कहानी- सिस्टिन चैपल का वह चित्र (Short Story- Sistine Chapel Ka Woh Chitr)

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क्या यह प्यार एकतरफ़ा था? शायद नहीं. यक़ीनन नहीं. मैं सोचती थी मैं अपने मन के नहीं दिमाग़ के आधीन हूं, तार्किक रूप से सोच कर सही और ग़लत की तुला पर तौलकर ही अपने निर्णय लेती हूं. मुझे गर्व था अपने संस्कारों पर. फिर क्यों मुझे रणधीर की आंखों के प्यार का निमंत्रण बुरा नहीं लगा- ग़लत नहीं लगा? लगता है, जैसे मेरे संस्कारों की सुदृढ़ दीवार में कहीं एक बहुत कमज़ोर स्थल था, जिसमें से अनजाने ही प्यार मेरे जीवन में प्रवेश कर गया था.

सुबह दरवाज़ा खोला, तो देखा बरसात हो रही है. सोते में पता ही नहीं चला. पहलेवाले आंगन भी तो नहीं रहे कि बाहर पड़ी बाल्टी, टिन की छत पर टप-टप पड़ती बूंदों की आवाज़ से नींद खुल जाए. चार मंज़िल इमारत की दूसरी मंज़िल पर मानो किसी बक्से में बना हो फ्लैट, चाहे तो घुटन महसूस करो, चाहे सुरक्षित. कड़ी ठंड के बावजूद चाय बनाकर बालकनी में आ बैठी. छुट्टी का दिन है. न कहीं जाना है, न किसी के आने की उम्मीद ही है. कामवाली बाई के सिवा आता भी कौन है यहां और आज तो न आने का उसके पास अच्छा बहाना है.
हर रोज़ इस समय सामनेवाले पार्क में लोग टहल रहे होते हैं, व्यायाम और योग हो रहा होता है. सड़क पर भी चहल-पहल प्रारंभ हो जाती है. परंतु आज तो सब वीरान है ठीक मेरे घर की ही मानिंद. मानो मैं अकेली ही बच गई हूं सारी सृष्टि में और मुझे अकेली पा मन के भीतर से ही चेहरे निकल-निकलकर और अपना वास्तविक रूप धारण कर मेरे चारों ओर जुटे हैं.
हू-ब-हू वैसे ही जैसे बरसों से उन्हें जानती थी. सच है हमारे पास स़िफर्र् वही लोग नहीं होते, जिन्हें हम देख और छू सकते हैं. बीते जीवन के अनेक संगी-साथी हमारे जीवन में रचे-बसे रहते हैं- अपनी आवाज़ और भाव-भंगिमाओं समेत- किसी अविभाज्य अंग की तरह ही. कुछ अजब संबंध है बारिश से मेरा, अजब सम्मोहन… बरसात होने पर न कुछ काम कर पाती हूं, न सो ही पाती हूं. घंटों बैठी बारिश को ही देखती रहती हूं. प्रकृति की अनुपम देन- बादलों से चूकर आती ये बूंदें. कभी कोमल और धीमी तन सहलाती-सी. कभी क्रोधित अपना प्रचंड रूप दिखाती, जीवनदायिनी भी, प्रलयकारी भी.
ज़िंदगी बदलती तो है, पर क्या इतना भी बदल सकती है- नहीं जानती थी. वह भी तो एक ऐसी ही बरसती शाम थी जब मैं उस बड़े-से होटल से बाहर आई थी. रणधीर की मांजी ने तो कहा भी था कि टैक्सी बुला देती हूं. मैंने ही मना कर दिया, “मैं स्वयं चली जाऊंगी.” मैंने बहुत आत्मविश्‍वास के साथ कहा था. बसों में सफ़र करने की ही आदी थी मैं. पर पांच सितारा उस होटल के आसपास तो क्या, दूर-दूर तक कोई बस स्टॉप नहीं दिखा. सही है पांच सितारा होटल के पास बस स्टॉप का क्या काम? आकाश एक सार स्लेटी रंग का हो रहा था और जल्द बारिश रुकने की कोई उम्मीद न थी. चलते-चलते थक गई, तो राह में आए एक बगीचे में जा बैठी. धीमी-धीमी बारिश हो रही थी. तन सहलाती-सी. चोट पर मरहम लगाती-सी. परंतु जब कांटा भीतर धंसा हो और ज़ख़्म ताज़ा हो, तो सहलाने से पीड़ा और अधिक होती है. वीरान बगीचे में बहुत देर बैठना भी सही नहीं लगा और घर जाने को भी मन नहीं था.

