कहानी- सर्द ज़मीन (Short Story- Sard Zamin)

अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी?

Hindi Kahani

वह बैग उठाए घर की दहलीज़ के बाहर क़दम रख देती है. इसके साथ ही कहानी ख़त्म हो जाती है… लतिका कहानी के समापन को एक अवास्तविक मोड़ मान उसका विश्‍लेषण करने लगती है. कहानी का हर पहलू, हर घटना उसे लगातार उलझन में डालती जाती है. उसे लगता है कि हंसा जैसी महिलाओं का समाज में होना सच है, पर उसके फैसले को कभी भी समाज की स्वीकारोक्ति नहीं मिल सकती है.

पिछले दो ह़फ़्तों से वह लगातार प्रेम कहानियों पर आधारित टीवी पर आनेवाले सीरियल की इस कहानी को देख रही थी. कहानी ‘हंसा’ नाम की एक महिला की थी, जिसके जीवन में अनायास ही एक पुरुष का प्रवेश होता है. पति के ज़्यादातर बाहर रहने व उसे समय न दे पाने के कारण अपनी तन्हा व उदास ज़िंदगी में रंग भरने की इच्छा उस पुरुष से मिलते ही हंसा के मन में पलने लगती है. बार-बार होती मुलाक़ातें नजदीकी बढ़ाती हैं, यहां तक कि उसका 8 वर्षीय बेटा भी उसमें अपने पिता की छवि व प्यार पाने की उम्मीद से उससे जुड़ता चला जाता है. पर पिता के आते ही अंकल की उपस्थिति उसके लिए गौण हो जाती है. उथल-पुथल से घिरी हंसा उस पुरुष के प्यार व सान्निध्य से जान पाती है कि पुरुष का स्पर्श कितना सुखद होता है. उसका साथ कितना विश्‍वास देनेवाला होता है. वह घर छोड़कर उसके साथ जाने का फैसला करती है. लेकिन अपनी बसी-बसायी गृहस्थी व बेटे को छोड़कर चले जाना उसके लिए सहज नहीं था. पर स्वयं के लिए जीने की ख़्वाहिश या पति के साथ बीते नौ वर्षों की पीड़ा शायद उसे स्वार्थी बनने को मजबूर कर देती है.

उसका जाना लतिका को ऐसा लग रहा था मानो किसी असंभव को जान-बूझकर लेखक ने संभव बनाने की कोशिश की है. समाज के नियमों व मर्यादाओं को दरकिनार कर इस तरह का क़दम उठाने की हिम्मत हंसा के अंदर हो ही नहीं सकती थी. उसे तो ज़बरदस्ती उसके अंदर ठूंसा गया था, ताकि नारी शक्ति को प्रस्तुत किया जा सके. फेमिऩिज़्म की परिभाषा को गढ़ने का यह प्रयास लतिका को परेशान किए जा रहा था.

आख़िर क्यों?

कहीं लतिका भी हंसा तो नहीं बनना चाह रही है?

लतिका हंसा नहीं है और हो भी नहीं सकती, लेकिन एक बार उसने भी तो हंसा बनने की कोशिश की थी.

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हर नारी के अंदर कहीं-न-कहीं एक हंसा छिपी होती है. कुछ उसे बाहर निकाल दबी-घुटी ज़िंदगी से छुटकारा पा लेती हैं तो कुछ जीवनभर दर्द के अंधेरे में स्वयं को गुम कर उस गुनाह की सज़ा भुगतती हैं, जो उन्होंने किया तो नहीं, पर उसके बारे में किसी कोने में बैठकर सोचा ज़रूर था. वही सोच उसे जीवनभर एक अपराधबोध, पीड़ा और ग़ुस्से के मिले-जुले भावों से जूझने के लिए मजबूर कर देगी, इसकी तो कल्पना उसने नहीं की थी. वही क्या, कोई भी इस तरह की कल्पना नहीं कर सकता.

