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कहानी- गुलाबी गुलाब (Short Story- Gulabi Gulab)

"किस बात के लिए माफ़ी मांगूं? ग़लती तुम्हारी थी या मेरी. गुलाबी गुलाबों का गुलदस्ता मैं लाई थी या तुम. कौन बार-बार यह जतलाने की कोशिश कर रहा है कि तुम्हारे प्यार का रंग फीका पड़ गया है?‌" "तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है मनस्वी, अपनी सोच के दायरों से बाहर निकलो, सब कुछ स्वच्छ व पाक़ नज़र आएगा. न रंग फीके पड़े हैं, न ही प्यार, सब कुछ वैसा ही है." अगम ने उसे बांहों में भरते हुए कहा.

शानदार पार्टी चल रही थी, मित्रों व रिश्तेदारों से घर भरा हुआ था. हालांकि मनस्वी नहीं चाहती थी कि इस तरह का कोई आयोजन किया जाए, लेकिन उसकी छोटी बहन गौरी की ज़िद थी कि शादी की दसवीं सालगिरह धूमधाम से मनानी चाहिए. मनस्वी के दोनों बच्चे भी ज़िद पर अड़ गए थे, लेकिन अगम ने इस बात को लेकर न तो कोई प्रतिक्रिया ही व्यक्त की थी, न ही स्वीकृति या अस्वीकृति का कोई प्रमाण प्रदर्शित किया था, पिछले दो बरसों से उनके रिश्ते के बीच जो तनाव उत्पन्न हो गया था, उसके बाद अगम का तटस्थ रहना स्वाभाविक ही था.

वैसे आजकल मनस्वी जिस मानसिक तनाव व एक तरह के डिप्रेशन व फ्रस्ट्रेशन से गुज़र रही है, उसको देखते हुए चहल-पहल का होना अच्छा ही है, कम-से-कम इससे उसका थोड़ा ध्यान तो बंटेगा.

कितना अर्सा हो गया उसे इस तरह सजे-संवरे देखे. अपने प्रति कितनी लापरवाह हो गई है वह, अगम ने उसे देख सोचा. गौरी ने ज़बर्दस्ती आज उसका मेकअप कर उसकी मनपसंद नींबुए पीले रंग की वह साड़ी उसे पहनाई, जो उसने इस दीवाली पर मनस्वी के लिए ख़रीदी थी. कितनी सुंदर लग रही है.

"हेलो अगम, बधाई हो." अपनी विचारधारा को संयत करते हुए उसने ध्यान पार्टी की ओर लगाया. फिर किसी बात पर खिलखिला उठी थी मनस्वी और उसके मोती जैसे दांतों की पंक्ति झलकने लगी थी. दो साल बाद शायद उसने मनस्वी को इस तरह हंसते देखा है. कहां छिपा लिया है उसने अपनी इस हंसी को, इस अप्रतिम सौंदर्य को... कितना बदल गई है वह!

हाथों में फूलों का गुलदस्ता ले मनस्वी की ओर बढ़ा अगम, उसका दिल चाह रहा था कि बांहों में भर कर उसे चूम ले.

"आई लव यू मनस्वी." गुलदस्ता उसकी ओर बढ़ाते हुए अगम आंखों में प्यार का अनंत सागर लिए, बोला.

"गुलाबी गुलाबों का गुलदस्ता." मनस्वी की आंखें बरस उठीं. पूरा का पूरा गुलदस्ता लेकर उसने समस्त लोगों के सामने उसे कूड़ेदान में डाल दिया.

"तुम अच्छी तरह से जानते हो कि मुझे लाल गुलाब पसंद हैं, ये फीके गुलाबी गुलाब भेंट कर क्या तुम यह जताना चाहते हो कि इनकी तरह तुम्हारा प्यार भी मेरे प्रति हल्का और फीका पड़ गया है? तुमने जान-बूझकर ऐसा किया है, ताकि लोग जान सकें कि तुम अब मुझे प्यार नहीं करते."

"मनस्वी, स्टॉप क्रिएटिंग सीन, लोग देख रहे हैं." अगम परेशान हो उठा कि यह क्या हो रहा है, "देखो, मैं तुम्हें समझा सकता हूं कि कहां ग़लती है, मैं जान-बूझकर गुलाबी गुलाब नहीं लाया. मैंने..."

