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कहानी- सुखद सत्य (Short Story- Sukhad Satya)

"शुक्र है, अपने प्रेमी के पत्र को पहचान तो लिया है तुमने, भोले-भाले चेहरे के पीछे इतना कपट भी हो सकता है, कौन सोच सकता था. तुमने मुझसे विश्वासघात किया है. मैं तुम्हें कभी क्षमा नहीं करूंगा... कभी नहीं."

आसमान का सूरज लाल होकर कब का अदृश्य हो चुका था, मगर यह पहला अवसर था कि अंधेरा घिर आने के बाद भी वसुधा का सूरज घर नहीं लौटा था. प्रतीक्षा करते-करते वसुधा को कुछ बेचैनी-सी होने लगी थी.

विवाह के पिछले एक वर्ष में ऐसा कभी भी नहीं हुआ था, सूरज के अस्त होने से पहले ही उसका अपना सूरज घर लौट कर अपनी रोशनी बिखेरने लगता था. आज की इस देर का कारण उसकी समझ में नहीं आ रहा था, मगर फिर भी वह ईश्वर से सब कुछ ठीक-ठाक होने की प्रार्थना अवश्य करने लगी थी.

सोचते-विचारते उसे याद आ गया था कि सुबह दफ़्तर जाते समय भी सूरज कुछ गंभीर सा था. सदा की तरह दफ़्तर जाते समय की मोहक मुस्कुराहट उसके चेहरे पर नहीं आई थी. उस समय तो वसुधा इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दे पाई थी. मगर अब सोचने लगी थी कि शायद सूरज के मन में कोई न कोई परेशानी अवश्य थी. दफ़्तर के काम की परेशानी हो सकती थी, जिसकी चर्चा वसुधा से करना उसने ठीक नहीं समझा होगा, और अब उसी कारण उसे देर हो रही होगी.

वसुधा के मन में विचारों का तूफान आता और जाता रहा. यह सिलसिला तब ही टूटा जब सूरज ने घर के अंदर कदम रखा. उस समय रात के आठ बज चुके थे.

"तुम सोई नहीं? जाओ, जाकर सो जाओ."

सूरज ने घर के अन्दर प्रवेश करते ही लापरवाही के साथ कहा और अपने कमरे की ओर बढ़ गया.

वसुधा बुरी तरह से चौंक पड़ी. शराब की गन्ध का एक तेज भभका उसने महसूस कर लिया था और सूरज के कदमों की लड़खड़ाहट अब वह स्पष्ट रूप से देख रही थी.

"यह... यह क्या? आप और था. शराब!?"

विस्मित-सी वह प्रश्न भी ठीक ढंग से नहीं पूछ पाई.

सूरज सीधे कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गया था.

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"हां, मैंने शराब पी है, पीना तो ज़हर चाहिए था, मगर मैंने केवल शराब पी है. जब मन जलता है, दिमाग़ में जलजला आता है और आत्मा संसार से भाग जाना चाहती है तो आदमी के लिए ज़हर ही दवा का काम करता है... मगर जो कायर ज़हर नहीं पी सकते, सुना है उनको सहारा एक मात्र शराब ही दे सकती है, और मैंने भी शराब पी ली है."

सूरज के मुंह से विचित्र से संवाद निकलने लगे पैन्यूली, जिनका अर्थ समझ पाना वसुधा के लिए असम्भव-सा ही था.

वह सूरज से पूछना तो बहुत कुछ चाहती थी, मगर उस पर धीरे-धीरे नशा गहराता देखकर उसने उस समय चुप रहना ही ठीक समझा था.

"चलिए, खाना खा लीजिए." कुछ सोचकर उसने कहा.

"तुम खाओ, और जाकर सो जाओ. मैं खाना खाकर आया हूं."

"यह क्या हो गया है आपको? मैंने आपके बिना कभी खाना खाया है, ऐसा पहले हुआ है क्या?"

"बस, बस, यह सब ढकोसला करने की आवश्यकता नहीं है. अकेले नहीं खा सकती, तो आकाश के साथ बैठ कर खाओ, उसके ख़्यालों में डूब कर खाओ और फिर उसी के ख़्यालों में डूब कर सो जाओ."

सूरज बोल पड़ा था और फिर जलती निगाहों से वसुधा को घूरने लगा था. अप्रत्याशित सी बात सुनकर वसुधा अचानक सकपका कर रह गई थी.