लतिका ने भी सोचने की हिम्मत की थी. बहुत बार उसका मन भी किया कि वह इस नीरस और बेमानी ज़िंदगी के खोल से स्वयं को मुक्त कर ले. उसके और राजीव के  बीच शादी के शुरुआती दिनों से ही तालमेल नहीं बैठ पाया था. इसके कारण अनेक थे, जो शारीरिक व भावनात्मक रूप से जुड़े थे. हो सकता है कि उसने ही राजीव को समझने में भूल की हो. लेकिन सच तो यह था कि एक महिला को पुरुष के जिस साथ की अपेक्षा होती है, वह उसे राजीव से नहीं मिला. न ही शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से. न तो वह लतिका की ज़रूरतों को समझ पाया, न ही उसके अंदर किसी तरह की अनुभूति जागृत कर पाया. वह हमेशा ‘ठंडी औरत’ होने का ताना सहती रही. राजीव हर बात में उसका मज़ाक उड़ाता. उसकी बेइ़ज़्ज़ती करता. सीधी-सी बात थी कि वह उससे हर तरह से बेहतर जो थी. रंग-रूप, नौकरी व बुद्धि- हर मायने में वह राजीव से बढ़कर थी. ऐसे में राजीव को अपनी हीनभावना से उबरने के बजाय लतिका के अंदर ग़लतियां ढूंढ़ना ज़्यादा आसान लगता.

‘कहा जाता है कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन ग़लती तो किसी से भी हो सकती है, इसीलिए अक्सर दो विपरीत दिशाओं में सोचनेवालों की ईश्‍वर जोड़ी बना देता है. वह भी क्या करे, उसके पास काम का दबाव भी तो बहुत रहता है.’ राजीव अक्सर अपने दार्शनिक अंदाज़ में यह बात कहता था, लेकिन वह भी अपने बेमेल विवाह को संभाल नहीं पा रहा था.

दिन-रात के झगड़े और राजीव का जब-तब घर से गायब रहना लतिका को अक्सर सालता रहता. वह जानना भी चाहती कि वह कहां जाता है और क्या करता है तो दो टूक-सा जवाब मिलता, “मैं तुम्हें बताना ज़रूरी नहीं समझता.” वह सामंजस्य बिठाने की बहुत कोशिश करती. राजीव के साथ ही ख़ुशियां ढूंढ़ने की चाह में एक क़दम उसकी ओर बढ़ाती तो वह दो क़दम पीछे हट जाता. शराब की आदत ने उसमें और भी बुराइयां ला दीं. दूसरी महिलाओं का साथ उसे प्रिय लगता था.

जब राजीव और उसके बीच कोई रिश्ता ही नहीं था तो बच्चा होने का तो सवाल ही नहीं उठता था. अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी? राजीव और वह अलग-अलग कमरों में सोते थे. शराब पीकर होश खोकर सोना कितना आसान होता है. किसी क़िस्म का ख़याल या भूख तब परेशान नहीं करती.

जीने का हक़ हर किसी को है, एक चिड़िया भी तमाम जिजीविषाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहती है. उसके अंदर तो दिल, दिमाग़, भावनाएं सभी थीं. एक बार ऑफ़िस के टूर से दो दिन के लिए मुंबई गई थी. वहां उसका स्वागत आलोक ने ही किया था. वहां की ब्रांच का हेड था वह. दो दिन तक साए की तरह उसके साथ रहा. जान-पहचान, समान स्वभाव और मानसिक रूप से तालमेल बैठने से उनके बीच ऐसी दोस्ती हुई कि वापस आकर भी ऑफ़िस के काम के अतिरिक्त संवाद कायम रहा. फ़ोन, ईमेल और चैटिंग… बड़े ही ख़ुशनुमा पल हुआ करते थे वे.

