कहानी- सच्चा सुख (Short Story- Sachcha Sukh)

 

एक कोने में खड़ी मैं ये सब देख-सुन रही थी. मेरी बेटी का भविष्य मुझे अपने सामने दिखाई दे रहा था. कमरे में आई तो आहट से सुमित जाग गये थे. जब उन्होंने पूछा कि मैं कहां थी, तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. आज मैं जीत और हार दोनों को एक साथ देख रही थी. तब हम दोनों ने मिलकर एक फैसला किया.

Short Story

“मनीषा, तुम्हारा फ़ोन है, जल्दी आओ.” सुमित की आवाज़ आयी. मेरी बचपन की सहेली तान्या का फ़ोन था.

“हेलो.”

“हाय मनीषा, कैसी हो?”

“तान्या मैं तो बिल्कुल ठीक हूं, पर तू कैसी है? आज कितने समय के बाद तेरा फ़ोन आया है… कहां है तू?”

“मैं बिल्कुल ठीक हूं.” तान्या ने कहा. “अभी कुछ दिन पहले ही लंदन आयी हूं. मां से तो मिल चुकी थी, अब मैं शिमला आ रही हूं. रोहन का कुछ काम भी है और तुझसे मिल भी लूंगी. मनीषा, एक ह़फ़्ते के लिए किसी अच्छे होटल में मेरे लिए कमरा बुक कर देना प्लीज़.”

“होटल में नहीं तुझे मेरे घर पर रुकना होगा, समझी.” मैंने तान्या पर दोस्ती का अधिकार जताते हुए कहा.

“पर तुझे कुछ परेशानी तो नहीं होगी?” तान्या कुछ झिझकते हुए बोली.

“नहीं यार, अच्छा बता… तू कब आ रही है?”

“परसों शाम तक.”

“ठीक है, मैं तेरा इन्तज़ार करूंगी.”

तान्या से बात करके अच्छा लगा. सारा काम करके जब सोने के लिए गयी तो नींद कोसों दूर थी. धीरे-धीरे तान्या के साथ बिताया हर लम्हा याद आने लगा. वो बचपन के दिन, स्कूल की शरारतें, कॉलेज का साथ और हमारी शादी…. कुछ दिनों तक हम एक-दूसरे से मिलते रहे, पर फिर सम्पर्क के तार टूटने लगे. एकाध बार फ़ोन पर भी बातें हुईं… पर हमारी दोस्ती नहीं टूटी. तान्या के लिए कमरा ठीक किया. उसकी पसंद की ज़्यादातर चीज़ें मैंने तैयार कर ली थीं. अब तो बस उसी का इंतज़ार था. तभी डोरबेल बजी. दरवाज़ा खोला तो सामने सुमित के साथ तान्या खड़ी थी. उसे देखकर इतनी ख़ुशी हुई कि न तो उसे गले लगा पाई और न ही अन्दर आने के लिए कह पाई. मेरे कंधे पर हाथ रखकर सुमित ने मेरा ध्यान भंग किया. मैंने तान्या को गले लगा लिया.

फिर तो हमने ढेर सारी बातें कीं- अपने बचपन की बातें, शरारतें और वो बातें जो अचानक ही हमारे चेहरे पर हंसी ले आतीं. तान्या से रोहन के बारे में पूछा, तो तान्या ने बताया- शादी के 4 साल बाद वह और रोहन लंदन चले गए. वहां पर रोहन का व्यवसाय बहुत अच्छा चल रहा है. लंदन के रईस लोगों में उनकी गिनती होती है. फिर वो अपनी हाई सोसायटी की बातें बताने लगी.

पता नहीं क्यों, मुझे यूं लगा जैसे तान्या कुछ बदल-सी गई है. हो सकता है बहुत समय बाद मैं तान्या से मिली थी, इसीलिए मुझे  ऐसा लग रहा हो. शाम को सुमित का फ़ोन आया तो उसने कहा कि खाना बाहर खा लेंगे. इसी बहाने तान्या घूम भी लेगी.

सुबह सुमित को जल्दी क्लीनिक जाना था, इसीलिए जल्दी उठकर नाश्ता बनाया. कामवाली आयी तो सारा किचन साफ़ करवाया. तान्या ये सब देख रही थी. अचानक वह बोली, “एक बात कहूं मनीषा, तुम घर का सारा काम करती हो, नौकर क्यों नहीं रख लेती?”

“बस यूं ही…. मुझे ख़ुद काम करना अच्छा लगता है.”

“घर का काम, बाहर का काम, क्या तुम अकेले थक नहीं जाती?”

“नहीं तो.”

