"... नौकरी करने वाले के लिए रिटायर होने की एक आयु निश्चित है, पर एक गृहिणी की कोई रिटायरमेंट आयु नहीं है. फिर भी गृहिणी को हेय दृष्टि से देखा जाता है. उसके त्याग और परिश्रम का कोई मूल्य नहीं आंका जाता. उसकी इज़्ज़त न परिवार में होती है, न समाज में. लोग सोचते हैं कि गृहिणी का परिवार और समाज के प्रति योगदान ही क्या है?.."
"क्या करूंगा?" यह प्रश्न सुदर्शन बाबू को कचोट रहा था.
"चाय." तभी उनकी पत्नी शांता ने उनकी ओर प्याला बढ़ाते हुए कहा.
"अं... हां." वे चौंक कर बोले और प्याला थाम लिया.
"दादी, दूध." बड़े पोते की आवाज़ आई.
"लाती हूं बड़े साहब." शांता ने मुस्कुरा कर कहा.
"मेरे लिए भी दादी." छोटे पोते ने मचल कर कहा.
"ओ.के. छोटे साहब."
"ज़रा शेविंग करने के लिए पानी दे जाना मम्मी." बड़े बेटे की आवाज़ थी.
"अच्छा."
"मम्मी, एक कप चाय दे दो." छोटे बेटे ने रिरियाती आवाज़ में कहा.
"अच्छा."
"मम्मी, मेरा पेटीकोट कुर्सी पर रह गया." बाथरूम से बड़ी बहू की आवाज़ आई.
"अच्छा, देती हूं."
"मम्मी..." छोटी बहू की आवाज़ आई.
"क्या है?"
"देखिए, आपका लाड़ला कपड़े नहीं पहन रहा है. ख़ुद भी लेट हो रहा है और मुझे भी लेट कर रहा है."
"छोड़ दो. मैं दूध लेकर आती हूं तो पहना दूंगी."
सुबह का समय था. सुदर्शन बाबू परिवार की चहल-पहल से कट कर क्या करूंगा वाले प्रश्न का समाधान करने में ही उलझे हुए थे.
'मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए किसी न किसी रूप में स्वयं को व्यस्त रखना ज़रूरी है.' चाय की चुस्की लेते हुए वे सोच रहे थे.
'अब तक एक राह उपलब्ध थी, रिटायर होने के उपरांत कौन सी राह होगी...
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प्राइवेट नौकरी या अपना कोई धंधा, किन्तु वे किसी निष्कर्ष पर पहुंच नहीं पा रहे थे.
उनका ख़्याल था कि उनका रिटायरमेंट परिवार में चर्चा का विषय अवश्य बनेगा, तब शायद कोई राह निकल आए.
इतवार का दिन था.
परिवार के सभी सदस्य टीवी के सामने बैठे थे. बड़े बेटे का ६ वर्षीय पुत्र शांता की गोद में और छोटे बेटे का पांच वर्षीय पुत्र सुदर्शन बाबू की गोद में बैठा था. सुदर्शन बाबू की नज़र यद्यपि टीवी के पर्दे पर थी, पर वे अपनी समस्या का ही समाधान ढूंढ़ रहे थे.
मनपसंद टीवी कार्यक्रम देखने के बाद बेटे-बहुएं अपने-अपने कमरे में चले गए. दोनों बच्चे खेलने में मस्त हो गए. शांता जब रसोईघर में जाने के लिए उठने लगी तो उसकी नज़र गुमसुम बैठे सुदर्शन बाबू पर पड़ी. वह उठते हुए बोली, "किस सोच में डूबे हैं जी?"
"तुम्हें पता है न कि मैं बहुत जल्दी रिटायर होने वाला हूं."
"हां, मुझे ही क्या, परिवार में सभी को पता है." वह सहज स्वर में बोली, "यह तो आपके लिए अच्छा ही होगा कि रोज-रोज़ की भागदौड़ से मुक्ति मिल जाएगी."
