वह मेरे जीवन का नायक नहीं है. वह मेरे जीवन का आधार है और आधार अक्सर दिखता नहीं. वह बस होता है- चुपचाप, अडिग. मैं उसके प्रेम में डूबी नहीं हूं. डूबना अस्थिर होता है, उसमें घबराहट भी होती है.
मैं उसके प्रेम में बसी हूं, जैसे कोई घर में बसता है...
आज सोच रही हूं अगर कोई मुझसे पूछे कि तुम उससे प्रेम क्यों करती हो, तो क्या जवाब दूंगी? क्या कहूंगी कि वह असाधारण है? नहीं. क्या कहूंगी कि उसने मेरे लिए दुनिया बदल दी? यह भी नहीं... सच तो यह है कि उसने मेरे लिए कुछ भी नाटकीय नहीं किया. उसने पहाड़ नहीं हटाए, समंदर नहीं पार किए. उसने बस मेरे साथ चलना चुना... बराबरी से, बिना मुझे पीछे छोड़े, बिना मुझे आगे धकेले.
वह बहुत साधारण है. सुबह उठकर वही चाय, वही अख़बार, वही दफ़्तर की भागदौड़. लौटते समय सब्ज़ी लेते हुए दाम पर मोलभाव करना. महीने के अंत में हिसाब जोड़ते हुए माथे पर हल्की रेखाएं. उसकी ज़िंदगी में रोमांच कम है, ज़िम्मेदारियां ज़्यादा, लेकिन मैं जब उसे देखती हूं तो मुझे उसके चेहरे पर थकान से ज़्यादा ईमानदारी दिखती है.
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मुझे याद है एक शाम मैं बहुत टूटी हुई थी. वजह बड़ी नहीं थी, पर भीतर का बोझ बहुत था. मैं बोलती जा रही थी, उलझी हुई, बिखरी हुई, शायद कुछ अनुचित भी. वह चुपचाप सुनता रहा. बीच-बीच में उसकी भौंहें सिकुड़तीं, जैसे सब समझ नहीं पा रहा. पर उसने मुझे रोका नहीं. न कहा कि इतनी सी बात है. बस अंत में इतना कहा, “तुम थक गई हो.” उसने मेरी समस्या हल नहीं की, पर उसने मेरी हालत पहचान ली और कभी-कभी, पहचाना जाना ही सबसे बड़ी राहत होता है.
वह मुझे प्रभावित करने की कोशिश नहीं करता. उसे पता भी नहीं कि प्रभाव कैसे डाला जाता है. वह बस अपना होना जानता है. उसके पास प्रेम जताने के बड़े तरी़के नहीं हैं, पर वह यह याद रखता है कि मुझे गुलाब जामुन पसंद है. वह यह देख लेता है कि मेरी आवाज़ में आज थोड़ी थकावट है. उसकी यह छोटी-छोटी सावधानियां मेरे लिए किसी बड़ी घोषणा से कम नहीं. कभी-कभी मैं सोचती हूं, अगर वह थोड़ा और चमकदार होता, थोड़ा और महत्वाकांक्षी, थोड़ा और अभिव्यक्त, तो क्या मैं उससे ज़्यादा ख़ुश होती? शायद नहीं, क्योंकि उसकी चमक कम है, पर स्थिर है. उसकी महत्वाकांक्षा सीमित है, पर उसमें हम शामिल हैं. उसकी अभिव्यक्ति कम है, पर उसका व्यवहार स्पष्ट है. उसने मुझे ऊंचाइयों का वादा नहीं दिया, पर गिरने की इजाज़त भी नहीं दी. उसने मुझे कहा नहीं कि तुम सबसे अलग हो... पर उसने कभी मुझे सामान्य कहकर छोटा भी नहीं किया.
मैं उसके साथ अभिनय नहीं करती. मुझे मज़बूत बने रहने का नाटक नहीं करना पड़ता. अगर मैं चिड़चिड़ी हूं, तो वह इसे मेरे स्वभाव की स्थायी परिभाषा नहीं बनाता. अगर मैं रोती हूं, तो वह मुझे कमज़ोर नहीं कहता. उसके पास समाधान कम हैं, धैर्य ज़्यादा है और धैर्य आज के समय में दुर्लभ है.
लोग पूछते हैं, इतना भी क्या है उसमें?
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मैं सोचती हूं, कैसे समझाऊं कि प्रेम हमेशा कारणों से नहीं होता. वह किसी की उपस्थिति से होता है. उससे होता है कि जब रात के दो बजे अचानक डर लगे, तो कोई बगल में सांस लेता हुआ मिले. उससे होता है कि जब दुनिया थोड़ी कठोर लगे, तो घर का दरवाज़ा खुलते ही कोई परिचित शांति मिल जाए.
वह मेरे जीवन का नायक नहीं है. वह मेरे जीवन का आधार है और आधार अक्सर दिखता नहीं. वह बस होता है- चुपचाप, अडिग. मैं उसके प्रेम में डूबी नहीं हूं. डूबना अस्थिर होता है, उसमें घबराहट भी होती है.
मैं उसके प्रेम में बसी हूं, जैसे कोई घर में बसता है- दीवारों की आदत हो जाती है, रोशनी की दिशा पहचान में आने लगती है और खिड़की से आती हवा अपनेपन का एहसास दिलाती है. कह सकती हूं तुम मेरा प्यार-अफेयर, दोस्त-साथी... सब कुछ हो!
हां, वह साधारण है, पर उसके साथ मेरा जीवन असुरक्षित नहीं है. और शायद एक स्त्री के लिए सबसे बड़ा असाधारण यही है कि उसे कहीं लौटने की जगह मिल जाए, जहां वह हर रूप में स्वीकार हो.
- मेघा राठी

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