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कहानी- मुरादों वाले दिन (Short Story- Muradon Wale Din)

सुषमा मुनीन्द्र

सुषमा मुनीन्द्र

पुजाई कराने बेटे-बहू को लेकर बूंदी पहुंची पांचाली से अम्मा ने पूछा, “पन्ना, तुम्हारी इज़्ज़त करती है न?” “हां अम्मा. पन्ना क्या आई, मुरादों वाले दिन आ गए. उसे गृहस्थी सौंप कर आराम फरमा रही हूं.” अम्मा के चेहरे में छा गया अकाल, दरअसल पांचाली का विजयोत्सव था.

गैजेट्स की तरह शायद मनुष्य के स्मृति कोष में भी इनबॉक्स होता है. चूंकि इस इनबॉक्स की निर्धारित सीमा नहीं है, इसलिए मेमोरी फुल होने पर कुछ संदेशों को डिलीट नहीं करना पड़ता. लेकिन परिवर्तित वक़्त उन स्मृतियों को डिलीट करता चलता है, जो जीवन का खाका बनाने में ज़रूरी भूमिका नहीं निभाती.

ज़रूरी भूमिका निभाने वाली स्मृतियां, स्थितियां उम्र के किन्हीं मोड़ों पर सामने आती रहती हैं और पुराने होते गए जीवन से मुलाक़ात करा देती हैं.

पांचाली के दांपत्य के 27 वर्ष. किशोरी युवती.. स्त्री.. पत्नी.. गृहिणी.. विमाता.. माता..! क्या खोया और क्या पाया, इसका मुकम्मल जवाब उसके पास नहीं है.

कितनी आकांक्षाएं... कितनी कल्पनाएं... सम्पन्न जीवन जीने की कल्पनाएं साकार हुईं जबकि अपने लिए बहुत कोमल लेकिन गहरे एहसास बुनने-चुनने की किशोर और युवा आकांक्षाएं अपूर्ण रह गईं.

वह 27 वर्षों का स्पर्श और स्मरण करती है, तो ऐसी विस्मित होती है मानो यह सब पिछले जन्म का घटित है. लगता है आयु और वक़्त उतना नहीं बीता है जितनी उसकी विचारधारा बदल गई है. कितना अलग सोचती थी. कितना अलग सोचने लगी है.

स्कूल मास्टर पिता की सिफर गृहस्थी. तीन बेटियों में सबसे छोटी पांचाली. दोनों बड़ी बेटियां जब भी धारकुंडी (मायके) आतीं, अपने अभावग्रस्त विवाह का ब्योरा देकर घर के अभाव को बढ़ा देतीं.

मां का कलेजा कसकता, “इतनी सुंदर, गुणी लड़कियां, लेकिन सम्पन्न घर न मिले.” अपनी अक्षमता पर बाबू के कंधे झुक जाते, “मेरे पास ख़ूब धन होता, तो मिल जाते. इन दोनों की शादी का कर्ज़ नहीं चुका पा रहा हूं. पांचाली की शादी कैसे होगी?”

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पांचाली ने विसंगति का सरलीकरण किया, “बाबू, मेरा पी.जी. होने दो. टीचर बन जाऊंगी. कहोगे तो एक सुपात्र ढूंढ़ लूंगी. प्रेम विवाह में तुम्हें ख़र्च नहीं करना पड़ेगा.” अम्मा की कसक बढ़ गई, “भली लड़कियां प्रेम-पियार नहीं करतीं. विधाता सबका जोड़ा बनाता है. तुम्हारा भी बनाया होगा.”

जोड़े बनानेवाले विधाता का फरेब देखो. सिफर गृहस्थी का संचालन करते हुए अम्मा असहिष्णु हो गई थी, लेकिन मतलब की बात करनी हो तो उनके मुख की तनी लकीरों में आग्रहभरी दीनता आ जाती है, “पांचाली, एकनाथ (बड़े दामाद) बहुत अच्छा रिस्ता बताए हैं. शेषमणि डॉक्टर हैं. दइया-दहेज एक्कौ नहीं मांग रहे हैं. जमी-जमायी गृहस्थी है. पांच साल का एक ठो लड़िका है.”

पांचाली की युवा आकांक्षा विधुर की पत्नी बनने को तत्पर नहीं थी.

“अम्मा, तुम्हें जमी-जमाई गृहस्थी दिख रही है. पांच साल का बच्चा नहीं दिख रहा?”

“पांचाली, दूसरी पत्नी एहसान की तरह रहती है. पति दबा रहता है. एकनाथ बता रहे हैं, डॉक्टर की ख़ूब आमदनी है. तुम्हारी बड़ी बहनें किल्लत में रहती हैं. जी ललकता है. किसी बेटी को तो सुखी देखूं.”

सम्पन्न जीवन जीने की पांचाली की स्वाभाविक इच्छा हो आई. नहीं सोच रही थी अवास्तविक न सही, लेकिन असाधारण स्थिति है, जिसके व्यापक असर से मुक़ाबला करना पड़ेगा. आरंभिक विरोध के बाद वह सहमत हो गई.