"आकाश... कौन आकाश?" उसके मुंह से यही निकल सका था.

"बहुत ख़ूब जो मुझे पूछना चाहिए, वह तुम पूछ रही हो?"

सूरज का स्वर अचानक विषैला हो गया.

"मैं... मैं... किसी आकाश को नहीं जानती."

कहने को तो वह कह गई थी, मगर स्वर की कंपकंपाहट को छिपाने में सफल नहीं हो पाई थी.

"नहीं जानती, तो फिर यह क्या है?"

सूरज ने घृणायुक्त कटाक्ष भाव से एक काग़ज़ उसकी ओर बढ़ा दिया था.

काग़ज़ पर दृष्टि पड़ते ही वसुधा की सारी शक्ति ही क्षीण हो गई थी.

"ये... ये... आपके पास कहां से आया?" वह कांपते हुए बोली थी.

"शुक्र है, अपने प्रेमी के पत्र को पहचान तो लिया है तुमने, भोले-भाले चेहरे के पीछे इतना बड़ा कपट भी हो सकता है, कौन सोच सकता था. तुमने मुझसे विश्वासघात किया है. मैं तुम्हें कभी क्षमा नहीं करूंगा, कभी नहीं."

सूरज घृणा के साथ बोला तो वसुधा की आंखों में आंसू आ गए थे.

"मैंने आपके साथ कोई विश्वासघात नहीं..."

उसने कहना चाहा था, मगर सूरज उसकी बात को बीच में ही काटकर बुरी तरह चीख पड़ा था.

"मेरे सामने यह त्रिया चरित्र दिखाने की आवश्यकता नहीं है. मेरी नज़रों से दूर हो जाओ."

वसुधा बुरी तरह से सहम गई थी और रोते हुए दूसरे कमरे में भाग गई थी. शेष पूरी रात रोते-रोते ही बीती थी.

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अतीत के जिस कड़वे पन्ने को वह भूल चुकी थी, वह अचानक इस तरह से सामने औरआकर उसके वर्तमान को तहस-नहस कर देगा, उसने सोचा भी नहीं था.

आकाश नाम का युवक उसके जीवन में आया अवश्य था, मगर जल्दी ही उसकी वास्तविकता भी सामने आ गई थी. आकाश की प्रवृत्ति किसी भंवरे की तरह ही थी. यह पता चलते ही वसुधा ने उसे बुरी तरह से लताड़ा था. और उसके लिखे सारे पत्र उसी के सामने फाड़ कर नाली में फेंक दिए थे. आकाश बस मुस्कुरा कर रह गया था. और "तू नहीं, और सही और नही और सही" वाले भाव के साथ सदा-सदा के लिए ही उसके सामने से चला गया था.

उसके बाद वसुधा धीर-गंभीर हो गई थी और एक परिचित के विवाह समारोह में उसका यही गुण सूरज को भा गया था. सूरज के अन्दर भी ऐसा कुछ था कि जब वह उसके मन में प्रवेश‌ की

खिड़कियां बन्द नहीं कर पाई थी.

पहली आकस्मिक मुलाक़ात ने दोनों के मन में दूसरी मुलाक़ात की अभिलाषा जगा दी थी और फिर यह सिलसिला ही चल पड़ा था. इसकी भनक परिवार जनों को मिली, तो इसकी सुखद परिणति सामने आ गई थी,

वसुधा दुल्हन बन कर सूरज के घर में अ गई थी, और समय पंख लगाकर उड़ान भरने लगा था, मगर आज आकाश का एक पत्र सूरज के हाथ में आ गया था और सारा सुख संसार अविश्वास की भेंट चढ़ने को तैयार होने लगा था.

यह पत्र सूरज के हाथ कैसे लग गया था, उसकी समझ से परे था, मगर यह बात अब उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी, जितनी उस पत्र के कारण सूरज के मन में आई ग़लतफहमी को दूर करना था. उसने दूसरे दिन सूरज को सब कुछ बताने का निर्णय ले लिया था.

दूसरी सुबह सूरज पर शराब का नशा तो नहीं था, मगर उसके चेहरे की गंभीरता में किसी भी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं था. वसुधा से कोई भी बात किए बिना वह चुपचाप तैयार होकर अपेक्षाकृत कुछ जल्दी ही दफ़्तर चला गया था. वसुधा लाख चाहते हुए भी उससे कुछ बात नहीं कर पाई थी.