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"मुझे कुछ नहीं सुनना, कोई सफ़ाई नहीं, कोई दलील नहीं..." रोती हुई मनस्वी उन आंखों से बेख़बर थी, जो उन दोनों को घूर रही थीं.

"गौरी, प्लीज़ टेक हर इन द रूम, मेरे ख़्याल से इसकी तबियत बिगड़ गई है." अगम शर्मिंदगी के एहसास से भर गया था. इन तमाम लोगों के सामने यह सब किया मनस्वी ने, क्या जवाब देगा वह इन सबको.

"रिलैक्स अगम, हम चलते हैं. टेक केयर." सम्मिलित स्वर ने उसे और झिंझोड़ डाला.

"सॉरी, न जाने क्या हो गया था मनस्वी को..."

सन्नाटा-सा छा गया था घर में, बच्चों में घबराहट थी, मम्मी-पापा के बीच कहीं कुछ घट रहा है- कुछ ग़लत या भयावह, इसका उन्हें भान अवश्य हो गया था, पर दोनों के बीच आपसी कट्टी की वजह क्या है, यह उनका अबोध मन अभी समझने में असफ़ल था. बात-बात पर झगड़ते हैं दोनों, पर क्यों? उन्हें तो दोनों ही पसंद हैं, फिर ग़लती कहां हो रही है? अपने ही अनसुलझे सवालों से परेशान दोनों बच्चे सहमे हुए से अपने कमरे में चले गए.

बच्चों के जाते ही अगम ने कूड़ेदान में से गुलदस्ता उठाया और बड़ी ही सावधानी से एक-एक फूल की पत्ती को तोड़ता हुआ उन्हें पैरों से रौंदता गया, मानो सारा आक्रोश उन निर्जीव पत्तियों पर ही निकालना चाहता हो, जो उसके अपमान का कारण बनीं. वह मनस्वी को जितना पास लाने की कोशिश कर रहा है, वह उससे उतनी ही दूर छिटकती जा रही है. आख़िर उसकी क्या ग़लती थी आज. जिस पुष्प विक्रेता से वह हमेशा फूल लेता रहा है, उसी को उसने लाल गुलाब के गुलदस्ते का ऑर्डर दिया था. पर शायद उसके आदमी की गड़बड़ी की वजह से गुलदस्ते बदल गए थे और उसे इस बात का पता चला तो सीधे दुकान पहुंचा था, लेकिन तब तक दुकान बंद हो चुकी थी. एक बार उसका मन हुआ था कि किसी दुकान में जाकर नया गुलदस्ता ले, पर यह सोचकर कि पार्टी में जाने में देर हो जाएगी और यह सोचकर भी कि मनस्वी को सारी बात बताकर वह माफ़ी मांग लेगा, वह घर आ गया था. और यहां... उसने उसे सच्चाई बताने तक का मौक़ा न दिया. कम-से-कम उसकी भावनाओं की कद्र कर ही फूल रख लेती या पार्टी ख़त्म हो जाने का ही इंतज़ार कर लेती, यूं कूड़ेदान में गुलदस्ता फेंक उसके प्यार को आहत तो न करती... उसको अपमान का भागीदार तो न बनाती.

"जीजाजी, मैंने दीदी को नींद की गोली देकर सुला दिया है. बच्चे भी सो गए हैं, आप..." गौरी रुक गई. अगम की पनीली आंखों को देख उसे दीदी पर बड़ा ग़ुस्सा आ रहा था. नाहक ही इनका दिल दुखाया, पर सबसे ज़्यादा आक्रोश उसे स्वयं पर आ रहा था यह सब उसी की वजह से हुआ, लेकिन वह और जीजाजी... छीः कितना अनाप-शनाप सोचती हैं दीदी... अपने मन की पवित्रता व अगम की निश्छलता के कारण ही तो वह आज तक सब कुछ सहती आ रही है, यह सोचकर कि दीदी की परिपक्वता उन्हें अवश्य ही सही राह दिखा देगी, पर अब लगता है सब व्यर्थ है.

"मैं चलती हूं." गौरी ने तटस्थता से कहा.

"रुक जाओ गौरी, सुबह चली जाना." अगम ने अपने दर्द को भीतर ही समेटते हुए कहा.

"नहीं, मेरा जाना ही ठीक होगा, कहीं दीदी सुबह उठकर बीती रात को लेकर फिर कोई नया

बखेड़ा न खड़ा कर दें."

