इस बार वह गुफा के बाहर क्यों नहीं आ रही है, क्या मथ रहा है उसके दिमाग़ में. गुफा के भीतर इतना लंबा समय उसका कभी नहीं बीता. अब तो उन्हें डर भी लगने लगा है.
निक्की ख़ामोश थी. उसकी ख़ामोशी एक ऐसा खंजर हुआ करती है, जिसे साथ रहने वाले इंसान की न चाहते हुए भी अपने दिल में अपने ही हाथों से उतारना पड़ता है. या यूं कहें कि इसमें चाहने या न चाहने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि निक्की तो अपनी है, ऐसे में उसकी ख़ामोशी चाहे पीड़ा दे या विस्मित कर दे उसे सहन करना ही होगा. जब कोई बात गहरे तक उसे मथने लगती है, तो वह इसी तरह ख़ामोश हो जाती है. आज से ही नहीं बचपन से ही वह ऐसी है. न जाने किस गुफा में गुम हो जाती है फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है.
इसीलिए उसकी इस आदत को जान लेने के बाद, उस खंजर के दर्द को सहन करने की आदत बना लेने के बाद उन्होंने उसकी गुफा में प्रवेश करने की अनाधिकार चेष्टा कभी नहीं की. जानती थी कि अवसाद की कालिमा ख़त्म होने के बाद वह स्वयं ही बाहर निकल गुफा का दरवाज़ा ढुका खुले में थिरकने लगेगी. उसका थिरकना, हर समय बोलते रहना, बात-बात में खिलखिला उठना देखा जाए तो निक्की का सच यही है, लेकिन उसके दूसरे सच को स्वीकारना भी अब उनका नियम बन गया है.
वह समझ चुकी है कि निक्की का स्वाभिमान, अपने दुख, अपनी कठिनाइयों को किसी के सामने खोलकर रखना पसंद नहीं करता. व्यक्त करना तो दूर किसी को वह यह भी पता नहीं लगने देती कि किस बात से यह कसमसाहट है. दुख का कोई औचित्य भी.है या नहीं या वह बस यूं ही तर्कहीन सवालों के ऊहापोह में उलझी हुई है. क्योंकि सही-ग़लत के तराजू में निक्की शायद उलझनों को तौलना नहीं जानती है, वहीं गुफा में बैठे वह अंतर्द्वंद्व में घिरी रहती है. समस्याओं के तानों-बानों में उलझी, चाहे वह स्कूल की परीक्षा हो या कॉलेज के ड्रामे में भाग लेने के दौरान तैयार होने की या बैडमिंटन का मैच हारने की हो. मतलब यह कि थोड़े थोड़े दिनों बाद अक्सर उसके साथ ऐसा हो ही जाता था, किंतु वह सिलसिला ज़्यादा लंबा खिंचता भी तो नहीं था.
इस बार यह ख़ामोशी कुछ ज़्यादा ही लंबी खिंचती प्रतीत हो रही है. कहीं यौवन में प्रवेश करने से जुड़ी कोई बात तो नहीं... लेकिन निक्की काफ़ी समझदार है इसके प्रति या फिर कोई ऊंच-नीच, किसी तरह की कोई अनहोनी तो नहीं हो गई, उसके साथ... मां को तो हर पहलू से सोचना पड़ता है चाहे फिर वह अपनी बेटी के बारे में ऐसी वैसी बात ही क्यों न हो. वह तो इस बिन बाप की बच्ची की मां-बाप, भाई-बहन सभी कुछ तो हैं. बिना पिता के एक लड़की को संभालना कितने जतन से वह ऐसा करती आई है. उसके ही दायरे में बंधे उसके इर्दगिर्द घूमते हुए पल-पल उसे बढ़ते देख, उसकी छोटी-छोटी गतिविधियों का अवलोकन करते हुए अपना अस्तित्व भुलाए उनका न जाने कितना समय बीत गया है. अपने बारे में सोचने का ख़्याल कभी अवचेतन तक में भी नहीं आया. इस पर भी निक्की की गुफा का द्वार उनके लिए कभी नहीं खुला, न जाने किस मिट्टी की बनी है लड़की. यह सोचो तो हंसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है कि यह मिट्टी तो उन्हीं की है, उन्हीं के प्यार से सींचा गया है पौधा, फिर भी इस पौधे ने इतना भिन्न रूप लिया है कितनी ज़िद्दी है वह. बस ज़िद में कुछ कहने, सुनने की बजाय ख़ामोशी इख़्तियार कर लेती है. उसे लगता है कि किसी के सामने दुस्ख प्रकट करने से वह बौनी हो जाएगी.