उन्होंने तो यह अपेक्षा की थी कि वह गंभीरतापूर्वक इस समस्या पर बात करेगी, पर उसकी बात सुनकर वह हताश हो गए.
परिवार के सभी सदस्य रात्रि का भोजन एक साथ ही करते थे. शांता के विचार तो वह जान ही चुके थे, बेटों-बहुओं के विचार जानने के लिए उन्होंने यह बात छेड़ दी.
"तो अब आप किसलिए चिंतित हैं पापा?" बड़ा बेटा उनकी ओर यह प्रश्न उछाल कर चुपचाप खाने लगा.
"हां, और क्या!" उस प्रश्न का छोर संभालते हुए छोटे बेटे ने कहा, "अपनी गृहस्थी तो बिल्कुल व्यवस्थित है."
"अब आपकी उम्र भी आराम करने की हो गई है पापा." बड़ी बहू ने मधुर स्वर में कहा.
"हां पापा, आपने बहुत खट लिया." छोटी बहू ने कहा, "अब हम चार कमाने वाले है, फिर चिंता किस बात की है?"
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सुदर्शन बाबू के होंठों पर एक कटु मुस्कान बिखर गई. 'ये लोग आर्थिक पक्ष को ही महत्वपूर्ण मान रहे हैं?' वे सोचते हुए खा रहे थे, 'क्या यह जीवन केवल पैसे के बल पर चलता है? पैसा रहते हुए भी क्या जीवन में धुन नहीं लग जाता? आराम करने का मतलब यह तो नहीं होता कि निष्क्रिय होकर बिस्तर पर पड़े रहो. उन्होंने कनखी से शांता की ओर देखा, वह सर्वधा मौन थी.
आख़िर वह दिन आ ही पहुंचा, जिस दिन सुदर्शन बाबू को रिटायर होना था. वे उदासी और ख़ुशी के दोराहे पर खड़े थे. उन्हें ख़ुशी इस बात से हो रही थी कि वे अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार अपने कर्तव्यों का भलीभांति निर्वाह करके रिटायर हो रहे थे और उदासी का कारण वहीं था यानी खाली समय कैसे कटेगा.
सुदर्शन बाबू सोच की मुद्रा में ही घर पहुंचे. बाहर का दरवाज़ा बंद था. उन्होंने अनमने मूड में कॉलबेल के बटन पर उंगली रख दी
शांता ने दरवाज़ा खोला. उनके हाथ में फूल की मालाएं और उपहारस्वरूप प्राप्त ब्रीफकेस देख कर वह मुस्कुराईं, फिर थोड़ा झुक कर कहा, "वेलकम होम, सर."
वे होंठों पर औपचारिक मुस्कान बिखेर कर बैठक में प्रवेश कर गए, सेंटर टेबल पर मालाएं और ब्रीफकेस रख कर सोफे पर बैठते हुए कहा, "मेरे रिटायर होने से तुम बहुत ख़ुश दिख रही हो शांता, है न?"
"क्योंकि इस समय मुझे आपका साथ चाहिए." उनके बगल में बैठती हुई वह बोली, "अब मुझे खाली-खाली सा घर बहुत खलता है. मैं बहुत एकाकी महसूस करती हूं. बेटे-बहुएं नौकरी पर ही चले जाते हैं. जब पोते छोटे थे तो उनकी देखभाल में मन उलझा रहता था. वे अब स्कूल जाने लगे. वैसे तो घर में सुबह-शाम सभी रहते हैं, फिर भी मैं अकेली रहती हूं. नौकरी करने वाली बहुओं के पास सुबह में बिल्कुल समय नहीं है और उनका संध्या का समय अपने पति और बच्चों के लिए है. नौकरी करने वालों के लिए छुट्टी का दिन आराम करने का दिन होता है, चाहे वे उसे मनोरंजन करके बिताएं या सो कर या सैर-सपाटे करके, एक गृहिणी के लिए ही कोई भी दिन छुट्टी का दिन नहीं होता."
