो मन में आस बंधी. मैं ऑपरेशन थिएटर के बाहर इंतज़ार में बैठ गया.
डॉक्टर के प्रयास और हमारी प्रार्थनाएं रंग लाईं. आख़िर मां का ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो ही गया. घर फोन करके बताया, तो नीति भी ख़ुश हो गई.
“आज का दिन वाकई बहुत अच्छा है. पीहू का एलोक्यूशन भी बहुत अच्छा गया. बता रही थी बीच में एक बार भी नहीं भूली. शायद कोई प्राइज़ भी मिल जाए.”
“अच्छा यह तो बहुत अच्छी बात है. मां को एक दिन कमरे में रखकर अगले दिन छुट्टी दे देंगे.” मैंने बताया.
रात में रुकने के ख़्याल से मैं दिन में घर आ गया था. नीति अस्पताल चली गई थी. रात को अस्पताल पहुंचा, तो नीति ने बताया, “अपने मिलनसार स्वभाव के कारण मां ने इन चंद दिनों में ही अस्पताल के स्टाफ से नज़दीकियां बना ली हैं. चूंकि अगले दिन डिस्चार्ज है, इसलिए आईसीयू के नर्स, वार्ड बॉय दिनभर कमरे में आकर मां से मिल रहे थे. मां भी ख़ुशी-ख़ुशी सबका हालचाल पूछ रही थीं. सबके जाने के बाद रात में मैंने मां से चुहल की.
“नीति बता रही थी आपने यहां भी सबसे दोस्ती कर ली है. दिनभर पूरा स्टाफ मिलने आता रहा. सबसे मिल ली ना आप? कोई छूट तो नहीं गया? कि कल घर पहुंचने पर वहां आ टपके.”
“मिल ली. बस आज सुबह वाली एक नर्स वापस दिखाई नहीं दी. उसे पहले भी कभी नहीं देखा था.”
“आ जाएगी सुबह हम लोगों के जाने से पहले. अब आप सो जाओ. पूरे दिन बहुत बतिया लिए. अब घर जाकर पूरा आराम करना है. मैं किसी को मिलने नहीं दूंगा आपसे.” मां को सख़्त हिदायत देकर मैं भी सो गया. सवेरे करण के आ जाने के बाद मैं डिस्चार्ज पेपर आदि क्लीयर करवाने के लिए नीचे रिसेप्शन पर जाने लगा, तो मां ने याद दिलाया.
“वह नर्स तो वापिस दिखी ही नहीं?”
“क्या नाम था?”
“पता नहीं.”
“ऐसे कैसे पता लगेगा मां? अच्छा देखते हैं.”
रिसेप्शन पर भीड़ थी. रिसेप्शनिस्ट ने कुछ देर इंतज़ार करने के लिए कहा. मैं पास ही सोफे पर बैठ गया. थोड़ा पीछे खिसका तो कुछ चुभा. मैंने हाथ डालकर निकाला. ‘अरे यह तो वह दूसरी वाली गुलाबी चिट है! लगता है उस दिन यहीं पड़ी रह गई.’ मैं डस्टबिन के लिए इधर-उधर नज़रें दौड़ाने लगा. तभी मां की पुकार सुनाई दी.
“रजत, मिल गई वह! देख, उधर कॉरिडोर में जा रही है.” व्हीलचेयर पर करण के साथ आई मां की नज़रें एक दिशा में पीछा कर रही थीं.
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“भइया, मां को किसी नर्स से मिलना है. आप मिलवा लाइए. यहां का काम मैं देखता हूं.” हाथ की चिट जेब में खिसका कर मां को लिए मैं कॉरिडोर में बढ़ गया.
“सुनिए, एक मिनट...” और उस महिला को रोक लिया. जैसे ही नज़रें मिलीं मैं चौंक गया. यह तो उस दिन वाली ही महिला है. मां इसे नर्स क्यों कह रही है? वह भी हंसते हुए मां से गले मिली. मां ने उसे ख़ूब-ख़ूब आशीर्वाद दिया कि उसकी वजह से ही वह ठीक हो पाई है. असमंजस की स्थिति में उससे विदा लेकर मैं मां को लिए रिसेप्शन पर आया और रिसेप्शनिस्ट से पूछा कि वह महिला कौन थी?
