कहानी- शेष प्रश्‍न… (Short Story- Shesh Prashan…)

Hindi Story

“दीदी, आप मेरी गुरु हैं, इसलिए आपके घर आ सकती हूं, वरना जिस घर में लड़के होते हैं, वहां मां मुझे जाने ही नहीं देतीं. कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए.” उसकी सहज साधारण-सी बात पर मैं मुस्कुरा उठी थी.

“और फिर मैंने उन्हें बताया ही नहीं है कि आपका एक युवा बेटा भी है.” सुनकर मैं चकित हुई थी और उसी दिन समझ गई थी कि उसके व्यक्तित्व के जिस मासूम आवरण को आज तक देखा है, उसके नीचे और भी परतें हैं. लड़की अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बैसाखियां खोजना जानती है.

दूर खड़ी वो क्षीणकाय लड़की सीमा-सी लग रही थी. यहां कोर्ट में क्या कर रही है? वो तो कनाडा जा चुकी होगी. मेरा भ्रम होगा सोचकर मैं आगे बढ़ने लगी. इतने में ही उसकी आवाज़ ने पैरों में बेड़ियां पहना दीं. “दीदी आप? कितने दिनों बाद मिली हैं.”

“हां, बहुत दिनों बाद तुम्हें देख रही हूं. तुम कैसी हो? यहां कैसे?” उसके चेहरे पर पसरा मौन अनकहे ही बहुत कुछ कह गया था. चिरपरिचित गुलाबी आभा जाने कहां लुप्त हो गई थी?

“क्या बताऊं दीदी, अब हारकर कोर्ट में केस किया है. उसे मैं छोड़ूंगी तो नहीं. अब तो न उसके घरवाले बात करते हैं, न ही उससे कोई संपर्क रहा है.” सीमा अपने कनाडा स्थित एनआरआई पति से परेशान है. उड़ती-सी ख़बर काफ़ी पहले मेरे कानों में भी पड़ी थी. एक बार सीमा का फोन भी आया था. किसी नारी सहयोगी संस्था का पता अपनी किसी सहेली की मदद के लिए मांगा था.

“दीदी, मेरे साथ छल हुआ है.” विवशता से छलकती उसकी आंखें देखकर मैं समझ चुकी थी कि निराशा से उपजे अवसाद के कठिन क्षणों को वो शायद शिद्दत से झेल रही है. “हिम्मत रखो, सब ठीक हो जाएगा.” मैंने पीठ थपथपाते हुए कहा. “हां दीदी, मगर उसे तो सबक सिखा के रहूंगी.” क्रोध से उसका चेहरा क्षणभर को लाल हो उठा.

“दीदी, आपसे पता लेकर मैं उस नारी संस्था के लोगों से मिली थी. उन्होंने भी साथ देने का आश्‍वासन दिया है. बस, ये सारा झंझट निबट जाए, तो फिर से घर बसा लूं.  बहुत भागदौड़ रही हूं पिछले दो बरसों से. थक चुकी हूं.” कुछ ही पलों की व्याकुलता के बाद फिर वही महत्वाकांक्षी सीमा मेरे सामने थी. “दीदी, शादी के लिए एक-दो प्रस्ताव आए भी हैं. एक विधुर हैं, उनका अपना व्यापार है. दूसरे तलाक़शुदा हैं, उनकी इंक फैक्टरी है. काफ़ी संपन्न घराने से हैं. गाड़ी-बंगला सब है, परंतु जब तक तलाक़ नहीं मिल जाता, मेरी ज़िंदगी तो अधर में ही लटकी रहेगी.”

“घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा.” सीमा से विदा ले जब घर पहुंची, तो सारा घर अस्त-व्यस्त पड़ा था. मुझे देखते ही दोनों बच्चे घर को व्यवस्थित करने में जुट गए, लेकिन मेरे मन की उथल-पुथल कैसे व्यवस्थित हो सकेगी? सीमा के सुख की कामना के साथ विचारों की मंजूषा खुलने लगी थी. ऐश्‍वर्य और चकाचौंध में जीने की लालसा सहेजे, धन-दौलत की कसौटी पर रिश्तों को तोलती यह लड़की क्या वास्तव में गृहस्थी और विवाहित जीवन का अर्थ समझ पाएगी?

