कहानी- वक़्त (Short Story- Waqt)

प्रिया, पति की मुश्किलों को समझकर उनके साथ सहयोग करोगी, तो तुम देखोगी कि वो एक बार तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पाए, तो अगली बार पूरी करने की पुरज़ोर कोशिश ज़रूर करेंगे. इन छोटी-छोटी बातों से ही रिश्ते में गहराई आती है. व्यक्तित्व में ठहराव आता है. मैं यह नहीं कहती कि तुम्हें नाराज़ होने का हक़ नहीं है, लेकिन ज़्यादा समय तक रूठे रहना पति-पत्नी के रिश्ते में खालीपन पैदा करता है. संवादहीनता उनमें दूरी बढ़ाती है.

Kahani

रात के दो बज रहे थे. विमान की तेज़ आवाज़ सुनकर बेसाख़्ता मैं टैरेस पर चली आई. घर के नज़दीक एयरपोर्ट होने के कारण विमानों की आवाज़ें यहां आती रहती हैं. निगाहें उठाकर मैंने आसमान की ओर देखा. एक विमान काफ़ी नीचे उड़ रहा था. शायद उसने अभी-अभी उड़ान भरी थी. हो सकता है, इसमें रोहित हों. उनकी फ्लाइट का भी तो यही समय था.

जब से रोहित बीजिंग जाने के लिए घर से निकले हैं, मेरा मन कमज़ोर पड़ रहा है. आंखों में नींद नहीं है. एक अजीब-सी बेचैनी, अजीब-सी असुरक्षा का एहसास मन को घेर रहा है. वह बीजिंग न जाएं, एयरपोर्ट से ही घर वापस लौट आएं. हालांकि पहले भी दो बार ऑफिस के काम से वे अमेरिका गए थे, पर उस व़क्त ऐसी बेचैनी का एहसास नहीं हुआ था, फिर आज ऐसा क्यों हो रहा है? शायद इसकी वजह वह झगड़ा है, जो मेरे और रोहित के बीच हुआ था और जिसकी वजह से मैं उनसे बात नहीं कर रही थी.

विवाह के बाद मेरा पहला जन्मदिन था. सोचा था, उस दिन रोहित कुछ स्पेशल करेंगे. मुझे बढ़िया-सा उपहार देंगे, कहीं घुमाने ले जाएंगे, लेकिन यह सब तो दूर, सारा दिन बीत गया और उन्होंने मुझे बधाई तक नहीं दी. शाम को उनका मैसेज आया- ‘बॉस की प्रमोशन पार्टी है. डिनर पर जा रहा हूं. तुम खाना खा लेना. मेरा इंतज़ार मत करना.’ पढ़कर क्रोध और वेदना की मिली-जुली प्रतिक्रिया आंखों से आंसू बनकर बह निकली. ठीक है, उन्हें मेरी परवाह नहीं, तो मुझे क्यों हो? वो मेरी उपेक्षा कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं कर सकती? कितनी मुश्किल से हुई थी हमारी शादी. पापा मेरी शादी अपने दोस्त के बेटे डॉ. आलोक से करना चाहते थे, लेकिन मैं रोहित को चाहती थी. रोहित विजातीय थे, इस कारण मम्मी-पापा इस शादी के लिए सहमत न थे. बाद में मेरे काफ़ी ज़िद करने पर वे राज़ी हुए, लेकिन मुझे क्या पता था, इतनी मुश्किल से हासिल हुआ प्यार भी इतनी जल्दी अपनी ऊष्णता खो देगा. छह महीने बीतते-बीतते हम दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा होने लगा. आज सोच रही हूं, तो लग रहा है, क्या वे बातें उतनी

महत्वपूर्ण थीं, जिनकी वजह से मैं नाराज़ हो जाती थी. रोहित का पिक्चर के लिए प्रॉमिस करना और फिर काम की व्यस्तता के कारण प्रोग्राम कैंसिल कर देना, क्या बहुत बड़ी बात थी? दो दिन तक मुंह फुलाए घूमती रही थी मैं. अगले संडे पिक्चर दिखाने ले गए, तभी मूड ठीक हुआ था मेरा. ऐसी छोटी-छोटी बातें अक्सर हो जातीं. कभी वीकएंड पर भी उन्हें ऑफिस जाना पड़ता, उस समय उखड़ी-उखड़ी रहती मैं उनसे. रोहित कहते, “प्रिया, मैं अपने काम के साथ समझौता नहीं कर सकता. मेरे लिए मेरा काम, मेरी पूजा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता या मुझे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है. मैं जानता हूं कि मैं तुम्हें अधिक समय नहीं दे पाता हूं. तुम बस कुछ दिन सब्र रखो. मैंने अपने मैनेजर से बात की है. जल्द ही वो मुझे कोई दूसरा प्रोजेक्ट दे देंगे. तब मैं तुम्हारी सारी शिकायतें दूर कर दूंगा.” पर मुझमें सब्र नहीं था. मुझे रोहित की बातें आधारहीन लगतीं. पुरुष की ज़िंदगी में उसकी पत्नी की अहमियत इससे पता चलती है कि वो अपनी पत्नी को कितना समय देता है.

