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कहानी- सूखे हुए गुलाब (Short Story– Sukhe Huye Gulab)

हाथ पकड़कर प्रेमालाप किया हो या साथ जीने-मरने की क़सम खाई हो, ऐसा भी नहीं था. शायद बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ समझ लेने की शक्ति भगवान ने मनुष्य को बख़्श रखी है.

हर घटना, जो बीत जाए, कहानी सी लगने लगती है. बरसों बाद तो भूली दास्तां लगती है. सुनी थी या पढ़ी थी यह भी भूला जा सकता है. ऐसे में यह याद करना बेमानी है कि जब यह हादसा गुज़रा था तब कितना भयावह था वह. कैसे दिन का चैन, रात की नींद सब उड़ गई थी. ऐसा ही आज लग रहा है मल्लिका को, जो बीती सो बात गई.

तब ऐसा नहीं लगा था, अपमान और पराजय जैसे शब्द उस भयावहता को दिखाते ही नहीं है. कभी-कभी अपनी अर्धवक्ता में बौने रह जाते हैं. एक क्षण को तो मर जाने को जी चाहा था, फिर इच्छा हुई थी कि आत्महत्या से तो अच्छा ही होगा कि मार डाले. हत्या भी पाप है, आत्महत्या भी. कम से कम दिल को तसल्ली तो रहेगी कि अपने अपमान का बदला ले लिया. मन शायद सागर से भी अधिक गहरा है और असीम है उसमें उठने-गिरने वाली कामना-लहरें भी. एक लहर आत्महत्या की, एक हत्या की. एक वैराग्य की कि बस इतना ही साथ था और एक राहत की कि चलो जो हुआ, अच्छा हुआ, बाद में ऐसा हो जाता तो क्या बचाव था.

आज ऐसे ही ऊहापोह में फंसी, अपनी ही छवि को देखकर शांत है मल्लिका. ऐसा नहीं है कि मलाल नहीं है, मलाल है. अब यह पूरी तरह स्वीकार भी कर लिया गया है कि उसने विवाह नहीं किया. घोषित यह है करियर की ख़ातिर नहीं किया, अब पैतीस की उम्र में वर की खोज करना माता-पिता, नाते-रिश्तेदारों ने भी छोड़ दिया है, तब तो उम्र भी सत्ताईस थी और अक्सर माता-पिता की फटकार होती थी कि कब करोगी शादी, उम्र निकली जा रही है. तब अपनी सूरत, काबिलीयत, पद, पैसे, हैसियत, घर-परिवार सबका गुमान था रिश्तों की क्या कमी, उसे देखकर 'न' कोई नहीं कह सकता. 'हां' कहने का विशेषाधिकार उसके पास ही सुरक्षित है. माता-पिता भारत में है, वह अमेरिका में एक मल्टी-नेशनल कंपनी में उच्च पद पर है. एम. बी. ए. के बाद नौकरी आसानी से मिलनी ही थी. मिली. घर-परिवार का बखेड़ा नहीं. अविवाहित, माता-पिता दोनों की ओर से खुली छूट मिली हुई थी कि जिससे करना चाहे बस बता दे, धूमधाम से शादी कर देंगे, धर्म जाति-प्रांत का बंधन नहीं है, बस अगर भारतीय हो, तो ज़्यादा अच्छा है.

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अगर किसी और देश का हो, तो एतराज़ उसमें भी नहीं, किंतु ऐसा न हो कि आगे चलकर एडजस्टमेंट में दिक्क़त हो, खान-पान, संस्कार सब अलग होंगे.

जब खुली छूट थी तब कोई नज़र न चढ़ता था. क्योंकि पांव ज़मीन पर न थे और निगाहें आसमान पर थीं. ग्रीन कार्ड होल्डर कन्या, पिता आईएएस, कन्या स्वयं इतनी काबिल, कमी क्या थी. आए दिन किसी न किसी लड़के के प्रस्ताव के बारे में घर में चर्चा हो ही जाती. आंखों में कुछ ऐसी चकाचौंध सी समाई थी कि कुछ जंचता ही नहीं था.

ऐसे में अचानक लाल गुलाब महकने लगे थे. प्रेम नहीं कह सकते इसे, आकर्षण मानें, मल्लिका सुंदर, आकर्षक, युवा... पांवों के नीचे कइयों के दिल होंगे ऐसा कहते थे लोग. गाना था न एक 'मेरा दिल खो गया है कहीं, आप के पांव के नीचे तो नहीं...' बस समझिए इसी गाने का मानवीय चित्रण करना हो तो मल्लिका की रूपर्गीवता छवि सामने आ खड़ी होगी. सुंदर, सुघड़, सुशील, सजा-संवरा व्यक्तित्व मल्लिका नाम को एकदम सही चित्रित करता हुआ. लोग आकर्षित होते हैं, रीझते भी हैं, यह सब पहचानना कठिन काम नहीं होता. परिचय बढ़ाने की कोशिश भी करते, ऐसे में बेशब्द अस्वीकृति का सरूर और दूसरे को आहत देखने में आनंद आता. अपने सौंदर्य और क्षमता के उपवन में विचरण करती मल्लिका के उस साम्राज्य में फूलों से लदी शाखें लचकने लगी थीं. दूसरी या तीसरी मुलाक़ात ही रही होगी, जब सत्यप्रिय ने थोड़ा झुककर एक अधखिला गुलाब भेंट किया था.

"मेरा नाम सत्यप्रिय है और इलाहाबाद से हूं और आप?.." ठगी सी रह गई थी मल्लिका, यही तो है स्वप्न-पुरुष.