खानापूर्ति के लिए किए गए विवाह में शेषमणि ने ख़ूब सादगी दिखाई. वांछित बचत से मां-बाबू प्रसन्न. किसी ने नहीं सोचा शेषमणि का यह दूसरा विवाह है, लेकिन पांचाली का पहला है. वह इतना उत्सव ज़रूर चाहती है कि विवाह, विवाह जैसा लगे.

बूंदी (शेषमणि का गांव) में अवसर मंगल का था, पर मातम का सा आभास मिल रहा था. मधुयामिनी का कमरा, बिस्तर में बिछी नई चादर के अलावा श्रीविहीन था. इस रात के लिए हर युवती की तरह पांचाली ने भी तमन्ना की थी, लेकिन कमरे की सादगी और पैंतीस वर्ष के शेषमणि को देखकर आहत हो गई.

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शेषमणि नहीं समझ पा रहे थे 23 वर्षीय पांचाली से क्या बोलें. आयु अंतर का संकोच, दूसरे विवाह की विवशता, उन्मेष (पुत्र) का भार पांचाली को सौंपने की झिझक, इसी कमरे में पहली पत्नी निधि के साथ हुए पहले मिलन का असर. वे असमंजस में थे. आख़िर मंतव्य कहा, “पांचाली, समझ रहा हूं तुम्हें अलग परिस्थिति मिली है... निधि के न रहने पर अम्मा ने उन्मेष को जिस तरह दुलार दिया, वह हठी हो गया है. बच्चा यदि तुम्हारे साथ ज़िद्दी होकर व्यवहार करे, तो बुरा न मानना... धीरे-धीरे मिलनसार हो जाएगा.”

पांचाली चाहती थी दांपत्य का आरंभ उन्मेष की फ़िक्र व्यक्त करते हुए नहीं, बल्कि कुछ अच्छे संवाद से हो.  कुछ देर चुप रही फिर पूछा, “उन्मेष आपके साथ सोहागपुर में नहीं रहता?”

“रहता था. लेकिन इधर मुझे अस्पताल से फ़ुर्सत नहीं मिलती. अम्मा उन्मेष को बूंदी ले आईं. बेचारे का स्कूल छूट गया. तुम आ गई हो. उसे सोहागपुर ले चलना है.”

पांचाली, बूंदी में आठ दिन रही. परिजन निधि की स्मृति, उन्मेष की चिंता, शेषमणि की लाचारी को प्रमुख मान रहे थे. ख़्याल नहीं था पांचाली क्या सोच रही है. वह पछीती (घर के पीछे) बने स्नान गृह की ओर जा रही थी. संकरे-अंधेरे गलियारे में अम्मा और विवाह में आई विधि (निधि की बड़ी बहन) मद्धिम स्वर में अपना मर्म सुना रही थीं.

विधि का स्वर, “निधि ने सुख न जाना. ठाट उसे ही मिलता है, जिसके भाग्य में लिखा हो.”

पांचाली सदमे में- मैंने ऐसा ठाट पाने की चेष्टा तो क्या कामना तक नहीं की.

अम्मा का स्वर, “सेस, दूसर बियाह नहीं करत रहा, पै घर-गिरस्ती औरत के बिगिर (बगैर) नहीं चलय.”

पांचाली सदमे में- डॉक्टर साहब दूसरा विवाह नहीं करना चाहते थे तो बिना गर्भधारण किए मैं भी मां नहीं बन जाना चाहती थी. मैं दर्द में हूं. डॉक्टर साहब का दूसरा विवाह है, पर मेरा पहला है. मैं अब इस घर की बहू हूं. मंगल बेला है. औरतों को मंगल गीत गाने को कहें, पर आप दोनों पलकें भिगो रही हैं. पांचाली अपना पक्ष रखना चाहती थी, पर उसकी मीमांसा को कोई उचित न मानता. नई बहू तर्क करने की अशिष्टता कभी नहीं करती. फिर वह तो गहन स्थिति में यहां आई है. उसके प्रत्येक क्रिया-व्यवहार को संदेह से देखा जाएगा. स्वाभाविक विरोध को षडयंत्र माना जाएगा.

और आठ दिवसीय प्रवास से लौटी पांचाली के मुख में नवपरिणीता वाली आभा नहीं थी. मां और दोनों सहोदराओं को उसका मुख नहीं गहने दिख रहे थे.

कहानी- मुरादों वाले दिन

मां ने आशीष दिया, “पांचाली, तुम सोने-चांदी से लदी रहो.”

“निधि की उतारन से मां?”

मां ने दिलासा दी, “सोना हमेशा शुद्ध और क़ीमती होता है.”

“पांचाली, तुमने इतने गहने पहने तो क्या देखे नहीं हैं. मैं तो सात जनम में इतने गहने नहीं बनवा सकती.” पांचाली को बड़ी बहन का लोभ अशोभन लगा, “दीदी, लेकिन तुम्हें जो अधिकार मिला है, मुझे नहीं मिलेगा.” मां ने पांचाली के सिर पर अजेय भाव में हाथ फेरा, “पांचाली अब तुम ऐश करना सीखो. बच्चे का ध्यान रखोगी तो डॉक्टर साहब तुम्हारे सलाहकार बनकर रहेंगे.”

