कहानी- पाखी (Short Story- Pakhi)

कहानी- पाखी (Short Story- Pakhi)

हम शहर से बाहर निकल आए, तब तक वह बिन बोले ही बैठी रही. मैंने उस मौन को भंग करने के लिए गाने की सीडी लगा दी. ‘छुपा लो मन में यूं प्यार मेरा…’ हेमंत कुमार की आवाज़ कार के भीतर तैर गई. उसने मेरी ओर भरपूर नज़र से देखा, उसकी पसंद याद रखने के लिए धन्यवाद दे रही हो जैसे. पर रही वह चुप ही. कितना बोलती थी पहले. आज उसके मुख से शब्द निकलवाना भी कठिन हो रहा था. वर्षों बाद मिले थे हम, पर प्रेम के रिश्ते कभी मरते हैं क्या? मुरझा सकते हैं क्या? मैंने ज़बर्दस्ती उन्हें सुला रखा था, पर मन के भीतर सांस ले रहे थे वह, आज भी.

मैं अस्पताल के लिए निकलने ही वाला था कि टेलिफोन की घंटी बजी. मैंने जब तक जूते पहने मां टेलिफोन पर बात करने लगीं. उनकी बातों से यूं लगा जैसे कोई दुखद घट गया है. मैं जाते-जाते रुक गया. पता चला कि चंडीगढ़वाले मौसा की ह्रदयाघात से मृत्यु हो गई है अकस्मात् ही. अभी तो उनकी ख़ास उम्र भी नहीं थी. उनके पिता भी जीवित थे अभी. वैसे तो मां स्वयं चंडीगढ़ जातीं, पर एक महीना पूर्व ही उनके घुटने की सजर्री हुई थी अत: उनका जाना संभव नहीं था.
मैंने उनसे कहा, “इस वक़्त तो मेरा अस्पताल जाना आवश्यक है, क्योंकि मरीज़ों को समय दे रखा है. बारह बजे तक आप ड्राइवर के हाथ मेरा बैग बनाकर भेज देना मैं सीधा वहीं से निकल जाऊंगा.
मां की देखरेख के लिए एक स्त्री थी और दीदी का घर भी पास ही था.
ठीक समय पर ड्राइवर आ गया, पर मुझे निकलने में एक बज ही गया. मुझे लगा कि आज ही लौटना संभव नहीं हो पाएगा, अत: मैंने ड्राइवर को घर भेज दिया और चंडीगढ़ जाने के लिए निकल पड़ा.
दरअसल, उमा मौसी मां की सगी बहन नहीं हैं. ममेरी-चचेरी भी नहीं. मां का जब विवाह तय हुआ, तब पापा चंडीगढ़ में नौकरी कर रहे थे. मां को इस बात से थोड़ा सुकून मिला कि उनके स्कूल के समय की संगिनी उमा भी चंडीगढ़ में ही रहती थीं. एक वर्ष पूर्व ही हुआ था उसका विवाह. नए शहर में उनके होने से मां और नानी दोनों को बहुत तसल्ली हुई.
पापा को प्रायः ही दफ़्तर के काम से शहर के बाहर जाना पड़ता था, सो उन्होंने कुछ अरसे बाद उमा मौसी के क़रीब ही घर ले लिया, जिससे वह मां की तरफ़ से थोड़ा निश्चिंत हो गए थे. हम बच्चे भी लगभग बराबर के ही थे. सबसे बड़ी मेरी दीदी और फिर मौसी का बेटा मधुकर. उससे दो वर्ष छोटा मैं और मुझसे भी दो वर्ष छोटी मौसी की बेटी पाखी.