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पर इस बार वह गुफा के बाहर क्यों नहीं आ रही है, क्या मथ रहा है उसके दिमाग़ में. गुफा के भीतर इतना लंबा समय उसका कभी नहीं बीता. अब तो उन्हें डर भी लगने
"ओह हो मम्मी आप 'ओल्ड फैशन्ड' मम्मी की तरह बिहेव मत करिए. मुझसे वह सब झमेले नहीं होते, अपने शरीर पर परत दर परत कपड़ा चढ़ा बोझ डालना कौन-सा संभ्रात कहे जाने की परिभाषा है."
उन्हें लगता है जैसे उन्हें इस द्वार के बंद होने का कारण पता है, एक आशंका है- हो सकता है रजत ही हो, पर उनका मन कहता है कि सिन्हा से उनकी दोस्ती ही शायद इस मौन का कारण है, इस उम्र में वह दोस्त बनाएं... उसके साथ घूमें, हंसी+मज़ाक करें, यही शायद उसकी तटस्थता की वजह बनती जा रही है. उसका कच्चा मन जो स्वयं इस समय सपनों के राजकुमार की खोज में रहता हो, वह संबंध स्वीकार न कर पा रहा हो.
जब से एक सेमिनार में उनकी सिन्हा से मुलाक़ात हुई और वह उनके सरल व सहज आचरण से प्रभावित हो, उनकी ओर खिंची है, तब से ही... नहीं तब से नहीं, निक्की ने शुरू-शुरू में तो सिन्हा को बहुत ही आत्मीयता से लिया था. वही चहकना, घूमना, उनके घर पहुंचकर उन्हें दावत पर बुला लेना फिर स्वयं अपने हाथों से ज़िद करके न सिर्फ़ खाना बनाना, बल्कि बहुत ही मनुहार से उन्हें खिलाना भी.
इसमें कोई संदेह नहीं कि सिन्हा में अपनी ओर आकर्षित करने का स्वभावगत गुण है. उनकी उम्र का ही होने पर भी सिन्हा का जीवन ज़्यादा दूर नहीं गया है. आंखों में एक विशेष तरह की गहराई है. मुस्कुराते ही गालों पर गढ्ढे पड़ जाते हैं. हर समय सलीके से कपड़े पहने मिलते हैं. हर इंच से 'परफेक्ट मैन', हालांकि उनके जीवन में भी अधूरापन है- पत्नी की मौत से उत्पन्न हुआ एकाकीपन, एक तरह से वे एक ही नाव के दो सवार हैं, इसीलिए इतने निकट आ गए हैं. अपने सुख-दुख सहजता से बांट लेते हैं. सिन्हा की बेटी बोर्डिंग में पढ़ती है. जब छुट्टियों में वह घर आती है, तो वे सब कुछ भूल जाते हैं. बेटी का साथ पा उसकी ख़ुशियों को मोती में भरने के प्रयत्न में उनका यौवन हिलोरें लेने लगता है.
सब कामों को ताक पर रख, मिलने के आसपास बने रहते. खाना वालों को किनारा कर वह अपने हाथ से अपनी बेटी माधुरी के लिए खाना बनाते. उस वक़्त उनकी छवि एक ममतामयी मां की बन जाती और 'परफेक्ट मैन' की सच्चाई भीनी-सी लगने लगती, तब समझना मुश्किल होता कि इतना व्यथित रहने वाला व्यक्ति अचानक इतना अस्त-व्यस्त कैसे रह पाता है?