पांचाली दूसरी विदा पर बूंदी आई. तीसरे दिन उसे शेषमणि के साथ सोहागपुर जाना था.

अम्मा से आग्रह किया, “अम्मा, उन्मेष को अपने साथ ले जाना चाहती हूं.”

अम्मा ने अविश्‍वास दर्शाया, “दुलहिन तुम इसकी देखरेख ठीक तरह नहीं कर पाओगी. इस बार रहने दो.” सोहागपुर... सिफर गृहस्थी से आई पांचाली सर्व सुविधा युक्त घर देख कर दंग हुई. यह वैभव नहीं, विपुल वैभव है. उसने घर का कोना-कोना देख डाला. घर संकेत कर रहा था- तुम प्रथम नहीं द्वितीया हो. निधि का स्थानापन्न. उसने यहां शासन किया है. एक अदृश्य प्रतिद्वंदी जीवनभर समानांतर चलती रहेगी. कोई तुम्हें लेकर औपचारिकता करेगा, कोई संकोच, कोई विद्रोह, कोई संदेह. तुम्हारी कर्तव्यपरायणता को उपकार माना जाएगा, राय-मशविरे को स्वार्थ. सधे भाव में काम करके भी अनिवार्य सा भरोसा शायद न बना सको. हो सकता है मूल अधिकार की दावेदारी करने में तुम्हें संकोच हो. शेषमणि से तुम्हारा रिश्ता पति-पत्नी का है, पर तुम उनकी पहली नहीं दूसरी पत्नी हो. संबंध में विकृति या कृत्रिमता न आए, इसके लिए तुम्हें तप करना होगा. करूंगी- यह अनुबंध वह स्वयं से कर रही थी. सप्तपदी का ऐतबार मज़बूत होता है.

आरंभिक संकोच के बाद शेषमणि और वह निःसंकोच होने लगे. पांचाली को लगा वह अच्छा संतुलन बना लेगी. उन्मेष बच्चा है. थोड़ा-बहुत उपद्रव कर समझदार हो जाएगा. नहीं जानती थी योद्धा बहुत छोटा हो तो लड़ाई जघन्य हो जाती है.

नए सत्र में अम्मा, उन्मेष को लेकर सोहगपुर आई. उन्मेष की देखरेख को लेकर वे पांचाली को इतने निर्देश देतीं, जिन्हें न वे ख़ुद पूरा कर सकती थीं, न निधि करती रही होगी.

उन्मेष की देखभाल करते हुए पांचाली भूल गई नवविवाहितों की जो नई दुनिया होती है, उसका नयापन ख़त्म होता जा रहा है. उन्मेष, पांचाली को घर का सदस्य मानने लगता, यदि रहनुमा बनी अम्मा माह-दो माह में टोह लेने न पहुंचतीं. आते ही उन्मेष को अपनी सुपुर्दगी में ले लेतीं. नहलाना-खिलाना, स्कूल भेजना, अपने साथ सुलाना.

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पांचाली को लगता उसके अभ्यास में व्यवधान आ रहा है, “अम्मा, उन्मेष ने मेरे कमरे में सोने की आदत डाल ली है. आप अपने साथ न...”

“जब तक यहां हूं, अपने लाल को अपने साथ सुलाऊंगी.” अपने पास सुलाते हुए अम्मा उन्मेष से भेद पूछतीं. उन्मेष नहीं समझता था अम्मा की सहानुभूति पाने के लिए गतिविधियों को अतिरंजित रूप में बता कर कैसी विसंगति तैयार करेगा.

अम्मा सुबह गहन पूछताछ करतीं, “सेस, उन्मेष यहां नहीं रहना चाहता था तो बूंदी ले आते. बता रहा है तुम पीटते हो.”

“स्कूल जाने में बहुत रोता था. एक बार पीटा. अब शांति से चला जाता है.”

“यह कहो, दुलहिन आते ही बच्चे को पिटवाने लगी. लोग ठीक कहते हैं मां दूसरी तो बाप तीसरा.”

शेषमणि को फटकार कर अम्मा को तसल्ली नहीं हुई. बूंदी लौटते हुए एक-दो पड़ोसी महिलाओं और दुलारी (कामवाली बाई) को सतर्क कर गईं.

“बूंदी का काम छोड़ कर हम यहां नहीं रह सकते. उन्मेष का ध्यान धरना. बिना मां का बच्चा है...”

