कहानी- ऑर्डरवाली बहू (Story- Ord...

कहानी- ऑर्डरवाली बहू (Story- Orderwali Bahu)

Hindi Short Story

मॉडर्न टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठाकर आजकल की ये कामकाजी बच्चियां घर-बाहर सब मैनेज कर तो लेती हैं, फिर क्यों पुरानी लीक पर अड़ी सासें ख़ुद को नहीं बदलतीं? घर के कामकाज का रोना रोकर क्यों कलह मचाए रखती हैं? इन बच्चियों को ज़रा-सा प्यार, सम्मान मिल जाए, तो कैसी खिली-सी रहती हैं और यह भी तो कम बड़ी बात नहीं कि स्वधा को ऑफिस के काम करते हुए भी घर के हर सदस्य की ज़रूरत का ध्यान रहता है.

फोन रखकर मैं सिर पकड़कर बैठ गई थी. ऑफिस के लिए बिल्कुल तैयार स्वधा मेरे माथे पर बल देखकर ठिठक गई. पूछा, “क्या हुआ मां? किसका फोन था?”

“रमाबाई नहीं आएगी.”

“ओह! यह भी ऐन मौ़के पर धोखा देती है.” वह फिर वापस मुड़ गई. बोली, “मां, मैं लेट हो रही हूं, निकलती हूं, आप बिल्कुल परेशान न हों.”

“परेशान कैसे न होऊं? कितने दिनों बाद मैंने अपनी सहेलियों को लंच पर बुलाया है. अब कहां मैं किचन में खड़े होकर ज़्यादा देर तक खाना बना सकती हूं? ओह! अब क्या करूं?”

“डोंट वरी मां, आप किचन में मत जाना, मैं सब मैनेज कर दूंगी, बाय मां.” कहते-कहते वह घर से निकल गई. मैं सिर पर हाथ रख बैठी रह गई. स्पाइन की कुछ समस्या के कारण कमरदर्द रहने से मेरा किचन में ज़्यादा काम करना छूट गया है. रमाबाई ही खाना बनाती है. मेरे पति अनिल और बेटा अंकित तो टूर पर गए हैं. हम सास-बहू ही आजकल घर पर हैं, तो मैंने अपनी फ्रेंड्स को आज घर पर बुला लिया था. अब? हम पांचों फ्रेंड्स अंकित और स्वधा के विवाह के बाद आज ही मिल रहे हैं. अंकित के विवाह को चार महीने ही हुए हैं. यहीं मुंबई में ही दोनों जॉब करते हैं. मुझे स्वधा अच्छी लगती है. मुझे ऐसी ही तो बहू चाहिए थी, हंसमुख, हमें प्यार करनेवाली. बस, स्वधा का किचन में जाने का मूड नहीं होता. हफ़्तेभर तो ऑफिस के काम रहते हैं, वीकेंड में वह आराम के मूड में रहती है, स्वाभाविक है. मुझे इससे कोई शिकायत नहीं. मैं पारंपरिक सास की तरह अपने बेटे-बहू पर कोई बंदिश लगाना ही नहीं चाहती. बच्चे हैं, उनकी भी लाइफ है. उन्हें अपनी मर्ज़ी से जीने का पूरा हक़ है. मैं तो कई बार यह सोचती हूं कि अगर कामकाजी बहू किचन में घुसना न चाहे, तो बुरा क्या है. सास बहू का करियर, उसकी डिग्रियों का महत्व क्यों नहीं समझती? बेटे ने डिग्रियां ली हैं, तो बहू ने भी मेहनत से अपना करियर संवारा है. बेटा छुट्टीवाले दिन पूरा आराम चाहता है, तो कामकाजी बहू को भी तो आराम की ज़रूरत है. घर के कामों का विकल्प हो, तो बहू को ही क्यों किचन में जाने के लिए बाध्य किया जाए.

ख़ैर, अब तो यह सोचना है कि क्या करूं. स्वधा को देर हो रही थी, वह निकल गई है. मैं किचन में कुछ बना भी लूंगी, तो खड़े होने से मेरी तकलीफ़ बढ़ जाएगी. दर्द शुरू हो जाएगा, तो अपनी फ्रेंड्स के साथ बैठने का आनंद कैसे लूंगी? इतने में ही मेरे व्हॉट्सएप पर स्वधा का मैसेज आया- आप चिंता न करना मां, मैंने आप सबके लिए खाना ऑर्डर कर दिया है, सब पहुंच जाएगा. और साथ में ढेर सारी किसेज़ की इमोजी देखकर मुझे हंसी आ गई. मैंने भी ‘थैंक्यू वेरी मच’ लिखते हुए किसेज़ की ख़ूब सारी इमोजी डालकर जवाब दिया. यह हम सास-बहू का पूरा दिन चलता है. मुझे हंसी आ रही थी. यह लड़की भी न! ऑर्डर करने में बहुत होशियार है, मुंह से कुछ निकलते ही झट से ऑनलाइन ऑर्डर कर देती है. इतने में डोरबेल बजी. मेड शीतल आई थी. मैंने उससे कहा, “शीतल, आज ज़रा अच्छी तरह से सफ़ाई करना.”