उस समय भी यही तर्क दिया था मैंने, जब चाचा के बेटे सौरभ की शादी में जाना था. शादी से एक दिन पहले बरेली पहुंचना चाहती थी मैं. रोहित भी राज़ी हो गए थे, पर घर से निकलने के बिल्कुल पहले रोहित के ऑफिस से फोन आ गया. खेदपूर्वक वो बोले, “सॉरी प्रिया, आज मैं किसी हालत में नहीं जा सकूंगा. प्रोजेक्ट में कुछ इश्यूज़ आ गए हैं, जिन्हें सॉल्व करना मेरी ज़िम्मेदारी है.” सुनते ही मुझे ग़ुस्सा आ गया था, “रोहित, आप इस बात को भी समझिए कि रिश्ते निभाना भी उतना ही ज़रूरी है. मेरा एक ही भाई है. मैं शादी में अगर जल्दी नहीं पहुंचूंगी, तो उसे कितना बुरा लगेगा. हो सकता है, ग़ुस्से में वो मुझसे बात भी न करे. चाचा-चाची ज़िंदगीभर इस बात का उलाहना देंगे.” रोहित शांत ही रहे. सारा दिन मेरा मूड ऑफ रहा था. अगले दिन रास्तेभर मैं रोहित से उखड़ी-उखड़ी रही थी. चाचा का घर आते ही मैं अंदर की ओर लपकी. हल्दी की रस्म तभी ख़त्म हुई थी.

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चाचा-चाची ने मुझे गले लगाया. सौरभ अपनी बहन की सहेलियों के साथ हंसी-मज़ाक में उलझा हुआ था. उसने दूर से ही हाथ हिला दिया. पास आकर रोहित से बात करने की औपचारिकता भी नहीं दिखाई. मैं जान-बूझकर वहां सबके नज़दीक जाकर खड़ी रही कि कोई तो मुझे देरी से आने का उलाहना देगा, लेकिन किसी को हमारे आने की फ़िक्र ही नहीं थी, फिर देर या जल्दी का सवाल ही कहां उठता था. मन ही मन मैं खिसिया रही थी. अपने इन्हीं संबंधों के लिए मैंने रोहित से झगड़ा किया था. रोहित मुख से कुछ नहीं बोले. बस, मुझे देखकर मुस्कुराते रहे थे.

रात में फेरों के व़क्त मम्मी मुझे एकांत में ले जाकर बोलीं, “प्रिया, तेरे और रोहित के बीच सब कुछ ठीक है न. सुबह से देख रही हूं, तू रोहित से बात नहीं कर रही है.” मम्मी की सहानुभूति पाकर मेरा दिल भर आया. व्यथित होकर मैं बोली, “मम्मी, मेरे और रोहित के बीच अब बहुत झगड़े होते हैं. कई-कई दिन तक हम एक-दूसरे से बात तक नहीं करते. रोहित अब बहुत बदल गए हैं. पहले उन्हें मेरा कितना ख़्याल था, लेकिन अब उन्हें मेरी बिल्कुल परवाह नहीं है. उनके लिए उनका काम ही सर्वोपरि है.” मम्मी शांत मन से मेरी बातें सुनती रहीं, फिर बोलीं, “प्रिया, कॉलेज में मैं तुम्हारी ही उम्र की कितनी लड़कियों के संपर्क में रहती हूं. उनमें से कई मुझे अपनी समस्याएं भी बताती हैं. प्रिया, मुझे लगता है, आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियों में एडजस्ट करने की भावना कम हो रही है और उनका अहं बढ़ रहा है. आजकल पति और पत्नी को जो बराबरी का दर्जा मिल रहा है, उसके चलते पति से उनकी अपेक्षाएं कुछ ज़्यादा ही रहती हैं और इनके पूरा न होने पर उनका अहं टकराने लगता है. शिकायतों का दौर शुरू हो जाता है.”

“मम्मी, तो क्या ग़लत बातों पर रिएक्ट नहीं करना चाहिए, उन्हें सहते रहना चाहिए.”