पांचाली के भीतर तेज़ उबाल उठा. चीखने की इच्छा हुई, “उन्मेष बिना मां का बच्चा है तो मैं क्या हूं? सौतेली ही सही, मां हूं. इसी हैसियत से ब्याह कर लाई गई हूं. जानती हूं. विमाता को खलनायिका की तरह परिभाषित किया जाता है. कुछ स्वभावतः कुटिल होती होंगी, कुछ को परिस्थिति कुटिल बना देती होगी. जो कुटिल नहीं होतीं उन्हें भी कुटिल मान लिया जाता है. अम्मा आपने मेरी कौन सी कुटिलता देखी, जो अभियोग लगाना चाहती हैं? मुझसे कह सकती हैं उन्मेष छोटा है, ध्यान रखना. लेकिन आपको पड़ोसिनें और दुलारी विश्‍वासपात्र लगती हैं. डॉक्टर साहब देख रहे हैं, मैं पूरी निष्ठा के साथ परिस्थिति से तादात्म्य बनाने की चेष्टा करती हूं, फिर भी मुझ पर वैसा विश्‍वास नहीं करते जैसा निधि पर करते रहे होंगे. मैंने क्या अपराध किया है, जो आप लोग मुझे अधिकार, अपनत्व, एतबार सौंपने में इतना कष्ट पा रहे हैं?.. ... कुछ न कह सकी. जानती थी उसकी प्रत्येक अभिव्यक्ति में अर्थ ढूंढ़े जाते हैं.

उन्मेष को निरंकुश बनाकर अम्मा बूंदी खिसक लीं. पांचाली स्कूल जाने के लिए उसे सुबह उठाती, वह शत्रुता ठान लेता. होम वर्क कराती, उद्दंडता करता. जानती थी उन्मेष का दोष नहीं है. लापरवाही से दूर रखने के लिए बच्चे के साथ सख्ती करनी पड़ती है, लेकिन उसे सख्ती करने का हक़ नहीं है.

उसने शेषमणि को सूचित किया, “उन्मेष गृह कार्य करने में सुस्ती करता है. बात नहीं मानता.” उन्मेष को लेकर शेषमणि अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे थे, “पांचाली, ऐसा माहौल बनाओ कि उन्मेष तुमसे लगाव-जुड़ाव बनाने की कोशिश करे.”

“मतलब?”

“निधि की इतनी साड़ियां हैं. पहना करो. तुम्हें उन साड़ियों में देखकर उन्मेष को अच्छा लगेगा.”

“उन्मेष साड़ियों का महत्व समझने के लिए छोटा है. आप शायद निधि के मोह से बाहर नहीं आ पा रहे हैं.” “क्या तुम सोचती हो दिवंगत के कपड़े नहीं पहनना चाहिए?”

पांचाली की मां कहती थीं, मृतक के कपड़े दान कर देना चाहिए. पहनने से दोष होता है. पर यहां तर्क कटुता उत्पन्न करेंगे.

“अच्छा कलेक्शन है. मैं पहनूंगी.” साड़ियां क़ीमती थीं, लेकिन पांचाली को उतरन का बोध होता. जबकि उसे उन साड़ियों में देखकर शेषमणि की आंखों में खोज दिखाई देती. जैसे निधि के चिह्न ढूंढ़ रहे हैं. पांचाली एक क़िस्म की ईर्ष्या से गुज़रती. कह न पाती अब आप मेरे पति हैं. मैं आप पर पूरा अधिकार चाहती हूं.

उन्हीं दिनों पांचाली की दोनों बहनें उसकी समृद्धि देखने आईं. बड़ी बहन का तकिया कलाम, “पांचाली, मैं तो सात जनम में घर की ऐसी सजावट नहीं बना पाऊंगी. अरे, तुम कितनी क़ीमती साड़ियां पहनती हो.” बहनों का कौतुक देख पांचाली ने अपने विवाह में मिली साड़ियां बिस्तर पर फैला दीं. बहनों ने साड़ियां ऐसे हस्तगत कीं मानो लंबित पड़ी साध पूरी हो रही है. उपकृत मझली बहन बोली, “साड़ियां तो दे दीं. सोहर (बधाई गीत) गाने कब आएं?”

“जब ईश्‍वर की मर्ज़ी होगी.” ईश्‍वर की मर्ज़ी हो गई. गर्भ धारण कर पांचाली प्रसन्न थी. विमाता बनी. अब माता बनेगी. प्रसव के लिए पधारी अम्मा ने ख़ूब प्रपंच किया, “उन्मेष, घर में बच्चा आने वाला है.”

“हां आजी. पापा कहते हैं मेरा छोटा सा दोस्त आएगा.” “दोस्त तुम्हारे खिलौने, स्कूल बैग, साइकिल छीन लेगा.” भयभीत उन्मेष सुबह होते ही अम्मा के बिस्तर से उचट कर शेषमणि के पास पहुंचा, “पापा, दोस्त मेरी साइकिल छीन लेगा.”

“किसने कहा?”

“आजी ने. मैं उसे मार डालूंगा.” उन्मेष को गोद में उठाए शेषमणि अम्मा के सम्मुख थे, “अम्मा, बच्चे को मत भड़काओ.”

“सावधान कर रहे हैं. तुम्हें भी कर दें. अब तक फिर भी ठीक था. अपनी औलाद का मुंह देखते ही पांचाली इसे दूध में पड़ी माछी की तरह फेंक देगी.” रसोई में चाय खौला रही पांचाली के मानस तक दुराशय पहुंच रहे थे. उम्मीद थी शेषमणि, अम्मा के तर्क को खारिज करेंगे. चुप रह गए. अजन्मे शिशु का यह कैसा स्वागत है? मां बनना कितना स्वाभाविक भाव है. यहां अपराध समझा जा रहा है. उसके भीतर दीन भाव भर गया.