सुदर्शन बाबू ध्यानपूर्वक और शांतिपूर्वक शांता की बातें सुन रहे थे, वस्तुतः वे शांता के मनोभावों को आज ही पकड़ पाए थे. वैसे शांता ऐसी भावनाएं पहले भी कई अवसरों पर व्यक्त कर चुकी थी, किन्तु तब वे उसकी भावनाओं को एक गृहिणी की झुंझलाहट समझ कर हंसी में उड़ा देते थे. वे अतीत में झांकने लगे...
शांता ग्रेजुएट थी. वह अपनी शिक्षा का उपयोग नौकरी में करना चाहती थी, पर पिताजी को यह बात पसंद नहीं थी. शांता ने भी पिताजी की भावनाओं का विरोध नहीं किया. गृहस्थी का सारा बोझ उसके कंधों पर आ गया.
एक बहन थी, पर शांता ने उसकी पढ़ाई में कभी विघ्न नहीं डाला. समय व्यतीत होने के साथ ही वह दो बेटों और एक बेटी की मां बन गई. उनके पालन-पोषण का भार भी उसने ही उठाया.
समय अपनी रफ़्तार से भागता रहा, बहन ससुराल चली गई, मां-पिताजी का स्वर्गवास हो गया. परिवार सिमट अवश्य गया, पर शांता के दायित्व में कोई कमी नहीं आई.
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गृहस्थी का बोझ ढोने में वे शांता की मदद कर नहीं पाते थे. सुबह से शाम तक का सारा समय कार्यालय जाने-आने में ही ख़र्च हो जाता था. कार्यालय से लौटने के बाद वे इस क़दर थक जाते थे कि चाहते हुए भी घरेलू कार्यों में शांता का हाथ नहीं बंटा पाते थे. सरकारी कार्यालयों में परिश्रम और ईमानदारी से काम करने वाले को यही तो एक पुरस्कार मिलता है कि उसे ख़ूब खटाया जाता है. उन्हें छुट्टी के दिन कोई भी काम करने की इच्छा नहीं होती थी.
एक दिन शांता झुंझलाकर बोली, "नौकरी करने वाले को तो आराम करने के लिए छुट्टी का दिन भी मिल जाता है, पर एक गृहिणी को आराम करने के लिए एक दिन भी नहीं मिलता. नौकरी करने वाले के लिए रिटायर होने की एक आयु निश्चित है, पर एक गृहिणी की कोई रिटायरमेंट आयु नहीं है. फिर भी गृहिणी को हेय दृष्टि से देखा जाता है. उसके त्याग और परिश्रम का कोई मूल्य नहीं आंका जाता. उसकी इज़्ज़त न परिवार में होती है, न समाज में. लोग सोचते हैं कि गृहिणी का परिवार और समाज के प्रति योगदान ही क्या है?.."
"ब्रीफकेस बढ़िया है." शांता ने कहा.
उसकी आवाज़ पर सुदर्शन बाबू अतीत से वर्तमान में लौट आए, उन्होंने शांता की ओर देखा. वह ब्रीफकेस को उलट-पलट कर देख रही थी.
रात्रि का सन्नटा बिछ चुका था.
सुदर्शन बाबू को नींद नहीं आ रही थी. वे कभी इस करवट पर हो रहे थे तो कभी उस करवट पर. उन्हें ऐसा एहसास होने लगा था कि उन्होंने शांता के साथ बड़ा अन्याय किया है. वे सोच रहे थे, 'सच, शांता के बारे में कभी सोचा ही नहीं. वह जब नौकरी करना चाहती थी तो उसकी इच्छा को मां-पिताजी ने गृहस्थी के बोझ तले दबा दिया. जब बहुएं आई तो शांता ने अपनी इच्छा को उन पर लादने की कभी कोशिश नहीं की. गृहस्थी का बोझ ख़ुद ही उठाती रही. घरेलू कार्यों में बहुओं का थोड़ा-बहुत सहयोग उसे अवश्य प्राप्त हो जाता था, पर उन्हें सुबह में बिल्कुल समय नहीं मिलता था.