शाम को सूरज फिर देर से घर लौटा था और वसुधा के अक्षम्य विश्वासघात के विषय में अकेले ही बड़बड़ाते हुए सो गया था. खाना पीना तो उसने घर में एकदम बंद ही कर दिया था. अगले तीन-चार दिन इसी प्रकार निकल गए.

रविवार का पूरा समय सूरज, वसुधा के साथ ही बिताता था, मगर इस बार रविवार की सुबह-सुबह भी वह कहीं जाने की तैयारी करने लगा था.

उसे बाहर निकलता देख वसुधा लगभग उसका रास्ता रोकते हुए सामने आ गई थी और दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी थी.

"भगवान के लिए मेरी एक छोटी सी भूल के लिए मुझे और अपने आपको इतनी बड़ी सज़ा मत दीजिए, कम से कम एक बार तो मेरी बात सुन लीजिए."

"किस भूल के विषय में बात कर रही हो. आकाश से सम्बन्ध रखने वाली भूल, उसका पत्र अपनी आलमारी में छिपाकर रखने वाली भूल या फिर मुझे मूर्ख समझने वाली भूल... मैं जानता हूं जब चोर प्रमाण सहित पकड़ा जाता है, तो सच्चाई स्वीकार करने में ही अपनी भलाई समझता है और उस सच्चाई को किसी विवशता का लबादा पहना देता है. तुम भी ऐसी ही कोई बात कहोगी. मगर अब कहने सुनने से लाभ ही क्या है? विश्वास की धरती पर अविश्वास की एक छोटी-सी दरार भी पूरी धरती को बंजर बना देती है."

"मैंने आपसे कोई छल या कपट नहीं किया है. आकाश मेरे जीवन में आया अवश्य था, मगर उसी प्रकार चला भी गया था. मैं अपने पेट में पल रही आपकी तीन माह की निशानी की सौगन्ध खाकर कहती हूं."

सूरज थोड़ा सा चौंक पड़ा था और वसुधा उसे सब कुछ सच-सच बताती चली गई थी. सारी बातें सुनते हुए सूरज का चेहरा गंभीर ही बना रहा था.

"अगर तुम्हारे मन में कोई चोर नहीं था, तो तुमने इतने दिनों तक यह बात मुझसे छिपाए क्यों रखी?" उसने पूछा.

"आपसे मिलने के बाद तो यह बात स्वयं मुझे भी याद नहीं थी. इसलिए इसमें छिपाने वाली तो कोई बात ही नहीं थी."

वसुधा ने निर्भीकता से उत्तर दिया, मगर सूरज के चेहरे पर शंका के बादल ज्यों के त्यों मंडराते रहे.

"तुम्हारी बात अगर सत्य भी है, तो भी एक पति की भावना को तुम नहीं समझ सकतीं. पति के लिए यह सहन करना कितना कठिन होता है कि उसकी पत्नी पहले किसी और से प्रेम करती थी."

उसने कहा और फिर घर से बाहर निकल गया था. शाम को फिर देर से घर लौटा था.

वसुधा ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की मगर सूरज के मन में पड़ी दरार को पाटने में सफल नहीं हो सकी.

आकाश का नाम वक़्त-बेवक़्त उनके बीच आने लगा था. और दोनों के बीच दूरी बढ़ने लगी थी, दोनों का जीवन किसी मशीन जैसा हो गया था. हारकर वसुधा ने भी इसे ही अपना भाग्य मान लिया था.

थकी-हारी और अपराधबोध से ग्रस्त वह एक दिन शाम को रसोई के काम में व्यस्त थी कि अचानक बाहर से सूरज की हर्षयुक्त आवाज़ सुनकर चौंक पड़ी. ऐसी आवाज़ सूरज के गले से बहुत दिनों बाद निकली थी. वसुधा स्वयं को रोक नहीं पाई और बाहर आ गई. बाहर सूरज किसी युवक से हंस-हंसकर बातें कर रहा था.

"ओह, राकेशा अचानक तुम्हें अपने सामने देखकर विश्वास नहीं आ रहा है. बिना कोई सूचना दिए इस तरह अचानक चले आए तुम?"

"मित्र का घर तो अपना घर होता है, वहां पहुंचने के लिए सूचना देने की क्या आवश्यकता है? वैसे मैं सूचना देकर तो नहीं आया, मगर एक सूचना देने अवश्य आया हूं." राकेश ने उत्तर दिया था.

