कहानी- नई दिशा (Short Story- Nai Disha)

“आज यदि मैं इस मुक़ाम तक पहुंच पाई हूं, तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा योगदान मेरी उस सहेली का है, जिससे मेरा दर्द, मेरी मायूसी, मेरे जीवन की निराशा बर्दाश्त नहीं हुई और एक सच्चे मित्र की तरह उसने मुझे नई दिशा दिखाई… ”

Kahaniya

इस गणतंत्र दिवस पर सुमति को राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किया जा रहा था. उसके द्वारा पोलियो निवारण के लिए किए गए कार्यों के लिए उसे समाजसेवा के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका था. लेकिन आज उसे देश के सबसे बड़े पदाधिकारी द्वारा इस महान दिवस पर सम्मानित किया जा रहा था. मेरी ख़ुशी का तो जैसे ठिकाना ही न था. इतने बरस बीत गए, पर अब भी लगता है जैसे कल की ही बात है.

उस समय मैं कक्षा ग्यारहवीं में पढ़ती थी. पापा के ट्रांसफर के कारण अजमेर ज़िले के एक छोटे से कस्बे केकड़ी के नए स्कूल में पहला दिन था मेरा. बहुत छोटा-सा कस्बा था यह. स्कूल के नाम पर सरकारी स्कूल ही थे और किसी प्रकार के कोई प्राइवेट स्कूल नहीं थे. यूं तो मेरी रुचि साइंस में थी, लेकिन इस कस्बे में सभी लड़कियां आर्ट के ही विषय पढ़ती थीं. कॉमर्स और साइंस पर जैसे लड़कों का एकाधिकार था. मेरा स्कूल में नया-नया दाख़िला हुआ था, इसलिए मेरी कम ही सहेलियां थीं, लेकिन एक अच्छी सहेली थी- सुमति. अपने नाम की ही तरह अनमोल गुणों का ख़ज़ाना थी वह. ऐसा कोई काम नहीं था, जो उसे नहीं आता था. पढ़ाई, संगीत, गायन, कढ़ाई-बुनाई, गृहकार्य इत्यादि में अव्वल थी वो. उसके बनाए चित्र तो जैसे जीवंत हो उठते थे. वो न स़िर्फ मेरी सहेली थी, बल्कि एक प्रेरणास्रोत भी थी.

ईश्‍वर ने उसे सर्वगुण संपन्न तो बनाया था, पर उन सबके साथ उसके एक पैर को पोलियो का शिकार भी बना दिया था. हमारी दोस्ती में यह कोई अड़चन नहीं थी, लेकिन लोगों के ताने जब-तब उसे मायूस कर देते थे. वह हमेशा सोचती कि वह पोलियो की शिकार हुई, इसमें उसका क्या दोष? लेकिन उन दिनों यह माना जाता था कि पिछले जन्म के दुष्कर्मों के कारण इस जन्म में पोलियो होता है. यही कारण था कि उसके अपने रिश्तेदारों के मुंह से जब-तब खरी-खोटी निकल जाती थी और उसे मायूस कर देती थी.

वह जितनी अच्छी थी, उतनी ही भावुक भी थी. लोगों के ताने उसे अंदर तक झकझोर कर रख देते थे और वह मायूसी के अथाह सागर में डूब जाती. मैं अपनी सहेली को यूं दुखी देखकर भी कुछ नहीं कर सकती थी. मैंने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, “लोग तो कहते रहेंगे, दूसरों की बातों को दिल से नहीं लगाना चाहिए. जब तक तुम स्वयं को विकलांग न समझो, तुम विकलांग नहीं हो. तुम जितने गुणों से भरपूर हो, उतने गुण तुम्हारे अच्छे कर्मों का ही नतीजा हैं. पोलियो तुम्हें कमज़ोर नहीं बना सकता.” लेकिन मेरी बातों का उस पर कुछ असर नहीं होता. वो चुपचाप स्वयं को दोष देती रहती कि उसके पोलियोग्रस्त होने के कारण उसे और उसके माता-पिता को दूसरों की बातें सुननी पड़ती हैं.