“मुझे यक़ीन नहीं होता कि तुम वही मनीषा हो, जिसका काम करने के लिए नौकर आगे-पीछे घूमा करते थे. कहां गयी वो मनीषा? लेकिन तुम्हीं ने अपना भाग्य बनाया है. तुम्हारे माता-पिता तुम्हारी शादी एक ऊंचे और रईस घर में कराना चाहते थे. पर तुमने साफ़ मना कर दिया और ज़िद पकड़ ली कि तुम सुमित से ही शादी करोगी. इसी वजह से तुम्हें घर छोड़ना पड़ा. जब तुम्हारी और सुमित की शादी हुई, उस समय सुमित ने प्रैक्टिस शुरू ही की थी. तुमने अपनी ज़िंदगी के सुनहरे दिन संघर्ष में गंवा दिये. हालांकि आज तुम्हारे पास बहुत कुछ है फिर भी वो नहीं है, जो होना चाहिए था. क्या मिला तुम्हें मनीषा?”

“तान्या छोड़ ना, तू भी क्या बातें ले बैठी.”

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“नहीं मनीषा, तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है, आज तुझे एक बात बताती हूं. बचपन में जब मैं तेरे घर आती थी, तो उस ऐशो-आराम की ज़िंदगी को देखकर सोचती थी कि काश, मेरे पास भी वो सब कुछ हो, जो तेरे पास है. फिर रोहन से मेरी शादी ने तो मेरी क़िस्मत ही बदल दी. आज मेरे पास मेरी चाहत से बहुत ज़्यादा है. यदि उस समय तूने भी अपने पिताजी की बात मान ली होती तो…”

“तो मैं इस तरह घर का काम नहीं कर रही होती. है ना…”

“मनीषा, तू बिल्कुल नहीं बदली.”

“पर तू ज़रूर कुछ बदल गयी है तान्या, पहले से मोटी हो गयी है.” मैंने बात बदलते हुए कहा, तो दोनों को हंसी आ गयी और वातावरण फिर से सहज हो गया.

“चल मनीषा, मार्केट चलते हैं, थोड़ी-सी शॉपिंग भी हो जाएगी.” तान्या ने कहा.

“ठीक है, मैं तैयार हो जाती हूं.”

तभी डोरबेल बजी, दरवाज़ा खोला तो सामने अक्षय और गौरी खड़े थे. दोनों मम्मी-मम्मी कहते हुए ऐसे चिपक गए, मानों बरसों बाद मुझसे मिल रहे हो. दोनों 4 दिन पहले ही तो टूर पर गये थे. अक्षय ने इंजीनियरिंग की और गौरी मेडिकल की तैयारी कर रही थी.

“कौन है मनीषा?” तान्या ने अन्दर से पूछा.”

“बच्चे घर वापस आये हैं, तान्या हम शाम को चलेंगे.”

“अरे…. अक्षय और गौरी कैसे हो तुम लोग?”

“हम ठीक हैं, आप तान्या मौसी ही हो ना? मम्मी ने आपके बारे में काफ़ी बातें बतायी हैं.” गौरी और अक्षय दोनों तान्या से बातें करने लगे.

“अच्छा भई, फ्रेश हो जाओ, मैंने तुम दोनों की पसंद का खाना बनाया है, चलो जल्दी करो.”

“मम्मी, हमें आपकी और पापा की बहुत याद आयी.”

“बेटा, मुझे और तुम्हारे पापा को भी तुम्हारी बहुत याद आती थी. अच्छा ये तो बताओ, तुम्हारा टूर कैसा रहा?”

“बहुत अच्छा, बहुत मज़ा आया.” गौरी ने ख़ुश होते हुए कहा. फिर नाश्ता करते हुए दोनों बच्चे अपनी-अपनी बातें बताने लगे कि उन्होंने चार दिन में क्या-क्या किया.

अचानक तान्या बोली, “ये दोनों चार दिन के लिए बाहर गये और तुझे इस तरह से बातें बता रहे हैं जैसे छोटे बच्चे स्कूल से आकर बताते हैं. और लगता है छोटे बच्चों की तरह ही ये दोनों तुझसे दूर भी नहीं रह सकते. है ना मनीषा.”

“हां तान्या, तू ठीक कह रही है. ना तो ये हमारे बिना रह सकते हैं और ना हम इनके बिना. अक्षय की तो ठीक है, पर जब गौरी की शादी हो जाएगी तो कैसे रहेंगे इसके बिना, सोचकर ही दिल घबराने लगता है. अच्छा तान्या, तुषार कैसा है? क्या कर रहा है?”

“तुषार रोहन के साथ बिज़नेस में हाथ बंटाता है. रोहन की तरह उसे भी काम की बहुत समझ हो गयी है.”

रात को मैं और तान्या बातें कर रहे थे. बातों-बातों में तान्या ने गौरी और तुषार के रिश्ते की बात की. “मनीषा, मुझे गौरी बहुत पसंद है और तुषार के लिए वह पऱफेक्ट है. क्या कहती हो?”