वसुधा समझ गई थी कि सूरज का कोई घनिष्ठ मित्र घर पर आया है. वह अन्दर जाने लगी थी.

"... मगर भाभी जी कहां हैं भाई?"

उसी समय राकेश का स्वर उसे सुनाई पड़ गया था और वह रुक गई थी. सूरज ने भी आवाज देकर उसे बुला लिया था और राकेश से उसका परिचय कराने लगा था, "ओहो! भाभीजी प्रणाम! में राकेश सूरज का लंगोटिया यार. आप चाय वाय के चक्कर में मत पड़िएगा. सीधे स्वादिष्ट-सा भोजन ही बनाइए, क्योंकि मुझे आज रात यहीं रहना है."

राकेश ने सीधे-सीधे कहा था, तो वसुधा भी अपनी हंसी नहीं रोक पाई थी,

"अच्छा बताओ! किस प्रकार की सूचना देने आए हो तुम?"

सूरज ने राकेश से पूछा, तो वह हंसने लगा था.

"जल्दी क्या है, बता देंगे. अभी तो बतियाने के लिए पूरी रात पड़ी है."

वह बोला तो मुस्कुराती हुई वसुधा रसोईघर की ओर चल पड़ी थी, दोनों मित्र बातें करने में व्यस्त हो गए थे.

उस दिन वसुधा ने बहुत ही अच्छा खाना बनाया, खाते समय राकेश ने पता नहीं कितनी बार प्रशंसा की थी और अन्त में कह उठा था. "वाह भाभी वाह! सूरज की सेहत का राज़ तो मेरी समझ में आ गया है. अब कृपा करके मेरी पत्नी को भी यह कला सिखा देना."

"तुम्हारी पत्नी! तुमने शादी कर ली है क्या?"

वसुधा के स्थान पर सूरज ने चौंक कर पूछा.

"की तो नहीं मगर करने वाला हूं और तुम्हें उसी का निमंत्रण देने यहां आया हूं."

वह उठा और एक सुन्दर-सा कार्ड सूरज की ओर बढ़ाते हुए बोला, "बिना किसी बहाने के भाभीजी को साथ लेकर ज़रूर आना सूरज." सूरज गर्दन हिलाते हुए कार्ड पढ़ने लगा.

"अरे! तुम्हारी शादी निशा से हो रही है?" सूरज चौंकते हुए बोला.

"हां, मगर तुम क्यों चौंक रहे हो? मुझे अपने प्रेम पर विश्वास था और देखो अन्त में मेरा प्रेम जीत ही गया है."

"हां, हां, मुझे मालूम है, तुम निशा को बहुत चाहते थे, मगर तुमने ही तो बताया था कि निशा किसी पवन नाम के युवक से..."

"हां, वह भी सच था, मगर क्षणिक सच. इससे पहले कि मेरा मन पूरी तरह से टूटता पवन ने अपनी असलियत दिखा दी थी और निशा को धोखा देकर कहीं गायब हो गया था. निशा का मन उसके कारण टूट गया था. बस अपना रास्ता साफ़ हो गया था. थोड़ा मुश्किल से ही सही, मगर निशा ने मेरा प्यार स्वीकार कर ही लिया है."

राकेश ने गर्वयुक्त प्रसन्नता के साथ बताया, तो सूरज किसी सोच में पड़ गया, वसुधा बर्तन समेट कर अन्दर चली गई,

"तुम किस सोच में डूब गए भाई?" कुछ देर की चुप्पी के बाद राकेश ही बोला.

"कुछ नहीं..."

"कुछ तो है. नहीं तो यह चुप्पी कैसी? कहीं मेरी शादी में न आने का कोई बहाना तो नहीं ढूंढ़ रहे हो?" राकेश हंस पड़ा था.

"नहीं यार, फिर भी सोच रहा था कि फ़ैसला तो तुम्हारा है मगर फिर भी यह जानते हुए भी कि निशा किसी और से प्रेम करती थी, तुम उसे अपनाने को तैयार हो गए ..?"

"अरे, इससे क्या लेना देना? अब तो वह केवल मुझसे प्रेम करती है और फिर प्रेम करने पर  किसका अधिकार नहीं है. मैं अगर निशा से करता था, तो वह किसी और से कर सकती थी, वह तो मेरा भाग्य अच्छा था. वैसे तुम भी तो एक बार किरन नाम की एक लड़की के दीवाने हो गए थे." राकेश फिर हंस पड़ा था.