बढ़ी हुई बेतरतीब दाढ़ी देख माधुरी कहती, "ओह पापा, आप तो बढ़ी हुई दाढ़ी में सचमुच हैंडसम लगते हैं. बिखरे बिखरे बाल, ढीला-ढाला कुर्ता-पायजामा, आप तो बच्ची के पापा बन जाते हैं.
नाराज़गी का नाटक करते हुए पूछते, "क्या बन जाते हैं मतलब? मेरे पापा होने पर शक है?"
"नहीं, लेकिन सूटेड-बूटेड पापा से अच्छे मुझे अपने ऐसे अस्त-व्यस्त पापा लगते हैं." वह अल्हड़ता से उनके गले में झूल जाती. स्कूल का आख़िरी साल होने पर भी उसके अंदर का बचपन किलकारियां लेता.
माधुरी से संबंधित अनेक बातें, बहुत छोटी-छोटी घटनाएं तक उन्होने कई बार उनके सामने दोहराई थीं. पिछली बार माधुरी को लेकर वह उनके घर भी आए थे. माधुरी की शोखी, उसकी निष्कपटता बहुत अच्छी लगती थी. मां का मन उस लड़की पर ममता उंडेलने को व्याकुल हो उठा था. निक्की से दो साल ही तो छोटी है, चलो एक और बेटी मिल गई... लेकिन उन्हें यह देखकर अजीब लगा था कि निक्की का माधुरी के प्रति व्यवहार सहन न था, एक कड़वाहट उसके शब्दों में घुली हुई थी. कहीं कोई स्वागत की गर्माहट न थी, न नई सहेली बनने का उत्साह था. इतना ही नहीं सिन्हा से भी वह बात काट कर बात कर रही थी, जैसे जान-बूझकर उपेक्षा करने की कोशिश कर रही हो, वरना सिन्हा के आने पर वह पूरे घर को हंसी से गुंजा देती थी.
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सिन्हा ने कई बार मज़ाक करने की कोशिश की, लेकिन उसके चेहरे पर छाए संजीदगी के भाव देख वह चुप हो गए थे. यहां तक कि माधुरी भी अपने आपको बहुत असहज महसूस कर रही थी. उसका यह व्यवहार देख उन्होंने भी सिन्हा का विवाह का प्रस्ताव टाल दिया था. हालांकि वह भी चाहती थी कि उन्हें सिन्हा जैसे व्यक्ति का साथ मिल जाए, जो निक्की को भी बेटी की तरह मानता है. उसके इस पड़ाव पर पहुंचकर उन्हें सुख-दुख बांटने के लिए एक साथी की आवश्यकता होती थी.
अब निक्की को समझाने का मतलब था, विरोध की ज्वाला को भड़काना. वह नासमझ लड़की कहीं सिन्हा के प्रति भावुक होकर कुछ कर बैठी तो क्या होगा... नहीं, नहीं, उन्हें कुछ करना ही होगा.
निक्की जब गुफा से बाहर निकली तो वह चौंक पड़ीं, मानो किसी ने रेत से महल खड़ा करना चाहा हो, निक्की इतनी बड़ी कब से हो गई... इतना श्रृंगार एकदम बदला हुआ रूप, हमेशा चुस्त टी शर्ट और जीन्स में वह कॉलेज जाती थी. उनके बार बार कहने पर भी बालों को नहीं बांधती थी, चूड़ी बिन्दी तो दूर की बात थी, कभी साड़ी पहनने को कहने पर वह कहती, "ओह हो मम्मी आप 'ओल्ड फैशन्ड' मम्मी की तरह बिहेव मत कीजिए. मुझसे वह सब झमेले नहीं होते. अपने शरीर पर परत दर परत कपड़ा चढ़ा बोझ डालना कौन सा संभ्रात कहे जाने की परिभाषा है."