“तान्या, मैं अभी कुछ नहीं कह सकती हूं. सुमित से बात करके बताऊंगी.”

अगले दिन सुमित क्लीनिक नहीं गये. तान्या को भी वापस जाना था.

तान्या को लंदन गये तीन महीने हो चुके थे. एक दिन सुमित बड़े ख़ुश होते हुए घर वापस आये. जब मैंने उनसे पूछा तो सुमित ने बताया, “एक रिसर्च के लिए उसे दोबारा लंदन जाना है. पंद्रह दिन लग जायेंगे. एक व्यक्ति साथ जा सकता है, तो मैं सोच रहा था कि तुम साथ चलो.”

“नहीं सुमित, बहुत ख़र्चा होगा. आप ही जाइए और वैसे भी एक बार तो मैं हो आयी हूं.” मैंने सुमित को मना करते हुए कहा, “मनीषा, हमारे टिकट तो फ्री हैं और हम तान्या के घर रह लेंगे.”

“हां मम्मी, आप लोग जाओ. मैं अपना, भइया और घर का अच्छी तरह ध्यान रखूंगी.” गौरी ने कहा.

“कब जाना है सुमित?”

“अगले ह़फ़्ते. हां, तुम तान्या को फ़ोन कर देना.”

मैंने तान्या को बताया तो वो बहुत ख़ुश हुई. अगले ह़फ़्ते हम दोनों लंदन पहुंच गये. तान्या हमें एयरपोर्ट पर लेने अकेले आयी. रोहन के बारे में पूछने पर तान्या ने बताया रोहन और तुषार दोनों बाहर गये हुए हैं.

तान्या के घर पहुंचे तो ऐसा लग रहा था जैसे किसी आलीशान महल को मॉडर्न लुक दे दिया हो. घर के हर काम के लिए नौकर लगे हुए थे. कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. सुमित रोज़ सुबह अपनी रिसर्च के लिए निकल जाते. मैं और तान्या मार्केट के लिए. मुझे आये तीन दिन हो गये थे. जब मैं पहली बार रोहन से मिली. उसमें भी वे स़िर्फ 2 घंटे घर पर रुके, जिसमें उनके 15 बार फ़ोन आये. तान्या घर पर नहीं थी. रोहन के पास तान्या के लिए इंतज़ार करने का भी टाइम नहीं था, उसे अपनी फ्लाइट जो पकड़नी थी. मुझे लगा कि तान्या को बहुत बुरा लगेगा. और जब तान्या के वापस आने पर मैंने उसे बताया तो उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी. मुझे अटपटा-सा लगा.

हमें आये एक ह़फ़्ता हो गया था. ज़्यादातर तान्या ने हमें सभी देखने लायक जगहों पर घुमा दिया था. अब तो हमें बच्चों की भी बहुत ज़्यादा याद आने लगी थी. मैंने तान्या से तुषार के बारे में पूछा तो उसने कहा- “तुषार आज आयेगा. तब मिलवा दूंगी.”

रात में अचानक मेरी आंख खुली. प्यास लग रही थी. पर कमरे में पानी नहीं था. पानी लेने उठी तो डोरबेल बजी, इतनी रात को कौन हो सकता है. मैं दरवाज़ा खोलने जा ही रही थी कि तभी नौकर ने दरवाज़ा खोल दिया. सामने तुषार ही था. सीधे अपने बेडरूम में गया. नौकर ने खाने के लिए कहा तो तुषार ने मना कर दिया. तभी तान्या वहां आ गयी. तान्या को देखकर तुषार चौंक गया, “मम्मी, आप इस समय?”

“हां, मैंने काका से कह दिया था, जब तुम आओ तो वो मुझे बता दें.”

“तभी तो मैं सोच रहा था कि आज आपको मेरी याद कैसे आयी?” तुषार ने कुछ तीखे स्वर में कहा.

“तुषार, मैंने तुझे गौरी के बारे में बताया था ना.”

“गौरी… कौन गौरी?”

“भूल गया… मेरी बचपन की सहेली मनीषा की बेटी. कुछ सोचा तूने इस बारे में.”

“सोचना क्या है, आपको तो पता है मैंने अभी बिज़नेस ज्वाइन किया है और मैं पापा के पीछे नहीं रहना चाहता. मैं काम के साथ कोई कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करना चाहता. फिर भी यदि वो लड़की इतनी अच्छी है तो सोचूंगा, पर फ़िलहाल मैं बहुत बिज़ी हूं. कल मैं मॉरीशस जा रहा हूं. काका को पैकिंग के लिए कह दीजिए.”