हम बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते थे, अत: आना-जाना संग ही होता. पाखी चूंकि सबमें छोटी थी, सो हम सब ही उसके अभिभावक बने हुए थे. यूं भी वह नरम-नाज़ुक सी थी और घर से निकलते वक़्त मौसी बोल ही देतीं, “पाखी का ख़्याल रखना.”
दोनों सखियों का प्यार बरक़रार रहा, प्रगाढ़ ही होता गया. दुनिया आधुनिक हो चुकी थी, परन्तु हमारे परिवार अभी अछूते थे नई हवा से. संस्कारित परिवारों में सहज रिश्ते ही बन जाते हैं. सहज और आत्मीय. उमा मौसी हम भाई-बहन की मौसी बन गईं और हमारी मां उन के बच्चों की. घर के पुरुष अपने-अपने व्यवसाय में व्यस्त रहते थे.
पाखी के पापा सरल ह्रदय और ख़ामोश प्रवृत्ति के थे. वह परिवार के मामलों में कुछ भी दख़लअंदाज़ी नहीं करते थे. दीदी का विवाह हो गया और मौसी का बेटा मधुकर बारहवीं पास कर इंजीनियरिंग करने चला गया. मेरा ध्येय मैडिकल में जाने का था और उसके लिए अभी दो वर्ष स्कूल में पढ़ना बाक़ी था. मधुकर के जाने के बाद मैं मौसी के बाहर के छोटे-मोटे काम निबटा देता और कोई विशेष पकवान बनाते समय मां पाखी को बुला लेतीं. अब मैं ही पाखी का अभिभावक था. स्कूल के अलावा उसे कहीं जाना होता, तो भी मौसी मुझसे कहतीं. पाखी की तरफ़ के इस सुरक्षात्मक रवैये में कब प्यार का अंकुर फूटा, नहीं जानता, पर एक बार अंकुर फूटने के बाद वह बेल धीरे-धीरे बढ़ रही थी, बिना महसूस किए बढ़ रही थी, निशब्द बढ़ रही थी.
मुझे दिल्ली के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया. महीने दो महीने में मेरा घर का चक्कर लग ही जाता. पाखी के संग टेलिफोन पर भी बात होती रहती थी. ऐसा नहीं कि मौसी यह सब जानती नहीं थीं, पर उन्होंने कभी कोई आपित्त नहीं जताई. मां को तो यूं भी पाखी से बहुत लगाव था.
बच्चों का विवाह तय करने से पूर्व अच्छी तरह जांच-पड़ताल करनी पड़ती है, पर यहां तो सब कुछ देखा-परखा हुआ था. पाखी का एमए पूरा हो जाने पर सगाई की सोची गई. पाखी के दादाजी क़स्बेवाले घर में अपने बड़े बेटे के पास रहते थे. बहुत बुलाने पर ही कभी चंडीगढ़ का चक्कर लगाते. सगाई की रस्म के पूर्व उनकी अनुमित लेना आवश्यक थी. पर लगा यह मात्र बड़ों को सम्मान देनेवाली औपचारिकता मात्र ही है.