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रणधीर से मेरा परिचय मेरे छोटे भाई अनीश के कारण था और उन दोनों को एक सूत्र में बांधता था उनका क्रिकेट प्रेम, जुनून कहना अधिक उपयुक्त होगा. हमारे घर के ठीक सामने पड़ता था शिवाजी पार्क, जहां हर शाम क्रिकेट खेला जाता और हमारा घर शाम भर के लिए उसी पार्क का हिस्सा बन जाता. कभी क्रिकेट का सामान रखने-उठाने, कभी पानी पीने लड़के हमारे घर आते-जाते रहते. इसी टीम का कप्तान था रणधीर सिंह. गेहुंआ रंग, लंबा-चौड़ा अपने साथियों से पूरा सिर ऊपर उठता हुआ. गेंद फेंकने के अपने अंदाज़ से जाना जाता था. मेरा भाई था तो दुबला-पतला और ठिगना, परंतु ग़ज़ब की फुर्ती थी उसमें. यूं हमारे घर के सभी लोग नाज़ुक बदन ही थे. मैं जब कॉलेज में पढ़ रही थी, तब भी अनेक लोग मुझे स्कूली छात्रा ही समझते रहे.
मां का नौकरी करना उनका शौक़ या अस्मिता की तलाश जैसी बात नहीं थी अपितु बच्चों को अच्छी शिक्षा एवं कुछ सुविधाओं की मूलभूत ज़रूरतें ही पूरीे हो पातीं. अतः मां के नौकरी करने की आवश्यकता महसूस की गई. उन्होंने बीए कर रखा था और पढ़ाने के लिए बीएड करना अनिवार्य था. मैं तब दो वर्ष की रही होऊंगी, जब मां ने पढ़ाई शुरू की. मुझे व्यस्त रखने के लिए वह मेरे हाथ में चित्रों की कोई क़िताब पकड़ा देतीं. उन्होंने पढ़ाना प्रारंभ किया, तो मेरा दाख़िला भी उसी स्कूल में करवा दिया. आना-जाना संग हो जाता, परंतु लौटकर उन्हें ढेरों काम करने होते. मेरा साथ तो पुस्तकों से ही जुड़ा रहा. फ़र्क़ बस इतना पड़ा कि फोटोवाली क़िताबों की जगह कहानियोंवाली क़िताबों ने ले ली.
अनीश के जन्म के समय पहले मां छुट्टी पर थीं, फिर नानी आकर रहीं. मैं कुछ बड़ी हुई, तो घर की देखभाल की कमान मैंने संभाल ली. मां इधर से निश्‍चिंत स्कूल की अन्य गतिविधियों में व्यस्त हो गईर्ं. कभी वार्षिकोत्सव, कभी कोई प्रोजेक्ट और कभी जांचने के लिए परीक्षा-पत्रों का बड़ा-सा बंडल. अनीश तो स्कूल से आते ही खेलने भाग जाता. उसके लिए पढ़ना एक मजबूरी थी. असली शौक़ तो क्रिकेट ही था.
एक दिन इन लोगों का क्रिकेट शुरू होते ही बारिश शुरू हो गई. आसपासवाले लड़के तो अपने-अपने घरों को भाग गए, दूरवाले भीगे हुए हमारे घर आन पहुंचे. चाय को मैंने पूछा, तो मना कर दिया, परंतु उनके चेहरे कुछ और कह रहे थे. मैंने मसालेदार चाय बनाकर सब को पिलाई. रणधीर को बहुत पसंद आई. डरते-डरते बोला, “और मिलेगी क्या?”
उनका इतना सामान पड़ा रहता स्टोर में कि हमारे घुसने तक की जगह न बचती. दूर रहनेवाले लड़कों के तो लेग पैड्स, ग्लव्ज़ तक रखे होते. अधिकतर तो रणधीर ही आता लेने और फिर संभालकर रखने के लिए. रखते समय उसके चेहरे पर अपराधबोध-सा कुछ रहता. कहता, “छोटा-सा स्टोर है, जिसमें आधा तो हमने ही घेर रखा है.” मैं कुछ पढ़ रही होती, तो उसमें रुचि लेता. देशी-विदेशी साहित्य के अलावा मैं अन्य देशों के बारे में, वहां की संस्कृति और कला के बारे में भी पढ़ा करती थी. रणधीर ने कई देश देख रहे थे, सो वह उनके बारे में मुझे बताता. एक बार बोला, “हमारे घर में तो पढ़ने को कोई महत्व ही नहीं देता. लड़कियों को
गहने-कपड़ों के अलावा और कोई शौक़ नहीं. विदेश घूमने भी जाएंगे, तो पुरुष व्यापार बढ़ाने के लिए और स्त्रियां स़िर्फ बाज़ारों में घूमने की ख़ातिर.” शुरू में तो मैं रणधीर से बात करने में थोड़ा हिचकिचाती थी, फिर मन को समझाया कि छोटे भाई का दोस्त ही तो है, वह भी इतना सुसंस्कृत और शालीन स्वभाव का.