जाती हुई गौरी को देख उसे ख़ुद पर शर्म आई. मनस्वी, जिसे वह जान से ज़्यादा चाहता है, वह उस पर शक करती है और वह भी गौरी को लेकर, वह गौरी, जो उनकी शादी के समय बच्ची थी. उसके बड़े हो जाने से क्या रिश्तों के मायने बदल गए हैं?

बस उसकी संजीदगी, व्यवहार अच्छा लगने के कारण उसे गौरी के साथ समय बिताना अच्छा लगता है. वह उससे बात करते हुए, उसके साथ घूमते हुए वैसा ही महसूस करता है जैसा किसी ऐसी बेटी का बाप जो बच्ची से किशोरी बनकर युवती में तब्दील हो गई है. और जब से मनस्वी ने उन दोनों को लेकर ग़लत सोचना शुरू किया है, तभी से तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई है.

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मनस्वी के बिना जीवन काटने के बारे में तो अगम सोच भी नहीं सकता. न ही उसे इस बात पर विश्वास होता है कि जिस मनस्वी को वह इतने लंबे अर्से से जानता है, वह उसी की ईमानदारी पर शक करेगी. अगम वहीं सोफे पर पसर गया. भरे हुए कमरे के बीच भी कितनी वीरानी लग रही थी. उसके भीतर भी एक भयानक सन्नाटा छा गया था. आख़िर क्यों मनस्वी नादान बन रही है? गौरी तो उनके सामने बच्ची है.

पिछले दो साल से गौरी इसी शहर में नौकरी कर रही है. अकेली रहेगी, यही सोच कर स्वयं मनस्वी ने अपने घर के पास ही एक मकान उसके लिए ढूंढ़ लिया था. बहन नज़दीक ही है, यही उनके मम्मी-पापा के लिए संतुष्टि की बात थी. शुरू-शुरू में मनस्वी भी बेहद ख़ुश थी, पर धीरे-धीरे उसने यह तोहमत लगानी शुरू कर दी कि अगम उसकी उपेक्षा कर रहा है, उसका फ़ायदा उठा रहा है. अगम का विश्वास यह सोचकर और भी आहत हुआ था कि मनस्वी उसे अभी तक नहीं समझ पाई, उसके प्यार की अथाह गहराइयों को माप नहीं सकी, तभी तो गौरी के प्रति उसके लगाव को इस नज़रिए से देखती है. वह उन दोनों के रिश्ते को बाप-बेटी के रिश्ते का दर्ज़ा क्यों नहीं दे पाती, उसे तो अपनी बेटी तपस्वी और गौरी में कोई अंतर नहीं लगता. फिर कहां कमी रह गई है.

बरसों से वे एक-दूसरे को जानते हैं और दस वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं, फिर भी मनस्वी.... अगम का शरीर ही नहीं, वरन् मन भी थका हुआ था, लेकिन नींद कोसों दूर थी. बरसों के सफर पर निकल गया था शायद उसका मन, इससे वह समीकरणों को सुलझाने में सफल हो पाए शायद. ख़ुद को आख़िर कब तक और कितना मथा जा सकता है?

वह और मनस्वी तो बचपन से ही दोस्त थे और प्यार में बदली दोस्ती को निभाने के लिए बहुत जल्दी ही विवाह भी कर लिया था. उन्नीस-बीस वर्ष के रहे होंगे तब... दोनों देखा जाए तो एक साथ ही बड़े हुए हैं, हर क़दम पर साथ चले, कई निर्णय एक साथ किए और अपने भविष्य के फ़ैसले भी साथ-साथ लिये. मनस्वी को अध्यापिका बनने का शौक था, इसलिए एक स्कूल में नौकरी कर ली और वह एक प्राइवेट कंपनी में काम करने लगा. एम.बी.ए. तो उसने बाद में ही किया. अब मैनेजर है एक गैरसरकारी कंपनी में. शादी के छह वर्षों तक उनके जीवन में कोई व्यवधान नहीं था. अपने को अच्छी तरह से स्थापित करने के बाद ही वे बच्चों के बारे में सोचना चाहते थे. फिर दोनों ही बच्चे एक-एक साल के अंतर पर हो गए तो मनस्वी ने उन्हें पालने के लिए नौकरी छोड़ दी. लेकिन वह ख़ुश थी, पर अचानक गौरी के आने से सब गड़बड़ा गया. उसको देखकर उसे महसूस होने लगा कि वह अक्षम है, उसकी काबिलियत की कोई क़ीमत नहीं और फिर एक असुरक्षा की भावना ने उसे जकड़ लिया.