“नहीं प्रिया, तुम इस बात को समझो. ग़लत बातें सहने में और एडजस्टमेंट में अंतर है. पति की परिस्थितियों को समझना और उनसे तालमेल बिठाकर चलना एडजस्टमेंट होता है. छोटी-छोटी बातों पर रूठना, बोलचाल बंद कर देना, हर समय शिकायतें करना, ये सब बचपना है. प्रिया, पति की मुश्किलों को समझकर उनके साथ सहयोग करोगी, तो तुम देखोगी कि वो एक बार तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पाए, तो अगली बार पूरी करने की पुरज़ोर कोशिश करेंगे. इन छोटी-छोटी बातों से ही रिश्ते में गहराई आती है. व्यक्तित्व में ठहराव आता है. मैं यह नहीं कहती कि तुम्हें नाराज़ होने का हक़ नहीं है, लेकिन ज़्यादा समय तक रूठे रहना पति-पत्नी के रिश्ते में खालीपन पैदा करता है. संवादहीनता उनमें दूरी बढ़ाती है.”

“मम्मी, मैं समझ रही हूं, कम से कम आप मेरी भावनाओं को समझेंगी, यही सोचकर अपने मन की बात कह दी. विश्‍लेषण करना ही है, तो निष्पक्ष भाव से करिए न, पक्षपातपूर्ण रवैया क्यों अपना रही हैं? कहां तो आप रोहित के साथ मेरी शादी के ख़िलाफ़ थीं और कहां आपको उनकी हर बात ठीक लगती है.” मम्मी का सदैव की भांति उपदेश देना मुझे खिन्न कर गया था.

ऐसा कम ही होता है कि किसी के समझाने से इंसान पर असर पड़े. मुझ पर भी मम्मी के समझाने का कोई असर नहीं हुआ था. अगर हुआ होता, तो अपना जन्मदिन भूल जाने पर मैं रोहित से इतना नाराज़ न होती. रात में बॉस की पार्टी से वो देर से घर लौटे थे. सुबह मेरे क़रीब आकर बोले, “प्लीज़ प्रिया, मुझसे नाराज़ मत हो. बॉस प्रमोशन पर जा रहा है. कल सारा दिन इतना व्यस्त रहा कि तुम्हारा जन्मदिन भूल गया. आज सुबह मम्मी ने फोन करके याद दिलाया. मुझे बहुत अफ़सोस है प्रिया, लेकिन मैं भी क्या करूं, तीन दिन बाद बीजिंग जाना है. तब तक रत्तीभर भी फुर्सत नहीं है, मगर वादा करता हूं कि वापस आकर हम आउटडोर वीकएंड सेलीब्रेट करेंगे.”

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मैंने रोहित की बात का जवाब नहीं दिया और किचन में चली आई. मुझे लगा शायद यह बात सच है कि ज्यों-ज्यों शादी का समय बीतता जाता है, पत्नी अपने पति से जुड़ती जाती है और पति विमुख होने लगता है, तभी रोहित को मुझसे अधिक अपना काम प्यारा है. मुझे उम्मीद थी, रात में रोहित मुझे फिर से मनाएंगे. देर से ही सही, मेरे लिए जन्मदिन का उपहार ज़रूर लाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. जाने के लिए घर से निकले, तब भी मैंने उनसे बात नहीं की. चुपचाप उनकी पैकिंग की और एक ओर खड़ी हो गई, इस प्रतीक्षा में कि शायद चलते हुए, वो मेरे क़रीब आएं. मुझे अपने आगोश में समेटकर, मेरा माथा चूम लें, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मेरी हसरत दिल में ही रह गई. रोहित बदल गए हैं. मेरे बोलने न बोलने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. यही एहसास जागा था मन में, लेकिन अब लग रहा है कि यह सच नहीं है. अगर ऐसा होता, तो जाते समय पलटकर बार-बार मुझे न देखते. उनका चेहरा यूं उतर न जाता. मैं भी कितनी मूर्ख हूं,

ज़रा-ज़रा-सी बात पर ओवर रिएक्ट करती हूं. आख़िर क्यों नहीं बोली मैं रोहित से? ऐसा भी क्या कर दिया था उन्होंने, जो उन्हें बाहर तक छोड़ने नहीं गई? जाते समय उनसे यह भी नहीं कहा कि जल्दी आना. उनका व्यथित चेहरा यादकर मेरा मन द्रवित हो रहा था. काश, मम्मी की बातों को मैं गंभीरता से लेती और उनसे यूं नाराज़ न होती. ख़ैर, ईश्‍वर करे कि ये चार दिन जल्दी बीत जाएं और रोहित लौट आएं, फिर अपने अहं को दरकिनार कर उनके साथ एक नई शुरुआत करूंगी. इस विचार के साथ ही निगाहें घड़ी पर जा टिकीं. सुबह के छह बज चुके थे. रोहित की फ्लाइट को चार घंटे से अधिक बीत चुके थे. अब तक उन्होंने बीजिंग की आधी से अधिक दूरी भी तय कर ली होगी.