मायके में कितना बोलती थी. अब इतना चुप रहने लगी है. उसने अपनी प्रकृति को बदल डाला. फिर भी इस घर के लोग तुष्ट नहीं होते. बच्ची जन्मी है- सूचना पर अम्मा और शेषमणि ने मंगल मनाया.

“हम भगवान से मनावत रहे घर में लच्छिमी आए.” “पांचाली तुमने परिवार पूरा कर दिया. एक बेटा, एक बेटी. आदर्श परिवार.” पांचाली ने कृति (पुत्री) को छाती से लगा लिया, “कृति तुमने मुझे उन्मेष के हिस्सेदार (भाई) को जन्म देने के अपराध से बचा लिया.”

पांचाली की अपार व्यस्तता. उसे उन्मेष से अधिक कृति पर ध्यान देना पड़ता था.

“मां, मैं बगीचे में पाइप से पानी डाल रहा था. कपड़े गीले हो गए.” चम्मच से कृति को दूध पिला रही पांचाली ने उन्मेष को देखा, “बेटा, आलमारी से कपड़े निकाल कर पहन लो.” शेषमणि अस्पताल जाने के लिए तैयार हो रहे थे. दुराशय उन पर असर डालते थे. अति सतर्कता उनका लक्ष्य थी. उन्हें स्पष्टतः लगता उन्मेष उपेक्षित हो रहा है, “पांचाली, तुम तय करती हो उन्मेष क्या पहनेगा, कैसे पहनेगा. उसके कपड़े बदल दो. गीले कपड़ों में ठंड लग जाएगी.” देख रही है शेषमणि मतभेद उत्पन्न करना चाहते हैं. बहुत चुप रही. अब बोलेगी, “कृति को दूध पिला रही हूं. बीच में छोड़ कर उठ जाऊं, तो यह दुबारा नहीं पीती है. उन्मेष की मदद कर दीजिए. वैसे उन्मेष छोटे-छोटे काम करना सीख ले, यह ग़लत नहीं है.” “छोटे-छोटे क्यों उससे बड़े काम कराओ.”

“बड़े काम करने की उसकी उम्र नहीं हुई है. जब घर में दूसरा बच्चा आने वाला हो, मां बड़े बच्चे को छोटे-छोटे काम सीखने के लिए प्रेरित करने लगती है, ताकि वह ज़िम्मेदारी सीखे.”

“मैंने ऐसा क्या कह दिया, जो मुद्दा बना रही हो?”

“सब्र की एक मियाद होती है. आज मुद्दा बना ही दूं. मैं जब मायके जाती हूं आप उन्मेष को मेरे साथ नहीं जाने देते. वह बूंदी भेज दिया जाता है या अम्मा यहां आ जाती हैं. छुट्टियों में इसके मामा इसे ननिहाल ले जाते हैं. आपको फ़िक्र नहीं होती, वहां उसके साथ क्या व्यवहार हो रहा होगा? मुझसे शादी की है तो भरोसा भी कीजिए.”

“करता था पर अब तुम कृति पर अधिक ध्यान देने लगी हो.”

“मैं वैसी ही हूं जैसी थी. आप कुंठित लगते हैं. आपको समझना होगा. कुंठाएं काम बिगाड़ती हैं.”

“भाषणबाजी बंद करो.” शेषमणि उन्मेष का हाथ पकड़कर कमरे में चले गए और उसके कपड़े बदलने लगे. पांचाली के लिए राह नहीं. बेबाक़ होकर सबके साथ सरोकार... सिलसिले बनाना चाहती है, पर उसकी बातों के ग़लत अभिप्राय निकाले जाते हैं. क्या वह हर किसी से विनती ही करती रहे? दूसरी पत्नी को लोग पूर्णतः स्वीकार नहीं करते हैं, तो दूसरा विवाह क्यों करते हैं? फिलर की तरह इस्तेमाल करने के लिए? विमाता क्रूर होती है, तो अपनी संतान के लिए दूसरी मां लाते क्यों हैं? संतान की परिचारिका बनाने के लिए? कितनी कुछ कहना-पूछना चाहती है. शायद कभी न पूछ सके. उसे ख़ुद को मज़बूत करना पड़ेगा. वही करेगी जो अपनी समझ से सही लगेगा. कौन किस अर्थ में लेगा यह उसका मसला नहीं है. न ही उन्मेष या कृति का है. अस्वाभाविक बन गए समीकरण के लिए न उन्मेष ज़िम्मेदार है न कृति. इन्हें इनके हिस्से का स्नेह, सुरक्षा, समीपता मिलनी चाहिए. उन्मेष और कृति... पांचाली दोनों बच्चों को समानता देती जबकि शेषमणि ने सायास-अनायास अदृश्य विभाजन कर लिया. उनके खेमे में उन्मेष, पांचाली के खेमे में कृति. कृति और पांचाली के बीच प्राकृतिक गठबंधन था.