यूं तो हर माता-पिता संतान का हित ही चाहते हैं, लेकिन यदि समाज भारतीय हो, तो एक विकलांग बेटी के माता-पिता को कितनी चिंताएं सताती होंगी, सुमति अच्छी तरह से जानती थी. उसकी मां को हर समय उसकी शादी की चिंता रहती थी. डर वाजिब भी था. कौन करेगा शादी एक विकलांग लड़की से! उनकी रूपवान व गुणवान लड़की की शादी किसी विकलांग, नेत्रहीन और विधुर से ही होनी थी, जो उन्हें अंदर ही अंदर कचोटता रहता था. उन्हें उसे पढ़ाना भी तो एक बोझ के समान लगता था, क्योंकि यदि वह ज़्यादा पढ़-लिख गई, तो शायद उसके माता-पिता के लिए उसके लायक लड़का ढ़ूंढ़ना बेहद मुश्किल हो जाएगा. माता-पिता की यह बेचैनी और ये आशंकाएं सुमति से छिपे नहीं थे, इसीलिए उम्र से कहीं ज़्यादा समझदार और दूरदर्शी बन गई थी वो. चाहकर भी हमउम्र लड़कियों की तरह सहेलियों के साथ बैठकर गप्पे लड़ाना, इधर-उधर की फ़िज़ूल की बातें करना उसके स्वभाव में नहीं था. वह अपनी सोच का साथी अपने चित्रों को ही बनाती और उसी में ख़ुश रहती. कक्षा में नई होने के कारण मैंने भी इस एकाकी, शांत और समझदार लड़की को अपनी सहेली बनाना मुनासिब समझा और कम बातें होते हुए भी हम दोनों के बीच अपनेपन का रिश्ता बहुत गहरा हो गया था. इसी वजह से जब भी उसे उदास पाती, तो मैं भी गुमसुम हो जाती.

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एक दिन पापा ने भांप लिया और मुझसे जानना चाहा कि आख़िर क्या कारण है मेरे यूं बार-बार उदास होने का. जब मैंने उन्हें सुमति के बारे में बताया, तो उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया और वादा किया कि वो ऐसा कोई उपाय ज़रूर ढूंढ़ निकालेंगे, जिससे सुमति की मायूसी दूर हो सके.

इस बीच हमारा सत्र बीत गया. एक बार फिर सुमति ने कक्षा में टॉप किया था. मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, पर यह ख़ुशी भी कुछ पलों के लिए ही थी. जैसे ही वो रिपोर्ट कार्ड लेकर बाहर निकली, वाणिज्य संकाय के कुछ छात्रों ने उसकी विकलांगता पर ताने कसने शुरू कर दिए. उसके चेहरे से मुस्कान यूं गायब हुई मानो मुस्कुराना कभी भी उसका हक़ नहीं था. मेरे लिए यह असह्य था. मैंने उन लड़कों को ख़ूब खरी-खोटी सुनाई, पर उनकी सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. जब तक सुमति और मैं घर तक नहीं पहुंचे, वो लड़के सायकिल पर हमारा पीछा करते रहे और तरह-तरह के ताने कसते रहे. मुझे लगा कि मैंने सुमति व अपनी परेशानी और बढ़ा दी है. आख़िर कर भी क्या सकते थे हम दोनों उन बदतमीज़ व बदमिज़ाज लड़कों का, जिन्हें उनके अपने परिवार और उससे भी बढ़कर इस सामाजिक व्यवस्था ने निरंकुश और नपुंसक बना दिया था.

मैंने घर पर आकर सारा क़िस्सा पापा को बताया. उन्हें उनके वायदे की याद दिलाई. कुछ ही दिनों बाद पापा ने देहरादून घूमने का प्लान बनाया. उन्होंने कहा कि मैं सुमति और उसके माता-पिता को भी देहरादून चलने के लिए कहूं. यूं भी सुमति को अकेले मेरे साथ भेजने के लिए उसके माता-पिता तैयार नहीं होते, इसलिए वो हमारे साथ चलने को तैयार हो गए, पर बहुत सारी मिन्नतों के बाद. लेकिन मैं ख़ुश थी, आख़िर मेरी इच्छा जो पूरी होने जा रही थी.

पापा के मित्र देहरादून के कलेक्टर थे. उन्होंने ही हमारे वहां ठहरने का इंतज़ाम किया था और वहां की कुछ संस्थाओं में हमारे भ्रमण की भी व्यवस्था करवाई थी. सबसे पहले हम एन.आई.वी.एच. (नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ विज़ुअली हैंडीकैप्ड) गए, जहां पर अनेक जन्मांध लोग अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं. आंखों में अंधेरे के बावजूद वहां हरेक की ज़िंदगी में उम्मीद का उजाला था. काले घने अंधेरे के बावजूद अपने लिए एक नई राह तलाशना उन्हें आता था. उनकी कठिनाइयां सुमति से कहीं बड़ी थीं, पर मायूसी की चादर ओढ़कर बैठने की बजाय वो अपनी कठिनाइयों का मुक़ाबला करने के लिए हर पल मुस्कुराते हुए तैयार रहते थे. हर चेहरे पर ज़िंदगी को मुस्कुराकर जीने का जज़्बा खिलखिलाता था.