वह बात-बात में अगम से झगड़ा करने लगी. यहां तक कि यह इल्ज़ाम भी लगाने लगी कि उसकी वजह से उसे नौकरी छोड़नी पड़ी. हां, कितना चिल्लाई थी वह इस बात को लेकर, एक नया ही रूप देखा था उसने उस दिन मनस्वी का.

"बच्चे तुम्हारी ज़िम्मेदारी भी तो हैं. तुम चाहते तो उनको संभालने का उत्तरदायित्व कुछ अपने ऊपर लेकर मुझे नौकरी छोड़ने पर मजबूर नहीं करते. लेकिन तुम तो चाहते थे कि मैं तुम पर आश्रित हो जाऊं और तुम मनचाहे ढंग से गुलछर्रे उड़ा सको." वह ग़ुस्से से पागल हो उठी थी.

"स्टॉप टॉकिंग रबिश. तुमने अपनी समस्या की वजह से नौकरी छोड़ी, क्योंकि नई प्रिंसिपल के साथ तुम्हारे सिद्धांत टकरा रहे थे. नई पद्धति को न अपना पाने के कारण तुम बेचारगी और अलग थलग महसूस कर रही थीं, सिर्फ़ इसलिए ही बच्चों की आड़ ले तुमने नौकरी छोड़ी, वरना मैं तो बच्चों को क्रेच में छोड़ने या घर में ही आया रखने को तैयार था."

अगम के स्पष्टीकरण से बिफर पड़ी थी मनस्वी, मानो सच्चाई ने लोहे की गर्म सलाखें दाग दी हों उसके जिस्म पर, पर वह झुकने को तैयार नहीं थी.

"सब बकवास है. हक़ीक़त तो यह है कि तुम नहीं चाहते थे कि मेरी भी एक पहचान हो. घर में बैठकर ऊबती रहूं, यही चाहते हो न तुम?"

"मनस्वी, बचपन से लेकर आज तक तुम्हें हमेशा प्रोत्साहित ही किया है मैंने, फिर क्यों बेमानी बातें सोचकर अपने को सता रही हो? अपने आप को पीड़ा पहुंचाने में तुम क्यों सुकून पाने लगी हो? तुम्हारी पीड़ा हमारी भी पीड़ा है, समझो इसे, मैं वही हूं, जो पहले था, तुम्हारा अगम."

सोफे पर लेटे-लेटे अगम ने बेचैनी से करवट बदली, कितनी बातें हैं जिसके बारे में अगर सोचा जाए तो मन के कांच दरकने लगें. घुटन से अपने को मुक्त रखने के लिए अगम ने नींद का सहारा लिया. हालांकि तब तक रात्रि अपने अंतिम प्रहर तक पहुंचने को आकुल थी.

वातावरण में उपजे शोर को वह सपने में फैला महसूस कर रहा था, क्योंकि नींद अभी पूरी ही कहां हुई थी, लेकिन मनस्वी ने जब उसे झिंझोड़ा तो उसे एहसास हुआ कि वास्तविकता क्या है? "सुबह के साढे नौ बज रहे हैं और जनाब है कि सो रहे हैं. ऑफिस नहीं जाना क्या? बच्चे भी उठ गए हैं." उसकी आवाज़ में झल्लाहट थी.

रात में जो कुछ उसने किया था, उसके प्रति शर्मिंदगी का कोई भाव तक नहीं था उसके चेहरे पर.

"हद हो गई, एक तो तुम्हारी वजह से सारी रात सो नहीं पाया, क्षमा मांगने से तो रहीं ऊपर से झल्ला रही हो तुम मनस्वी?" अगम यकायक चिल्ला उठा था मानो सारा संयम जो उसने अब तक ओढ़ रखा था, वह धीरे-धीरे फिसलने लगा था उसके हाथों से.

"किस बात के लिए माफ़ी मांगूं? ग़लती तुम्हारी थी या मेरी. गुलाबी गुलाबों का गुलदस्ता मैं लाई थी या तुम. कौन बार-बार यह जतलाने की कोशिश कर रहा है कि तुम्हारे प्यार का रंग फीका पड़ गया है?"

"तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है मनस्वी, अपनी सोच के दायरों से बाहर निकलो, सब कुछ स्वच्छ व पाक़ नज़र आएगा. न रंग फीके पड़े हैं, न ही प्यार, सब कुछ वैसा ही है." अगम ने उसे बांहों में भरते हुए कहा.

"मत छुओ मुझे, इन्हीं हाथों ने गौरी को भी न जाने कितनी बार छुआ है."

सहमे हुए बच्चों को देख अगम और किसी विवाद में पड़ने की बजाय चुप हो गया. फ़िलहाल मनस्वी के रवैये को देखकर किसी तरह के बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती थी. अब तो उसने अपने व गौरी के रिश्ते की सफ़ाई देना भी छोड़ दिया है. क़सूरवार को सफ़ाई की ज़रूरत होती है, बेकसूर को नहीं.

बच्चों को तैयार कर, उनका टिफिन पैक कर वह स्कूल छोड़ आया. नन्हीं तपस्वी को तो उसने सिर्फ़ मनस्वी के व्यवहार के कारण स्कूल में डाला था, वरना...

वह नाश्ता तैयार कर ही रहा था कि तभी गौरी आ गई.

"लाइए जीजाजी, मैं बनाए देती हूं. दीदी कैसी हैं अब?" अगम कुछ उत्तर दे पाता, इससे पहले ही मनस्वी वहां आ गई, "तुझे मेरी चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं, न ही यूं सुबह-शाम मेरे घर चक्कर लगाने की ज़रूरत है, बहन का घर ही मिला था तुझे, जा चली जा यहां से." अवाक् गौरी निःशब्द बाहर निकल गई.

"तुम दिन-ब-दिन कितनी फूहड़ होती जा रही हो. क्या एक शिक्षित व संभ्रांत घर की महिला इस तरह बोलती है? दिनभर बेकार औरतों के साथ रह कर तुम भी उन जैसी जाहिल होती जा रही हो. क्या ज़रूरत है तुम्हें उनके बीच बैठने की?" अगम को आसपास की औरतों के साथ बैठकर उसका गप्पे लगाना और अफ़वाहें फैलाना बिल्कुल पसंद न था. उसके बार-बार टोकने पर भी मनस्वी ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया.

"पागल, जाहिल और क्या-क्या कहना बाकी है अभी अगम? ज़हर क्यों नहीं दे देते मुझे?" मनस्वी को फिर आक्रोश का दौरा पड़ा. जब भी अगम उसे कुछ समझाने की कोशिश करता, वह एकदम पागल-सी हो जाती है.

"मनस्वी, मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूं. तुम्हारे उसी रूप को वापस लाना चाहता हूं, जो पहले था. तुम्हारे बिना सब निरर्थक है, हम सब तुम्हें बहुत चाहते हैं."

"नहीं, तुम झूठ बोल रहे हो. कोई मुझसे प्यार नहीं करता, मैं पहले सी सुंदर भी नहीं रही हूं." मनस्वी के बहते आंसुओं से अगम पीड़ित हो गया.

अगम को लगा था कि मनस्वी उसकी बात को समझेगी, लेकिन वह सिर्फ़ चिल्लाने लगी, "कुछ ठीक नहीं हो सकता, सब बिखर गया है, गौरी जवान है, उसके पास अच्छी नौकरी है, मेरे पास क्या है? न सुंदर देह, न नौकरी."

"कितनी बार कह चुका हूं कि मेरे और गौरी के बीच कोई अमर्यादित रिश्ता नहीं है. तुम्हारे दिमाग़ में जो बस गया, उसे तुम्हें ही निकालना होगा. मैं हार गया. फ़ैसला करना चाहती हो करो. दो वर्षों के इस तनावयुक्त जीवन के दौरान तुम्हारी सनक के कारण मैं जीते-जी टूट गया हूं. अब तुम

कहोगी तो बच्चों लेकर मैं कहीं दूर चला जाऊंगा तुमसे?" हताश अगम घर से बाहर निकल गया. उसने सोचा था कि वह आराम करेगा, पर ऐसा सोचना ही व्यर्थ था.