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कृति, पांचाली का निर्देश मानती. कृति के अनुचित व्यवहार पर पांचाली हस्तक्षेप करती जबकि उन्मेष के अनुचित व्यवहार पर अपरिहार्य सख्ती करने की छूट उसे नहीं थी. फलतः कृति समय सारिणी बनाकर पढ़ती, अच्छा प्रतिशत लाती. शेषमणि के संरक्षण में उन्मेष निरंकुश होता गया. कृति को मारता. गृह कार्य न कर खेलने चला जाता. पांचाली न जाने देती, तो हीमैन की तरह तन जाता, “पापा से तुम्हारी शिकायत करूंगा.” उन्मेष बात का बतंगड़ बना देता. वह पांचाली को ऐसे देखता मानो वह स्वयं बहुत महत्वपूर्ण और पांचाली तुच्छ है.

“पढ़ने के लिए कहती हूं. कृति और इसके रिजल्ट में कितना अंतर है.”

“क्योंकि तुम इसे ज़िम्मेदारी से नहीं पढ़ाती. इसके नाना फोन पर पूछते रहते हैं उन्मेष की पढ़ाई कैसी चल रही है. मुझे बताना पड़ता है. कहने लगे कृति के दिमाग़ में कौन सी मशीन फिट है जो अच्छा रिजल्ट लाती है. उन्मेष के दिमाग़ में क्या भूसा भरा है, जो कठिनाई से पासिंग मार्क्स ला पाता है. आप लोग उसका ध्यान क्यों नहीं रखते? सुनकर मुझे शर्म आती है.”

पांचाली का चेहरा मलिन हो गया, “उन्मेष के ननिहाल वाले भी मुझे कटघरे में घसीटेंगे? मैं ध्यान देती हूं. बच्चे की रुचि यदि पढ़ाई में न हो...”

“तुमसे न होगा. मैं उन्मेष के लिए ट्यूशन का इंतज़ाम कर दूंगा.” दुर्निवार स्थिति. उन्मेष नहीं जानता था भटकन में है. पांचाली उसे भटकन का बोध कराने के लिए आधिकारिक तौर पर स्वतंत्र नहीं थी.

पाठशाला में उन्मेष किस स्तर की अनियमितता कर रहा है, शेषमणि न जान पाते यदि उसके कक्षा अध्यापक फोन कॉल कर उन्हें और पांचाली को पाठशाला न बुलाते.

“उन्मेष से बार-बार कहा माता या पिता किसी को लाए पर आप लोग नहीं आए.” पांचाली सिर झुकाए बैठी रही. शेषमणि पिता धर्म का प्रमाण देने के लिए उन्मेष को खासी पॉकेट मनी देते हैं. अब स्पष्टीकरण दें.

शेषमणि बोले, “उन्मेष ने नहीं बताया.”

“मैं समझ गया था इसीलिए कॉल किया. उन्मेष रेग्युलर स्कूल नहीं आता है.”

“घर से ठीक वक़्त पर स्कूल के लिए निकलता है.” “लेकिन पहुंचता नहीं. आज भी नहीं आया. मंथली टेस्ट में कभी पास नहीं होता. आप उसके रिपोर्ट कार्ड में साइन कर देते हैं. कभी पूछते हैं पास क्यों नहीं होता?” “मुझे रिपोर्ट कार्ड नहीं दिखाता.”

“इसका मतलब फेक साइन करता है. मानता हूं आपको मरीज़ों से फ़ुर्सत नहीं मिलती, पर मैडम आपको जानकारी रखना चाहिए. मुझे नहीं लगता वह वार्षिक परीक्षा में पास हो जाएगा.”

पांचाली का झुका सिर अधिक झुक गया, “मास्टर साहब, आप तो जानते हैं व्यस्तता के कारण पिता बच्चों की गतिविधियों को कम जानते हैं. बच्चों की गतिविधि मां, पिता को प्रेषित करती है. मुझे यह मोहलत नहीं मिली.”

“डॉक्टर साहब के मानस में उन्मेष इतना समाया हुआ है कि वाजिब शिकायत करूं तो ऐसी मुद्रा बना लेते हैं मानो त्रस्त कर रही हूं. मुझे सीमाएं बताई जाती हैं. व्यवहार करने के तरी़के मुझ पर आरोपित किए जाते हैं. स्थिति का लाभ ले बच्चा नादानी करने लगा है. स्पष्टीकरण मांगना है तो मुझसे नहीं उन्मेष की आजी, पिता, समाज से मांगिए.” पांचाली और शेषमणि आंखें झुकाए बैठे रहे. पांचाली नमी को छिपा रही थी. शेषमणि शर्म को. अध्यापक ने स्थिति समझी.

“आप लोगों ने मुझे वक़्त दिया. उम्मीद है उन्मेष को समझा देंगे.”

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उन्मेष ने नहीं सोचा था आज का दिन भिन्न होगा. घर में घुसते ही शेषमणि ने कड़े रुख में पूछताछ की, “उन्मेष कहां से आ रहे हो?” उन्मेष कैसे बताता मूवी देखकर आ रहा है. मूवी देखना ज़ाहिर न हो इसलिए उसने अच्छी युक्ति लगाई थी. दोपहर तीन बजे वाले शो में इंटरवल के बाद की मूवी देखता. दूसरे दिन शाम छह बजे के शो में इंटरवल के पहले की.