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लतिका की बंधी-बंधाई ज़िंदगी में कुछ परिवर्तन आया. जैसे शांत सागर की लहरों में उफान आने लगा हो. दोनों ही अपने स्थिर जीवन से उकता चुके थे, शायद इसीलिए निकटता का सेतु बहुत जल्दी कायम हो गया. आलोक को अपना तन-मन समर्पित करने की तीव्र इच्छा लतिका को बार-बार उकसाने लगी. आलोक भी अपनी पत्नी से रिश्ता तोड़ उसके साथ जीवन बिताने को तत्पर था. तभी एक दिन लतिका के अंदर भी राजीव को छोड़ने की सोच उपजी. बेमानी रिश्ते को ढोने से फ़ायदा भी क्या था?

लेकिन इसी बीच पता चला कि राजीव का लिवर ख़राब हो गया है. शराब नहीं छोड़ी तो गुर्दे भी ख़राब हो सकते हैं. अस्पताल में भर्ती करा वह जी-जान से उसकी सेवा में जुट गई. पत्नी का फ़र्ज़ बाकी इच्छाओं पर भारी पड़ा. वैसे भी उस जैसे कमज़ोर इंसान को वह इस व़क़्त कोई झटका नहीं दे सकती थी. आलोक उसे समझेगा, यह भरोसा था उसे. पर आलोक का अस्पताल में आना राजीव को खल गया. बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उसने उससे बिना कुछ कहे, बिना पूछे अपने मन में अनगिनत जाल बुन डाले. अविश्‍वास की झलक उसकी आंखों में देख लतिका ने उसे समझाना चाहा, पर उसकी हीनता ने तब तक उस पर गालियों के चाबुक बरसा डाले थे.

वह चुप हो गई. क्या फ़ायदा था ऐसे आदमी को किसी तरह का जस्टिफ़िकेशन देने का? वैसे भी सच को सुनने की समझ उसमें थी ही नहीं. आलोक लौट गया. कमज़ोरी और बेबसी से आतंकित राजीव को भला किस तरह की चुनौती दे? आलोक लतिका को अपने पास आने को कहता.

आलोक से उसकी मुला़क़ात फिर कभी नहीं हुई. न ही किसी और तरह से उन्होंने एक-दूसरे से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की. मानो बिना कहे ही वे यह समझौता करने को तैयार हो गए थे. राजीव की हालत कुछ सुधरी तो वह उसे घर ले आई. उसकी सेवा और देखभाल ने उसे उठने के क़ाबिल बना दिया. पर राजीव का व्यवहार और सोच कुछ अधिक संकुचित होता चला गया था. उसकी नज़रों में लतिका ‘ठंडी औरत’ से ‘गिरी हुई औरत’ हो गई थी.

लतिका अपनी उस सोच को कोसती, जिसने उसे ख़्वाब देखने के लिए उकसाया था. कभी लगता कि उसे राजीव को बीमारी की हालत में ही छोड़कर चले जाना चाहिए था. वह हर ओर से रिक्त हो गई थी. देखे गए सपने उसे और तंग करते. बिस्तर पर दम तोड़ती इच्छाएं उसे अब जड़ बनाने लगी थीं. ‘ठंडी औरत’ ही बनेगी अब वह. दिन-रात के ज़ुल्म और प्रताड़ना सहने के बावजूद वह

राजीव को छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाई. वह कमज़ोर थी शायद. तभी तो राजीव उसे छोड़कर चला गया. साथ में महानता का लबादा भी ओढ़ लिया.

‘तुम आलोक के साथ ख़ुश रह सको, इसलिए जा रहा हूं. तुम आज से मुक्त हो.’ पत्र में लिखी इन पंक्तियों को पढ़ उसे लगा कि वह बेदर्दी से छली गई है.

राजीव जब साथ था, वह उसकी हीनता का बोझ ढोती रही और अब उसके जाने के बाद उसकी महानता का बोझ ढोने पर मजबूर है. अपनी ख़ुशियों को बंटोर कर अंजुरी में भरने की उसे इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी, उसने सोचा न था. राजीव को क्या पता कि उसकी अंजुरी में से ख़ुशियां और तमाम इच्छाएं तो कब की फिसल कर सर्द और गीली ज़मीन पर बिछ चुकी हैं.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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