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धीरे-धीरे वह बहुत अपना-सा लगने लगा, घर के सदस्य-सा, बहुत बातूनी नहीं था वह, पर उसमें सादगी भरी एकनिष्ठा थी.
एक दिन जब वह क्रिकेट का सामान उठाने आया, तो उसे तेज़ ज़ुकाम के साथ हल्का बुखार भी था. लेकिन उस दिन खेलना आवश्यक था, क्योंकि उनकी टीम का मैच एक अन्य मैदानवाली टीम के संग था. मैंने उसे दवा दी और तुलसी-अदरकवाली चाय पिलाई, तो उसे कुछ राहत मिली. टीम ने बहुत अच्छा खेला और ये लोग मैच जीत गए. जाते समय वह सामान रखने आया, तो कुछ पल खड़ा रहा, मानो कुछ कहना चाहता हो. उसे चुप देख मैंने ही पूछा कि क्या बात है? झिझकता हुआ बोला, “मुझे यहां आकर बहुत अच्छा लगता है. बहुत अपना-सा लगता है यह घर. पूरी उम्र तो नौकर-नौकरानियों के भरोसे पले. बचपन में भी माता-पिता से मिलने, बात करने का समय फिक्स होता था. यह नहीं कि खेलकर आए और मां की गोद में चढ़ गए. बच्चों के छोटे-छोटे डर होते हैं, यह कोई नहीं समझता था. बस, बहादुर होने का आचरण करना पड़ता सदैव. चोट लगने पर भी रोना मना था. हर समय औपचारिकता निभाई जाती. घरभर में आज कोई नहीं जानता कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. यहां जो अपनापन मिलता है, वह अपने घर में नहीं मिलता.”
सहसा ही उसने हाथ बढ़ाकर कहा, “मुझसे दोस्ती करोगी? सदैव निभाओगी?” तब फेसबुक जैसी चीज़ नहीं होती थी, पर कुछ उसी तरह की दोस्ती का निमंत्रण था वह भी- उतना ही स्पष्ट. मैंने भी उसी रौ में हाथ बढ़ाकर कह दिया, “क्यों नहीं?” अच्छा तो वह मुझे लगता ही था. परंतु यूं दोस्ती का नामकरण किया जाता है, यह नहीं जानती थी.
समय के साथ हमारी मैत्री प्रगाढ़ होती गई. हम अपने मन की बात एक-दूसरे से कहने के लिए, सलाह-मशविरा करने के लिए, अपने डर, अपनी महत्वाकांक्षाएं बांटने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते चले गए. मेरे जीवन में भी तो अकेलापन था. घर और स्कूल की चक्की में पिसती मां को इतना समय ही कहां मिलता था और अनीश तो अपने यार-दोस्तों में ही मस्त रहता.
इस बात के दो-तीन दिन बाद ही उसने कहा, “मैं तुम्हें फ्रेंड के रूप में खोना नहीं चाहता…” मैंने बीच में ही टोकते हुए कहा, “पर मैंने दोस्ती तोड़ने की बात कब कही तुमसे?”

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सहसा ही हम दोनों ने एक-दूसरे को ‘तुम’ कहकर संबोधित किया था, यह बाद में ध्यान आया.
वह कुछ देर मुझे देखता रहा और फिर धीरे से परंतु आत्मविश्‍वासपूर्वक पूछा, “क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”
प्रश्‍न इतना आकस्मिक था कि मैं थोड़ी देर आश्‍चर्यचकित उसे देखती रही. यूं मैं पिछले कई दिनों से उसके बदलते मनोभावों को देख रही थी, पर वह ऐसा कोई प्रस्ताव रख देगा, यह नहीं सोचा था. लेकिन क्या यह प्यार एकतरफ़ा था? शायद नहीं. यक़ीनन नहीं. मैं सोचती थी मैं अपने मन के नहीं दिमाग़ के आधीन हूं, तार्किक रूप से सोच कर सही और ग़लत की तुला पर तौलकर ही अपने निर्णय लेती हूं. मुझे गर्व था अपने संस्कारों पर. फिर क्यों मुझे रणधीर की आंखों के प्यार का निमंत्रण बुरा नहीं लगा- ग़लत नहीं लगा? लगता है, जैसे मेरे संस्कारों की सुदृढ़ दीवार में कहीं एक बहुत कमज़ोर स्थल था, जिसमें से अनजाने ही प्यार मेरे जीवन में प्रवेश कर गया था. उम्र में मुझसे छह महीने कम, जीवन स्तर में बहुत बड़ा उच्च कुलीन और धनी-नामी परिवार का. और मैं एक अति साधारण परिवार से, पर जब साथ होते, तो ये सब मायने न रखता. न उम्र का हिसाब, न आर्थिक या प्रांतीय भेद. अब मेरा मन पुस्तकों में न लगता. कहानी के नायक में मुझे उसी का चेहरा नज़र आता. प्यार में शायद कुछ तर्कसंगत होता ही नहीं, कोई नियम-क़ानून लागू होता ही नहीं.