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परन्तु उन्होंने तो आते ही इस संबंध को सिरे से नामंज़ूर कर दिया. उनकी पोती का विवाह एक गै़र ब्राह्मण परिवार में हो रहा है यह सुनते ही वह भड़क उठे. यह वही दादाजी थे जिनकी गोदी में मैं बचपन में अधिकारपूवर्क बैठ जाया करता था. परन्तु उनका कहना था कि इस ज़माने में मिलना-जुलना तो उन्होंने स्वीकार कर लिया है, पर शादी-ब्याह का तो प्रश्न ही नहीं उठता. वह महीनेभर चंडीगढ़ रुके रहे और न केवल पाखी का उन्होंने अपने समाज में संबंध तय कर दिया, दो महीने के भीतर विवाह का मुहूर्त भी निकलवा लिया था.
मेरा सपना बेआवाज़ ही टूट गया. यह कैसा सामाजिक नियम था, जो मानवीय अधिकारों को पूरी तरह नकार रहा था. पाखी के पिता सारे क़िस्से में तटस्थ बने रहे. हमारे पक्ष में कुछ नहीं बोले. आखिर अभी तक तो अपनी मौन स्वीकृति दे ही रखी थी न. यदि वह थोड़ा-सा भी विरोध करते, तो शायद दादाजी अपनी मनमानी नहीं कर पाए होते.
मैं जब मौसी के घर पहुंचा, तो सांझ घिर आई थी. वह लोग श्मशान से लौटकर नहा-धो चुके थे और दो-चार के ग्रुप में बैठे आपसी दुख-सुख बांट रहे थे. मेरे आने पर सब ने बारी-बारी नज़रें उठाकर मेरा मुआइना किया और मेरे भीतर आने की राह बना दी. जानता तो था कि मौसी व्हीलचेयर पर हो गई हैं, फिर भी उन्हें यूं देखकर झटका लगा. मैं मौसी से गले मिला और वहीं उनके पास नीचे बैठ गया.
इस आकस्मिक झटके ने सब को मौन कर दिया था. मृत्यु ने कमरे में चुप्पी की एक अदृश्य चादर-सी फैला रखी हो जैसे.
राह भर पुराने दिन मस्तिष्क में घूमते रहे थे, जिनमें पाखी का चेहरा प्रमुख था. वही रील फिर से चलने लगी. भोली-सी शक्लवाली पाखी, बच्चों-सा खिलखिला कर हंसनेवाली पाखी, हरदम अवलम्बन खोजती पाखी. इधर-उधर नज़र घुमाई, पर वह नहीं दिखी. कुछ देर बाद ठीक मेरे पीछे धीमी-सी आवाज़ आई, “चाय.”
सिर घुमाया तो पाखी ही थी, पर कितनी बदली हुई. मैं हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ. उसके हाथ से चाय लेकर पास रखी कुर्सी पर बैठ गया. मेरी पसंद की चाय थी, कड़क और कम शक्करवाली. पाखी मां के पास बैठी कैसी रोगिणी-सी लग रही थी. नहीं! सिर्फ़ पिता की मृत्यु उसका कारण नहीं हो सकता. एक ही दिन में किसी का वज़न कम नहीं हो जाता.
रात होने तक काफ़ी लोग अपने घरों को लौट गए थे. बाकियों के सोने का प्रबंध किया जा रहा था. एक कमरे में पुरुष, दूसरे में स्त्रियां. मुझे सुबह जल्दी लौटना था, सो मुझे मौसी ने घर के आगेवाले कमरे की ओर इंगित करते हुए कहा, “वहां लगा है तुम्हारा बिस्तर. थक चुके हो, जा कर लेट रहो.” वहां जाकर देखा, तो एक पलंग पर दादाजी सो रहे थे, दूसरे पर मेरे लिए बिस्तर लगा था.
मैं चुपचाप लेट गया और सोने का उपक्रम करने लगा. नींद कहां से आती. बहुत कुछ था मस्तिष्क में.
रील फिर से चल पड़ी. पीछे छूट गए बचपन की ख़ुराफ़ातों के दिन, पाखी के संग बताए दिन. भविष्य के सपने देखते दिन.
यही दादाजी हैं, जिनकी गोद में मैं अधिकारपूवर्क चढ़कर बैठ जाया करता था, विशेषकर जब वह कुछ खा रहे होते. भरपेट भोजन कर लेने के बाद भी मुझे उनकी थाली से खाना अच्छा लगता था और वह जानते थे कि मैं मीठे का बहुत शौकीन हूं. वह अपने हाथ से मेरे मुंह में मीठा डालते. पढ़ाई में मेरी लगन देखकर बहुत ख़ुश होते. मुझे ‘पढ़ लिख कर बड़ा आदमी’ बनने का आशीर्वाद देते. जब मेरा दाख़िला दिल्ली के एम्स में हुआ, तो वह अपने हर मिलनेवाले को मेरे बारे में गर्व से बताते.