इसी धीर-गंभीर, शांत, सुदर्शन स्वप्न-पुरुष की प्रतीक्षा में ही तो नहीं टालती रही थी सभी प्रस्ताव. दोनों ही ओर से 'ओ. के.' पहली ही नज़र में हो गया था. हाथ पकड़कर प्रेमालाप किया हो या साथ जीने-मरने की क़सम खाई हो, ऐसा भी नहीं था. शायद बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ समझ लेने की शक्ति भगवान ने मनुष्य को बख़्श रखी है, किशोरवय सा प्रेम तो नहीं था यह किंतु प्रेम की कोपलें किसी भी उम्र में फूट सकती हैं, यह तभी जाना था मल्लिका ने.

"मैं इंडिया जा रहा हूं, सोचता हूं आपके पैरेंट्स से भी मिलता आऊं."

"क्यों?" जान-बूझकर अनजान बनी थी मल्लिका.

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"सब तय करने, आई मीन, फॉर्मली तय करने!" न विवाह का प्रस्ताव रखा गया, न इस बारे में कुछ स्पष्ट सी बात हुई. बस फोन कर दिया घर कि सत्यप्रिय मिलने आएंगे, इलाहाबाद आते हुए.

संकेत समझा गया, घर में वही आवभगत, जो भावी दामाद को मिलनी चाहिए, मना किसको करनी थी. न सत्यप्रिय को, न मल्लिका के परिवार को. दो सप्ताह बीतने में लगता, तो दो सप्ताह का ही समय है, किंतु मल्लिका को दो सप्ताह, दो महीने या दो बरस की तरह लगे. आशा थी कि लौटते हुए पहले मल्लिका से मिलने आएंगे सत्यप्रिय, अब तो अनजान की तरह नहीं, अपने की तरह मुलाक़ात हो सकेगी.

सत्यप्रिय नहीं आए, उनका फोन आया, "अपनी छोटी बहन की शादी की बात कर सकोगी?" नश्तर सा चुभ गया दिल में. जूही तो पांच साल छोटी है, कली सी है. अभी तो पढ़ाई चली ही आ रही है. फिर किसी ने सोचा भी नहीं कि जूही की शादी... अभी तो बड़ी मल्लिका की शादी भी नहीं हुई है. जुही में अपने 'स्व' का गुमान नहीं है, सिर्फ़ सहज संकोच है. सत्यप्रिय को वही भा गई है. पता नहीं मन को कितना समझाया कि छोटी बहन के सौभाग्य से क्यों गिला कर रही है वह, बहन के लिए मन में ईर्ष्या महसूस हो रही है, इसे पहचानकर अपने ऊपर शर्म भी बहुत आई थी. ऐसी स्वार्थी तो नहीं है मल्लिका, दूसरे ही पल अपनी शिराओं में खून खौलता सा लगा. यह जूही को स्वीकार नहीं है, यह मल्लिका को रिजेक्ट करना है.

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दर्पण में अपना प्रतिबिंब देखती मल्लिका ने अपने आप से सवाल पूछा था कि क्या है ऐसा, जो रिजेक्ट किया जा सके, चेहरे पर एक पकापन है, पद की गरिमा है. जूही में भोलापन घुला सौंदर्य है, छोटी है. छोटी कहां, इक्कीस बरस की है. शादी की उम्र तो उसकी भी हो गई, सत्यप्रिय अगर मल्लिका के लिए सुपात्र है, तो जूही के भी लिए सुपात्र है, पर इससे उसकी पात्रता घट तो नहीं जाती?

"घट जाती है..." जूही ने लिखा था, "आज मुझे देखकर वह तुम्हें भूल सकता है, तो कल किसी और के कारण मुझसे विमुख हो सकता है. व्यक्ति में दूसरे के प्रति जो ईमानदारी होनी चाहिए, उसकी तो कमी है. ऐसा व्यक्ति मुझे किसी भी रूप में स्वीकार नहीं है." जूही ने अस्वीकृति दी है यह बात मरहम सी नहीं लगी थी. अपनी पराजय का दंश तो कम नहीं हुआ.

इसके बाद पता तो नहीं किया कि सत्यप्रिय हैं कहां, किस हाल में हैं. अच्छे ही होंगे. ऐसा समझदार आदमी कभी देवदास नहीं बन सकता, न ऐसा दीवाना बन सकता है कि कोई पत्थर से मारने लगे. ज़िंदगी अपनी जगह सबके लिए सही चलती है. धरती अपनी धुरी पर ठीक!ठाक घूमती है. सत्यप्रिय के बारे में तो कुछ पता नहीं, पर जूही अपने घर संसार में मगन है.

मगन तो मल्लिका भी है. अपने काम का नशा है, पद का गुमान है, अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझती है. वह कुर्सी पर नहीं विराजती, कुर्सी अपने पूरेपन से उसके पूरेपन पर हावी रहती है. वह कहती है कि उसने करियर के लिए शादी वगैरह का झमेला नहीं पाला. जिन्हें जीवन में कुछ ज़्यादा पाना होता है वह इन साधारण बातों में नहीं पड़ते, 'दीज़ मैरिड वीमेन... नौकरी करती क्यों है, जब हमेशा घर-बच्चे ही इनके दिमाग़ में घुसे रहते हैं..." वह बड़ी सख़्त प्रशासक है और नियम की पक्की.

इस सबके पीछे यदि मैं लिख दूं कि उसकी मेज की दराज़ में गुलाब के सूखे फूल हैं कुछ, जो सहेजकर संभालकर रखे हैं और अक्सर जब वह उन्हें छूती है तो उसके मन में अब आत्महत्या या हत्या का विचार नहीं आता, बस आंखों में आंसुओं की नमी सी आ जाती है तो क्या आप इस पर विश्वास कर लेंगे?

वह कायदे-क़ानून की पक्की एक बहुत सख़्त प्रशासक है.

- अलका पाठक

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