मां को प्रमोशन मिला और वे एजुकेशन डायरेक्टर बन गईं. परंतु इसके साथ ही उन्हें दूसरे शहर जाने का आदेश भी मिल गया. पापा तो रिटायर हो ही चुके थे. अतः परिवार को दूसरे शहर जाने में क्या आपत्ति होती, सो उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी. रणधीर ने घर में बात करने का ऐलान किया. मुझे डर लग रहा था, पर वो आश्‍वस्त था, क्योंकि वो माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने को भी तैयार था. उसके माता-पिता ने मना तो नहीं किया, पर ‘सोचते हैं’ कहकर बात को फ़िलहाल टाल दिया. इसी बीच रणधीर को उसके पिता काम के सिलसिले में थोड़े दिनों के लिए अपने संग विदेश ले गए. उन लोगों के जाने के दो दिन के पश्‍चात् उसकी मां का टेलीफोन आया. वह मुझसे मिलना चाहती थीं और एक पांच सितारा होटल में मिलने का समय और जगह बता दी.
ठीक ही तो था. ‘वे मुझसे मिलना चाहती हैं’ यह सोचकर मैं ख़ुश हुई और सलीके से तैयार होकर उनसे मिलने पहुंची. उन्होंने स्नेहपूर्वक मेरा हालचाल पूछा, इधर-उधर की बात की और फिर बोलीं, “तुम एक अच्छी लड़की हो, समझदार लगती हो. मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं, पर हमारे
समाज में रिश्ते लड़के-लड़की के बीच नहीं, परिवारों के बीच तय किए जाते हैं. और प्रायः ही छुटपन में तय कर दिए जाते हैं. उस लड़की की सोचो जिसने इतने वर्ष रणधीर के लिए सपने संजोए हैं. इसकी मंगल कामना के लिए व्रत-उपवास रखे हैं. आसानी से न मानता रणधीर, इसीलिए उसके काका बहाने से उसे विदेश ले गए हैं.
मैं समझती हूं तुम्हारी भावनाओं को, नए युग की सोच को. यह भी जानती हूं कि तुम मेरी मजबूरी समझोगी. तुम लोगों का यहां से जाने का सुन मेरा काम सरल हो गया. रणधीर के लौटने पर मैं उसे संभाल लूंगी. बस, तुम उससे संपर्क करने का प्रयत्न मत करना. इतनी ही गुज़ारिश है मेरी तुमसे. मेरा ढेर सारा आशीर्वाद है तुम्हारे साथ.
पढ़ी-लिखी हो, अपनी ख़ुशी तलाश लोगी. जीवन का ध्येय ढूंढ़ लोगी.”
पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में भी वे बहुत आधुनिक एवं गरिमामयी लग रही थीं. उनके चेहरे से छलकता स्नेह आकर्षित कर रहा था. और वह मुझे आशीर्वचन कह रही थीं. संस्कारवश मैंने झुककर उनके पैर छूने चाहे, परंतु उन्होंने बीच में ही रोककर मुझे गले लगा लिया और कहा, “बेटियां पैर नहीं छूती हैं और तुम भी तो मेरी बेटी समान हो.” उन्हें वहीं किसी का इंतज़ार करना था, अतः मैं अकेली वहां से बाहर निकली. देखा बारिश हो रही थी. आकाश सलेटी रंग का यूं एकसार था. लगता नहीं था कि जल्दी रुकेगी.
मौसम की मनःस्थिति भी हम मानवों जैसी होती है क्या? रंग-बिरंगे फूलों से लदा वसंत कितना प्रसन्न दिखाई देता है.