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और तब भी यही दादू थे, जो पाखी से मेरे विवाह के बीच दीवार बनकर खड़े रहे थे.
स्नेह-दुलार एक तरफ़ और विवाह संबंधों के स्थापित मानदंड अलग. पूरी आयु जिन रूढ़िवादी विचारों को निभाते आये थे उन पर समझौता करने को क़तई तैयार नहीं थे वह.
थका होने के बावजूद और प्रयत्न करने पर भी मुझे नींद नहीं आ रही थी. एक मलाल यह भी था कि पाखी से बात नहीं हो पाई थी. यह बात अलग है कि बात करके भी क्या होता?
मैंने महसूस किया कि दादू भी हर थोड़ी देर में करवट बदल रहे हैं. उन्हें भी शायद नींद नहीं आ रही. कुछ समय बाद धीमी-सी एक आवाज़ आई, “मिट्ठू” मेरे बचपन का नाम! एक बार लगा मुझे भ्रम हुआ है शायद. अपने ही पलंग पर लेटे हुए मैंने उनकी तरफ़ मुंह कर लिया. थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर से मेरा नाम लिया, इस बार थोड़ा स्पष्ट. मैं उठकर उनके पलंग पर आ बैठा, ताकि उनकी बात सुन सकूं. बचपन का वह लगाव अभी गया नहीं था.
“मुझे मुआफ़ कर सकोगे मिट्ठू? मैं तुम्हारा अपराधी हूं.”
मैंने उनका झुर्रियोंवाला दुबला-पतला हाथ अपने दोनों हाथों के बीच रखकर हौले से दबाया. बड़ी कठिन मांग थी. जिनके कारण मेरे सब सपने ध्वस्त हो गये थे, मेरे जीवन की गाड़ी पटरी पर से उतर गई थी, इस एक वाक्य से सब भूल जाऊं? मेरे लिए वह घटना अतीत का हिस्सा नहीं बन पाई थी. मैं आज भी उनके इसी विरोध को जी रहा था.
यदि मैंने किसी और से विवाह कर अपना घर बसा लिया होता, तो शायद टीस इतनी गहरी न होती.
पर कहां कर पाया था मैं ऐसा? मैं देर तक उनका हाथ अपने हाथों में लिए चुपचाप बैठा रहा. कुछ भी न कह पाया.
मुझे पाखी से बात न हो पाने का मलाल तो था ही. वैसे तो शायद हिम्मत न भी कर पाता, परन्तु जब दादाजी ने बात छेड़ ही दी थी, तो मैंने भी पूछ लिया, “पाखी ख़ुश तो है न?”
उतर में वह चुप ही रहे. पर मैं बात को अधूरी नहीं छोड़ना चाहता था, अत: फिर से जोड़ा, “मैं इसी बात से संतुष्ट हूं कि पाखी ख़ुश है.”
“वह खुश होती, तो मुझे इतना मलाल न होता. अपनी ज़िद का फल मिला है मुझे. समाज मनुष्यों ने ही बनाया है, तो समय के अनुसार उस में बदलाव लाने की ज़िम्मेदारी भी तो…”
पर यह सब सुनने का धैर्य नहीं था मुझमें. मैंने बात काटते हुए पूछा, “क्या हुआ? क्या परेशानी है पाखी को? मुझे आज वह कुछ बीमार-सी लगी. मैंने सोचा पिता को असमय खो देने के कारण ऐसी लग रही है शायद.”
“कुछ मत पूछो बेटे. बासी पड़ गई परंपराओं की ख़ातिर मैंने अपने बच्चों की ख़ुशियां छीन लीं. उसी का दंड भोग रहा हूं.” रुक-रुककर बोल रहे थे वह.
“दामादजी के ह्रदय में छेद है. दवा तो चल रही है, पर कहते हैं ऑपरेशन करवाना होगा.भाई बाहर जा कर बस गया है और मां व्हीलचेयर पर है. कौन करे उसके लिए भागदौड़?”
फिर कुछ रुककर बोले, “इसी से अभी आ भी नहीं पाए हैं. पाखी को भी सुबह तड़के निकलना होगा.”
“मैं सुबह सात बजे जाने की सोच रहा हूं. चाहें तो मेरे साथ भेज सकते हैं.” मैंने निर्णय उन्हीं पर छोड़ दिया था.
सुबह तैयार होकर जब मैं बाहर निकला, तो पाखी अपना बैग लेकर वहां पहले से ही खड़ी थी चुपचाप. मैं कार में जा बैठा, तो भी वह वहीं खड़ी रही. मुझे ही उसे आवाज़ देकर बुलाना पड़ा. हम शहर से बाहर निकल आए, तब तक वह बिन बोले ही बैठी रही. मैंने उस मौन को भंग करने के लिए गानों की सीडी लगा दी. ‘छुपा लो मन में यूं प्यार मेरा…’ हेमंत कुमार की आवाज़ कार के भीतर तैर गई. उसने मेरी ओर भरपूर नज़र से देखा, उसकी पसंद याद रखने के लिए धन्यवाद दे रही हो जैसे. पर रही वह चुप ही. कितना बोलती थी पहले. आज उसके मुख से शब्द निकलवाना भी कठिन हो रहा था. वर्षों बाद मिले थे हम, पर प्रेम के रिश्ते कभी मरते हैं क्या? मुरझा सकते हैं क्या? मैंने ज़बर्दस्ती उन्हें सुला रखा था, पर मन के भीतर सांस ले रहे थे वह, आज भी.