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“क्या हुआ मैडम?”

“लंच पर मेरी फ्रेंड्स आ रही हैं.” शीतल हमारी दस साल पुरानी मेड है, इतनी पुरानी मेड तो घर के सदस्य की ही तरह हो जाती है. बोली, “वाह, खाना बन गया?”

“नहीं, रमाबाई ने छुट्टी कर दी.”

“ओह! मैं कुछ काम कर दूं?” वह जानती है मेरे स्वास्थ्य के बारे में. मैंने कहा, “नहीं स्वधा ने सब ऑर्डर कर दिया है.” शीतल ने जैसी नज़रों से मुझे देखा, हम दोनों हंस पड़ीं. शीतल ने हंसते-हंसते कहा, “बाप रे! छोटी मैडम कितना ऑर्डर करती हैं.” मैं मुस्कुराते हुए सामान समेटने लगी, शीतल अपना काम करने लगी.

अचानक मैं पिछले चार महीनों पर नज़र डालने लगी. स्वधा जबसे आई है, हर समस्या का समाधान चुटकियों में खोज देती है. विवाह की भागदौड़ के बाद मेरी कमर का दर्द बढ़ गया, तो एक दिन उसने ऑफिस से ही ऑर्डर करके सरप्राइज़ में कुछ भेजा. मैंने डिलीवरी लेकर बॉक्स खोला, उसमें दर्द में सिंकाई के लिए एक इलेक्ट्रिक बॉटल थी, जो घंटों गर्म रह सकती थी. अभी तक मैं पुरानी तरह की ही बॉटल में पानी गर्म करके सेंकती थी. कभी-कभी आलस भी आ जाता था. मैं उसका यह सरप्राइज़ देखकर बहुत ख़ुश हुई थी. मैंने स्वधा को थैंक्स कहने के लिए उसी समय फोन किया था, तो हंसी थी. “मां, अच्छा लगा न सरप्राइज़?”

मैंने कहा था, “यह तो बहुत अच्छी चीज़ है, तुम्हें कैसे ख़्याल आया?”

“अरे, सब मिलता है मां, यह तो अंकित को पहले ही ऑर्डर कर देनी चाहिए थी.”

बहुत काम की चीज़ निकली थी यह. मुझे काफ़ी आराम हुआ था. अनिल को कई दिन से हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत हो रही थी. वे बार-बार चेक करवाने के लिए डॉक्टर के पास जाते. एक दिन शाम को अचानक एक पार्सल आया. उसमें ब्लड प्रेशर चेक करने की मशीन थी. स्वधा ने ही ऑर्डर की थी. अनिल हंस पड़े थे, “यह तो बहुत अच्छा है हमारे घर में ऑर्डरवाली बहू आई है. ऑफिस से ही हमारी ज़रूरतों की चीज़ें ऑर्डर करती रहती है.”

वीकेंड में अगर रमाबाई न आए, तो स्वधा पूछती है, “मां कुछ ऑर्डर कर लें?” मैं कभी मना नहीं करती. सोचती हूं, रोज़ सब घर का बना ही तो खाते हैं. सब टिफिन लेकर जाते हैं. आज स्वधा को टिफिन नहीं चाहिए था, उसके ऑफिस में पार्टी थी. हां, तो फिर स्वधा सबकी पसंद का ध्यान रखते हुए ऑर्डर करने का काम संभाल लेती है.

शीतल काम करके चली गई, तो मैं भी नहा-धोकर तैयार हो गई. कामिनी, नीरा, आरती और मंजू तय समय पर आ गईं. स्वधा के आने के बाद हम आज पहली बार मिल रहे थे. हालचाल के बाद नीरा ने पूछा, “रश्मि, कैसा लग रहा है सास बनकर?”

“बहुत अच्छा! बेटी की कमी पूरी कर दी स्वधा ने. बहुत प्यारी बच्ची है. मुझे ऐसी ही बहू चाहिए थी.” इतने में डोरबेल बजी. हमारा खाना आ गया था. आरती ने पूछा, “कौन है?”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हमारा लंच.”

“अरे, रमाबाई नहीं आई क्या?”

“नहीं.”

“ओह! फिर तो तुम्हें तकलीफ़ हो गई.”

“तकलीफ़ कैसी? घर में ऑर्डरवाली बहू आई है. ऑटो में बैठते ही लंच का ऑर्डर कर दिया था उसने.”