“कौन सी? मैंने नहीं देखी.” काम में लगी रिसेप्शनिस्ट ने सिर ऊपर उठाते हुए कहा.
“अरे वही, जो उस दिन यहां मेरी बेटी को मैजिक ट्रिक दिखा रही थी.”
“अच्छा वो! वो तो डॉक्टर अपर्णा हैं. हमारे हॉस्पिटल की मनोवैज्ञानिक डॉक्टर!”
मैं वस्तुस्थिति समझने का प्रयास कर रहा था कि करण ने मां की व्हीलचेयर थामकर गेट की ओर बढ़ाना आरंभ कर दिया.
“चलो भइया! हो गया सब.”
“हैं..!” मैं मानो नींद से जागा. फिर उनके साथ हो लिया. कैब की पीछे की सीट पर मां को बैठाकर मैं भी उनके पास ही बैठ गया. करण आगे बैठ गया था.
“मां, डॉक्टर अपर्णा के बारे में आप कुछ बता रही थी?”
“पता नहीं! क्या चक्कर है? सवेरे मेरे पास तो वह नर्स की ड्रेस में आई थी. अब सब उसे डॉक्टर क्यों कह रहे हैं? उसने ताज़ा फूलों का गुलदस्ता मेरे सिरहाने रखा. फिर मेरी चादर ठीक करते हुए मुझसे बतियाने लगी. ‘आज तो आपकी सर्जरी है. कौन डॉक्टर कर रहे हैं?’ मैंने बोल दिया, “डॉक्टर विनय गुप्ता.” तुम लोगों के मुंह से बीसियों बार यह नाम सुन चुकी हूं. वह चौंकी.
“नहीं नहीं कोई और डॉक्टर होंगे. डॉक्टर विनय गुप्ता तो बहुत ख्याति प्राप्त डॉक्टर हैं. लोगों को महीनों तक उनका अपॉइंटमेंट नहीं मिलता. वह कैसे आपकी सर्जरी के लिए तैयार हो गए?”
मैंने दोबारा सोचकर कहा, “नहीं नाम तो यही है.” वह आश्चर्यचकित रह गई.
“अच्छा, बहुत हैरानी की बात है!” अब आपको क्या बेस्ट ऑफ लक बोलें? उनका तो 100% सफल सर्जरी का रिकॉर्ड है!”
मैं हैरानी से मां की बात सुन रहा था. माना डॉक्टर विनय गुप्ता अच्छे डॉक्टर हैं. पर ऐसा अतिशयोक्तिपूर्ण कुछ मैंने तो उनके बारे में नहीं सुना था. ओह, तभी मां थिएटर में जाने से पूर्व बार-बार मुझसे पूछ रही थी कि डॉक्टर विनय गुप्ता ही उनकी सर्जरी कर रहे हैं ना? मतलब पेशेंट का मनोबल बनाए रखने के लिए मनोविज्ञान का सहारा लिया जा रहा है! गुड! सच है मन सभी के पास होता है. मगर मनोबल कुछ ही लोगों के पास होता है.
तभी मेरी जेब में रखा मोबाइल बज उठा. निकालकर देखा तो स्पैम था. मैं वापस मोबाइल जेब में रखने लगा, तो गुलाबी चिट हाथ आ गई जिसे मुझे डस्टबिन में डालना था. दिल अचानक तेज़-तेज़ धड़कने लगा. मैंने कांपते हाथों से मुड़ी-तुड़ी चिट खोली. मेरा अंदाज़ा सही था. उसमें चमक रहे दो शब्दों की चमक से मेरी आंखें चौंधियां गईर्ं- नहीं भूलूंगी. महज़ दो शब्द किसी की प्राणवायु बन गए थे. मुझे मानना पड़ा शब्दों का भी तापमान होता है. ये सुकून भी देते हैं और जला भी देते हैं.

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