अकेलापन मनस्वी को काटने लगा, ड्रॉइंगरूम की सफ़ाई करते हुए गुलाबी फूलों की नुची, मसली पत्तियों को देखकर वह अपने आपको कोसने लगी. क्या फ़र्क पड़ता है रंग से. ख़ुशबू तो सबकी एक जैसी होती है, लेकिन उसे पता है कि ऐसा अगम ने सिर्फ़ उसे चिढ़ाने के लिए किया था. फिर भी उसे महसूस हुआ कि वे कुचली हुई पत्तियां उसका उपहास उड़ा रही हैं, वापस कूड़ेदान में उन्हें डाल उसने कमरे की सजावट को भी नोच डाला. बिना प्यार के ये सब चीज़ें भी कितनी दिखावटी लगती हैं. कहीं उसी की उमंग, उसी का उत्साह तो नहीं मर गया है, पर पड़ोस वाली आंटी तो बता रही थीं कि अगम अक्सर गौरी के घर जाता है. जब गौरी यहां आती है तो उसे वहां जाने की क्या ज़रूरत है. शक की गुंजाइश तो स्वतः पैदा हो जाती है.

दोनों चाहे लाख क़समें खा लें, पर वह यक़ीन नहीं करने वाली लेकिन अगर कहीं ये सब ग़लत हुआ तो... तब तो कितना बड़ा अनर्थ कर रही है मनस्वी सबके साथ... पर नहीं, वह नहीं मानती. कैसे अगम गौरी के आगे-पीछे घूमता रहता है, उससे कितनी आत्मीयता से बातें करता है, कितने ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाता है, इतना ही नहीं, उसकी मदद करने, उसका कोई काम करने के लिए वह अपना काम तक छोड़ देता है. जब देखो तब उसे गाड़ी में लिफ्ट देता है. गौरी लावण्यमयी है और अकेली भी, न घर की चिंता है, न बच्चों का उत्तरदायित्व, पर हर लड़की एक दिन पत्नी व मां बनती है, तो क्या सबके पति किसी और लड़की के प्रति आकर्षित हो जाते हैं? नहीं, यह तो संभव नहीं...

इसका मतलब है कि कहीं उसकी सोच में ही त्रुटि है. सच बात तो यह है कि वह अपनी स्थितियों से तंग आ गई है. कब मनस्वी कमरे में आकर स्वयं का विश्लेषण करने बैठ गईं, इसका उसे भान तक नहीं हुआ. मानो सन्नाटे ने, ख़ासकर गुलाबों की नुची पत्तियों ने उसे अपने भीतर झांकने के लिए विवश कर दिया हो, घर का सारा काम पड़ा था, किन्तु वह अपने आपको ढूंढ़ने में इतनी खोई थी कि बाहरी परिवेश से सम्पूर्णतया कट गई.

रात को अगम जब लौटा तो उसने दो टिकटें मनस्वी के सामने रख दीं

"कहीं जा रहे हो क्या?" मनस्वी में उससे नज़रें मिलाने का साहस नहीं था.

"हां, हम दोनों कल शाम डलहौजी के लिए रवाना

होंगे, कोई सवाल नहीं, कोई सीन नहीं. मैंने छुट्टियां ले ली हैं, बच्चों को गौरी संभालेगी. उसने भी पंद्रह दिनों की छुट्टी ले ली है." अगम ने तटस्थता से उत्तर दिया और बिना उसकी प्रतिक्रिया जाने या देखे बच्चों के साथ मसरूफ़ हो गया. मनस्वी का दुविधाग्रस्त दिमाग़ काम करने लगा, "मुझसे पूछा तक नहीं, यानी सब गौरी के साथ मिलकर तय किया है." पर जल्दी ही उसने अपने आपको संयत किया और काम में लग गई.

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घर, बच्चे, काम, सबसे दूर डलहौजी में अगम की बांहों में, गौरी के बारे में न सोचते हुए मनस्वी को लगा कि बीते दिन लौट आए हैं. कितना वक़्त बीत गया था दोनों को साथ घूमे, यहां तक कि स्पर्श किए. ऊंची-नीची, चढ़ाव-उतार और हरियाली से भरपूर जगहों पर घूमना उसे पसंद था. दिनभर के साथ, मस्ती और ताजी हवा ने उसके अंदर जमीं काई को साफ़ कर दिया था. उसकी भावनाएं उमड़ने लगीं, जीवन के प्रति ललक जाग उठी, वह एक नई मनस्वी बन गई थी.

डलहौजी में लाल गुलाब के ढेर लगा दिए अगम ने उसके सामने, उसके बाहुपाश में सिमटी मनस्वी ख़ुशी के मारे रो पड़ी. न जाने कितने अवसाद पाल रखे थे उसने, अगम तो उसका है.