इस समय में वह उसे हतप्रभ-सी खड़ी ताकती रहीं, एक भरपूर सौंदर्य की मल्लिका, यौवन की परिपक्वता से लदी, अपने उभारों को ख़ूबसूरती से संवारे उनके सामने खड़ी थी. उनकी हल्के गुलाबी रंग की साडी जो उनके जन्मदिन पर सिन्हा ने उन्हें भेंट की थी, में लिपटी, सुर्ख बिन्दी, लिपस्टिक और हाथों में खनकती चूड़ियां, सब उन्हें विस्मित कर रहे थे. अचानक मां का दायित्व उन्हें कोंचने लगा. सिन्हा के साथ अपना घर बसाने के सपने में वह यह भूल गई थीं कि ब्याह की उम्र तो उनकी बेटी की है. उसे साड़ी पहने देख एक हुक सी उठी. बेटी ही सही पर उसे मां के इस साड़ी के प्रति भावनात्मक जुड़ाव को समझना चाहिए था.
आज कॉलेज में ज़रूर कोई समारोह होगा या फिर किसी सहेली की शादी. पूछने के लिए मुंह खोला ही था कि वह तेजी से बाहर निकल गई. यह लड़की अपनी इस जड़ता से बाहर निकले तो आज ज़रूर इसके सामने सिन्हा से अपने ब्याह की बात कहेंगी. फिर दोनों मिलकर इसके भविष्य के प्रति सोचेंगे. अकेले इस लड़की को संभालना अब मुश्किल होता जा रहा है.
"अरे निक्की तुम?" सिन्हा उसे अपने घर पर इस समय और इस बदले हुए रूप में देखकर चौंक गए.
"किसी समारोह में जा रही हो? साड़ी ख़ूब फब रही है तुम पर, इरा साथ नहीं आई?"
"क्यों, क्या ज़रूरी है कि हमेशा में मां का पल्लू पकड़ कर आऊं." निक्की के स्वर के तीखेपन से सिन्हा अचंभित हो गए.
"अरे नहीं भई..." सिन्हा ने कानों को हाथ लगाते हुए कहा, "ग़लती हो गई, मैं तो भूल ही गया था कि आजकल हमारी बेटी तीखी मिर्च हो गई हैं." उन्होंने बात को मज़ाक में उड़ाते हुए कहा.
"मैं आपकी बेटी नहीं हूं." निक्की ने इस बार लगभग चीखते हुए कहा, "आख़िर मुझमें क्या कमी है, जो आप मुझे प्यार नहीं कर सकते?"
"यह तुमसे किसने कहा कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता." सिन्हा उसके इस अप्रत्याशित व्यवहार से घबरा गए थे.
"मैं जानती हूं आप मम्मी से प्यार करते है, तभी तो उनके साथ ही हमेशा घूमते हैं. मैं तो मम्मी से ज़्यादा जवान हूं फिर आप..."
"निक्की ख़ामोश हो जाओ और इसी वक़्त यहां से चली जाओ. तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है तभी तो उम्र और रिश्तों की मर्यादा तुम भूल रही हो." सिन्हा ग़ुस्से से बेकाबू हो उठे. कितना बड़ा आघात पहुंचाया था निक्की ने. बेटी की तरह जिस पर स्नेह उड़ेला उसी ने उन्हें आज अपमानित कर दिया. कहां भूल हो गई उनसे जो निक्की उन्हें ग़लत समझ बैठी. अपनी ही नज़रों में वह अपने आपको छोटा महसूस कर रहे थे.
कांपते हाथों से उन्होंने इरा को फोन मिलाया. सब कुछ बताते हुए उनकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी और इरा को लग रहा था कि काश! धरती फट जाए और उसमें समा जाए. क्या सर्वनाश कर डाला था निक्की ने. जिसे उसका पिता बनाने की वह सोच रही थी, उसे वह लड़की प्यार करने लगी है. उसकी लंबी ख़ामोशी का राज़ उन्हें समझ आ गया था. वह मां के सिन्हा के साथ संबंधों को लेकर परेशान थी. अपनी अल्हड़ता को वह प्यार का नाम दे रही थी. सिन्हा के साथ हंसते बतियाते वह रिश्ते को प्यार का नाम दे बैठी.