“कैसी हो?” मैंने पूछा.
धीरे से बोली, “ठीक हूं.”
“बात भी नहीं करोगी मुझसे?” मैने पूछा.
“क्या बोलूं? अपराधिनी हूं तुम्हारी.”
“पर मैंने तो इस तरह से कभी नहीं सोचा. मेरे तुम्हारे हाथ में था क्या? मैने कभी तुम्हें दोषी नहीं ठहराया.”
“दोष नहीं था, तो सज़ा क्यों मिली हमें?”

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इस प्रश्न का उत्तर, तो हम दोनो के पास नहीं था.
पाखी को उसके घर उताराने के लिए रुका. उसके पति सुबोध से मुलाक़ात करने भीतर भी गया. पाखी फटाफट चाय-नाश्ता बना लाई.
दिल्ली के अनेक डाॅक्टरों से मेरा परिचय था. मैंने सुबोध के रोग की विस्तार से जानकारी ली और हर संभव सहायता करने की ठानी. मैंने उनसे पुरानी रिपोर्ट इत्यादि सब काग़ज़ लिए और दिल्ली पहुंचते ही डाॅक्टर से समय लेकर उन्हें सूचित कर दिया. और दिल्ली पहुंचने को कहा.
मैंने और दीदी ने मिलकर एक कमरा उन दोनों के ठहरने के लिए तैयार कर दिया. इतना तो मैं भी जानता कि ऑपरेशन होगा और लंबा रुकना पड़ेगा.
दीदी समझती थी मेरे मन की उथल-पुथल को. उसने पाखी और उसके पति को अपने घर ठहराने की पेशकश भी की. पाखी उसके लिए अनजान थोड़े ही थी. मैंने ही मना कर दिया. मां और दीदी की नज़रें अक्सर मेरे चेहरे पर कुछ खोजती-सी लगतीं. परन्तु मैंने अपने मन को एक मज़बूत बक्से में बंद कर रखा था.
पाखी आई थी मेरे घर. मैंने यही तो चाहा था न! पर न ढोल बजे, न शहनाई. कार रुकने पर पहले तो मेरा हाथ स्वयं बढ़ गया उतरने में उसकी सहायता करने के लिए पर समय रहते मुझे ध्यान आ गया और मैं पीछे हट गया.
मैंने एक सप्ताह की छुट्टी ले रखी थी. और इन लोगों के साथ लगा रहा. ऑपरेशन हुआ और सफल रहा. बस अब कुछ दिन आराम की ज़रूरत थी. मैं उन दोनों को अपने घर ले आया. एक सप्ताह बाद एक बार फिर से चेकअप करवाना था. उसके बाद ही वह घर जा सकते थे. कैसी परीक्षा के दिन थे वह मेरे लिए?
सप्ताह बाद मेरा ड्राइवर छोड़ आया उन दोनों को उनके अपने घर. हां, वही घर था अब पाखी का.
जिसे हम दिल से प्यार करते हैं, तो उसे ख़ुश ही देखना चाहते हैं न! और पाखी की ख़ुशी अब वहीं अपने पति के संग हैं, इस बात को मैं कैसे भूल सकता हूं?
प्रेम में पूर्णरूपेण पा लेने की शर्त कहां लिखी है? कृष्ण की दीवानी राधा क्या अपना घर छोड़ आ गई थी कृष्ण के पास?
कृष्ण ने क्या ऐसी कोई अपेक्षा भी की थी?

Usha Wadhwa
उषा वधवा

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