कहानी- अर्द्धविराम 3 (Story...

कहानी- अर्द्धविराम 3 (Story Series- Ardhviraam 3)

अगली सुबह रिचा ने चाय बनाई. हमेशा की तरह आरव चाय और पेपर लेकर उनके कमरे में आया. “गुड मॉर्निंग शहंशाहे आलम, हाज़िर है आपकी चाय और पेपर.” फीकी-सी मुस्कुराहट उनके चेहरे पर आकर लुप्त हो गई.
चाय का कप पकड़ पेपर उसे देते हुए वे बोले, “पेपर पहले तुम्हीं पढ़ो. मैं तो खाली हूं सारा दिन. कभी भी पढ़ लूंगा.” कहते हुए उनके चेहरे पर दर्द की लकीरें उभर आईं.
किंतु आरव ने पेपर टेबल पर रखते हुए कहा, “नहीं पापा, पेपर पहले आप ही पढ़िए. आप जानते हैं, मुझे बेड टी के साथ रिचा की डांट खाने की आदत है.”

दरअसल, अभी तक उन्होंने अपने रिटायरमेंट को गंभीरता से लिया ही नहीं था. कभी नहीं सोचा था, आगे क्या करेंगे. स्वयं को इस स्थिति के लिए पहले ही तैयार कर लेते, तो खालीपन का एहसास मन को नहीं सालता. पहले जीवन कितना व्यवस्थित था. सुबह नहा-धोकर घर से ऑफिस के लिए निकलते, तो देर शाम ही घर लौटते, किंतु अब तो कोई नियमितता नहीं रही. सुबह सैर पर से लौटकर क्या करें? पहाड़-सा दिन काटे नहीं कटता था. कितना पेपर पढ़ें, कितना टीवी देखें. अंजलि कहीं ले जाना चाहती, तो इंकार कर देते. सारा समय घर में ही पड़े सोचते रहते. मन में आशंकाओं के बादल उमड़ते-घुमड़ते. पता नहीं बेटा-बहू कैसा व्यवहार करें? आख़िर हैं तो वे भी इसी पीढ़ी के. कोई ज़माने से अलग तो हैं नहीं. इसी ऊहापोह में आठ दिन गुज़र गए.
आरव, रिचा और सनी घर लौटे, तब तक वह बिल्कुल निराश हो चुके थे. लग रहा था, ज़िंदगी में कुछ भी नहीं बचा है. सब समाप्त हो गया है.
रात में आरव ने आश्‍चर्यचकित हो अंजलि से पूछा, “मम्मी, पापा को क्या हो गया है? दस दिन में ही कितने कमज़ोर लग रहे हैं.”
अंजलि का मन भर आया, “अब तुम आ गए हो. तुम्हीं समझाओ. रिटायर हो जाने से कोई इतना निराश होता है क्या? कहते हैं, मेरी ज़िंदगी के चैप्टर पर पूर्णविराम लग गया है. अब मैं ज़्यादा जी नहीं पाऊंगा.”
आरव गंभीर हो उठा और अपने कमरे में चला गया. अगली सुबह रिचा ने चाय बनाई. हमेशा की तरह आरव चाय और पेपर लेकर उनके कमरे में आया. “गुड मॉर्निंग शहंशाहे आलम, हाज़िर है आपकी चाय और पेपर.” फीकी-सी मुस्कुराहट उनके चेहरे पर आकर लुप्त हो गई.
चाय का कप पकड़ पेपर उसे देते हुए वे बोले, “पेपर पहले तुम्हीं पढ़ो. मैं तो खाली हूं सारा दिन. कभी भी पढ़ लूंगा.” कहते हुए उनके चेहरे पर दर्द की लकीरें उभर आईं.
किंतु आरव ने पेपर टेबल पर रखते हुए कहा, “नहीं पापा, पेपर पहले आप ही पढ़िए. आप जानते हैं, मुझे बेड टी के साथ रिचा की डांट खाने की आदत है.”
तभी पीछे से रिचा बोली, “आहा, पापा आप ही कहिए, डांटते यह हैं या मैं?”
“पापा मेरी साइड लेंगे.” आरव बोला. रिचा उनके पास बैठ गई. उन दोनों की मीठी नोंक-झोंक का वे आनंद उठाते रहे.
चाय के बाद रिचा बोली, “पापा, आप क्या सनी को बस स्टॉप तक छोड़ देंगे?”

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“हां हां, क्यों नहीं.” झटपट वे तैयार हो गए. सनी की उंगली पकड़कर बस स्टॉप तक जाते हुए उसकी प्यारी-प्यारी बातों ने उनके मन को हल्का कर दिया. यूं भी पोता उन्हें बेहद प्यारा था. घर लौटकर वे रिचा से बोले, “आज से सनी को छोड़ने और लाने का काम मेरा है. अब तुम्हें जाने की आवश्यकता नहीं है.”
“ठीक है पापा.” रिचा प्रसन्न हो गई.
अगले दिन छुट्टी के समय वे सनी को लेने घर से निकल रहे थे कि अंजलि ने हाथ में थैला देते हुए कहा, “सुनिए, लौटते हुए सब्ज़ी ले आया कीजिए.”
“मम्मी, सब्ज़ी मैं और आरव ले ही आते हैं.” रिचा ने कहा. अंजलि बोली, “एक सप्ताह की सब्ज़ी फ्रिज में पड़े-पड़े बासी हो जाती है. अब पापा घर में रहते हैं, फिर क्यों न ताज़ी सब्ज़ी मंगवाई जाए.”
उन्हें बुरा लगा. आज से पहले उन्हें याद नहीं, अंजलि ने कभी उनसे सब्ज़ी लाने को कहा हो. पहले यह काम वह स्वयं करती थी. बाद में आरव और रिचा करने लगे, किंतु अब उनके रिटायर होते ही…

रेनू मंडल

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