“सच?” फिर तो उन्हें स्वधा की ऑनलाइन मंगवाई चीज़ें बताने लगी. सब हैरान थीं. ख़ुश भी. अब तक हम पांचों में बस आरती को ही ऑनलाइन ऑर्डर से चिढ़ होती थी. जब तक वह दुकान-दुकान न भटक ले, उसकी शॉपिंग पूरी नहीं होती थी. उसकी फैमिली इस बात से ख़ूब परेशान रहती है. सब्ज़ी भी दस ठेलों पर देखकर ही ख़रीदती है.

आरती ने आदतानुसार कहा, “पता नहीं कैसा स्वाद होगा, कब का बना भेज दिया होगा और चीज़ें भी पता नहीं कैसी निकलेंगी?”

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नीरा ने कहा, “अच्छी ही रहती हैं. कुछ वापस भी करना हो, तो आराम से वापस होता है. दुकान-दुकान भटकने की एनर्जी अब हममें भी तो नहीं बची.”

मैंने पार्सल खोला. गर्म-गर्म पंपकिन सूप भी था. स्वधा जानती है मुझे सूप पीने का बहुत शौक़ है. हम जब भी बाहर जाते हैं, मैं सूप कभी मना नहीं करती. पिछली बार पंपकिन सूप पीया था. मुझे बहुत अच्छा लगा था. स्वधा ने कहा भी था, “मां, जब मन हो, बताना. मैं ऑर्डर कर दूंगी.” अंकित उस समय ज़ोर से हंसा था. कहा था, “मां, स्वधा को बस एक बार कुछ बोलो कि आपको क्या चाहिए. होम डिलीवरी हो जाएगी.”

हम सब इस बात पर उसे ख़ूब छेड़ते हैं, वह भी हंसती रहती है. सूप गर्म था. ठंडा न हो जाए, मैं सबके लिए निकालकर ट्रे में रखने लगी. सबको सूप बहुत पसंद आया, फिर कामिनी ने कहा, “चलो, देखते हैं और क्या ऑर्डर किया है बहूरानी ने. देखा, तो स्टार्टर्स थे- शाही पनीर, मिक्स वेज और नान. सबके मुंह से एक साथ निकला, “अरे, वाह, चलो खाते हैं.” हम सबने खाने का भरपूर लुत्फ़ उठाया. आइस्क्रीम तो एक दिन पहले आ ही गई थी. कुछ देर बातें होती रहीं. उसके बाद सब जाने के लिए उठने लगीं, तो आरती ने कहा, “सुनो.” हम सबने उसे प्रश्‍नवाचक निगाहों से देखा, तो वो मुस्कुराते हुए बोली, “बहू तो कमाल है. हम सबके लिए शानदार लंच मैनेज करवा दिया. मैं भी ऐसी ही बहू लाऊंगी?” नीरा ने उसे चिढ़ाया, “पहले बीस जगह घर-घर जाकर लड़की नहीं देखोगी?” सब हंस पड़े. सब चली गईं, तो मैंने स्वधा को फोन किया, “थैंक्यू बेटा, बहुत अच्छा लंच था. हम सबने बहुत एंजॉय किया.”

“गुड, अब आप रेस्ट करना और हां, शाम को भी रमाबाई नहीं आई, तो किचन में मत घुस जाना.”

“हां, ठीक है. काफ़ी खाना रखा भी है.”

“ठीक है फिर, हम दोनों ही तो हैं.”

मैं सामान समेटकर थोड़ी देर आराम करने के लिए लेट गई. ध्यान स्वधा की तरफ़ ही था. प्यार आ रहा था उस पर मुझे, नई तकनीक का लाभ सबसे ज़्यादा इन बच्चियों को ही हुआ है शायद. घर में कोई किटकिट नहीं, प्यार और शांति ही तो चाहिए होती है. मॉडर्न टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठाकर आजकल की ये कामकाजी बच्चियां घर-बाहर सब मैनेज कर तो लेती हैं, फिर क्यों पुरानी लीक पर अड़ी सासें ख़ुद को नहीं बदलतीं? घर के कामकाज का रोना रोकर क्यों कलह मचाए रखती हैं? इन बच्चियों को ज़रा-सा प्यार, सम्मान मिल जाए, तो कैसी खिली-सी रहती हैं और यह भी तो कम बड़ी बात नहीं कि स्वधा को ऑफिस के काम करते हुए भी घर के हर सदस्य की ज़रूरत का ध्यान रहता है. गर्मी, सर्दी, बरसात, पीरियड के दिनों में महानगरों में आना-जाना, फिर दिनभर ऑफिस में काम करना आसान है क्या? मुझे तो लगता है घरों में ज़्यादातर कलहों का कारण सास की पुरानी सोच ही है. मतलब यह कि बेटे की शादी के बाद बदलने की ज़रूरत बहू को नहीं, सास को ज़्यादा है. स्वधा के ही बारे में सोचते-सोचते मेरी पलकें मुंदने लगी थीं.

Poonam ahmed

पूनम अहमद

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