"वह... वह तो मेरा बचपना था यार!" मुश्किल से ही सही मगर सूरज को भी हंसना पड़ गया था.

"तुम बचपना कर सकते हो, तो दूसरा क्यों नहीं कर सकता?" इस बात पर सूरज निरुत्तर-सा हो गया था,

"फिर भी यदि विवाह के बाद यदि तुम्हें पवन वाली बात कभी-कभी चुभने लगे, तो कैसे मैनेज करोगे?" कुछ समय बाद सूरज ने धीमे से पूछा.

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"क्यों चुभेगी भाई! जब वह सब निशा को ही याद नहीं है, तो मुझे क्यों याद आएगा वह पन्ना एक दुखद सत्य था उसे भूलकर हम अपने वर्तमान सुखद सत्य को ही याद रखें और सुखद सत्य यही है कि में और निशा एक दूसरे से प्यार करते हैं."

राकेश ने उत्साह के साथ कहा था और फिर सोने चला गया था.

सोने के लिए तो सूरज भी चला गया था, मगर राकेश की बातों ने उसकी नींद नायब कर दी थी. दिमाग़ में एक के बाद एक विचार आते चले गए.

राकेश और उसके जीवन में कितनी बड़ी समानता थी और कितना बड़ा अन्तर. जिस बात को जानने के बाद वह वसुधा को बेवफ़ा समझने लगा था, उसी बात को पहले से ही अच्छी तरह जानते हुए राकेश खुले मन से निशा को स्वीकार कर रहा था.

सुखद सत्य का अर्थ भी समझ में आने लगा था, वसुधा और उसका प्रेम भी तो उनका वर्तमान सुखद सत्य था. आकाश और पवन जैसे भंवरे अगर संसार में होते हैं, तो राकेश जैसे सुलझे हुए लोगों से भी यह दुनिया भरी पड़ी है.

तब वह राकेश क्यों नहीं बन सका? जिस काले पन्ने को सिरे से भूल कर वसुधा ने अपना सब कुछ उस पर न्यौछावर कर दिया था, उसी को पुनः कुरेद कर उसे कौन सा सुख मिल रहा था? जीवन तो वसुधा के साथ ही बिताना था और इसे सुखद सत्य के सहारे ही बिताया जा सकता था. राकेश की बातें अच्छी तरह से उसकी समझ में आने लगी थीं.

पास ही में आंखें बंद किए वसुधा लेटी हुई थी. चेहरे पर छाया असीम भोलापन, छल-कपट से कहीं दूर दिखाई देने लगा था. सूरज के मन की सारी संकीर्णता बाहर निकल गई, तो उससे रहा नहीं गया, एक हाथ आगे बढ़ाकर वह वसुधा का माथा सहलाने लगा.

"क्या सोच रहे हैं आप?" वसुधा ने तुरंत ही आंखें खोलकर उससे पूछ लिया.

सूरज बहुत समय तक अपलक उसके चेहरे को निहारता रहा, फिर गहरी सांस लेकर बोला, वह,‌ "कुछ नहीं. राकेश की शादी में तो चलोगी न मेरे साथ?"

"क्यों नहीं! आपके साथ तो कहीं भी चलूंगी, वैसे भी राकेश भैया के विवाह का कार्ड हमारे लिए केवल निमंत्रण पत्र नहीं है. हमारे जीवन में फिर से बहारें लाने वाला कार्ड है वह. आप दोनों की सारी बातें सुनती रही हूं मैं."

वसुधा मुस्कुरा पड़ी. सूरज भी मुस्कुराया, फिर तुरन्त ही भावुक होकर बोला-

"मेरी मूर्खता को क्षमा करना वसुधा! न जाने क्यों मैं आकाश जैसे नाम से ईर्ष्या करने लगा था. जबकि ईर्ष्या तो उन जैसे लोगों को मुझसे करनी चाहिए, क्योंकि वे खाली हाथ हैं और मेरे पास तुम हो."

"अब छोड़िए भी इन बातों को."

वसुधा ने कहा और अपने नेत्र बंद कर दिए, सूरज ने भी धीरे से अपने होंठ उसके माथे पर टिका दिए थे.

- शक्ति पैन्यूली

कहानी- सुखद सत्य

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