शायद उसका भी कसूर नहीं था. बचपन में ही पिता को खो देने के बाद कोई पुरुष उसके जीवन में इतने क़रीब पहले कभी नहीं आया था. इसी कारण सिन्डा के प्रति वह आसक्त हो गई. तभी वह माधुरी को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी. कैसी विडम्बना थी आज बेटी ही मां के विरुद्ध खड़ी हो गई थी. बेटी ने मां के ख़िलाफ़ यह कैसा मौन युद्ध छेड़ दिया, जिसमें हर तरफ़ हार उन्हीं की है.
आज तक उन्होंने इसलिए अपने वजूद को कोई रूप नहीं दिया था, ताकि निक्की का बचपन कुम्हला न जाए. बड़ी होती निक्की को अब उनका पल्ला पकड़ने की ज़रूरत नहीं रह गई थी, तभी उन्हें एकाकीपन का एहसास हुआ था. यही सोचकर कि कल को निक्की ससुराल चली जाएगी, तो यह सिन्हा से विवाह करने को तैयार हो गई थी.
अब निक्की को समझाने का मतलब था विरोध की ज्वाला की भड़काना. वह नासमझ लड़की कहीं सिन्हा के प्रति भावुक हो कुछ कर बैठी तो क्या होगा... नहीं नहीं, उन्हें कुछ करना ही होगा. रिश्तों की मर्यादा की रेखा उसके सामने खींचनी ही पड़ेगी. नहीं तो वह उम्र भर संबंधों को बिना सोचे समझे प्यार का नाम देती रहेगी. वह तैयार होकर घर से निकल गईं. निक्की के पास घर की चाबी थी इसलिए फ़िक्र नहीं थी.
सिन्हा के साथ जब वह घर लौटी, तो निक्की आ चुकी थी और अपनी गुफा में बैठी थी. उन्होंने बिना एक पल गंवाए दरवाज़ा खटखटाया. कोई प्रतिक्रिया न पा उन्होंने आंख उठा सिन्हा की ओर देखा. उनकी आंखों ने इरा के अंदर एक आत्मविश्वास भर दिया. कभी-कभी औलाद को सुधारने के लिए मां को कठोर बनना भी ज़रूरी है.
"दरवाज़ा खोलो निक्की, बस बहुत हो गया, बचपन से आज तक मैने कभी तुम्हारी गुफा में घुसने की कोशिश नहीं की पर अब बहुत हो चुका. चुपचाप इस ख़ामोशी की गुफा से बाहर निकल आओ."
उनकी आवाज़ की कठोरता और दृढ़ता से निक्की चौंक पड़ी. मम्मी को क्या हो गया है. उसने हज़ारों बार इस तरह उनका दिल दुखाया है और आज भी तो... न जाने उसे क्या हो गया था, जानते हुए भी मम्मी और सिन्हा एक-दूसरे को चाहते हैं, वह ऐसी भयंकर भूल कर बैठी. सिन्हा का व्यक्तित्व उसे झकझोर गया था. एक 'परफेक्ट मैन' बस वह बहक गई थी.
गुफा के द्वार खुल गए... हमेशा के लिए, सामने मम्मी खड़ी थी सिन्हा का हाथ धामे, उनकी मांग में सिंदूर दपदपा रहा था. लाल जरी की साड़ी में कितनी सुंदर लग रही थीं. सिन्हा से नज़रें मिलते ही उसकी आंखें शर्म से झुक गई.
"निक्की, इस सच को तुम्हें स्वीकारना ही होगा, आज से ये तुम्हारे पापा हैं और तुम उनकी बेटी. मात्र आकर्षण से रिश्तों को परिभाषित नहीं किया जाता, उसके लिए परिपक्वता व अनुभव की डोर की भी आवश्यकता होती है."
निक्की में सामना करने की शक्ति नहीं थी. शर्म से वह नज़र नहीं उठा पा रही थी. वह अपने कमरे में चली गई, पर इस बार दरवाज़ा बंद नहीं हुआ. गुफा में अब रोशनी जगमगा रही थी.
- सुमन बाजपेयी

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