रातभर जागने के कारण सिर बहुत भारी हो रहा था, लेकिन मन की बेचैनी कुछ भी करने नहीं दे रही थी. अनमने भाव से मैंने टीवी ऑन किया. न्यूज़ चैनल लगाते ही नज़र ब्रेकिंग न्यूज़ पर जा टिकी- ‘बीजिंग जा रहे विमान का एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क टूट गया है. विमान का कुछ पता नहीं है. तलाश जारी है, मेरा दिल धक्क से रह गया. ‘हे भगवान! इसी विमान में तो रोहित थे. तो क्या… नहीं, नहीं. मेरा हृदय चित्कार कर उठा. आंखों से आंसू बहने लगे. ऐसा लगा, शरीर की मानो सारी शक्ति ख़त्म हो गई हो. कांपते हाथों से मैंने एयरपोर्ट का नंबर मिलाया, लेकिन नंबर बिज़ी था.

तभी कॉलबेल बजी. लगता है, रोहित आ गए. शरीर में एक नई स्फूर्ति-सी जागी. आंसू पोंछ बदहवास-सी मैं दरवाज़े की ओर भागी. बाहर कुरियरवाले को देख मन बुझ गया. रोहित ने एयरपोर्ट से एक पैकेट भेजा था. मैंने जल्दी उसे खोला. अंदर एक ख़ूबसूरत-सी रिस्टवॉच थी, साथ में एक स्लिप जिस पर लिखा था- ‘मेरी प्रिया को जन्मदिन का तोहफ़ा’, मन पर बोझ लेकर जा रहा हूं कि जाने से पहले तुम्हारी नाराज़गी दूर न कर पाया. तुमसे बहुत जल्द मिलूंगा, तो सारे गिले-शिकवे दूर कर दूंगा- स़िर्फ तुम्हारा रोहित.

मैं फूट-फूटकर रो पड़ी. रोहित, मुझे उपहार नहीं चाहिए. मुझे स़िर्फ तुम्हारा साथ चाहिए. प्लीज़ लौट आओ रोहित, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगी. काश! मैं रोहित से नाराज़ न हुई होती. काश! मैंने उन्हें रोक लिया होता. मेरी नज़रें दोबारा टीवी पर जा टिकीं. विमान को ढूंढ़ने के प्रयास और तेज़ हो गए थे, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चल पा रहा था. थोड़ी देर में मम्मी आ गईं. उनके सीने से लग मैं बिलख उठी.

रोते-रोते मेरी हिचकियां बंध गईं. मम्मी मेरा सिर सहलाते हुए बोलीं, “प्रिया, हिम्मत रखो. तुम्हारे पापा एयरपोर्ट पता करने गए हैं. मेरा मन कह रहा है, रोहित ज़रूर आएंगे.” मम्मी की आवाज़ मुझे कहीं दूर से आती लगी. दिन का उजाला बढ़ रहा था और मेरा भविष्य अंधकार की गहरी खाई में डूबता जा रहा था. अगले दिन से दोस्तों और रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया था. हर कोई अपने तरी़के से सांत्वना दे रहा था. धीरे-धीरे एक माह बीत गया. विमान का अब तक कुछ पता नहीं चला है. रोहित के लौट आने की आस आज भी मेरी सांसों में बसी हुई है. आज अपनी बालकनी में बैठी मैं अश्रुपूरित नेत्रों से बीते दिनों की स्मृतियों में खोई हुई हूं. कुछ दिन पहले तक मैं और रोहित इसी बालकनी में बैठकर शाम की चाय पीते थे. रोहित मुझसे ढेर सारी बातें करना चाहते और मैं अपनी शिकायतों के ताने-बाने में उलझी अक्सर ख़ामोशी अख़्तियार कर लेती थी. आज मैं रोहित से बात करना चाहती हूं, उन्हें बताना चाहती हूं कि मैं उन्हें बहुत प्यार करती हूं, लेकिन मेरी बात सुनने के लिए रोहित मेरे पास नहीं हैं. चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ है. व़क्त यह कैसा खेल खेल गया मेरे साथ. काश! मैं व़क्त रहते प्यार की अहमियत को समझ पाती. काश! मैं गु़ज़रे व़क्त को लौटा पाती.

       रेनू मंडल

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