12वीं कक्षा तक सीमा मेरी छात्रा रही है. ज़माने से अलग-थलग उसका भोला व्यक्तित्व मुझे अचंभित करता था. आज के युग में जहां लड़कियां स्वतंत्र निर्णय लेना अपना अधिकार समझती थीं, वहीं इसके लिए माता-पिता की इच्छा किसी वेद वाक्य से कम नहीं थी. बेहद आज्ञाकारी और अनुशासनपूर्ण व्यवहार औरों के लिए आदर्श स्वरूप था.  मेरे घर कभी-कभी पढ़ने आ जाती थी. मेरे दोनों बच्चे अंकित व अनुभा बराबर के-से थे. अनुभा के साथ सहज मित्रता थी, लेकिन अंकित की उपस्थिति में असहज होने लगती थी. “दीदी, आप मेरी गुरु हैं, इसलिए आपके घर आ सकती हूं, वरना जिस घर में लड़के होते हैं, वहां मां मुझे जाने ही नहीं देतीं. कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए.” उसकी सहज साधारण-सी बात पर मैं मुस्कुरा उठी थी.

“और फिर मैंने उन्हें बताया ही नहीं है कि आपका एक युवा बेटा भी है.” सुनकर मैं चकित हुई थी और उसी दिन समझ गई थी कि उसके व्यक्तित्व के जिस मासूम आवरण को आज तक देखा है, उसके नीचे और भी परतें हैं. लड़की अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बैसाखियां खोजना जानती है. माता-पिता को अंधेरे में रखने की बात ज़रूर गले नहीं उतरी थी. शायद इस बात को महत्वहीन समझना गुरु की हैसियत से मेरा अपराध भी था.

परिवार में पढ़ाई का माहौल न होते हुए भी अनवरत परिश्रम के बलबूते कुछ बनने की महत्वाकांक्षा सीमा में मुझे स्पष्ट दिखती थी. वो जानती थी, यदि पढ़ाई में ढील हुई, तो स्कूल छुड़ा दिया जाएगा, लेकिन उसे तो पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करके वैभवपूर्ण ज़िंदगी चाहिए थी. किसी बड़े अधिकारी या संपन्न व्यापारी से विवाह का सपना था. मैं उसकी महत्वाकांक्षा से प्रसन्न भी होती थी और डरती भी थी. कहीं कुछ ग़लत न कर बैठे. फिर भी मैंने इसे मात्र कुंआरे मन के दिवास्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं समझा था. सोचती थी, समय से बड़ा गुरु कौन हो सकता है? स्वयं ही समझ जाएगी.

12वीं के बाद आगे की पढ़ाई के ख़र्च के लिए सीमा ने अंशकालिक नौकरी ढूंढ़ ली. नौकरी की मंज़ूरी आसानी से नहीं मिली थी, लेकिन इच्छाशक्ति का संबल था, तो साधन भी जुट गए. ग्रेजुएशन के बाद सीमा को एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी मिल गई थी. कंपनी के मालिक उनके परिचित थे. सीमा की योग्यता व लगन से प्रभावित हो, उन्होंने उसके पिता को हर प्रकार की देखभाल का आश्‍वासन दिया था. घर में चार पैसे आने लगे, तो अनजाने ही माता-पिता का अंकुश ढीला पड़ने लगा.

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एक शाम सीमा का उत्साह देखते ही बनता था. उसे एक बड़ी विज्ञापन कंपनी में नौकरी मिल गई थी. 30 हज़ार रुपए वेतन था. मैं ख़ुश थी उसकी तरक़्क़ी से, लेकिन उस शाम मेरा मन आशंकित हो हतप्रभ हो गया, जब वो बड़ी सहजता के साथ अनुभा को बता रही थी, “अपने देसाई सर को मैंने सौगंध दिला दी है कि मेरी नई नौकरी की ख़बर मेरे घर तक न पहुंचने पाए, वरना मुझे घर बैठना पड़ जाएगा. अनजान लोगों के बीच मेरे पापा मुझे कभी नौकरी नहीं करने देंगे.”

“कभी न कभी तो पता लग ही जाएगा. कभी कोई फोन या मिलनेवाला आ गया तो?” अनुभा ने टोका था.