शांता ही एक ऐसी प्राणी थी, जो सुबह में सबके लिए उपलब्ध थी. मुझे अलसुबह चाय पीने की आदत है. शांता को मेरे लिए चाय बनाने के लिए तड़के उठना ही पड़ता था, चाहे वह जितनी भी रात को सोए. बेटों, बहुओं और पोतों के लिए उसे ही नाश्ता और लंच तैयार करने पड़ते थे. सोचते-सोचते पता नहीं, उन्हें कब नींद आ गई.
सुदर्शन बाबू तड़के ही उठ गए. पहले वे तभी उठते थे, जब शांता चाय लेकर आती थी.
उन्होंने शांता की ओर देखा. वह आज बड़े इत्मीनान से सो रही थी. उन्होंने उसका ललाट और हाथ छू कर देखा कि कहीं बुखार तो नहीं है, पर सब कुछ ठीक ठाक देख कर उन्हें बड़ा सुकून मिला.
वे स्वयं चाय बनाने के लिए रसोईघर में पहुंच गए. आज वे बहुत दिनों के बाद रसोईघर में गए थे. जब से बहुएं आई थीं, उन्हें रसोईघर में जाने का मौक़ा नहीं मिला था. उन्हें चाय-चीनी ढूंढ़ने में कोई परेशानी नहीं हुई. रैकों पर करीने से सजा कर रखे गए सारे डिब्बों पर चीज़ का नाम लिखी पर्चियां लगी थीं. दूध फ्रिज़ में था.
अलसुबह शांता सिर्फ़ दो प्याले चाय बनाती थी एक अपने लिए और दूसरा सुदर्शन बाबू के लिए, बाद में सभी के लिए चाय बनती थी. कभी शांता बनाती थी तो कभी कोई बहू. आज उन्होंने सभी के लिए चाय बना दी और एक प्याला चाय लेकर वे रसोईघर में ही खड़े-खड़े सुडकने लगे.
वे चाय पीकर प्याला सिंक में रख ही रहे थे कि बहू आ गई. रसोई शघर में उन्हें देख कर वह आश्चर्य से बोली, "आप किचन में क्या कर रहे हैं पापा?"
"आज मेरी नींद सबेरे ही टूट गई कांता बेटी." वे हंस कर बोले, "मैंने सभी के लिए चाय तैयार कर दी है."
"मम्मी कहां है?"
"वह सो रही है."
"उनकी तबीयत ठीक है न पापा?"
"हां, हां, बिल्कुल ठीक है. दरअसल, आज से मुझे ऑफिस नहीं जाना है न, इसलिए वह इत्मीनान से सो रही हैं.”
कांता मुस्कुरा कर चाय डालने लगी.
"अपनी मम्मी के लिए एक प्याला दे दो बेटी."
कांता ने मुस्कुराते हुए चाय का प्याला दे दिया. वे उसे लेकर शांता के पास चले गए. पलंग के पास खड़े होकर कुछ क्षण उसे निहारते रहे, फिर धीरे से कहा, "शांता."
उनकी आवाज़ पर वह हड़बड़ा कर उठ बैठी और उनींदी आंखों से इधर-उधर देखती बोली, "अरे, मैं अब तक सोई रही?"
"चाय गरम." उन्होंने रेलवे प्लेटफॉर्म की तरह आवाज़ लगाई.
"आपने चाय बनाई?" कह वह एक भोली बच्ची की तरह मुस्कुरा पड़ी.
और सुदर्शन बाबू सोच रहे थे कि पति-पत्नी को एक-दूसरे की ज़रूरत बुढ़ापे में ही अधिक होती है.
- घनेश्वर प्रसाद
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