“पापा, ट्यूशन...” शेषमणि ने उसे घसीट लिया.

"झूठ मत बोलो. मैं तुम्हें डॉक्टर बनाना चाहता हूं... तुम वार्ड बॉय नहीं बन सकते.” शेषमणि उन्मादी की तरह उसे पीटने लगे. पांचाली स्थिति बूझती जड़वत खड़ी रही. फिर उन्मेष को बचाते हुए ख़ुद झटके खा गई, “छोड़िए दोष उन्मेष का नहीं, आपका, बल्कि मेरा है... न मैं इस घर में आती, न इतना तनाव बनता... छोड़िए..” पांचाली के दख़ल से शेषमणि की पकड़ कमज़ोर हो गई.

स्याह अंधेरों वाली भयावह रात. किसी ने खाना नहीं खाया. अपने-अपने शयनकक्ष में सब ऐसे छुपे थे जैसे फरारी काट रहे हैं.

आख़िर पांचाली ने पूछा, “नींद नहीं आ रही?” शेषमणि की आवाज़ ऐसी थी मानो ख़ुद से जूझ रहे हैं, “कुछ अम्मा ने उकसाया, कुछ मेरी सतर्कता, कुछ तुम पर नियंत्रण, कि मनमानी न करने लगो. पांचाली मैंने उन्मेष का तो अनर्थ किया ही, तुम्हारा भी अपमान किया. जानता हूं पी.एम.टी. निकालने के लिए किस मेहनत, माहौल, मानसिकता की ज़रूरत होती है, लेकिन मैंने उन्मेष से कभी नहीं पूछा क्या पढ़ रहे हो? क्या समझ में नहीं आ रहा है. तुम उन्मेष को राह पर लाने की कोशिश करो.”

“सब ठीक होगा.” यह आश्‍वासन वह शेषमणि को कम स्वयं को अधिक दे रही थी. परिवर्तन एक अतिरंजना की राह देखता है या निष्ठा से किए गए प्रयास विफल नहीं होते या लड़ाई कितनी ही घमासान हो मंद पड़ते हुए एक दिन ख़त्म हो जाती है या वे ज्ञान बांटने के क्षण थे. दृश्य शेषमणि की चेतना पर वार कर रहे थे- पांचाली ने सहा है. कृति घर में व्याप्त तनाव के कारण स्वाभाविक भाव में नहीं रह पाती.

घर में बन गए दो खेमों के कारण मुझसे संपर्क, समीपता नहीं बना पाती. न मैंने बनने दी. अब उसने मान लिया है मैं उन्मेष का और पांचाली उसकी हमदर्द है. बेचारा उन्मेष. मैंने इसे उदारता ख़ूब दी, मार्गदर्शन देना याद न रहा. दृश्य उन्मेष की चेतना पर वार कर रहे थे- मां मुझे बचाते हुए पिट गईं. कृति छोटी है पर संरक्षिका की तरह सुरक्षा देते हुए मुझे कमरे में ले आई. पापा ने हद दर्जे की हिंसा की. मुझे लग रहा है मेरी सामर्थ्य कम हो गई है. क्षमता का उपयोग मैं नहीं कर पाया...

दृश्य पांचाली की चेतना पर वार कर रहे थे- मैंने जोख़िम और अनिश्‍चितता में दिन बिताए हैं कि एक दिन यह घर सही वेब लेंथ पर आ जाएगा. आज जो हुआ... होता रहा तो कैसी परिस्थिति का निर्माण होगा?

दृश्य कृति की चेतना पर वार कर रहे थे- मां, मोर्चे पर अकेली हैं. उन्हें कहीं से मदद नहीं मिलती. भैया को समझाऊंगी वे तुम्हारी मां हैं, जैसे मेरी.

बारहवीं में उन्मेष दूसरी बार अनुत्तीर्ण हो गया. मामा आए समझाने. उन्मेष दृढ़ता से बोला, “मामा, मुझे बर्बाद करने वाली मां नहीं, पापा, आजी, आप लोग हैं. मैं अपना भला-बुरा नहीं समझता था पर पापा समझते थे. इन्होंने मुझे कभी सही सलाह नहीं दी. मां ने दी पर मैं उनके साथ ग़लत सलूक करता रहा. मुझे शर्म आती है.” मामा का मुख दांव हारने के भाव से जर्द हो गया, “बेटा, यह तुम नहीं तुम्हारी हताशा बोल रही है। बचपन से कहते आए हो डॉक्टर बनोगे. बारहवीं में अटके हो.” “मामा, मैं अपनी क्षमता खो चुका हूं. डॉक्टर बनने की मेरी इच्छा नहीं है. कृति जहीन है. डॉक्टर बनेगी.” “कृति? उन्मेष लोग हंसेंगे. घर का चिराग़ कुछ न कर सका, लड़की पिता का साम्राज्य संभालने चली है.” “मामा वह डिज़र्व करती है.”

पांचाली की बहुआयामी विजय. एकाएक बहुत कुछ वांछित सा लगने लगा. नहीं सोचा था उद्दंड उन्मेष इतना आज्ञाकारी हो जाएगा. अपनी ज़रूरत, मांग शेषमणि से नहीं उससे बताएगा. पढ़ाई पर एकाग्र होने लगेगा. कृति को चिकित्सक बनने के लिए प्रेरित करेगा.