“वो सब मैंने सोच लिया है. फोन या विज़िटर के आने पर देसाई सर कह देंगे कि मैं  मीटिंग में हूं या कहीं बाहर गई हूं और फिर सर मुझे फोन करके बता देंगे. मैं उस व्यक्ति को फोन कर लूंगी. मैंने पूरी योजना बना ली है. हर पहलू पर हर दृष्टिकोण से सोच लिया है.” सीमा आत्मविश्‍वास से चहक रही थी.

“लेकिन देसाई सर ऐसा करेंगे क्यों?”

“क्यों नहीं करेंगे? मैं रोज़ एक घंटे उनका काम मुफ़्त जो करूंगी.”

सचमुच विस्मित थी मैं उसकी दूरदर्शिता पर. उसकी दुनियादारी व होशियारी पर चाहकर भी कुछ नहीं कह पाई. माता-पिता के भरोसे को अनदेखा कर सफलता के सोपान चढ़ती लड़की को इस अवस्था में नैतिकता का पाठ पढ़ाने का मतलब होगा, भैंस के आगे बीन बजाना. इस नौकरी के दौरान सीमा में नित नए परिवर्तन परिलक्षित होने लगे थे. ख़ूबसूरत तो वो थी ही, पर अब और भी निखर गई थी. अपने रूपाकर्षण से वो भी अनभिज्ञ नहीं थी. प्रतिभा की धनी तो थी ही. जतन से संवारी देह के कारण वो स्त्रियों की ईर्ष्या, लेकिन पुरुषों के आकर्षण का केंद्र बनी. बचपन से अभावों में पली बेटी को माता-पिता द्वारा तलाशे रिश्ते रास नहीं आ रहे थे. समृद्ध घराना व ऐश्‍वर्ययुक्त साथी की खोज में कई वसंत सरक गए. माता-पिता ढीले पड़ गए. घर आई लक्ष्मी को तो भरे-पूरे ब्राह्मण भी नहीं लौटाते हैं, फिर यहां तो आवश्यकताओं का तकाज़ा था.

फिर अचानक एक दिन सुनाई दिया कि  सीमा की शादी हो गई. कई दिन बाद सीमा मुझसे मिलने आई. हाथों में सोने के भारी जड़ाऊ कंगन, तीन लड़ीवाले मंगलसूत्र में लटकता हीरे का अर्धचंद्राकार पेंडेंट, बड़े-बड़े हीरे के कर्णफूल और महंगी साड़ी से मेलखाती मयूर पंखी बिंदिया. चेहरे पर उल्लास बिखरा पड़ा था. मुझे देख नज़रें झुका लीं थी. क्षमा प्रार्थिनी-सी बोली थी, “दीदी, सब कुछ बहुत जल्दी में हो गया. किसी को आमंत्रित करने का समय ही नहीं मिला. 12 तारीख़ को रमेश कनाडा से आए और 15 तारीख़ को हमारी शादी हो गई.”

“सीमा, तुम ख़ुश तो हो न?”

“हां दीदी, बहुत. कनाडा में उनका बहुत बड़ा व्यापार है. तीन गाड़ियां हैं.” उसका चेहरा उल्लास से खिला जा रहा था.

“समय हो तो किसी दिन तुम लोग खाने पर आओ.”

“रमेश तो चले गए, अब मुझे भी जाने की तैयारी करनी है. वो तो स़िर्फ 15 दिनों के लिए ही आए थे. शादी के बाद हम तुरंत ही हनीमून के लिए निकल गए. लौटकर दो दिन उनकी बहन के पास रहे. मैं इंडिया से बिल्कुल कट न जाऊं, इसलिए एक फैक्टरी यहां भी लगाने की सोच रहे हैं.”

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“बहुत अच्छी बात है. इतना प्यार करनेवाला पति मिला है.” उसके वैभव व भाग्य को सराहने के बावजूद मेरी स्त्री सुलभ जिज्ञासा ख़त्म नहीं हो पाई. “ये संबंध किसी परिचित के माध्यम से हुआ है या…” सीमा फिर हंसी, “नहीं दीदी, एजेंट द्वारा हुआ है, सारा पत्र-व्यवहार, मेल-मिलाप व बातचीत मैंने ख़ुद की है. मेरे इस रिश्ते पर रिश्तेदारों को भी जलन हो रही है.” उसकी आवाज़ में उपलब्धि का आभास था.