"अगम, मैं नहीं जानती कि पिछले दो वर्षों में जो कांटे मैंने तुम्हें चुभाए हैं, उसके बदले में कितनी बार माफ़ी मांगूं, पर जो कुछ मैंने किया, वह अनजाने में ही हुआ, 'डिप्रेशन' से भर गई थी मैं, तभी तो असुरक्षा की भावना मुझे कचोट रही थी. शायद इसीलिए अपनी लापरवाही के खंजरों से तुम्हें लहुलुहान करती रही मैं."

"भूल जाओ मनस्वी, नए सिरे से ज़िंदगी की शुरुआत करने का भी एक मज़ा है. तुम अपनी ही गुफ़ा की क़ैद से निकल गई, यही काफ़ी है. बाकी समीकरणों को हम वापस चल कर हल कर लेंगे." वापस लौटते हुए वह स्वयं में एक बड़ा परिवर्तन महसूस कर रही थी. बच्चों के प्रति उसका मन ममता से भर गया था और गौरी के प्रति उसके मन में संरक्षक का भाव था. फिर भी अगम चाहता था कि मनस्वी लौट कर अपनी कल्पनाओं की गुफ़ा में क़ैद न हो जाए, इसलिए गौरी की मदद ली.

"चलो दीदी, योगा और स्वीमिंग की क्लासेस में जाना शुरू करते हैं." गौरी ने उसे उकसाया. उसे घर से बाहर निकालने में जब वह सफल हो गई तो उसके लिए बढ़िया साड़ियां ख़रीदीं. मनस्वी की देहयष्टि अपने पुराने आकार लेने लगी तो स्वतः ही उसके अंदर अपने को संवारने की इच्छा जागृत हो गई.

"हाय दीदी, क्या गज़ब ढा रही हो." गौरी ने कहा.

"चलो यहां से, कहीं मेरी जान को नज़र न लगा देना." अगम मुस्कुराया,

"जानती हो मनस्वी, मैंने तुम्हारी नौकरी के लिए कई लोगों से कह रखा है, पेपर में भी ढूंढ़ रहा हूं."

"क्या?" मनस्वी अवाक थी.

"मैं... नौकरी... पर कैसे... नहीं-नहीं, बच्चों को कहां छोडूंगी? फिर नौकरी छोड़े चार साल हो गए हैं, सब कुछ बड़ा अजीब लगेगा."

"कुछ अजीब नहीं लगेगा, बच्चों के लिए मैंने आया का इंतज़ाम कर लिया है. वैसे भी मां-बाबू जी को मैंने कुछ दिनों के लिए यहां आने के लिए लिख दिया है, ताकि शुरू-शुरू में न तो बच्चों को अटपटा लगे, न ही अव्यवस्था हो." अगम ने दृढ़ता से कहा.

"पर अगम..." मनस्वी अभी भी विश्वास नहीं कर पा रही थी.

"पर-वर कुछ नहीं, मुझे अपनी उसी मनस्वी की ज़रूरत है, जिसमें आत्मविश्वास हो, जो स्वयं से प्यार करे और हम सब को भी और इसे पाने के लिए में कुछ भी सह सकता हूं."

नौकरी करते-करते मनस्वी को दो माह बीत गए थे, बिल्कुल ही बदल गई थी वह. एक नई चमक से ओतप्रोत थी. सभ्य, संभ्रांत, हंसती हुई, अपने व्यक्तित्व को पा लिया था उसने अपने अस्तित्व की महत्ता का एहसास होते ही उसकी सोई भावनाएं पुनः जागृत हो गई थीं.

अपने आने वाले जन्मदिन के लिए उसे तैयारियां करते देख अगम जान गया था कि मनस्वी ने अपने आपको खोज लिया है.

जन्मदिन वाले दिन जब गुब्बारों के फटने से अगम की आंख खुली तो वह चकित रह गया. बच्चे, मनस्वी, गौरी, सब के हाथ में गुलाबी गुलाबों के गुलदस्ते थे, "हैप्पी बर्थ डे टू यू." का समवेत स्वर उसे आनंदित कर गया.

"पर ये गुलाबी गुलाब?" अगम परेशान हो गया.

"छोड़ो न, रंग में क्या रखा है. बात तो गुलाब की है, उससे निकली ख़ुशबू की है." कहते हुए मनस्वी ने उसे चूम लिया और अपने हाथों से बना मफलर उसके गले में डाल दिया.

- सुमन वाजपेयी

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