उसके बाद हम राफेल संस्थान गए, जहां पर मंदबुद्धि बच्चों को पढ़ाया जाता था. इनमें कई वयस्क भी थे, जो बाल्यकाल से ही इस संस्था में प्रशिक्षण प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनने में क़ामयाब हुए थे. इस संस्था में लाइब्रेरियन के तौर पर काम करनेवाली महिला एक दिन इसमें पढ़नेवाली मानसिक रूप से अक्षम बच्ची थी, जिसे उसके माता-पिता ने छोड़ दिया था. उन भोले-मासूम बच्चों में सीखने की इतनी ललक और जिज्ञासा थी कि कोई भी अपने बचपन की मधुर स्मृतियों में खो जाए.

बाद में हम विकलांग बच्चों की ऐसी संस्था में गए, जहां पोलियो या किसी हादसे के कारण विकलांग हुए कई बच्चे एक साथ रहते थे और किसी कौशल में प्रशिक्षण प्राप्त करते थे. वहां जो हमने देखा, उसे देखकर हमारी आंखें भीगे बिना नहीं रह सकीं. एक कमरे में संजू नाम का एक लड़का पेंटिंग बना रहा था. उसके दोनों हाथ और पैर एक सड़क हादसे में कट गए थे, लेकिन मुंह में पेंसिल रखकर भी वो बहुत ख़ूूबसूरत पेंटिंग बना रहा था. वहां खड़ी एक टीचर ने बताया कि संजू को बचपन से ही पेंटिंग का बहुत शौक़ था, इसलिए जब इसके हाथ-पैर दोनों कट गए, तब भी इसने अपने शौक़ को नहीं छोड़ा और मुंह में पेंसिल रखकर भी वो ऐसी पेंटिंग बनाता है कि लोग दांतों तले उंगली दबाने को विवश हो जाएं. आज संजू की देशभर में कई पेंटिंग एक्ज़ीबिशन लग चुकी हैं.

सुमति और उसके माता-पिता इन बच्चों की ऐसी जीजिविषा देखकर अचम्भित थे. उन्हें भी यह प्रेरणा मिली कि अपनी बेटी को एक बोझ मानने की बजाय उसकी क्षमताओं और सामर्थ्य को बढ़ाने की ओर ध्यान देना चाहिए. उस एक दिन ने सुमति और उसके परिवार की सोच पूरी तरह बदल दी. पापा ने अपना वादा भली-भांति निभाया था, उन्होंने मेरी सहेली की निराशा को जिस तरह आशा में बदल दिया, वह सोचकर ही मेरा मन आह्लादित हो उठता है.

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अब यदि कोई सुमति को उसकी विकलांगता की याद दिलाता, तो वह उन जन्मांध, मंदबुद्धि, विकलांग बच्चों, विशेषकर संजू के जीवन के सकारात्मक पहलुओं को याद कर और आत्मविश्‍वासी हो जाती. ज़िंदगी जीने का उसका हौसला और बढ़ जाता. उसने ठान लिया कि वह अपना सारा जीवन असहाय माने जानेवाले विकलांग बच्चों को सशक्त बनाने में लगाएगी. अब सुमति के माता-पिता भी इस कोशिश में उसके साथ थे. आज जब उसे उसके प्रयासों के लिए सम्मानित किया जा रहा है, तो मेरी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं है.

समारोह में दिए भाषण में उसने कहा, “आज यदि मैं इस मुक़ाम तक पहुंच पाई हूं, तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा योगदान मेरी उस सहेली का है, जिससे मेरा दर्द, मेरी मायूसी, मेरे जीवन की निराशा बर्दाश्त नहीं हुई और एक सच्चे मित्र की तरह उसने मुझे नई दिशा दिखाई… उस दिन से मैंने ठान लिया कि मैं भी हरसंभव कोशिश करूंगी कि मेरे जैसे हताश, मायूस विकलांग लोगों को मज़बूत और समर्थ बनाने का बीड़ा उठा सकूं. मेरी सहेली ने एक सुमति को नई दिशा दिखाई, ताकि मैं कई सुमतियों के जीवन की बैसाखी को फिर से चलायमान कर सकूं…”

मैं उसे बोलते देख भावविभोर थी. आज मेरी मित्रता गर्व की किसी भी सीमा को नहीं पहचानती थी. मैं जानती हूं कि उसकी इस सफलता के पीछे अकेले मेरा योगदान नहीं था, बल्कि मैंने जो किया स्वयं के लिए किया. आख़िर उसे दुखी देखकर मैं ख़ुश कैसे रह सकती थी. फिर जीवन के लिए एक नई सोच, नया रास्ता, तो स्वयं सुमति ने तलाशा और अकेले अपने दम पर तय किया था.

Nidhi Choudhary

     निधि चौधरी

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