उसके जाने के बाद बहुत कुछ सोचती रही. फिर काफ़ी दिनों तक सीमा से मुलाक़ात नहीं हुई. सोचा कनाडा चली गई होगी. ज़रूरी तो नहीं कि मुझे बताकर ही जाती. क़रीब एक साल बाद अचानक एक दिन सीमा का फोन आया, तो मैंने उलाहना दिया, “बिना मिले ही चली गई.”

“इसी सिलसिले में फोन किया है दीदी, आपके कोई परिचित कनाडा में हैं क्या? मेरा मन घबरा रहा है. रमेश न तो फोन उठाते हैं, न पत्रों का जवाब देते हैं. उनकी बहन भी बहुत परेशान कर रही है. मैं कल मां के पास आ गई हूं.”

“तुम घर आओ, बैठकर बात करते हैं.”

घर आने पर सीमा ने जो कुछ बताया, वो बिल्कुल पत्रिकाओं में छपी कहानियों जैसा था. सीमा के पास न रमेश का सही पता-ठिकाना था, न उसकी वो बहन ही सगी थी. शुरू में रमेश कनाडा बुलाने का आश्‍वासन  देता रहा… इसी बीच बहन कही गई महिला ने सीमा को विश्‍वास में लेकर सारे गहने कब्ज़े में कर लिए. ऐसे में पुलिस और उस नारी संस्था की धमकी देकर किसी तरह ज़ेवर वापस लेकर सीमा मां के पास लौट आई. खोजबीन के दौरान कई तथ्य सामने आए. रमेश पहले से ही शादीशुदा था. वह यहां आकर मौज-मस्ती के लिए शादी करता था. उसकी बहन कही जानेवाली महिला व एजेंट भी उससे मिले हुए थे. वे लोग दहेज का सामान व ज़ेवर हथियाकर ग़ायब हो जाते थे किसी दूसरे शहर में, फिर किसी और को फंसाकर लूटते थे.

सीमा का क्रोध व क्रंदन चरम सीमा पर था, काफ़ी समझाने के बाद हल्की हुई थी. “आप ठीक कह रही हैं. एक तरह से अच्छा ही हुआ जो जल्दी पता चल गया. मैं बच गई.” ढांढस बंधाती मैं सीमा को देखती रही. कुछ ही महीनों में कुंदन-सी देह स़फेद पड़ गई थी. उस दरिंदे ने सारा रक्त निचोड़ लिया था. कुछ रातें साथ बिताकर एक लड़की को तबाह कर गया था, लेकिन धन-दौलत और आधुनिकता के नशे में डूब अपना सर्वस्व न्योछावर करने की आतुरता भी तो सीमा की ही थी. यदि ख़ुद पर भरोसा था, तो माता-पिता पर भी भरोसा रखना चाहिए था. ग़लती मेरी भी थी. एक बार तो मुझे भी उसे समझाना चाहिए था कि विवाह का आधार प्रेम, विश्‍वास, सहयोग और समर्पण है. माता-पिता बेटी के लिए घर और वर दोनों की छानबीन करते हैं, तब कहीं अपनी लाडली को दूसरे हाथों में सौंपते हैं. मात्र वैभव के आधार पर किसी रिश्ते की नींव कैसे टिक सकती है?

उस दिन के बाद सीमा को आज देखा था. कोर्ट की धूल फांकते देख अपनी प्रिय छात्रा के प्रति मेरा मन बहुत कोमल हो उठा. ईश्‍वर जल्दी ही उसे उसकी मंज़िल तक पहुंचाए. लेकिन मन आशंकित है, क्योंकि सीमा आज भी शादी व गृहस्थी का आधार रुपए-पैसे, मोटर, बंगले में ढूंढ़ रही है. आधुनिकता के रंग और भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल, धन की लालसा को सुख का पर्याय माननेवाली मेरी ये शिष्या क्या कभी रिश्तों का मोल व ब्याह के पवित्र बंधन की मर्यादा को समझ पाएगी? यह प्रश्‍न तो आज भी शेष ही है.

Prasoon Bhargava

    प्रसून भार्गव

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