कहानी- मुरादों वाले दिन

पहले ही प्रयास में अच्छे रैंक के साथ पी.एम.टी. पास करने का उल्लास मनाने में कृति यूं झिझक रही थी मानो उसने उन्मेष को चिकित्सक बनाने के शेषमणि के सपने को अपने लिए पंजीकृत कर लिया है. पता नहीं क्या सोच कर शेषमणि उसे भरपूर शाबासी नहीं दे पा रहे थे. जबकि उन्मेष ऐसा मोद मग्न हुआ मानो कृति की सफलता उसका अभीष्ठ हो.

“अरे डॉक्टरनी? क्या रैंक हैं. तुम्हें बहुत अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिलेगा. काउंसिलिंग मेें मैं तुम्हारे साथ चलूंगा.” कृति भावुक हो गई. भइया मुझे अपना तौलिया नहीं छूने देता था. आज मेरी सफलता का जश्न मना रहा है.

“भइया, तुम बहुत अच्छे भाई हो. मेरी बहुत मदद करते हो.”

“कृति, मैंने अपनी ही मदद नहीं की, तुम्हारी क्या करूंगा. सिम्पली बी.एससी. कर रहा हूं, पर तुमने इस घर को बहुत बड़ी ख़ुशी दी है.”

पंचाली उन्मेष को देखती रही- कैसा वंचित सा नज़र आ रहा है. विषमताओं ने मुझे ही नहीं इसे भी छला है. शेषमणि की सतर्कता ने इससे वे अवसर छीन लिए, जो शायद इसे मिलते. संतोष बस इतना है कि अब तक का बोझ, दबाव, थकान उतर गई लगती है. थोड़ा सा आनंद, थोड़ी सी तसल्ली थोड़ी सी कद्र, थोड़ा सा अपनत्व, थोड़ी सी उम्मीद, थोड़ा सा अधिकार... इतना ही तो चाहा था.

याद आते हैं अपने कई-कई रूप. 23 साल की लड़की, जो एक बच्चे के पिता से विवाह करने में हिचक रही थी... निष्ठापूर्वक सहज विश्‍वास पाने के लिए प्रयास करती पत्नी, जिसे हर ओर से सलाह और संदेह मिल रहे थे, आधिकारिक जगह पाने के लिए कर्तव्य करती गृहस्वामिनी... इस घर में बरस बिता दिए, अब जाकर लगता है घर, घर और वह गृहस्वामिनी बनी है.

कृति को भोपाल मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया. कृति को ट्रेन में बैठाते हुए पांचाली ख़ूब रोई. कृति के साथ जा रहे उन्मेष ने रोती हुई पांचाली को थाम लिया. मानो संकेत दे रहा हो, “मां, मैं तुम्हें वही समीपता दूंगा जो कृति देती है.”

उन्मेष अब शेषमणि के सम्मुख कम जाता. अपनी ज़रूरत-मांग पांचाली के माध्यम से उन तक पहुंचाता. पांचाली ने शेषमणि को बताया, “उन्मेष मेडिकल स्टोर खोलना चाहता है.” शेषमणि को अपना सपना याद आ गया, “क्यों?”

“डॉक्टर नहीं बन सका. मेडिकल स्टोर खोलकर मेडिकल लाइन से जुड़े रहना चाहता है. कहता है पापा और कृति मरीज़ देखेंगे. यह दवाई की ख़ूब बिक्री करेगा. कृति की शादी डॉक्टर से करेगा. दोनों यहां सेटल होंगे.” “पांचाली, मुझे उन्मेष के लिए हमेशा दुख रहेगा. मैंने उसका बहुत अहित किया.”

“जो चाहता है करने दें. सेटल हो जाए, तो उसकी शादी कर दें. जिए अपनी ज़िंदगी.”

“ठीक कहती हो.” उन्मेष ने मेडिकल स्टोर का उद्घाटन पांचाली से करवा कर छिद्रान्वेषण करने वालों को पटकनी दी. पांचाली ने उन्मेष के विवाह पर उसकी पत्नी पन्ना को निधि के गहने सौंपकर अपने विरोधियों को विस्मित कर दिया.

वयोवृद्ध अम्मा का अब सिर हिलने लगा है. सिर हिलाते हुए सोचती हैं बूंदी में कितने लोगों के बेटे-बहू अलग हो गए. पांचाली ने उन्मेष और पन्ना को कौन सी बूटी खिलाई जो बिना रक्त संबंध के इतना अच्छा समायोजना चल रहा है.

पुजाई कराने बेटे-बहू को लेकर बूंदी पहुंची पांचाली से अम्मा ने पूछा, “पन्ना, तुम्हारी इज़्ज़त करती है न?”

“हां अम्मा. पन्ना क्या आई, मुरादों वाले दिन आ गए. उसे गृहस्थी सौंप कर आराम फरमा रही हूं.” अम्मा के चेहरे में छा गया अकाल, दरअसल पांचाली का विजयोत्सव था.

कहानी- मुरादों वाले दिन

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