फूलों की खिलखिलाहट से, मंद बयार की मस्ती से भरपूर और झड़ते पत्तों के दुख से पतझड़-उदास और थका-हारा, झंझावात और तेज़ बरसात में अपने क्रोध को दर्शाता है मॉनसून, पर वहीं हल्की-हल्की बूंदनियां टपकाता ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वर्षभर की संजोई व्यथा आंसू बन पृथ्वी को भिगो रही हो.
शहर छोड़ा, तो बहुत कुछ से नाता टूट गया. ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा पीछे रह गया. पर कुछ लोग हैं, जो यादें बनकर संग चले आए हैं मेरा अकेलापन बांटने. पानी बरसने पर आज भी वही दिन सामने आन खड़ा होता है और जिस प्रकार पेड़ की एक शाख हिलाने से अन्य शाखाएं भी साथ हिलने लगती हैं, उनसे भी फल-फूल टपकने लगते हैं. यादों की एक शाख हिलाने से एक के बाद एक यादें आती चली जाती हैं. वृक्ष की शाखाओं की मानिंद ही एक-दूसरे से गुथी रहती हैं हमारी यादें भी.
मां और पापा ने तो बहुत प्रयत्न किया कि मैं कहीं विवाह करने को मान जाऊं. परंतु जिस प्रकार रणधीर की वाग्दता ने उसे लेकर सपने बुने थे- व्रत-उपवास न रखे हों, सपने तो मैंने भी देखे थे न! मैंने अपना जीवन मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को सौंप दिया, जिन्हें कुछ अतिरिक्त स्नेह व धैर्य की ज़रूरत पड़ती है और मेरे पास तो अब असीम समय था. बस, बरसात के दिनों में ही न मैं सो पाती हूं, न कुछ काम ही कर पाती हूं. बारिश को देखती अतीत में विचरती रहती हूं; रणधीर ने ही मुझमें प्रेम का एहसास जगाया था, किसी स्वप्नलोक का-सा ही सुख भोगा था मैंने. उसे खोकर ही पीड़ा समझ पाई हूं और पीड़ा के दरिया से गुज़रकर ही तो आज दूसरों के दुख को समझने के क़ाबिल हुई हूं. ज़िंदगी से कोई गिला-शिकवा नहीं. और जब इसी जीवन का नहीं बता सकते कि भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है, तो अगले जन्म की बात क्या की जाए?
कल सांझ द्वार पर दस्तक हुई. खोला तो कुरियर था लंबा-चौड़ा-सा एक पार्सल पकड़े. साथ में एक पत्र भी. हस्ताक्षर कर उसे रवाना किया और जल्दी से पत्र खोला. रणधीर का था. लगभग पंद्रह वर्षों के पश्‍चात्. “बहुत मुश्किल से तुम्हारा पता ढूंढ़ पाया हूं. क्रिकेट के साथियों से अनीश का पता मिला और फिर अनीश से तुम्हारा. अभी तक तो यही सोचता रहा कि तुम स्वयं अपनी इच्छा से सारे संबंध तोड़ गई हो, क्योंकि मैं तुम्हारा नया ठिकाना नहीं जानता था, तुम तो जानती ही थी. तुम्हारी नाराज़गी का कारण जानना चाहता था, परंतु पूछता किससे? पिछले हफ़्ते मां की मृत्यु हुई और मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होंने तुमसे हुई मुलाक़ात और तुमसे लिए वादे के बारे में बताया. मन के एक कोने में तुम सदैव रही, पर अब तुम्हारा स्थान कुछ और ऊपर हो गया है. लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी है. तुम्हारी तरह मैंने भी अपनी परिस्थिति से समझौता कर लिया है. छोटा-सा एक तोहफ़ा भेज रहा हूं क़बूल कर लेना- रणधीर.”


माइकल एंजलो की पेंटिंग थी. वैटिकन के सिस्टन चैपल की छत पर बना सृष्टि की रचना का सबसे मशहूर चित्र- सृष्टि के रचयिता का आदम की ओर बढ़ा हाथ. न! शायद आदम का अपने रचयिता को छू लेने की अदम्य इच्छा से बढ़ा हाथ. बस, ज़रा-सा ही फासला बाकी है. सदियां बीत चुकी हैं, यह ज़रा-सा फासला तय नहीं हो पाया. कितनी कसक, कितनी विवशता है एक-दूसरे की ओर बढ़े उन दो हाथों में!
परिवार की मान-मर्यादा का ध्यान, अपने संस्कारों एवं सामाजिक व्यवस्था का सम्मान, जाने कितनी वर्जनाओं से बंधे हम! हमने अपने हाथ आगे बढ़ाने से स्वयं ही रोक रखे हैं.

           उषा वधवा

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