“ठीक है.” तान्या ने कहा और वो अपने कमरे में चली गयी.

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एक कोने में खड़ी मैं ये सब देख-सुन रही थी. मेरी बेटी का भविष्य मुझे अपने सामने दिखाई दे रहा था. कमरे में आई तो आहट से सुमित जाग गये थे. जब उन्होंने पूछा कि मैं कहां थी, तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. आज मैं जीत और हार दोनों को एक साथ देख रही थी. तब हम दोनों ने मिलकर एक फैसला किया. फिर अगले दिन रोज़ की तरह सुमित रिसर्च के लिए निकल गये. शाम को जब वो वापस आये, तो सुमित ने चाय के लिए कहा. तभी रोहन और तुषार भी आ गये. तुषार की फ्लाइट मौसम की वजह से काफ़ी लेट थी. सभी के लिए तान्या ने चाय मंगाई. आज मैंने पहली बार तान्या को तुषार और रोहन दोनों के साथ देखा. सभी बातें करने लगे. सभी को मूड में देखकर बड़ा अच्छा लगा. हमें यहां आये बीस दिन हो गये थे. सुमित की रिसर्च भी पूरी हो गयी थी. हमने जाने के लिए इजाज़त मांगी.

“तान्या तुम मेरी बहुत अच्छी दोस्त हो, मैं बहुत दिनों से तुमसे कुछ कहना चाह रही थी, आशा है, तुम बुरा नहीं मानोगी और इस बात से ना ही हमारी दोस्ती में फ़र्क़ आएगा.”

“तुम कहना क्या चाहती हो तान्या?”

“तान्या, मैं तुम्हारे वर्तमान को अपनी बेटी का भविष्य नहीं बनाना चाहती.”

“क्या मतलब…? मैं समझी नहीं मनीषा?”

“मतलब ये तान्या कि एक दिन तुमने पूछा था ना कि मैंने उस रईस और ऊंचे घर में शादी से क्यों मना कर दिया था और मुझे घर का काम करते देख तुम कहा करती थी कि मुझे सुमित से शादी करके क्या मिला? तो सुनो, मेरे पिता सचमुच एक बहुत रईस आदमी थे. उन्होंने मुझे हर वो चीज़ दी, जो वो ख़रीद कर दे सकते थे. तुमने सही कहा था, काम करने के लिए मेरे आगे-पीछे नौकर घूमा करते थे, पर मेरे माता-पिता नहीं. छींक आने पर डॉक्टरों की लाइन तो लग जाती थी, पर मां के ममताभरे स्पर्श का एहसास नहीं होता था. कभी भी घर, घर-सा नहीं लगता था. हमेशा दम घुटता रहता था.

इसी घुटन से बाहर निकलने के लिए मैं तुम्हारे घर आती थी थोड़ा-सा सुख तलाशने. तुम्हारी मां के हाथों के खाने का स्वाद मुझे आज भी याद है. तुम्हारे उस छोटे घर में मुझे बहुत अच्छा लगता. मैंने तभी फैसला किया था कि ऐसी जगह शादी करूंगी, जहां एक-दूसरे के लिए दिलों में प्यार बसता हो. सुमित मेरी ज़िंदगी में आये, तो मेरे सपनों को पंख मिल गये. मुझे अपने फैसले पर आज भी गर्व है. जो प्यार मुझे नहीं मिला, वो मैंने अपने बच्चों को दिया है. तभी तो हमारे बच्चे हमारे इतने क़रीब हैं.

पर तान्या तुम… तुम्हीं बताओ क्या है तुम्हारे पास? ना पति ना बेटा. एक ही घर में रहते, तुम तीनों को मिले ह़फ़्तों हो जाते हैं. तुम्हारा नौकर हर काम करता है. नौकर को पता है तुषार कब आता है, कब जाता है, उसका सामान कहां है, उसकी ज़रूरतें क्या हैं? फिर तुम उसकी मां कैसे हुई? तुम्हारा मन नहीं करता कि अपने पति और बच्चों की ज़रूरतों को तुम पूरा करो. पैसा ही सब कुछ नहीं होता. क्या तुम पैसों से अपना अकेलापन दूर कर सकती हो? नहीं तान्या, कभी नहीं. अब बताओ तुमने क्या पाया?”

अपने परिवार और उसकी ख़ुशियों से ज़्यादा कुछ नहीं होता. मैं गौरी की शादी तुषार से नहीं कर सकती, क्योंकि मैं गौरी को अकेलापन नहीं देना चाहती. यदि गौरी की शादी तुषार से हुई, तो तुम्हारा वर्तमान ही उसका भविष्य होगा.” तान्या मूक-सी हो गयी. वाकई सच्चे सुख की परिभाषा कहां समझ पायी वो.

– पारूल गोयल

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